Tuesday, December 18, 2012

माँ मेरी सुनो !!!

माँ तुम मेरी सुनो 
मत सुनो अब उनकी
जो कहते हैं कि ,
बेटी को आने दो
खिल कर मुस्काने दो ।
बेटे-बेटी का भेद मिटा कर
समानता की सरिता लहराने दो
वे लोग तो कहते हैं बस यों ही
नाम कमाने
कन्या-प्रोत्साहन के नाम पर
इनाम पाने ।
माँ , उनकी कोई बात मत सुनना
मुझे जन्मने के सपने
मत बुनना ।
सब धोखा है
प्रपंच भरा लेखा-जोखा है । 
एक तरफ कन्या प्रोत्साहन
दूसरी तरफ घोर असुरक्षा
अतिचार और शोषण ।

माँ, पहले तुम सुनती थीं ताने
बेटी को जन्म देने के और फिर 
उसे कोख में ही मारने के ।
लेकिन माँ इसे तुम्ही जानती हो कि
कितनी मजबूरियाँ और कितने बहाने
रहे होंगे तुम्हारे सामने
कोई नही आता होगा
बेटी की माँ को थामने
समझ सकती हूँ माँ ..
तुम गलत नहीं थी  ।
जानतीं थीं कि जन्म लेकर भी
मुझे मरना होगा
आँधियों में,
बेटी को पाँखुरी की तरह
झरना होगा ।
हाँ..हाँ..मरना ही होगा मुझे
एक ही जीवन में कितनी मौतें
जैसे तुम मरतीं रहीं हर रूप में
कितनी बार कितनी मौतें
शायद जिन्दगी ने तुम्हें समझा दिया था कि,
लडकी औरत  ही होती है
हर उम्र में सिर्फ एक औरत
औरत,  जिसे दायरों में कैद रखने
बनानी पडतीं हैं कितनी दीवारें
कितनी तलवार और कटारें
क्योंकि उसे निगलने को
बेताब रहता है अँधेरा जहाँ-तहाँ
कुचलने को बैचैन रहते हैं
दाँतेदार पहिये...
यहाँ-वहाँ
कोलतार की सडक बनाते रोलर की तरह
और...मसलकर फेंकने बैठे रहते हैं
लोहे के कितने ही हाथ
फेंक देते हैं तार-तार करके
उसका अस्तित्त्व
बिना अपनत्त्व और सम्मान के
कभी तन के लिये ,कभी मन के लिये
तो कभी धन के लिये 
झोंक देते हैं तन्दूर में।
खुली सडक पर ,भरे बाजार में
बस में या कार में..
कैसे सुरक्षित रहे  तुम्हारी बेटी, माँ
इस भयानक जंगल में 

पहले तुमसे नाराज थी व्यर्थ ही
कोख में ही अपनी असमय मौत से ।
पर अब मैं नाराज नही हूँ 
जानती हूँ कि
मेरी सुरक्षा के लिये
नही है तुम्हारे पास कोई अस्त्र या शस्त्र
तभी तो तुम्हारी बेटी करदी जाती है 
'निर्वस्त्र' ।
सच कहती हूँ माँ
मैं सचमुच डरने लगी हूँ 
दुनिया में आने से ।
अपनी ही दुनिया के सपने सजाने से
इसलिये अब तुम सिर्फ मेरी सुनो माँ,
हो सके तो अब मार देना मुझे कोख में ही
कम से कम वह मौत इतनी वीभत्स तो न होगी
पंख नुची चिडिया की तरह
खून में लथपथ....घायल पडी सडक पर
जीवन से हारी हुई..बुरी तरह..।
दो दिन सागर उबलेंगे 
पर्वत  हिलेंगे 
मुद्दे मिलेंगे 
बहसों और हंगामों के 
और फिर दुनिया चलेगी पहले की तरह 
नही चल पाऊँगी तो सिर्फ मैं
हाँ माँ, सिर्फ मैं ।
तुम्हारी असहाय अकिंचन बेटी 
सिर उठा कर 
सम्मान पाकर ।
कब तक शर्मसार होती रहोगी??
बेटी की माँ होने का बोझ 
ढोती रहोगी !! 
इसलिये मुझे जन्म न दो माँ !
मैं तो कहती हूँ कि
तुम जन्म देना ही बन्द करदो
नही सम्हाल सकती हो अगर
अपनी सन्तान को
सुरक्षा व सुसंस्कारों के साथ
माँ तुम सुन--समझ रही हो न ?
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Monday, December 17, 2012

अनजान शहर से गुजरते हुए-----100 वीं पोस्ट



किसी अजनबी शहर से गुजरते हुए
मुझे अक्सर अहसास होता है
कि बहुत जरूरी  होती है,
सजगता, समझ ,
और जानकारी
उस शहर के--इतिहास--भूगोल की
पर्स में रखनी होती है
मीठी यादों की पर्याप्त पूँजी
डायरी में नोट किये गए
बहुत खास अपने से नाम
किसी अपने का पता फोन नं.
ताकि शहर की गलियों, चौराहों को
पार किया जा सके यकीन के साथ ।
अजनबी चेहरों की भागती सी भीड में
अनजान रास्तों के जटिल जाल में
अन्तहीन सी दूरियों को पार करते हुए भी
याद रखा जा सके अपना गन्तव्य
उसे तलाशने में
खर्च होने से बचाया जा सके
जिन्दगी का एक बडा हिस्सा

जब भी गुजरती हूँ मैं
किसी अनजान शहर से
महसूस होती है तुम्हारी कमी
पहले से कहीं ज्यादा
किसी अनजान भाषा में
बतियाते लोगों को देखना
भर देता है मुझे
निरक्षर होने के अहसास से
तभी तो याद करती हूँ
तलाशती हूँ तुम्हें ही हर चेहरे में ।
क्योंकि तुम्हारा साथ होता है,
सिर पर हाथ होता है
तब नही होता कुछ भी अनजाना
जटिल और थकाने वाला ।

अनजान शहर से गुजरना
सिखाता है बहुत से तमीज-तहजीब
कि हर किसी से नही मिला जाता
उस तरह
जिस तरह मिलते रहते थे हम
अपने गाँव में सबसे
बेझिझक , बेखौफ...।
कि नही खोला जाता सबके सामने अपना बैग
नही गिनी जाती कहीं भी अपनी जमाराशि ..।
और कि नही बताया जाता
अपना घर और गन्तव्य हर किसी को
और यह भी कि सबसे जरूरी होता है
पास रखना अपने आपको
बना लेना किसी को बहुत अपना
गुजरते हुए किसी अनजान शहर से
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Wednesday, December 5, 2012

सफर का एक और खूबसूरत पडाव


बैंगलुरु--5 दिसम्बर
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सगाई--21 नवम्ब
24 नवम्बर 2012 को  मयंक और श्वेता पवित्र परिणय-सूत्र से बँध गए । यह मेरे जीवन का एक और सुन्दर प्रसंग है । स्वभाव से सौम्य व सुशील श्वेता ग्वालियर से ही है और वह भी बैंगलोर में ही ऐम्फेसिस में सॅाफ्टवेयर इंजीनियर है । यह विवाह जीवाजी क्लब ग्वालियर में जहाँ बडे हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ वहीं कुछ अपनों की अनुपस्थिति भी खली जिनमें भाई लोकेन्द्र (ब्लाग अपना पंचू ) का नाम सबसे पहले आता है क्योंकि वे स्थानीय हैं और मैं बार-बार याद करते हुए भी उन्हें सूचित न कर सकी । दूर-पास के और भी कई अपने थे । कई निमंत्रण-पत्र लिखे ही रह गए । इसका कोई स्पष्टीकरण देना अब बेमानी होगा । खैर....।
2 दिसम्बर को हम लोग यहाँ आ पहुँचे हैं । पन्द्रह दिन की घोर व्यस्तता के बाद अब मेरे पास कुछ पल फुरसत के हैं । इनमें में अपने सभी प्रिय ब्लाग्स देखूँगी और छूटे काम पूरे कर सकूँगी । 

