Tuesday, October 19, 2010

एक गीत

बरसों हुए मिटे, अब
जागी कराह क्यूँ है ।
जर्जर हुए वसन में ,
पैबन्द आह क्यूँ है ।

अब भूलना ही बेहतर
अपना कि क्या पराया ।
जो भी करीब आया,
प्रतिरूप साथ लाया ।
विश्वास और छल में ,
ऐसी सलाह क्यूँ है ।
बरसों हुए......
कुछ और जो ठहरता ,
मौसम हरा-भरा सा ।
हर पेड यूँ न लगता ,
सहमा डरा-डरा सा ।
बेवक्त ही हवा की
बदली निगाह क्यूँ है ।
बरसों हुए.....
गिर गिर सम्हाला खुद को
कैसे भी जब डगर में ।
टुकडे सम्हाल मन के ,
अनजान इस शहर में ।
गुजरे भी हम जिधर से ,
यह वाह--वाह क्यूँ है ।
बरसों हुए......

6 comments:

  1. behtareen geet hai ...bhav aur lay dono hi sadhe hue hain ....ek sans me padh gaya ....anand aayaa

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  2. 5.5/100

    लगभग सुन्दर गीत बन गया है
    पढने लायक भी और गुनगुनाने लायक भी
    लेकिन आखिरी पंक्ति अटपटी है

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  3. गिरिजा जी, बहुत सुंदर गीत है। बहुतबहुत बधाई।

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  4. अपने आस पास के परिवेश से उपजे मन को मथते और उद्वेलित करते अनुत्तरित प्रश्नों को समझने और सुलझाने की पीड़ा को बेहद ही खूबसूरती और मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा गया है. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  5. गीत के नाम पर सच्चा गीत, जो गेय भी है और भावप्रवण भी...जो संदेश छिपा है गीत में वह सामयिक भी है और यथार्थ भी!! गिरिजा जी धन्यवाद!

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  6. मैने आपकी लघुकथा पढ़ी थी जो मुझे काफ़ी अच्छी लगी थी पर पता नहीं क्यों उसका पन्ना नहीं खोल पा रही हूं इसलिए मैं उस पर अपनी टिपण्णी नहीं दे पा रही हूं. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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