Wednesday, June 2, 2010

पिता से आखिरी संवाद-19मई 2010

अन्ततः तुमने अलविदा कह ही दिया,
मेरे जनक ।
जानती हूँ कि अब नही मिलोगे दोबारा।
फिर भी ,
जब तुम्हारी बेवश आँखें,
और पपडाए होंठ,
विदा कह रहे थे सबको,
मै कहना चाहती थी तुमसे ---
रुको ...अभी कुछ और रुको ,
काकाजी ..।
अभी शेष तो रह ही गया ,
अपनी बेटी को प्यार करना
बाँहों में भर कर..।
वह बेटी जो ,
कभी पीछा किया करती थी तुम्हारा ,
दौड-दौड कर...पगडण्डियों पर।
तुम्हारे साथ चलने उँगली थाम कर।
रास्ता छोटा होजाता था,
तुमसे गिनती सीखते या मायने याद करते।
दुलार के लिये तरसती तुम्हारी बेटी,
आज भी वहीं खडी है...उन्ही पथरीली राहों पर,
तलाशती हुई...हर चेहरे में तुम्हारा ही चेहरा ।
ऐसे कैसे जासकते हो तुम ,
अपनी बेटी को यूँ ही अकेली छोड कर ,
सुनसान पगडण्डियों पर ।

(2)
यूँ तो लोगों की नजर में,
अब तुम्हारे होने का अर्थ,
साँस लेना भर था एक कंकाल का
पीडा भरी आँखों में तिल-तिल कर सूखना था
एक नदी का ।
उतर आना था साँझ का,
नियत समय पर।
लेकिन क्यों ....क्यों
नही है स्वीकार्य ,
यूँ फूट पडना नर्मदा और कावेरी का
थार के मरुस्थल में .।
तुम्हारा यूँ चले जाना चुपचाप,
दबे पाँव साँझ के आने की तरह।
नही लगा मुझे अच्छा ,
यूँ कॉपी छुडा लेना,
उत्तर लिखने से पहले ही ।
और बहुत नागवार गुजरा है,
एक बच्ची से ,उसकी गुडिया छीन लेना,
खरीदी थी जो, एक पिता ने ,
मंगलवारी हाट से ...।

5 comments:

  1. अनूठी संवेदना से गुँथी
    इन कविताओं ने अंतर्मन को भिगो दिया!
    --
    एक बेटी की तरफ से अपने पिता के लिए
    इससे अच्छी श्रद्धांजलि तो हो ही नहीं सकती!

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  2. सकारात्‍मक कदम के लिए शुभकामनाएं।

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  3. गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी , आपकी पिता से सम्बन्धित दोनों कविताएँ सचमुच बेजोड़ हैं । और इन पंक्तियों की मार्मिकता रुला देती है- ''यूँ कॉपी छुडा लेना,
    उत्तर लिखने से पहले ही ।
    और बहुत नागवार गुजरा है,
    एक बच्ची से ,उसकी गुडिया छीन लेना,
    खरीदी थी जो, एक पिता ने ,
    मंगलवारी हाट से ...।''

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  4. पहले काकाजी को श्रद्धांजलि फिर आपको नमन....

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  5. मर्मस्पर्शी भाव...!
    आँखें नम हैं!

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