Wednesday, November 14, 2012

एक वज़ह खुशियों की




खुशियों की एक खास वज़ह सी 
जैसे पहली किरण सुबह की ।
अभी-अभी तो  आयीं थीं ये ,
अरे होगई पूरे छह की



Monday, November 12, 2012

उजाला भरदें

कोना-कोना जगमग करदें ।
खुशियों को खुद अपना घर दें ।
जो भी दिखे अकिंचन तम सा ,
उसकी जेब उजाला भरदें  ।



ब्लाग जगत के सभी परिजनों को 
दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं ।

Saturday, November 3, 2012

करवा-चौथ स्पेशल

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न मेंहदी न महावर । न नए बेंदी-बिछुआ । जसोदा सुहागिन है और कल ही करवा-चौथ व्रत था । मुझे पता है कि जसोदा व्रत करती है और बडे चाव से साज सिंगार भी । गहने चाहे कांसे-पीतल के ही क्यों न हों वह नए ही पहनती है । पैरों में खूब गहरा महावर और हाथों में मेंहदी की टिकुलियाँ, छन छन करते बिछुए-पाजेब साँवली-सलौनी जसोदा को और भी सलौनी बनाते हैं । 
जसोदा हर साल माटी के 'करवा' देने आती है । गर्मियों में मटके-सुराही, महालक्ष्मी पूजा पर हाथी और दीपावली पर 'दिये-सरैया' लाने का दायित्त्व उसी ने ले रखा है मजाल क्या कि ये सामान मैं किसी और से ले लूँ । वह आँगन में बैठकर इस बात की अधिकार के साथ शिकायत करती है तब कुछ देकर उसे सन्तुष्ट करना ही होता है और यह वादा भी कि आइन्दा किसी और से ये चीजें हरगिज नही लूँगी ।
जसोदा हर साल की तरह जब सुबह रात की पूजा का प्रसाद और खाना लेने आई तो उसे देख कर मुझे फसल कटे खेत जैसा अहसास हुआ । आँखें लाल व पलकें सूजी हुई सी थीं । यही नही आज उसने न साडी माँगी न ही सब्जी व पकवानों के विषय में पूछा । बस मायूस सी आँगन में आकर बैठ गई । यह देख मुझे अचरज के साथ कुछ खेद भी हुआ ।
"क्या हुआ जसोदा, तूने करवा-चौथ की पूजा नही की ?"
"मैंने करवा-चौथ पूजना छोड दिया है दीदी ।" वह सपाट लहजे में बोली ।.मुझे हैरानी हुई । झिडकने के लहजे में बोली--
"अरे पागल, सुहाग के रहते यह व्रत कही छोडा जाता है !" 
"कैसा सुहाग दीदी ?"--उसने निस्संगता के साथ कहा --"जिसे अपना होस नही रहता । रोज पीकर आजाता है । कभी यह भी नही सोचता कि हम भूखे सोरहे हैं कि बच्चों के पास नेकर-चड्डी भी है कि नही । चलो जे सब तो सालों से चल रहा है दीदी पर आदमी यह तो सोचे कि जो औरत उसके लिये दिन भर भूखी-प्यासी रह कर बिरत करती है ,उस दिन उससे कुछ नही तो कडवा तो न बोले । मार-पीट तो न करे । दीदी, मेरे लिये तो यही जेवर समान है कि वह दो बोल 'पिरेम' के ही बोल दे । भले ही कोई काम धाम न करे पर मुझसे खुश तो रहे । पर ना ,उसे उसी दिन नंगा नाच करना है । जब तक आँसू नही गिरवा लेता उसे चैन नही । तो फिर क्यों भूखी-प्यासी मरूँ उसके लिये ? सो मैंने तो ....।" इतना कहकर वह फफककर कर रोने लगी । मैं निःशब्द खडी उसकी पीडा के प्रवाह को देख रही थी । व्रत न करने का संकल्प जहाँ उसके साहस व स्वाभिमान का प्रतीक था वहीं आँसुओं का सैलाव उसके स्नेहमयी वेदना की कहानी कह रहा था ।
"क्यों रोती है जसोदा ! ऐसे दुष्ट आदमी से तो आदमी का न होना....।"
औरत की मारपीट और अपमान मुझे इतने विरोध व रोष से भर देता है कि मेरे मुँह से निकल पडा होता कि ऐसे पति से तो स्त्री पति-विहीना ही भली है पर उसने तडफ कर बीच में ही मेरी बात काटदी---
"ना दीदी ,ऐसा न बोलो । वह जैसा भी है बैठा रहे । उसका बाल भी न टूटे । उसी के कारण तो मैं सुहागिन कहलाती हूँ । बिना 'पती' के औरत की जिन्दगी का ( क्या) है दीदी । कौन उसकी इज्जत करता है !"   
कहाँ तो करवाचौथ का व्रत आज जेवर और मँहगे उपहारों का तथा पत्नी के प्रति पति के स्नेह व समर्पण का प्रतीक और पर्याय बन गया है और कहाँ निष्ठुर-निकम्मे पति की कुशलता व उसके दो स्नेहभरे बोलों में ही सब कुछ पा जाने वाली जसोदा की व्यथा-वेदना । मुझे लगा कि जसोदा का व्रत दिन भर भूखी-प्यासी रहकर चाँद की पूजा करने वाली सुहागिनों कहीँ ज्यादा ऊँचा है ।

