Tuesday, June 15, 2010

मान्या का लिखना तो देखो


मान्या का लिखना तो देखो


मान्या का लिखना तो देखो

काम उसे कितना तो देखो

पेन किसी का हाथ लगा है

यहां वहां घिसना तो देखो


गडबड गोल मकडजालों सी

गुडिया के गुच्छे बालों सी

आडी-तिरछी सी रेखाऐं

झरनों और नदी नालों सी


पढो पढ सको नई इबारत

समझो इसे सिर्फ शरारत

बचपन की चंचल कविता है

कोमल सी मासूम कहावत


कापी से क्या होगा

उसको छत भी पडे पूरी

आंगन चबूतरा लिख डाले

फिर भी बात अधूरी


रचदी हें सारी दीवारें

मम्मी की साडी सलवारें

पीठ खुली पापा की देखी

पल में खींची कई कतारें


चाचा की जो मिली डायरी

नन्हे हाथों नई शायरी

आसमान मांगेगी एक दिन

तारे-चांद लिखेगी अनगिन


3 comments:

  1. लिखने की सही शुरुआत , जहाँ जगह मिले लिख डालो ।इस उम्र पर सारे सपने कुर्बान !काम्बोज

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  2. मान्या की लिखावट ने तो बहुत सुंदर
    पेंटिंग रच डाली!
    --
    मान्या को इस सुंदर पेंटिंग-सा प्यार!

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  3. मनभावन होने के कारण
    "सरस पायस" पर हुई "सरस चर्चा" में

    इन्हें देख मन गाने लगता!

    शीर्षक के अंतर्गत
    इस पोस्ट की चर्चा की गई है!

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