Saturday, July 24, 2010

मैं---कुछ व्यंजनाएं

(१)
शाम के धुँधलके में ,
महानगर की व्यस्त सडक के किनारे,
वाहनों की तेज रफ्तार के बीच,
धुँए के गुबार से घबराया हुआ,
रोशनी के प्रहार से चकराया हुआ,
अजनबी भीड के सैलाब में धकियाया हुआ,
मैं.....
एक अकेला
पैदल यात्री
(२)
मैं ...
एक कहानी ।
अप्रासंगिक ,पुरानी ।
सुनना नहीं चाहता जिसे अब ,कोई भी।
फिर भी सुनाए जा रही है ,
बूढी--बहरी सी जिन्दगी ।
(३)
रिश्तों के दफ्तर में ,
मैं एक कर्मचारी ।
अतिरिक्त,
अनावश्यक,
अनाहूत ।
(४)
मैं...
मैला -कुचैला,
पीठ पर लादे ,
उम्मीदों का थैला ।
असहाय , उन्मन,
एक बचपन ।
कुरेदता रहता है ,कचरे का ढेर ।
तलाशने --लोहा,प्लास्टिक ।
कुछ सपने -अपने ।
(५)
मैं ...
दीपक की लौ,
जल रही है जो,
तेज रोशनी वाले बल्बों के बीच ,
व्यर्थ ही ...।
(६)
मैं ....
एक चालक,
नौसिखिया ,अनाडी ।
रिश्ते.....उफ्,
ब्रेक-फेल गाडी ।
(७)
मैं ....
गए साल का कैलेण्डर,
टँगा रह गया है जो ,भूल से ,
वक्त की दीवार पर ।
(८)
मैं ...
बेहद लापरवाही और,
गैर-जिम्मेदारी से ,
गलत पते पर डाला गया ,
एक पत्र।
पडा है अभीतक कोने में ,
अपठित, उपेक्षित ।
(९)
मैं....
एक अजनबी शहर के चौराहे पर खडा ,
गन्तव्य का नाम पता भूल गया,
एक अनपढ देहाती ।

सन्१९९८ में रचित

1 comment:

  1. एक बेहतरीन रचना
    काबिले तारीफ़ शव्द संयोजन
    बेहतरीन अनूठी कल्पना भावाव्यक्ति
    सुन्दर भावाव्यक्ति .साधुवाद
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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