Sunday, October 28, 2012

सबरस

( यह पोस्ट पढने से पहले---
25 अक्टूबर को सलिल जी ( चला बिहारी ब्लागर बनने  ) ने अपने ब्लाग पर ध्रुवगाथा को लेकर एक विस्तृत समीक्षा लिखी है । ऐसी समीक्षा जो एक साधारण कृति को विशिष्ट बनाती है । उसे यहाँ देना अनावश्यक ही है क्योंकि सलिल जी का ब्लाग जहाँ सुविशाल मैदान की तरह  है वही यह ब्लाग घनी बस्ती के बीच गली का एक हिस्सा है । सलिल जी द्वारा समीक्षा लिखी जाना और अपने ब्लाग पर देना दोनों बातें ही मेरे लिये हितकर हैं क्योंकि पुस्तक बहुत सारे सुधी पाठकों की जानकारी में आगई है । यहाँ ग्वालियर में तो विमोचन में सामिल हुए लोगों के अलावा किसी को अभी तक खास जानकारी नही (रुचि कहाँ से होगी )। इसमें मेरी निष्क्रियता भी एक कारण है । निस्सन्देह सलिल जी  धन्यवाद कहना उनकी सहृदयता भरी परख व संवेदना  का अवमूल्यन होगा । उसे केवल अनुभव किया जासकता है ।यहाँ यह सूचना इसलिये कि कहीं किसी कारण यदि वह समीक्षा न पढ पाए हों तो कृपया यहाँ http://chalaabihari.blogspot.in/  अवश्य पढें )
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माला जीजी जेठजी को, जो गंभीर रूप से बीमार हैं ,देखने आईं हैं । वैसे यहाँ आने के लिये उन्हें किसी खास कारण की आवश्यकता नही है । जेठानी की बडी बहन होने के साथ-साथ काफी अनुभवी व्यवहार-कुशल और दुनियादारी का ज्ञान रखतीं हैं । बेबाक बोलने के लिये जानी जाने वाली माला जीजी अब लगभग सत्तर साल की हैं । छत्तीस-सैंतीस वर्ष पहले जब मैंने उन्हें देखा था पूरे घर पर उनका वैसा ही प्रभाव था जैसा किसी सभा में मुख्य अतिथि का होता है । कानों में सोने की चेन से सम्हाले भारी-भारी झुमके झुलाती वे कोई भी बात कहतीं सब हाथ बाँधे उनके श्रोता बन खडे रहते थे । सब्जी छौंकने से लेकर त्यौहार ,विवाह और जापे की रस्मों व परम्पराओं में उनका दखल था । उन्हें किसी को भी रोकने टोकने या समझाने का पूरा अधिकार मिला हुआ था । दरअसल ऐसे लोगों को कोई अधिकार दे न दे वे खुद ही हासिल कर लेते हैं बिल्कुल निर्विरोध विजयी हुए उम्मीदवार की तरह ।       
अब उनका शरीर भले ही उतना साथ नही देता और त्वचा दुबले होने पर ढीले होगए कपडों जैसी होगई है । जीजाजी ( उनके पति) रिटायर होने के छह माह बाद ही चल बसे थे । पति का साथ छूट जाने पर वैसे ही स्त्री बिना छत वाले घर जैसी हो जाती है वह भी अगर वह निःसन्तान हो तो  मुश्किलें और भी बढ जातीं हैं । जो भी हो जीजी की आवाज में आज भी वैसी ही मजबूती ,और अभिव्यक्ति उतनी ही बहुरंगी और प्रभावशाली है । 
 क्या फर्क पडता है कि जीजी के बारे में कुछ लोग अलग तरह की बातें करतेरहते  हैं । भला पीछे बोलने वालों को कौन रोक सकता है ? वे तो दबी जुबान में यहाँ-वहाँ कोने में तम्बाकू की पीक की तरह पिचकते ही रहते हैं कि यह (माला जीजी)किसी की मीत नही । नम्बर एक की कंजूस है । दाँत से काट कर एक-एक पैसा निकालती है । मास्टर (जीजी के पति) अकूत दौलत छोड कर गया है पर मजाल है कि कोई थाह तो लेजाए । देवर-जेठ को तो पासंग पानी नही पीने देती । जो कुछ है ,अपनी बहनों और अपने भाई-भतीजों को ही देकर जाएगी । अब इन अकल के दुश्मनों से पूछो कि आदमी उसी को तो अपना धन-सर्वस्व सौंपेगा जिस पर अपनी सेवा-सुरक्षा का भरोसा किया जा सके । और भरोसा करना भी क्या कम साहस का काम है ??...
खैर वह एक अलग बात है ।  
मैंने बताया कि माला जीजी अपनी बहन (मेरी जेठानी) से मिलने व बहनोईजी को देखने आईं है । अब वे मथुरा से यहाँ तक आएं और कोई उनसे मिलने भी न जाए तो अव्यावहारिकता से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें बुरा लगेगा । तुरन्त शिकायत करेंगी कि , "भैना दो कदम चल के तू  मिलने भी न आ सकै !!" सो उनके आने की खबर जैसे ही मुझे मिली ,समय निकाल कर उनसे मिलने गई ।
"अरे ,लाली आगई!"--मुझे देखते ही जीजी फुलझडी की तरह चमक उठीं । मैंने देखा ,सदा की तरह चमचमाते दाँतों का मजबूत घेरा जीजी के गालों को धँसने से बचाए है। आँखें भले ही कुछ और छोटी लग रहीं थीं पर उनमें मानो ऐक्सरे और अल्ट्रा मशीनें आज भी फिट है आदमी के अन्दर के मांस-मज्जा और हड्डियों को परखने में सक्षम ।
"आप कैसी हैं जीजी ?"
"अरे लाली कैसी का हैं ,बस दिन पूरे करनौ समझौ ।(रुआँसी होकर) जे देखौ लला की हालियत..देखी ना जा सकै। गले से कौर नीचे ना उतरै । रात के दो-दो बजे तक नींद ना आवै..। राम ने ना जाने माथे पै का लिख दीनौ है..।" --बोलते-बोलते लगा कि उनका गला बैठ गया है ।आँसू हैं कि बस निकल ही नही रहे हैं ।
"सो तो है ..। लेकिन जीजी ईश्वर की कृपा से सब ठीक होजाएगा आप चिन्ता न करें ..।"
मैंने उनके दुख को कम करने की नीयत से कहा पर वे ओज भरी आवाज में मुझे लगभग ललकारते हुए बोली--"अरे ऐसौ कहीं हो सकै लाली ,कि अपने आदमी की चिन्ता न होवै ? ऐसे में कही ध्यान भी लग सकै का ? तेरे जीजाजी (उनके पति) बीमार थे ढाई महीने बिस्तर पर टट्टी-पेसाब कराया (नाक एकदम ऊपर खींचते हुए) । दाग ना लगने दियौ बदन पर । पूरा गाँव कहै कि सेवा करौ तो माला भाभी जैसी नही तो नही । का मजाल कि उधर एक मक्खी तक झाँके । अब उन ने भी का कम सुख कराए जब तक वे ठीक रहे मेरे पाँव मैले ना होने दिये । एक दिन मायके नही जाने देते थे लाली । सब कहते कि राम-सीता जैसी जोडी है (गहरी साँस)..बजार में हर मौसम और फेसन की चीज पहले हमारे घर आती थी । पर दिन एकसे तो रहने से रहे बिटिया । अब हाथ-पाँव ना चलै किसी का सहारा तो लेना पडेगा लाली ,सो मंटू (जीजी के भाई का बेटा) और उसकी बहू को पास रखा है । इतना बडा दो मंजिला मकान और जमाना है खराब ,भैन मेरी, अकेले कोई भी आकर डुकरिया का गला दबा कर(घबराते हुए) माल-मसाला ले चम्पत होजावै कौन को पतौ चलैगौ ! पर भैना ऐसे ही कोई किसी के घर रह सके है ? कुछ तो उम्मीद दिखै । तभी तो कोई अपना घर छोडकर रहने तैयार होगा । सो एक मकान मंटू के लिये बनवा दिया है हाथरस में और पचास हज्जार की एफ.डी करा रक्खी है । मंटू कभी जे ना कह सकै कि कंजूस बुआ ने सेंतमेंत ही इतनी सेवा करवा ली । लाली , भगवान का दिया सब कुछ है बस एक सन्तान नही दी । सो अब तो एकई उम्मीद है कि बाँकेबिहारी की किरपा से मंटू की बहू की गोद हरी होजावै तो घर में किलकारियाँ गूँजै । पर आजकल की छोरियाँ हैं न ,अपने मन की करे हैं ।(आवेश के साथ) ऊपर से जे टी.वी. वालों की बेसरमी देखो, कैसी-कैसी चीजें दिखाते हैं । छोरियन कों खुल्लेआम घूमना -फिरना और अच्छा पहनना-ओढना तो खूब चइये पर ससुराल के नाम से दूर भागें हैं । घर-गिरस्ती के लच्छन तो जानै ही नाइ ।का घर सम्हालेंगी और का सेवा करेंगी । ब्याह  भी करलें पर बच्चा पैदा करने की जहमत ना उठा सके हैं । अपनों दूध ना पिला सकैं हैं । फिर भला ब्याह करने की भी जरूरत का है ।
कोई कैसी भी हो पर मंटू की बहू तो आपकी सेवा करती है न जीजी
अर् रे ...सो तो सेवा जीजान लगा कर करे है । कोई काम ना करने देवै । पर लाली वही बात है न कि  तीन साल होने को आए...
तो तीन साल कोई ज्यादा नही हैं ---मैंने अपने प्रगतिसील होने का प्रमाण देना चाहा तो वे बुरा मान गईं । जोर देकर बोलीं---नही लाली तुम जेई तो नही जानौ, बाल-बच्चा तौ सुरू में होजाए तो ठीक नही लगाओ डाक्टरों के चक्कर......।"
मुझे वहाँ से जल्दी जाना था वरना जीजी  समझ के कलश  में से  कोई और भी रस निकाल कर टेस्ट करातीं तीं...। बाकी फिर कभी ।
        

