Saturday, September 3, 2011

पुत्तो,सन्दूक और तराजू

अतीत के प्रसंग प्रायः पीतल के बर्तनों की तरह होते हैं । यदि उन्हें यादों की माटी से घिसा--चमकाया न जाए तो वे धुँधले--मटमैले होजाते हैं । लेकिन कुछ प्रसंग कुछ लोग और कुछ चीजें दिल--दिमाग से कभी नही निकलतीं । उन्हें याद करना नहीं पडता बल्कि जब-तब होती रहती अनुभूतियों की बौछारों से कीडों--मको़डों की तरह खुद-ब-खुद सतह पर आकर कुलबुलाती रहतीं हैं । यह प्रसंग मुझे आज भी उतनी ही तीव्रता के साथ याद है । तब मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में थी । मेरी माँ बामौर के पास एक गाँव में बालबाडी स्कूल चलाती थी । पिताजी बडबारी में सरकारी मास्टर थे और मैं नानी के पास रहती थी । मुझे नानी के पास मेरी मर्जी से नही कुछ जरूरतों के कारण छोडा गया था । एक तो मेरे छोटे भाई ने आने में बहुत ही जल्दबाजी दिखादी थी । मेरी वजह से माँ भाई की देखभाल ठीक से नहीं कर सकती थी । या यह भी हो कि उसके कारण माँ मेरा ध्यान नही रख सकतीं हों । उधर नानी अकेली गाय-बछडे के साथ मन बहलातीं रहती थी और अपना समय किसी तरह काट रहीं थी । मेरे नानी के पास आजाने से माँ को राहत मिल गई और नानी को भी । यह बात अलग है कि मेरी राहत के बारे में किसी ने नही सोचा था । किसी को भी यह खयाल न था कि मुझे भी माँ की बेहद जरूरत है । दरअसल हमारे यहाँ बच्चों को महत्त्व देने की ,उनकी भावनाओं के खयाल की थोडी बहुत समझ अभी-अभी आई है । वरना वे ,रामभरोसे पर्वत पर हरियाने वाले बिरबों की तरह जो अनायास ही उगआते हैं ,पल बढ जाते हैं । कम से कम अपने लिये मैंने यही महसूस किया था । दूसरे तमाम बच्चों की तरह ही मैं भी---मैं कौन हूं, किसलिये हूँ, क्या कर सकती हूँ और क्या करना चाहिये ,यह जाने बिना ही बडी हुई थी । खैर., अपनी समझ में वो मुझे बहुत प्यार करती थीं पर प्यार का मतलब सिर्फ अच्छा खाना या हर वक्त नजर रखना ही तो नहीं होता । नानी मुझ पर हमेशा नजर रखती थी कि मैं स्लेट लेकर बैठी हूँ या नही ..सबक याद किया कि नहीं । वे जब खेत में मूँगफली या आलू खोदतीं थी ,मुझे चुपचाप खेत की मेंड पर बैठना होता था । उन्हें मंजूर न था कि मैं रेंहट के पानी के साथ दूर..वहाँ तक जाऊँ जहाँ गीले खेत में बगुले जाने क्या कुछ खोजते रहते थे । या उनके पास बैठ कर मूँगफली के पौधों में लटकी मूँगफलियाँ गिनूँ । "मिट्टी में कपडे खराब हो जाएंगे"-वो यही कह मुझे डाँट देतीं थीं । वास्तव में इसमें नानी का जरा भी दोष नहीं था । वे तो बस पिताजी के बताये रास्ते पर चलने की कोशिश करतीं थी । और पिताजी भी कहाँ गलत थे। वे अपनी बेटी को पढाना और सिर्फ पढाना और पढ लिख कर आगे बढते हुए देखना चाहते थे । उनका विचार था कि होश सम्हालते ही बच्चे को पढाई की तरफ मोड देना चाहिये । वरना वह भटक जाता है। जाहिर है कि मेरे लिये भी केवल एक काम था ,पढना और केवल पढना...। गुड्डे-गुडिया,झूला .कंगन .रिबन.मेला .साँझी-झाँझी...