Thursday, September 9, 2010

मन्नू , मेरा मान
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9 सितम्बर 1982 , कमलाराजा चिकित्सालय (ग्वालियर) । रात्रि साढे दस बजे
पीडा और प्रतीक्षा का कठिन दौर गुजर गया और दे गया एक अनौखा और प्यारा प्रतिफल ---मन्नू(विवेक)

मैं निस्सन्देह व निस्संकोच कहरही हूँ कि मैं अपने दूसरे बच्चे को भी पुत्र के रूप में ही चाहती थी । यह उस परम्परावादी सोच का परिणाम नहीं था ,जिसके अनुसार स्त्री स्वयं स्त्री जाति को जन्म नहीं देना चाहती , बल्कि मेरे जीवन का रूप ही ऐसा था ।---बिटिया साठ , तऊ बाप की नाठ----की सोच वाले परिवेश में , मैं यह बात बडी भयावहता के साथ महसूस कर चुकी थी कि पुत्र की माँ के रूप में ही मेरे अस्तित्व को थोडी-बहुत मान्यता मिल सकती है । और ऐसा हुआ भी ।
हालाँकि किसी की कामना या याचना से कुछ नही होता । यह मानव समाज ( न केवल मध्यमवर्गीय भारतीय समाज ) की प्रक्रति कहें या विडम्बना कि स्त्री के लिये अपनी प्रतिष्ठा व सम्मान हेतु पिता पति या बेटे
का सम्बल आवश्यक ही है । कम से कम जितना मैंने देखा व महसूस किया है , यही पाया है । और तब यह सच है कि मन्नू मेरा मान है , मेरा सम्मान है । भरोसा है और अभिमान है । मन्नू ने मुझे खुशियाँ भी दी हैं और मेरी सार्थकता का बोध भी ।

मन्नू में कई सारी खूबियाँ हैं । अपने दोनों भाइयों ( बडा प्रशान्त , छोटा मयंक ) की तरह सच्चा , ईमानदार, संवेदनशील और स्नेहमय है । कार्य के प्रति गहन उत्तरदाय़ी । और माँ के लिये विशेषरूप सेसजग, चिन्तित । ये गुण तीनों को मुख्यधारा से प्रायः अलग कर देते हैं । इसलिये कभी-कभी अकेलापन भी सालता है । मन्नू में कुछ और भी बातें हैं । कुछ ऐसी कि सोचने पर मजबूर करदें और कुछ हँसने पर -भी । जब वह चलना सीख गया था तब वह अक्सर गाँव में निकल जाता था । हमारा बहुत सारा समय सिर्फ उसे तलाशते बीतता था । गाँव की महिलाएं इस प्रतीक्षा में रहतीं कि कब मन्नू उनके घर जाए और वे उसे छुपाकर मुझे खूब छकाएँ ।
एक दिन जब वह ढाई - तीन साल का ही होगा ,और हम गाँव में ही थे ,छत पर खडे , सूर्यास्त को देख रहे थे । पंछियों की कतारें कल्लोल करती लौट रहीं थी । मन्नू एकदम गुमसुम खडा किसी सोच में डूबा था अचानक बोला ----मम्मी , पता है , सूरज अब कहां जारहा है ।
मैं तो नही जानती , तू ही बता ...।
मम्मी , यह धरती मोती की तरह है ,बीच में सुरंग है । मोती में जैसे धागा डालते है न वैसे ही सूरज बीच सुरंग से निकल कर सुबह दूसरी तरफ पूरब दिशा की ओर पहुँच जाता है ।
भई वाह -----मैं उसकी इस नई कल्पना पर कहे बिना न रह सकी । वर्षा-ऋतु में जब बिजली चमकती थी , वह कहता था----देखो बिजली उछल रही है ।
एकदिन मन्नू को मैंने सब्जी खरीदने भेजा । जब लौटा तो मैंने देखा कि कुछ टमाटर गले थे । और कई भिन्डी एकदम कडक । बेटा देख कर लाना चाहिये ।---मैंने समझाया तो कुछ खिन्न होकर बोला
---मम्मी, जरा सोचो कि सब लोग छाँटकर ले जाएंगे तो बेकार बचे--खुचे को कौन लेगा । इस तरह क्या उस बेचारे का नुक्सान नही होगा । जब मन्नू सातवीं कक्षा में था , उसे एक शिक्षक ने सिर्फ इस बात पर पीट दिया कि उसने अपने साथियों को चाँटा मारने से इन्कार कर दिया था । चाँटा इसलिये कि किसी को सवाल का सही उत्तर नही आया था जो अकेले मन्नू ने दिया था । उसे हफ्तों तक यह मलाल होता रहा कि सही उत्तर का इनाम उसे इतना कडवा और अन्याय पूर्ण मिला । उसका यह मलाल,-- यह कैसा इनाम , फालसे वाला , भडभूजा जैसी छोटी पर सार्थक अभिव्यक्तियों में प्रकट भी हुआ । कोई
आश्चर्य नही कि संवेदनशील लोगों को पग-पग पर ऐसे अनुभव होते रहते हैं , पर वे अपने गुणों से विसंगतियों को परे धकेलकर , जिन्दगी को सरस बनाते रहते हैं । मन्नू के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है । वस्तुतः उसका ह्रदय एक कलाकार का ह्रदय है । और कलाकार भले ही सही राह दिशा न मिलने से कला को विकसित न कर पाए पर कचरे में से भी स्रजन का सामान जुटा लेता है । आज अपने दोनों भाइयों के साथ वह बैंगलुरु में इंजीनियर है । मुझसे उसकी दूरी केवल भौगोलिक ही है । सुबह-शाम उसकी आवाज घर के कोने-कोने को जगाती रहती है , हर पल उसकी याद , मन को महकाती रहती है । सचमुच मन्नू जैसा बेटा पाकर कोई भी ईश्वर और भाग्य को मानने विवश होजाएगा ।



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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,
ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)

4 comments:

  1. बहुत अच्छा लगा - यह सब जानकर!

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  2. गिरिजा जी,
    बहुत ही आत्मीय अनुभव और एगो पूरा यात्रा का जइसा गुजर गया नजर के सामने से... मनु के अंदर हमको अपना झलक देखाई देता है..सम्बेदनसील होना कोनो कमजोरी का निसानी नहीं है, बल्कि एगो बहुत बड़ा ताकत है...आपका आगमन हमरे लिए आसीस है...जुड़े रहिए!!
    सलिल

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  3. मन्नू के बारे में जानना अच्छा लगा ..

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  4. Ati Sundar, bahut hi achhe tarike se vyakhya , i admire your hindi and way of expressing Your feelings and experience , Beautiful , bahut achha laga vivek ke bare me sab pad kar , dhanyawad Aunty ji.

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