Tuesday, October 9, 2012

एक कविता अपनों के लिये


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बुझने को है अब हर शिकायत  
तेल खत्म होते दीपक जैसी
शिकायत कि ,
अब क्यों नही मिलते हो तुम
उस तरह, 
जिस तरह तय था हमारे बीच 
मिलते रहने का ,
बाँटते हुए वह सब जो 
सह्य नही होता कभी अकेले ही ।
शिकायत कि ,
तुम अब कभी-कभार 
सडक पर ही मिल गए 
परिचित की तरह निभाते हो
अपनेपन की रस्म ,
व्यस्तता के सुनिश्चित बहानों के साथ ।
साथ बैठ कर चाय पीते हुए भी 
करते हो हमेशा इधर-उधर की बातें
हवा में उडते रेशों की तरह 
नही बताते कि पिछली शाम 
तुम क्यों थे इतने परेशान 
पूछते भी नही कि क्या है वह बात जो 
चलने नही दे रही मुझे दो कदम भी आगे 
महीनों से ...। 
शिकायत कि , 
क्यों नही सोचते तुम  
मेरे लिये वैसा ही
जैसा सोचती रही हूँ मैं तुम्हारे लिये
हमेशा तुम्हें साथ रखते हुए...।
शिकायत कि ,
तुम अनजान बन रहे हो 
एक पारदर्शी दीवार से 
जो बन रही है हमारे बीच अनजाने ही ।
तुम्हें परवाह नही है जरा भी कि 
महसूस नही कर सकते हम 
एक दूसरे को छूकर ।
क्या तुम कभी समझ पाओगे कि 
यूँ शिकायतों का बुझ जाना 
स्वीकार लेना है रिश्तों की दूरियों को
जैसे स्वीकार लिया है लोगों ने 
कार्य-व्यवहार में,
भ्रष्टाचार को ।
दुखः तो यह है कि 
तुम्हें दुख नही है,
फिक्र भी नही है 
यूँ शिकायतों के मिट जाने की 

Thursday, October 4, 2012

लोकार्पण---एक रपट


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1 अक्टूबर 2012 को 'ध्रुवगाथा' और 'अपनी खिडकी से' का लोकार्पण होना था सो होगया । इसकी सूचना तथा अखबार से लिया गया छायाचित्र मयंक ने और बाद में सुश्री कुन्दा जोगलेकर ने पहले ही फेसबुक पर डालकर मेरा काम पूरा कर दिया ।  वही सूचना यहाँ भी है ।
लोकार्पण में जो विशेष बात थी वह यह कि मुझे कुछ विशेष नही करना पडा । फोन सूचना से ही शहर के अनेक सहृदय साहित्यकार  जो थोडा बहुत मुझे जानते थे ,आगए थे । सारी व्यवस्था आदरणीया श्रीमती अन्नपूर्णा जी  ने की थी । उसमें अंजेश मित्तल जी ,भाई लोकेन्द्र सिंह (ब्लाग 'अपना पंचू' ) और मेरे पुत्रतुल्य मोनू व हनी का विशेष सहयोग रहा । पुस्तकों का लोकार्पण  डा.पूनम चन्द तिवारी( पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष जी.वि.वि.) ,डा. जगदीश तोमर( वरिष्ठ साहित्यकार एवं निदेशक प्रेमचन्द सृजन-पीठ उज्जैन) डा. दिवाकर विद्यालंकार जी(प्रकाण्ड विद्वान एवं शिक्षाविद्)डा.अन्नपूर्णा भदौरिया(हिन्दी विभागाध्यक्ष जी.वि.वि.) एवं श्री प्रकाश मिश्र जी ( कविता के सशक्त हस्ताक्षर ) ने किया । इन विद्वान साहित्यकारों ने जिस तरह दोनों पुस्तकों की विस्तार से समीक्षा व प्रशंसा की , मुझे विश्वास नही हो रहा था कि यह सब मेरी रचनाओं के विषय में और मेरे लिये कह रहे हैं । डा. विद्यालंकार जी ने ध्रुवगाथा पर एक विस्तृत वक्तव्य देते हुए कहा कि ध्रुवगाथा को उन्होंने एक ही बैठक में पढ डाला । बिना रुके बिना ऊबे । जब किसी लेखक और पाठक की अनुभूतियाँ एकाकार होजातीं है उसे रचना का साधारणीकरण (जनरलाइजेशन) कहते हैं । ध्रुवगाथा पढते समय उन्हें यह तीव्रता से महसूस हुआ और कई बार उनकी आँखें नम हुईं । डा. जगदीश तोमर ने 'अपनी खिडकी से' कहानी संग्रह को एक अद्भुत और अरसे बाद सामने आया एक पठनीय कहानी-संग्रह बताया साथ ही पतंग ,आज्ञा का पालन, बिल्लू का बस्ता आदि कहानियों की विस्तार से चर्चा की । श्री प्रकाश मिश्र जी व डा. अन्नपूर्णा दीदी ने भी मुक्त-कंठ से दोनों पुस्तकों को अत्यन्त रोचक स्तरीय व स्वागत योग्य कृति बताया ।
इस बीच कुछ कमियाँ भी अखरीं । जैसे कि बैंगलोर से तीनों भाई शिकायत कर रहे थे कि कार्यक्रम  इतनी जल्दी में क्यों रखा गया कि हममें से कोई न आ सका । मेरे पास कैमरा था लेकिन पर्स से निकालने का ध्यान ही न रहा । यह फोटो मैंने कहीं से माँग कर लिया है ।  जिन्हें अध्यक्षता करनी थी वे एक हडताल में फँसे रहे और अन्त तक न आ सके । लोकार्पण के लिये रखी गई पुस्तकें रंगीन पेपर में लपेट कर रखी जातीं हैं यह मुझे मालूम ही नही था । अन्नपूर्णा दीदी ने मुझे अचरज से देखते हुए कहा -- "अरे गिरिजा , तुम्हें आज तक यह भी नही मालूम !" 
वह  तो  ऐन मौके पर भाई  लोकेन्द्र सिंह व मोनू के प्रयासों से बात सम्हाल ली गई ।और एक कमी यह भी लगी कि ग्वालियर  में हिन्दी भाषा व साहित्य जगत के  भीष्म पितामह कहे जाने वाले डा. पूनमचन्द तिवारी जी को बोलने का अवसर नही दिया गया । 'खजुराहो' के रचयिता डा. तिवारी जी नब्बे साल से ऊपर के हैं ( दाँए से दूसरे )पर उनमें जितना हिन्दी के प्रति समर्पण भाव है उतनी ही सक्रियता भी है । वे जब बोलने खडे होते हैं सबसे पहले पूछते हैं --"आपकी माँ कौन है ? हिन्दी या अंग्रेजी ?"  और फिर एक लम्बा व्याख्यान शुरु । कार्यक्रम कोई भी हो अगर तिवारी जी बोलेंगे तो देश में हिन्दी की दुर्दशा पर जरूर बोलेंगे । अब हाल यह है कि किसी कार्यक्रम में तिवारी जी आते हैं तो आयोजक पहले ही कहदेते हैं, " क्या !! तिवारी जी का भाषण ??,ना भैया भूल कर भी ऐसा न करना । आधा -पौन घंटा खा जाएंगे ।" पर मेरा विचार है कि इतने वयोवृद्ध विद्वान को हमें जरूर सुनना चाहिये । उनकी सन्तुष्टि  के लिये ही सही । वे तो कगार पर खडे हैं । आँखों में बच्चों की सी लालसा व भोलापन है । पता नही कब वह आवाज कहीं खोजाए । वे हर जगह पहुँच जाते हैं यह क्या कम है । मुझे भी आपाधापी में ख्याल न रहा वरना संचालिका कादम्बरी जी से  जी से कह ही देती । सम्मान ग्रहण करके वे जब बिना बोले चले गए तब मुझे अहसास हुआ कि शायद वे बोलने का अवसर न मिलने के कारण रुष्ट होगए । मुझे कुछ ठीक नही लगा पर कुछ लोगों ने कहा --"अरे ठीक है  सब समय से निपटगया । वरना अभी आधा पौन घंटा जाता ।"
खैर कार्यक्रम के लिये मैं जैसा सोच रही थी उससे कुछ ठीक ही होगया । 

