Wednesday, September 28, 2011

हम संझा साँझी खेलते

क्वार माह यानी शरद ऋतु का प्रारम्भ । यानी एक रमणीय और सुहानी ऋतु का आगमन । इस ऋतु के सुहानेपन को कवि-शरोमणि तुलसीदास जी ने अनेक अनूठी उक्तियों द्वारा व्यक्त किया है ।
कवि सेनापति ने शरद-वर्णन जिस सजीवता से किया है, दर्शनीय है---
"पावस निकास याते पायौ अवकास ,भयौ जोन्ह कौ प्रकास सोभा ससि रमनीय कौं । विमल आकास होत वारिज विकास ,
सेनापति फूले कास हित हंसन के जीय कों । छिति न गरद,मानो रंगे हैं हरद सालि, 
सोहत जरद को मिलावै प्रान पीय कौं ।
 मत्त हैं दुरद मिट्यौ खंजन दरद ,
रितु आई है सरद सुखदाई सब जीव कौं ।"
ऐसी सुखदाई ऋतु में जब वर्षा रानी की छमछम ठहर जाती है, बिजली की सुनहरी पायलें उतार दी जातीं हैं ,बादलों के नगाडे उठा कर रख दिये जाते हैं ,किसी धुले-पुछे दर्पण जैसे निरभ्र आसमान की नीलिमा गहरा जाती है ,चाँदनी निखर कर चमक उठती है , ताजा नहाई सी धरती हरी चूनर ओढ कर मुस्करा उठती है, कास फूल उठता है , नदियाँ पारदर्शी हो जातीं हैं , तब तारों की छाँव में किशोरियों की तानें गूँज उठतीं हैं --"हम संझा साँझी खेलते ,हम जाहि बिरियाँ तन खेलते...
म्हारे उतते ही आए बाबुला ,बाबुल ने लई पहचानि .संझा साँझी..."
फूलों के रूप और गन्ध से गमकता ,लोक कला के सौन्दर्य से दमकता यह उत्सव गँवई--किशोरियों का सबसे उल्लासमय त्यौहार होता है । कनागतों (श्राद्ध-पक्ष) के साथ शुरु हुआ यह उत्सव सर्व-पितृ अमावस्या तक चलता है । मुझे याद है कि किस तरह हमारी हर शाम गीतों से गूँजती थी । पन्द्रह दिन हँसते-गाते बीत जाते थे एक नई ऊर्जा व उल्लास देकर ।
त्यौहार ऊर्जा व उल्लास तो देते ही है पर साथ ही हमें लगता है कि समय सिकुड कर छोटा होगया है धोने पर सिकुडे सूती कपडे की तरह । सावन बीता कि जन्माष्टमी आई । फिर साँझी ,नौदेवी ,दशहरा, दिवाली फिर देवठान....त्यौहार किस तरह जिन्दगी को गति देते हैं कि दौड उठती है फास्ट ट्रेन की तरह । दिन महीने पेडों की तरह पीछे भागते लगते हैं ,इस तरह कि उन्हें गिन भी नही पाते ।
हाँ अभी बात है केवल साँझी की .
क्वार में प्रतिपदा को प्रतीक्षा का उल्लासमय अन्त एक लुभावनी सी प्रतिस्पर्धा के आरम्भ के रूप में हो जाता था । प्रतिस्पर्धा यह कि एकदिन पहले पूर्णिमा  के दिन ही तय होजाता था कि इस साल साँझी किसके द्वार की दीवार पर सजेगी ,कि कौन सबसे ज्यादा सुन्दर और रंग-बिरंगे फूल लाएगी और कौनसे दिन किसके घर से साँझी का भोग लगेगा । 
साँझी के लिये सबसे पहला और सबसे प्यारा व रोचक काम होता था फूल इकट्ठे करना . धरती पर साँझ के उतरते--उतरते फूलों का ढेर लग जाता था -लाल, पीले, नीले गुलाबी, सफेद, जोगिया ..तमाम रंग के बेशुमार फूल जो खेतों, बाडों और बगीचों से चुन कर लाए जाते हैं । उधर कुछ कला-चतुर किशोरियाँ दीवार को गोबर से लीप कर गोबर से ही सुन्दर आकृतियाँ बनातीं थी । वे आकृतियाँ अनेक तरह की होतीं थीं--चन्दा--तारे, सूरज,मोर ,गूजरी , पनिहारिन, वृक्ष ,फूल-पत्ती और साँतिये आदि विभिन्न तरह की रचनाएं जो फूलों से सज्जित होकर जगर-मगर खिल उठतीं  थीं । रचनाकाराएं खुद ही मुग्ध होकर गा उठतीं थीं---
"मेरी साँझुलदे के आसो-पासो फूलि रही फुलवारी ।
तुम पहरौ साँझुलदे रानी नौ तोले का हरवा ।
त्यारे बाबुल ने गढायौ ,मैया रानी ने दै घाल्यौ ..."
फिर दिया बाती की बेला पर जब मन्दिर में घंटा घड़ियाल के साथ भगवान की आरती होती थी इधर सभी लडकियाँ साँझुल रानी को भोग लगातीं थीं । भोग हर तरह का होता था- हलवा पूरी खीर लड्डू ,कच्चा दूध जो बडे 'जतन' से 'अछूता' रखा जाता था ,उसी तरह जिस तरह भगवान का भोग रखा जाता है । बड़ी श्रद्धा व भक्ति और उल्लास के साथ साँझी को भोग लगाया जाता था . लड़कियाँ गातीं भी जातीं थीं ---
"मेरी साँझी भोग ले, भोग ले ।
और की साँझी रोग ले रोग ले ।
