Wednesday, September 14, 2011

शहर में बरसात

उसके स्वागत में कहीं
मोर नाचा नहीं
पपीहे ने गाया नहीं
उसके आने का सन्देश
हवा ने भी दिया नही
उमंगित होकर
लहर-लहर कर
बस आसमान का.
छोटा सा टुकडा
धुँधला हुआ,
गहरा हुआ ।
गडगडाहट हुई ।
बिजली चमकी।
बूँदें टपकीं
सीमेन्ट ,और कंकरीट की छत पर
मुँडेर पर रखे गमलों में
कोलतार की सडकों पर ।
नालियाँ उमडी
गीला हुआ।
फिर वर्षा थमी
सडकें सूखीं
मकान सूखे ।
आसमान साफ होगया
अक्सर ऐसा ही हुआ ।
और एक दिन यूँहीं
वर्षा गुजर भी गई,
किसी रजिस्टर में
अपने हस्ताक्षर किये बिना ही
अपना नाम आखिर ,वह,
लिखती भी कहाँ ..!

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर मनभावन अभिव्यक्ति|

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  2. निस्पृह भाव से अपना कर्म कर चली जाती हैं ये फुहारें।

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  3. शहर की वर्षा की व्यथा ... सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. बिल्कुल एसा ही होता है । भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

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  5. गिरिजा जी!
    आपकी इस कविता ने एक पूरा दृश्य उपस्थित कर देती है और लगता है कि हम उसका हिस्सा हों. क्लाइमेक्स अद्भुत है!!

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  6. वर्षा की ये बूँदें यही तो सन्देश देती हैं जीवन का ...किन्तु हम इंसान नहीं समझ पाते और मानव स्वभाववश सदैव हर काम के पीछे परिणाम की आकांक्षा करता है ...सलाम आपकी इस कविता को ..

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  7. प्रकृति तो सदैव ही जीवन के बहुमूल्य और अद्भुत होने के संदेश अपने हर क्षण के प्रभाव से देती रहती है। जो इसे महसूस करते हैं वे उसका लुत्फ़ उठाते हैं। जो महसूस नहीं करते वे अछूते रह जाते हैं।

    अच्छी और भाव पूर्ण प्रेरक रचना।
    आप अपना ईमेल पता दें ताकि जैसा कि आपसे वादा किया था हिंदी टाइपिंग का टूल व अनुदेश भेज सकूं।

    http://dsysumimu@gmail.com

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  8. शहर की वर्षा की व्यथा ..
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति आपकी लेखनी को नमन और आपको बधाई

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  9. वाह....

    बहुत ही सुन्दर, भावपूर्ण....

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  10. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  11. बहुत खूबसूरत!!

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  12. Mummy yhe badi achhee kavitaa hai, Aur kaheen gahare main hum parr bhee lagoo hotee hai. Aise jaane kitanee barasaaten, bin hastaksharr ki nikal gayeen..

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