Monday, September 24, 2012

'अपनी खिडकी से'--एक समीक्षक की नजर से


बड़ों के लिए किस्से बचपन के
- लोकेन्द्र सिंह
गिरिजा कुलश्रेष्ठ का पहला कहानी संकलन है 'अपनी खिड़की से'। भले ही यह उनका पहला कहानी संग्रह है लेकिन उनकी लेखनी की धमक पहले से मौजूद है साहित्यकारों के बीच। हाल ही में अपने स्थापना के तीन सौ साल पूरे करने वाली बाल जगत की पत्रिका 'चकमक' में उनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं। झरोका, पाठक मंच बुलेटिन  और सोशल मीडिया भी उनकी रचनाओं को लोगों तक पहुंचा चुका है। 'अपनी खिड़की से' में १५ बाल कहानियां हैं। हालांकि परंपरागत नजरिए से ये बाल कहानियां हैं लेकिन मेरे भीतर का मन इन्हें सिर्फ बाल कहानियां मानने को तैयार नहीं। इन १५ कहानियों का जो मर्म है, आत्मा है, संदेश है वह न सिर्फ बच्चों के लिए आवश्यक है बल्कि उनसे कहीं अधिक जरूरी बड़ों के लिए है। भाग-दौड़ के जीवन में अक्सर हमारा मन इतना थक जाता है कि हम अपने बच्चों की आवाज भी नहीं सुन पाते, उनकी संवेदनाओं को महसूस करना तो दूर की बात है। ऐसे में गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कहानियां हमें ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि अनजाने में ही सही कहीं हम अपने लाड़ले के बचपन के साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे। हालांकि 'अपनी खिड़की से' की कहानियां खुलेतौर पर बड़ों को उनकी गलतियां नहीं बतातीं लेकिन कहानियों का मर्म यही है। ये कहानियां गुदगुदाती हैं, जिज्ञासा जगाती हैं, चाव बढ़ाती हैं, मुस्कान लाती हैं और हौले से जीवन की अनमोल सीख दे जाती हैं।
संग्रह का शीर्षक पहली कहानी के शीर्षक से लिया गया है। पहली कहानी में साधारण परिवार का बालक वचन अपने घर की खिड़की से पड़ोस में रहने वाले अमीर परिवार के बालक नीलू की गतिविधियां देखकर अपना मन उदास करता रहता है। नीलू के कितने मजे हैं। उसके पास कितने खिलौने हैं। इकलौता होने के कारण मम्मी-पापा के प्रेम पर भी अकेले का अधिकार। लेकिन, जिस दिन वह मौका पाकर नीलू के घर उसके साथ खेलने जाता है और वहां उसकी जिंदगी से बावस्ता होता है तब उसे पता चलता है कि मजे तो नीलू के नहीं उसके हैं। उसके मां-पिता कहीं भी जाते हैं तो सब भाई-बहनों को लेकर जाते हैं। वह जी भरकर साइकिल चला सकता है। कपड़े मैले होने का डर नहीं, वह मैदान में खेल सकता है। लेकिन नीलू की मां तो कितनी रोक-टोक करती है। चुपके से यह कहानी बड़ों को भी समझाइश देती है कि बच्चों के मन को समझो और उन्हें तितली की तरह आजाद रहने दो। तमाम तरह की बंदिशों में बचपन को बांधकर उन पर जुल्म न किया जाए। बच्चों को महंगे खिलौनों से अधिक अपनों का स्नेह चाहिए होता है। इसलिए दुनियादारी के बीच से अपने मासूमों के लिए थोड़ा-सा वक्त तो निकाला जाए। दूसरी कहानी 'पतंग' बड़ी महत्वपूर्ण है। माता-पिता कई बार जबरन और कुतर्क के साथ अपने विचार अपने बच्चों पर थोप देते हैं। बच्चे की खुशी जाए भाड़ में। माता-पिता की यही गलतियां कई बार उन्हें और बच्चों को असहज स्थितियों में लाकर खड़ा कर देती हैं। अब इसी कहानी के पात्र सूरज को लीजिए, वह ईमानदार, सच बोलने वाला और माता-पिता का आज्ञाकारी बालक है। उसके पिता का मत है कि पतंग उड़ाने वाले लड़कों का भविष्य निन्यानवे प्रतिशत खराब है। वे सबके सामने यदाकदा घोषणा भी करते रहते हैं कि हमारा बेटा सूरज कभी पतंग नहीं उड़ाएगा। उसे तो एक अच्छा विद्यार्थी बनना है। अब भला पतंग न उड़ाने और अच्छे विद्यार्थी बनने का क्या विज्ञान है? सूरज का मन तो पतंगों के रंगीन ख्वाब सजाता है। एक दिन पतंग उड़कर खुद ही उसके करीब आ जाती है। अब वह पिता के डर से उसे छिपाता है, झूठ भी बोलता है, इस चक्कर में वह गिरकर चोटिल भी हो जाता है। हालांकि अंत में पिता को पता चल जाता है और बेटे की खुशी को भी वो समझ लेते हैं। 'रद्दी का सामान, इज्जत वाली बात, मां, बॉल की वापसी और आंगन में नीम' बेहद रोचक कहानियां हैं। ये बड़ों और छोटों के मनोविज्ञान को उकेरती हैं। बड़ों और छोटों के बीच किन बातों को लेकर उठापटक, खटपट और अनबन रहती है और इन्हें कैसे दूर करके दोनों एक-दूसरे के नजदीक आ सकते हैं, दोस्त बन सकते हैं, इन कहानियों में बेहद खूबसूरती से इसका शब्द चित्रण किया गया है।
'कोयल बोली' निश्चित ही आपको भावुक कर देगी। आपको आपका छुटपन और छुटपन के खास दोस्त की याद दिला देगी। 'बिल्लू का बस्ता' स्कूल के शुरुआती वर्षों की यादों का पिटारा खोल देगा। स्कूल जाने की कैसी-कैसी शर्तें होती थी। मां-पिता भी कितने प्रलोभन देते थे स्कूल भेजने के लिए। हमारे बस्ते में किताबें कम खिलौने ज्यादा मिला करते थे। विद्या के नाम पर किताबों में किसी पक्षी के रंगीन पंख और पौधे की पत्तियां। कंचे, डिब्बे-डिब्बियां, किताबों से काटे गए कार्टून और फूल के चित्र न जाने क्या-क्या। उस वक्त तो यही हमारे लिए कुबेर का खजाना होता था। सबसे छिपाकर रखना पड़ता था अपना खजाना।
'सूराख वाला गुब्बारा' और 'बादल कहां गया' बड़ी मजेदार कहानियां हैं। सूराख वाला गुब्बारा का आशय चंद्रमा से है। यह धरती, सूरज और चंद्रमा के संबंध में है। मनुष्य की गलतियों की वजह से 'बादल का अपहरण' हो गया है। हवा बालक बादल को अपने साथ ले गई है। उसने फिरौती के रूप में मांगे हैं पेड़, पौधे, जंगल और बगीचे। बादल चाहिए तो हमें धरती को हरी साड़ी से सुशोभित करना पड़ेगा। प्रकृति के संवद्र्धन का संदेश देती कहानी है यह।
तो मित्रो गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने अपने पहले ही कहानी संग्रह में हमें एक भरी-पूरी फुलवारी सौंपी है। जिसके १५ पुष्पों से उठती तरह-तरह की भीनी खुशबू बेहतरीन है। लेखिका प्रस्तावना में उम्मीद व्यक्त करती हैं उनकी ये बाल-कहानियां बाल पाठकों में ही नहीं वरन् प्रबुद्ध पाठकों के बीच में भी अपना स्थान बनाएंगी। मेरा मत है कि कहानियां प्रबुद्ध पाठकों द्वारा निश्चित ही सराही जाएंगी। अपने मकान की 'अपनी खिड़की से' देखेंगे तो कहीं न कहीं ये कहानियां हमें अपने आस-पास ही बिखरी नजर आएंगी।