 मेरी साँझी रानी और की साँझी..."
पता नही क्यों !'और' की साँझी के लिये की गई ऐसी अमंगल कामना ! यह मानवीय कमजोरी का सहज उद्घाटन है जिसके कारण वह अपनी वस्तु की श्रेष्ठता व कुशलता चाहता है । कोई छल नही ,कोई दुराव नहीं ।
भोग लगाने के बाद शुरु होता था गीतों का सिलसिला । गीत कई तरह के थे -चन्दा के ,भैया के , मायके की सहेलियों के और साँझी के सौन्दर्य के ।
किन्तु दूसरे लोकगीतों की तरह साँझी के गीतों में भी उस नारी की व्यथा-कथा के ही स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं जो माता-पिता की लाडली है । ससुराल में सास--ननद से प्रताडित है । वह मायके की गलियों के लिये तरसती है । चन्दा या बटोही द्वारा अपना मार्मिक सन्देश मायके को सन्देश भेजती है ----
"चन्दा रे तू चन्द बिरियां तन ठाड्यौ ही रहियो , 
हेला मारियो ही रहियो ।
सासु बोलनि मारै ,
ननदी ठोलनि मारै ।
मेरे बाहुल से कहियो ,
उन्हें हरवा गढावैं ,
उन्हें पाट पुरावें...। 
मोहि बेगि बुलावें...।"
शायद हरवा कंगन पाकर लालची सास--ननदें उनकी बेटी के प्रति सदय हो जावें ।
कभी कोई मायके से आया राहगीर उसे पहचान कर पूछ लेता है । गाँव की बेटी उसकी अपनी बेटी जैसी ही तो है--
"तुम काहे के दुख दूबरी ,और काहेनि मैलौ भेस ...?"--उत्तर मिलता है --
"हम सासु के दुख दूबरी और ननदी रे मैलौ भेस ।"
ऐसा सुना जाता है कि साँझी किसी जुलाहे की लाडली और रूपसी बेटी थी । उसे ससुराल में झाडू व पौंछा की तरह इस्तेमाल किया जाता था । वह दूसरों का अनाज कूटती फटकती थी । तब कही उसे दो रोटियाँ मिल पातीँ थी । 
साँझी की व्यथा जैसे हर लडकी की व्यथा है । पराए घर जाकर उसे जाने कैसा वातावरण मिलेगा । सो भविष्य की सोच छोडकर बचपन को भरपूर जीने की सलाह देती है---
"खेलि लै बिटिया खेलि लै तू माई बाबुल के राज ।"
तेरहवें दिन कोट (साँझी का बडा रूप ) बनाया जाता है । इसमें वे सारी चीजें बनाई जातीं हैं जो पिछले बारह दिनों में बनाई गईँ थीं । मुझे याद है कि कोट की तैयारियाँ बडे जोर-शोर से की जाती थी जिसे सजाने में हमारे ताऊजी पूरा सहयोग करते थे । अपने निर्देश में ही हमसे मिट्टी की कौडियाँ बनवाते थे । सफेद रंग से रँगी और बीच में काली लकीर से सजी  वे कौडियाँ एकदम असली लगतीं थीं । सुनहरी--रुपहली पन्नियों के मुकुट, झुमके ,हार ,कंगनों से साँझी को सजाते थे । कोट में 'मुड़फोरा' का बडा महत्त्व होता था । यह मिट्टी से ही बना होता था इसे बडी चतुराई व गोपनीयता के साथ कोट में कहीं इस तरह फिट किया जाता कि कोई जान न सके । जान भी ले तो हरगिज ले जा न सके । इसलिये लडकियाँ रात भर जाग कर मुड़फोरा की रखवाली करती थी । सुबह उसे सलामत पाकर गा उठतीं थी ---"ऐ, रे मुडफोरा बामन !
मेरी साँझुलदे रानी कौं हरवा क्यों नहि लायौ "
संभवतः मुडफोरा को साँझी का सुहाग माना जाता होगा । उसे चुराने की रीति वर के अपहरण से जुडी होगी । किसी भी त्यौहार के पीछे कोई एक कहानी नही होती । समय और स्थान के अनुसार उसमें अनेक कथा-किवदंतियाँ जुड जातीं हैं । कोई समय होगा जब दूल्हे को चुराकर बेटी ब्याहना गौरव तथा मान की बात समझा जाता होगा । वधू-अपहरण तो इतिहास की जानीमानी घटना है ही ।
अमावस्या की शाम को भारी मन से साँझी को दीवार से उतार कर नदी में सिरा दिया जाता था । शाम को गोठ (दावत) होती थीं ।
उन दिनों को याद कर महसूस होता है कि खुशी न तो सुविधा-साधनों की मोहताज होती है न ही सम्पन्नता की । हमने सुविधाएं जुटाते-जुटाते उस खुशी को कहीं खो दिया है जो जीवन की सबसे बडी उपलब्धि होती है । ये प्रकृति के आँगन में जीवन से जुडे ये गीत ,ये पर्व हालाँकि गाँवों तक ही सीमित रहे हैं या कि अब गाँवों में भी टी.वी. ने इन लोक-उत्सवों का कुहुक फीका कर दिया है पर इनमें छुपी मानव की जिजीविषा और संवेदना से हम ,चाहे कही भी रहें, आज भी अलग नही है ।