सब कुछ फालतू चीजें थी मेरे लिये । मैं प्रायः अपने दायरे में ही खडी बडी हसरत से मिलजुल कर धमा-चौकडी मचाते खेलते बच्चों को देखा करती थी । किसी बात के लिये माँग या जिद करना मुझे अपनी हद बाहर जाना लगता था । ऐसे में लीला का मेरी सहेली बनना तब मेरे लिये रास्ते में पडे मिल गए सिक्के से कम नही था । लीला मेरी हमउम्र तो थी । लेकिन उसकी पारिवारिक स्थिति काफी मजबूत थी । उसके पिता का जितना रुतबा मर्दों में था उससे कहीं ज्यादा माँ का औरतों में था । जाहिर है कि लीला को खुद किसी को मित्र या सहेली बनाने की गरज नहीं थी । गाँव के बच्चे उसके आगे-पीछे फिरते थे । उन्हें लीला का कोई भी काम ,(जैसे लीपने के लिये गली में से गोबर समेटना, झाडू लगाना, या पौधों में पानी देना ,)करने में ऐतराज न था । ऐसे में लीला का मुझे सहेली बनाना मेरे लिये नियामत जैसा था । और आश्चर्य भरा भी । उसने मुझे छोटे कामों,(झाडू लगाना आदि ,)से तो मुक्त रखा ही ,मौका पाकर कालू और भूरी को भी धुन डाला जो मुझे अक्सर चिढाते रहते थे । रास्ता रोककर तंग करते थे । यही नही ,स्कूल में जब कोई इंस्पेक्टर या टीका लगाने वाला आता ,जो मेरे लिये काफी भयानक होता था,तब लीला स्कूल से भागने में मेरी मदद करती थी । मैं इतनी अभिभूत थी कि उस वक्त सोच ही नही सकी कि लीला आखिर मुझ जैसी मामूली लडकी को इतना भाव क्यों देरही है । पर धीरे -धीरे बात मेरी समझ में आने लगी । और वह बात यह थी कि मेरे पास एक बहुत सुन्दर पुत्तो (गुडिया) थी जिसे मैंने गहनों-कपडों से खूब सजा रखा था ।एक छोटी सी सन्दूक थी जो कभी किसी शाही आदमी का सुपारीदान रही होगी । इनके अलावा एक छोटी तराजू भी थी जो पकी निबौलियों से आम बेचने का खेल खेलने के काम आती थी । ये चीजें मेरे लिये किसी गरीब की गुल्लक जैसी थी।
कहीं खोने या छिनने के डर से मैं इन्हें बाहर भी नहीं निकालती थी । लीला ने जब ये चीजें देखी तो वह न केवल मेरे और करीब आगई बल्कि वह मेरी इज्जत भी करने लगी । यही नही वह मुझे दूसरी लडकियों की तरह अपने घर न बुला कर खुद मेरे घर आजाती थी । तब अपनी उन चीजों के लिये मुझे गर्व महसूस हुआ । मन में अपने लिये विश्वास भी जाग उठा था । सच अपने प्रति विश्वास ,अपने कुछ होने का अहसास कितना स्वप्निल होता है । कितना उल्लासमय कितना रोमांचक, और कितना ऊर्जामय भी ।
कुछ दिन यूँही गुजर गये ।
एक दिन जब मुझे अपनी माँ और छोटे भाई की बहुत याद आ रही थी ,लीला ने मुझसे एक बहुत ही पिघलादेने वाला सवाल किया -"ऐ री क्या तेरा मन अपनी माँ और भाई से मिलने का नहीं होता ?"
"मन होने से क्या होता है !"-मैं उदास होकर कहा।
"अरे पागल मन से ही तो सब होता है" --उसने गहरी आत्मीयता के साथ कहा । और इसके बाद उसने जो योजना बनाई, सुन कर मैं उसकी सूझ-बूझ और साहस की कायल होगई । न कहने का तो उसने मौका ही नही दिया ।
बोली--"अगर तू वास्तव में जाना चाहती है तो जाना जरा भी मुश्किल नही है । मैंने अपने बापू से सब पता कर लिया है । रेलगाडी एकदम बुआ (मेरी माँ) के द्वार पर ही रुकती है । बस तुझे घर से निकलने का मन बनाना है ।"
"सच्ची !"--मैं पुलकित होउठी ।
और फिर कुछ और तर्क-वितर्कों..सवाल-जबाबों के बाद वह मुझे यह विश्वास दिलाने में सफल हो ही गई कि चाहें तो हम बामौर जासकते है ।
"तो अपन कल ही चलते हैं "--मुझे मौन देख कर लीला उत्साह के साथ बोली--"मेरी दादी कहती थी कि शुभ काम में देर नही करनी चाहिये ।" मैं एक बार फिर अभिभूत होगई । लीला को हर बात की कितनी जानकारी है । मैं तो एकदम बुद्धू हूँ । उस समय माँ और डब्बू से मिलने की ऐसी उमंग जागी कि उससे एक भी सवाल न पूछा कि कैसे क्या होगा ! इससे पहले वह अकेली कभी कहीं गई नही है तो भला अब कैसे जायेंगी ?क्या मामी (लीला की माँ) जाने देंगी ?पर इस तरह से बुद्धिमान लोग सोचा करते हैं । स्नेह और सम्बल की तलाश में भटकते हुए कमअक्ल नही ।