Thursday, September 20, 2012

पच्चीस साल बाद


'पच्चीस साल बाद' ---फिल्मी नाम लग रहा है न ? लेकिन यह सच है कि पुस्तक 'ध्रुव-गाथा' जो कल ही प्रकाशित होकर आई है ,पच्चीस साल से पहले ही लिखी गई थी । कथ्य व शिल्प में बेहद सामान्य होते हुए भी इस दृष्टि से मान्य हो सकती है कि यह सुदूर गाँव की केवल ग्यारहवीं पास और स्वाध्याय से बी.ए. प्रथम वर्ष पढती हुई महिला की रचना है । जब इसकी रचना हुई थी मैंने कविता के नाम पर केवल पंचवटी पढी थी । गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढाते हुए ,बच्चों को सम्हालते हुए स्वाध्याय से ही जैसे-तैसे शिक्षा ले रही थी ऐसे में मेरा साहित्यिक ज्ञान कितना होगा । स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम से बाहर नही । गुप्त जी की पंचवटी मेरी प्रिय पुस्तक थी (है) ध्रुवगाथा पर उसका ही प्रभाव दिखता है ।
लिखने की प्रवृत्ति तो हाईस्कूल पास करते ही दिखने लगी थी । कुछ गीत ,कहानियाँ व एक बाल-उपन्यास (रानी नील गगन की) ग्यारहवीं पास करते-करते लिख लिया था । पर जाने क्यों लगता था कि जैसा लिखा जाना चाहिये वह यह नही है । (आज भी ऐसा ही है ) इसलिये वे रचनाएं नष्ट भी होगईं । इसका एक ही कारण है कि मैं पर्याप्त साहित्य नही पढ पाई हूँ । अध्ययन न केवल अभिव्यक्ति के द्वार खोलता है बल्कि उसे निखारता व विविधता भी देता है । सन् 1982 में जब ध्रुवगाथा लिखना शुरु किया तब विवेक का जन्म होने को था ।
ध्रुव की कथा ने मुझे सदा प्रभावित किया । भागवत कथा में जब शास्त्री जी साश्रु इस कथा को सुनाते थे तब प्रौढ श्रोताओं के साथ हम बच्चे भी रोने लगते थे । समयानुसार इस कथा का बीज नमी और धूप पाकर अंकुरित हुआ और सहज ही कुछ पंक्तियाँ रच गईँ । और फिर यों ही बचकाने से प्रयास-स्वरूप ध्रुवगाथा ने एक खण्डकाव्य का रूप ले लिया ।1986 तक यह पूरा होगया । पिताजी ने शाबासी दी तो मैं खुद की नजरों में कुछ बडी होगई । लेकिन जब 1987 में मैंने एम.ए. के पाठ्यक्रम में 'नई कविता' पढी तो मेरा उत्साह क्षीण होगया । मुझे अपनी रचना द्विवेदी-युग की शुरुआत में ही में लिखी गई कुछ ज्यादा ही साधारण रचना लगी । पर उसमें सुधार-परिष्कार का अवकाश ही नही था । अब मेरे जीवन में मयंक जी(छोटा बेटा) भी आ चुके थे और मेरे दिल-दिमाग और समय पर पूरा अधिकार जमा चुके थे । अब कहाँ किताबें और कहाँ पढाई । इसके बाद यह हुआ कि मैं ध्रुवकथा को किसी बक्सा में डालकर भूल गई । सन् 2001 में बाल-साहित्य की एक कार्यशाला में लखनऊ जाना हुआ वहाँ गाजियाबाद की सुश्री मधु बी.जोशी जी से भेंट हुई । संयोग से मैं उन्ही के कमरे में ठहरी थी । मधु दीदी बहुत ही खुशमिजाज और ज़िन्दादिल महिला हैं । उनके पास बैठ कर कोई ऊब नही सकता । बातों-बातों में मैंने अपने उस बचकाने प्रयास का उल्लेख किया तो उन्होंने हर तरह से मुझे यह मानने विवश कर दिया कि अपनी रचना को यों गुमनामी के अँधेरे में रखना ठीक नही । अपने लिये ही सही उसे प्रकाश में जरूर लाओ ।तब मैंने कुछ सुधार के साथ ध्रुवकथा को टंकित करवाया । भाषा छन्द शैली कुछ नही बदला जा सका । बदलना चाहती थी पर वह दीवारों को छत और फर्श को दीवार बनाने जैसा दुष्कर कार्य होता ।
खैर पच्चीस साल बाद आई इस रचना को कहीं कोई जगह मिलेगी ऐसा तो मैं नही मानती फिर भी बाल खण्ड-काव्य के रूप में इसे कुछ लोग पसन्द करेंगे ऐसी उम्मीद तो है । पुस्तक में से ही ध्रुव-नारद-संवाद के कुछ अंश यहाँ दे रही हूँ पढ कर अपनी बेबाक टिप्पणी अवश्य दें । 
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स्वर्ग धरा के बीच सुगम संचार चलाने
आते हैं जब-तब नारद संवाद बनाने ।
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वन सुषमा को देख मुग्ध हो चले आरहे
प्रभु के नही प्रकृति के मुनिवर गीत गा रहे
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सहसा ठिठके ज्यों सोये बालक को देखा
उभरी माथे पर विस्मय की गहरी रेखा ।
पल्लव सा सुकुमार यहाँ क्योंकर सोया है
किसने छोडा , कुलभूषण किसका खोया है ?
   ..................
 "वत्स कौन हो ?और यहाँ तुम कैसे आए?
घोर विपिन में तुम क्यों जरा नही घबराए ?"
"घबराऊँगा क्यों ? प्रभु से मिलने निकला हूँ
राजपुत्र हूँ पर काँटों के बीच पला हूँ ।
यह तो आप कहें  कैसे आए हैं मुनिवर
कहीं आप ही तो हैं नही पिता परमेश्वर
माँ ने कहा रूप कोई भी रख लेते हैं
यूँ भगवान भक्त को खूब परख लेते हैं ।
यह सच है तो अपना असली रूप दिखाओ
बाहों में ले लो फिर अपने गले लगाओ ।"
......
"सदियों से मैं खोज रहा हूँ ईश्वर को ही ।
होते अगर कहीं वो ,मिल जाते मुझको ही ।
वन में भटक रहे हो ,किसने बहकाए हो ?"
मेरे मत से बेटा व्यर्थ यहाँ आए हो ।"
"अरे !आपको शायद यह भी पता नही है
तरु मेरा विश्वास , कि नाजुक लता नही है ।
जरा खींचने से जो टूट बिखर जाएगा
ध्रुव है यह ,जो ठान लिया वो कर पाएगा ।"
...........................
"भजन ?अरे बालक यह तो है मन बहलाना
इसी बहाने बुरे विचारों से बच जाना ।
कहीं नही है नाम रूप का कोई ईश्वर
सुन पुकार जो आजाए जैसे जादूगर ।"
.................
"गहन समर्पण और लगन से कितनों ने ही
ईश्वर को पाया है , बतलाया माँ ने ही ।
मुझमें लगन समर्पण भी गहरा है मुनिवर
यद्यपि मैं छोटा भी हूँ अज्ञान निरक्षर ।"......