सन् 1990 में चकमक में प्रकाशित
चित्र भी चकमक से ही लिये गए हैं।

12 comments:

  1. बहुत सुंदर आलेख और मन को छूने वाले लोकगीत...सचमुच सुख एक मानसिकता का नाम है न कि सुविधाओं का..प्रकृति के साथ जिसने जीना सीख लिया वह भला कभी उदास रह सकता है..

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  2. कल 30/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. ये पर्व त्यौहार हमें प्रकृति से, परिवार और समाज से जोड़ने के निमित्त ही व्यवहार में आये...और देखिये, आज इनसे किनारा किये हम इन सब से कितने कटते जा रहे हैं,साधनों के अम्बार बीच सुख दे दूर हुए जा रहे हैं.....

    हमारे इलाके में ऐसी किसी पर्व के बारे में सुना नहीं पहले...इसलिए यह बड़ा ही रोमांचक लगा...

    सेनापति जी की रचना पढ़ मन आह्लादित हो गया...

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  4. गिरिजा जी!
    इन परम्पराओं को खोया भी हमने हैं और इसे याद भी हम ही करते हैं.. एक नयी रीति/परम्परा/पर्व के बारे में जानकार बहुत ही अच्छा लगा!!

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  5. नयी जानकारी मिली .. बहुत अच्छी पोस्ट

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  6. मन कही जा टिका ..अच्छी लगी. शुभकामनाएं.

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  7. aj insaan paraparaon se kahin pare ho gaya hai . riti-riwaz kahanion ki tarah ho gaye hain.
    aapka lekh bahut achha laga.

    http://neelamkahsaas.blogspot.com/2011/09/blog-post.html

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  8. सुन्दर आलेख ....बहुत कुछ जानने को मिला

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  9. आपकी पोस्ट बढ़कर मैभी पुराने दिनों में खो गई \हमारे निमाड़ -मालवा में भी बहुत उत्साह से खेलती थी बालिकाए
    साँझा फूली |एक निमाड़ी गीत याद आ रहा है |
    साँझ की माँ साँझ ख भेजो
    करा साँझा की आरती
    पाना फूला भरी चमेली ,
    केशर भरियो बाग को ....
    बई
    साँझा के सासरे से
    हाथी भी आया
    घोडा भी आया
    जा बई साँझा सासरे .....
    हाथी आला बनाऊ
    घोडा पाला बनाऊ
    मै तो नै जाऊ
    दादाजी सासरे ....

    बहुत कुछ छुटा जा रहा है समय के साथ |

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  10. "छोटी सी गाडी लुडकती जाए
    उमे बैठी संजा बई जाए
    चुडलो चमकाती जाए
    घाघरो डमकाती जाए"

    गिरिजाजी, आपके आलेख से बहुत पुरानी यादें ताजा हो गई।
    मुझे भी एक गीत याद आ गया । जिसे सबके साथ बांटने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं।

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  11. बहुत सुंदर वर्णन , गौरतलब यह है कि क्या यह लोक-परम्पराएं जीवित रह पाएंगी ? या मात्र बीता कल बन के रह जायेंगी ? हम अपनी जड़ों को सरस रख पायेंगे या नहीं ?

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