यह सब लीला मेरे लिये ही तो कर रही है । वही तो है, जिसने मेरी भावनाओं को समझा है । नानी और पिताजी तो कई बार रोने व जिद करने पर भी ले जाने तैयार नही हुए थे । मैं तब सिर्फ यही सोच रही थी ।
"तो फिर अपने कपडे आज ही लाकर मेरे पास रखदे । कल उजाला होने से पहले ही निकल चलेंगे । और ध्यान रहे इस बात का किसी को पता न चले । नानी को तो हरगिज नही ।"--लीला ने मुझे समझाया और फिर फुसफुसाते हुए कहा--"और हाँ तू अपनी पुत्तो,सन्दूक और तराजू को लाना मत भूलना ।"
"इन्हें..क्यों ?"----पहली बार मेरे मन में सवाल उठा जिसका उत्तर देकर लीला ने मुझे पूरी तरह निरुत्तर और सन्तुष्ट कर दिया---"पागल ! यहाँ छोडेगी तो कोई भी चुरा लेगा । तेरी नानी क्या हर समय घर में बैठी रखवाली करती रहेंगी और फिर क्या इन चीजों को तू अपने छोटे भैया को नही दिखायेगी ? जरा सोच कि देख कर वह कितना खुश हो जाएगा ।" ऐसे नेक विचारों के बाद क्या शक की कोई गुंजाइश थी ?
मैं शाम को ही नानी से छुपा कर अपने कपडे और वे तीनों चीजें-- पुत्तो , सन्दूक और तराजू ,लीला को दे आई । देते समय लगा जैसे कोई कंजूस अपनी सारी जमा--पूँजी किसी को सौंप रहा हो । या कि जैसे कोई माँ अपने नन्हे से कलेजे के टुकडे को पहली बार कहीं दूर पढने भेज रही हो ।
"सुबह जल्दी आ जाना ।"लीला ने कहा और सारे सामान को फिर से जमाने लगी ।
रात भर मारे उल्लास के ,साथ ही भय और सन्देह के मुझे नींद नही आई । कैसे जाएंगे । रेल में कोई पकड तो न लेगा । माँ खुश होंगीं या डाँटेंगीं । मुझे न पाकर नानी पर क्या गुजरेगी
पर इन सारी बातों से ऊपर यह संकल्प था कि मुझे सुबह जल्दी लीला के घर जाना है । उजाला होने से पहले । ताकि कोई देख न ले ।
गनपति मामा के मुर्गे की पहली बाँग पर ही मैं नानी को सोती ही छोड कर लीला के घर पहुँच गई ।
उसने मुझे देखते ही एक चौंकाने वाला सवाल किया--"इतनी सुबह तू क्या कर रही है यहाँ ?"
"अरे ! तूने ही तो जल्दी आने को बोला था और तू भूल भी गई ।"--मैंने चकित होकर कहा । वह उठ कर बैठते हुए बोली--"अरे हाँ..। पर ,अरे री मैं तुझे बताना भूल गई । कल बापू ने बताया कि आजकल रेलगाडी बन्द है । अभी तो जा ही नही सकते ।"
"कल ? पर कल ही तो अपनी बात हुई थी ।" मैने थोडी बुद्धि लगाई ।
"हाँ ,लेकिन बापू ने रात को बताया । "
"तो फिर ?"---मैंने हताश होकर पूछा ।
"फिर क्या !" लीला लापरवाही से बोली --"कुछ दिन बाद चलेंगे ,जब रेलगाडी चलेगी ।अपन को चलना तो है ही ।"
"फिर मेरा सामान ? अभी तो ले ही जाती हूँ ।"--मैंने कुछ शंकित होकर अपना सामान को, जो कहानी के राक्षस की जान की तरह लीला के पास रखा था ,ले जाने की बात कहनी चाही । तो उसने मुझे लगभग झिडकते हुए कहा---
"सामान क्या कहीं कहाँ भागा जा रहा है । अपन को चलना है ना । कि नही चलना ।"
"चलना है ।" मैंने कहा तो वह बडप्पन के साथ बोली---" देख ,थैला तो जमा हुआ रखा रहेगा ही । जब भी मौका मिलेगा अपन निकल भागेंगे । है न ?"
मैं निरुत्तर हुई लौट आई । कुछ दिन मैंने गाडी के शुरु होने की प्रतीक्षा की और कुछ दिनों तक वह मुझे नई-नई जानकारियों में अटकाए रही कि रास्ते में जो जंगल पडता है उसमें कई बघेर्रा (बाघ )आगए हैं । कि नदी का पुल टूट गया है और कि टीका लगाने वाले आजकल बामौर में ही हैं। वे चले जाएं फिर चलेंगे ।