Sunday, September 16, 2012

वे 'लक्षणा' को नही जानते ।


"ए ! ओ !! अरे भाई सुनो !!!" 
साक्षरता अभियान के दल-प्रमुख ने एक गाँव वाले को पुकारा जो एक तरफ भागता हुआ सा जारहा था । यह कुछ साल पहले अक्टूबर-नवम्बर की बात है जब प्रदेश के पूर्ण साक्षर होने के आँकडों को जुटाने के लिये शिक्षक अपने छात्रों की बजाय निरक्षरों को साक्षर बनाने गाँव-गाँव घूम रहे थे पर निरक्षर थे कि खेत-खेत ,रबी की फसल बोने तथा अपने दूसरे कामों में रमे थे । खेत बुवाई के लिये उसी तरह सज-सँवर कर तैयार थे जैसे वधू-आगमन पर घर-आँगन और द्वार चौक-साँतियों से सजा-सँवार दिये जाते है । यही कारण था कि जब मोटरसाइकिलों की फौज मोतीझील ( मोतीझील कोई झील नही ग्वालियर में ही एक जगह का नाम है ) के पास उस छोटे से गाँव में पहुँची ,उस समय गाँव में बाहर दरवाजों पर बँधे छोटे बछडों--मेमनों तथा बूढे जानवरों को छोड कोई नही दिखाई दे रहा । या किसी चबूतरा पर पडी चारपाई से कभी-कभी खाँसने की आवाज बता देती थी कि कोई बीमार लेटा है । धूप चमकीली थी लेकिन हल्की सी नरम होगई थी ।  
"यह हाल है इस देश का । लोगों को भूख नही है पर सरकार है कि मुँह में कौर ठूँसे ही जारही है । ठूँसे ही जा रही है ।"
दल-प्रमुख नरेन्द्र जी ने एक असन्तोषभरी नजर पंचायत-भवन के आसपास बिखरे घासफूस और गोबर पर डाली एक दौडते-फँलागते आदमी पर लपककर आवाज का जाल फेंका--"ओ भाई जरा बात तो सुनो ।"
दो बार तो वह जाल खाली ही आया पर तीसरी बार वह आदमी जाल में मछली की तरह फँसा चला आया ।  
"क्या है साब ?"
"अबे ! कहाँ है सब लोग?"
"हजूर ,गेहूँ चना और मटर की बुवाई हो रही है । इस समय तो कोई नही मिलेगा ।"
"अबे मिलेगा कैसे नही । कल खबर भिजवाई थी ना ? हम क्या ऐसे ही डोल रहे हैं मारे-मारे ? सरकार का हुकम है । सबको कुछ जरूरी बात समझानी है । गाँव के सरपंच को तो कम से कम होना ही था यहाँ । जा बोल सबको । औरत ,बच्चे ,बूढे ,जवान सबको बुला ला ।" 
नरेन्द्र जी ने लताडा । फिर धीरे से बोले---"साले पूरे ढोर हैं । अब क्या इन्सान बनेंगे !"
वह आदमी इतने सारे पढे-लिखे लोगों को गाँव में देखकर अपनी लताड भूल गया और आज्ञाकारी बच्चे की तरह चला गया ।
सरपंच तक सूचना पहुँची । सरपंच कामधाम छोड कर आए । 
"सरपंच जी , आपको तो पता है कि साक्षरता अभियान चल रहा है । कल खबर भी भिजवाई थी कि सब लोगों को बारह बजे पंचायत-भवन पर इकट्ठे होने को कहदें ..।"
"आपकी नाराजी वाजिब है साब लेकिन आजकल साँस लेने को भी "...
"अरे छोडो खां साब ,मुश्किल से आधा-पौन घंटा लेंगे । सबको बिस्कुट वगैरा भी दिये जाएंगे ।"
"साब ! कोई कुछ नही खा पाएगा । यह सब हमारे लिये जहर है अभी ।"--सरपंच ने हाथ जोडकर कहा । नरेन्द्र जी चौंके--"जहर !! अरे भाई हम तुम्हें जहर देंगे ? तुम हमारे भाई जैसे ही हो ।...भैया ,हम तो अमृत बाँटने आए हैं। आप लोगो को अशिक्षित होने का कितना घटा सहना पडता है ,पता है ??...चार अक्षर सीख लोगे तो काम आएंगे ..वही सिखाने आए है । सोचो कि आपके घर तक खुद पूरा स्कूल आया है....।"  
"मैं कोशिश करता हूँ साब ..लेकिन" ...।
नरेन्द्र जी पीछे से कहने लगे --"देखा ! लोग ऐसे दंगे फसाद करवाते हैं । हमारे बिस्कुटों में ही जहर बता दिया । यही बात अखबारों तक पहुँच जाए तो क्या हो...! खैर हमें क्या ! सरकार ने भेजा तो आगए । 
"सरपंच से साइन जरूर ले लेना ।" 
"यह जहर वाली बात प्रिंसिपल साहब को जरूर बताना नरेन्द्र ।"
"और क्या । कौन जानता है कि किसके मन में क्या है ।"
कुछ साथियों ने अपनापन दिखाते हुए कहा ।
"ठीक है लेकिन आप लोगों को तो बिस्कुटों में जहर होने का सन्देह नही है न ?"
नरेन्द्र जी ने मुस्कराकर साथियों को देखा तो सब हँस पडे और पारले जी का एक-एक पैकेट अपने बैग में डाल लिया

Sunday, September 9, 2012

दर्द को सोने न देना ।


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यह 19 वर्ष पहले की बात है । सातवीं कक्षा एक का मासूम छात्र एक दिन स्कूल में अपने शिक्षक द्वारा पूछे गए सवाल का सही उत्तर देकर आत्म-विश्वास से भर उठा था ।
सवाल गणित का था । कक्षा में केवल एक वही था जिसने सही उत्तर दिया था । शिक्षक ने मुस्करा कर शाबाशी देने की बजाय उससे कहा कि ठीक है , चलो अब सबको एक-एक थप्पड लगाओ ।
सबको यानी अपने सभी सहपाठियों को । वह सीधा-सादा छात्र लडाई-झगडे से दूर रहने व सहपाठियों को अपना दोस्त मानने के अलावा डरता भी था । पर सबसे बडी बात तो यह थी कि वह इसे बिल्कुल गलत मानता था । अगर छात्र सवाल का जबाब नही दे पाए तो खुद सर को ही उन्हें दण्ड देना चाहिये न । वह अपने सहपाठियों को भला कैसे थप्पड मारता ,सो लडखडाती सी जुबान में बोल पडा---"सर मैं कैसे.?..क्यों ....??"
"अच्छा ! कैसे....!" बच्चे के कक्षाध्यापक ने आँखें निकाल कर कहा--- "आ देख मैं बताऊँ ! ऐसे...।" और उन्होंने बच्चे के गाल पर जोर का थप्पड लगा दिया ।
बच्चे को चोट लगी । गाल पर लगी तो लगी पर मन पर जो चोट लगी उसका दर्द बहुत गहरा हुआ । 'आखिर मुझे थप्पड क्यों मारा सर ने ? मैंने तो सही जबाब दिया था । क्या सही जबाब का ऐसा इनाम मिला करता है ?
इस बात को वह वर्षों तक नही भूल पाया । शायद आज तक भी उसे मलाल है कि आखिर लोग सही उत्तर को मान क्यों नही देना जानते । क्या इससे गलत और झूठे जबाबों की राह नही खुल जाती ?
वह बच्चा कोई और नही मन्नू (विवेक) था । जो आज 30 वर्ष का होगया है ,उस दर्द को भुलाने की  नाकाम कोशिश करता हुआ । मुझे मालूम है कि यह कोशिश बेकार ही होती है । सहृदय सरल व्यक्ति संवेदना को दरकिनार करके बहुत दूर तक सहज नही रह सकता । जो झूठ बोलना नही जानता वह कोशिश भी करता है तो पकडा जाता है ।
फिर कोशिश करने की जरूरत ही क्या है । दर्द कायम  रहे और वह रचनात्मक रूप लेता रहे , सकारात्मक रूप में व्यक्त होता रहे ।
अनन्त शुभ-कामनाओं व स्नेह के साथ यह कविता भी आज मन्नू और मन्नू जैसे हर सच्चे ,ईमानदार और संवेदनशील व्यक्ति के लिये है जो कहीं न कहीं निराश होकर विचारों का प्रवाह बदलने की कोशिश करता है -----