कहने की जरूरत नही कि न वह रेलगाडी फिर कभी चली ,न हम कभी बामौर जा सके । हताश होकर
जब मैं लीला से अपना सामान माँगने गई तो उसने बडी कटुता व निस्संगता के साथ केवल मेरी फ्राक मेरी ओर फेंक दी । मैं हैरान । लीला पूरी तरह बदली हुई थी ।
"और मेरी पुत्तो ?सन्दूक ??और तराजू ???--मैंने तेज हुई धडकनों को किसी तरह सम्हालते हुए पूछा । मेरी सबसे प्यारी चीजें तो उसी के कब्जे में थी । पर मेरी बात सुनते ही लीला के तेवर और भी रूखे होगये । आँखें निकाल कर बोली--"कैसी पुत्तो ?कौनसी सन्दूक ??किसकी तराजू ??? झूठी कहीं की मुझपर इल्जाम लगाती है ? अभी बताऊँ ?? मैंने जब अपनी बात दोहराने की कोशिश की तो वह निचले होठ को दाँतों में दबा कर ,मुक्का तान कर आक्रामक मुद्रा में आगई और मुझे धक्का देते हुए बोली--"चल भाग हमारे घर से । अब इधर आई तो ठीक न होगा समझी ! बडी आई पुत्तो, सन्दूक और तराजू वाली ।"
सच कहूं तो सीधी-सादी स्नेहमय भाषा का उत्तर तो मुझे आता है पर छल, उपेक्षा घृणा और जटिलता के उत्तर देने के समय में मेरी बोलती बन्द हो जाती है । एक शब्द नही सूझता । बुद्धि काम ही नही करती । तब भी यही हुआ । वैसे वहाँ कोई मेरी मदद करने वाला भी नही था । जब नानी को पता चला तो उन्होंने भी मुझे ही डांटा । बोलीं--"अपनी चीजें खुद ही तो जाकर दे आई अब रोती क्यों है ? भुगत...।"
मैं अपनी तीनों चीजों के साथ लीला की कटुता के लिये भी वर्षों रोती--कलपती रही । आज भी उन चीजों को याद करते समय अपने अन्दर उस छोटी बच्ची को महसूस करती हूँ । यह तो मेरी समझ में बहुत बाद में आया कि बामौर जाने का नाटक उसने केवल मेरी उन तीनों चीजों को हथियाने के लिये ही रचा था । और तब सचमुच मेरा दुख कई गुना बढ गया । वह मेरी चीजों को माँग लेती या छीन लेती तो इतना मलाल न होता । छल--फरेब से छुडाने का यह उसका अपना तरीका था ,जिसका दर्द मुझे जितना तब हुआ ,उतना ही( बल्कि उससे कहीं ज्यादा ),आज भी है । क्योंकि कहीं न कही आज भी मेरे साथ वैसा ही कुछ है । प्रायः स्नेह, विश्वास और उम्मीद के उत्तर में उपेक्षा, छल और निराशा ही मिलती है और तब मुझे बरबस लीला याद आजाती है । लगता है कि फिर किसी लीला ने मुझसे मेरी पुत्तो ,सन्दूक और तराजू छीन कर अपने घर से भगा दिया है ।

9 comments:

  1. भावपूर्ण रचना ! आपकी व्यथा पढकर लगा जैसे मेरी व्यथा को भी शब्द मिले ।

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  2. विश्वास के भाव सदा जीवित रहें, अनुभव को उन पर अधिकार न जमाने दिया जाय।

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  3. kitni buri thi leela ... dard yah jata nahi, samajh sakti hun

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. भावपूर्ण रचना !

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  6. बहुत मर्मस्पर्शी ... आपकी व्यथा समझ सकती हूँ ...

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  7. बचपन के ये खजाने बड़े अनमोल होते हैं, मानो सारे जीवन की जमा पूँजी... उन्हें कोई चुरा ले, तो भूलना असम्भव हो जाता है!! बचपन की तरह निश्छल और निर्मल संस्मरण!!

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  8. बहुत मर्मस्पर्शी प्रविष्टि| धन्यवाद|

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