" याद रखो ,
दर्द को आबाद रखो ।
दर्द , जो होता है सही सवाल के
गलत जबाब का  ।
दर्द जो बनावटी व्यवहार और
झूठे हिसाब का ।
दर्द ,जो सरलता पर
छल के वारों का है
दर्द ,जो आँगन में उठती दीवारों का है
दर्द ,जो अन्याय की जीत का है
दर्द ,जो 'गोंडवी' के गीत का है ।
दर्द ,जो उठता है
अखबार की सुर्खियाँ  पढने पर
दर्द ,जो होता है खुले आसमान तले
राशन के सडने पर ।
दर्द ,जो जगा देता है ,
'अलार्म की तरह ।
दर्द जो चलाए रखता है
गंतव्य तक पहुँचने के 'चार्म' की तरह ।
इस दर्द को सोने न देना ।
यह पूँजी है जीवन की ,
दौलत है दुनिया की
इसे खोने न देना ।"

Tuesday, September 4, 2012

'वह सबक'----माँ का एक अविस्मरणीय संस्मरण

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"उन दिनों स्कूल लगभग आठ घंटे लगता था । सुबह से दोपहर और फिर तीन से चार घंटे शाम को "---एक दिन मेरे आग्रह पर माँ ने जब अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताया तो बचपन जैसे उनकी आँखों में साकार हो उठा ।
"यह सन् 1946-47 के आसपासकी बात है । तब मध्यप्रदेश को मध्यभारत कहा जाता था । ग्वालियर में सिन्धिया जी का राज था । गाँवों की व्यवस्था जमींदारों के हाथों में थीं ।"
"हमारे गुरुजी पं. छोटेलाल जी थे । पाँच या दस रुपए वेतन मिलता था । कच्ची ,लेकिन लिपी-पुती और एकदम साफ-सुथरी खपरैल( पाटौर) हमारी पाठशाला थी जिसकी दीवारों पर खुद गुरुजी ने ही रंगों से वर्णमाला ,पक्षी फूल फल और पशुओं को अंकित किया था । दिशाओं की सही जानकारी के लिये चारों दीवारों पर दिशाओं के हिसाब से बडे अक्षरों में पूरब,पश्चिम,उत्तर व दक्षिण लिख दिया गया था । वैसे वे दिशाओं ज्ञान एक बडे आसान तरीके से कराते थे कि सुबह के समय जब हमारा मुख सूरज की ओर होता है तब पीठ पश्चिम की तरफ ,बाँया हाथ उत्तर में और दाँया हाथ दक्षिण की ओर होता है । शाम को ठीक इसके विपरीत होता है यानी मुख पश्चिम की ओर तो पीठ पूरब की ओर...।
झकाझक सफेद कमीज और धोती पहने ,माथे पर रोली का तिलक लगा ,पैरों में खडाऊँ डाले जब पंडित जी शाला में आते थे तो हम सब उनके सम्मान में एक साथ खडे होजाते थे मानो इतनी देर से केवल खडे होने के लिये ही बैठे थे । लगभग पन्द्रह मिनट ईश-विनय होती और फिर सबके ,कपडों ,बालों दाँतों व नाखूनों का निरीक्षण करते थे । वैसे तो गुरुजी हमारे साथ जमीन पर ही बैठ कर बडे प्रेम से हर चीज समझाते थे लेकिन निर्देश के अनुसार काम न मिलने पर सजा के लिये उनके पास पतली हरी संटी भी रहती थी जो हथेली पर पडने से पहले ही सांय की आवाज से दहशत भर देती थी और इसमें सन्देह नही कि वह दहशत काम पूरा करने में सहायक ही होती थी ।
इसके बाद सबकी पट्टियों व सुलेख की जाँच होती थी । उस समय स्लेट भी नही थी । काठ की बडी-बडी पट्टियाँ ही स्लेट का काम देतीं तीं जिन्हें कालिख से पोत कर काँच से घिस-घिसकर चमकाना भी एक जरूरी काम था । सरकंडे से खुद अपनी कलम बनानी होती थी । गुरुजी पहले ही सिखा देते थे कि बडे अक्षरों के लिये नोंक कितनी चौडी हो और छोटे अक्षरों के लिये कितनी पतली । खडिया के घोल में कलम डुबाकर पट्टी पर सफाई व सुघडता से लिखना होता था वरना गुरूजी की संटी को सक्रिय होने में देर नही लगती थी । साफ सुन्दर और शुद्ध लेखन तब पढाई की पहली की पहली शर्त हुआ करता था ।
सुबह के चार घंटों में केवल हिन्दी, व सामाजिक अध्ययन पढाया जाता था । हिन्दी में व्यंजनों व मात्राओं के उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता था । 'श' की जगह 'स' या व'' की जगह 'ब' जैसी गलतियों को वे बिल्कुल बर्दाश्त नही करते थे । मात्राओं के उच्चारण में वे हमारी ही नही अपनी भी दम निकाल लेते थे । 'क' पर 'आ' की मात्रा लगाने पर वे पूरा मुँह खोलकर बुलवाते--"-काssss" । फिर 'इ' की मात्रा पर झटके से रुकते --'कि' । फिर 'ई' की मात्रा पर वही लम्बा स्वर होता --"कीssss" । और इस तरह मात्राओं के गलत होने का सवाल ही नही था । इतिहास को वे कहानी की सुनाते थे और भूगोल को नक्शों, माडलों से या बाहर नदी और मैदान में जाकर, पहाड दिखाकर पढाते थे । ग्राफ द्वारा वे भारत का नक्शा इतनी अच्छी तरह बनवाते थे कि न तो कच्छ की खाडी में कोई गलती होती न ही पूर्वांचल की सीमाओं में । अन्त में वे इबारत लिखवाते या कोई व्यावहारिक कार्य करवाते जैसे तकली चलाना ,नारियल के खोखले के टुकडों को घिस कर  बटन बनाना या गीली मिट्टी से फलों व सब्जियों के माडल व कौडियाँ बनाना । सुबह की पाली दोपहर खत्म होजाती थी ।
"और फिर दूसरी पाली ?"-- ऐसी निराली पाठशाला के बारे में और भी जानने की मेरी उत्कण्ठा बढ गई तो माँ भी दुगने उत्साह से बताने लगीं---"दूसरी पाली ढाई-तीन बजे शुरु होजाती थी । बीच में मिले विराम में पंडितजी खाना बनाते--खाते और हम जुट जाते अपनी पट्टियाँ चमकाने में । शाम की पाली होती थी गणित व खेलों की । गिनती ,पहाडे, पाव ,पौना ,ड्यौढा सब कण्ठस्थ करने होते थे और बेसिक सवाल (जोड बाकी,गुणा,भाग )मौखिक ही अधिक होते थे जैसे कि 'सत्रह में क्या जोडें कि पच्चीस होजाएं ?'या कि 'तीन किताबें चौबीस रुपए की तो पाँच किताबों का मूल्य क्या होगा ?' केवल बडे और कठिन सवाल ही स्लेट या कापी में करने होते थे ।
पी.टी. करवाते समय जब वो कडक आवाज में सावधान कहते तो लगता कि एक पखेरुओं का झुण्ड साथ पंख फडफडाकर उडने तैयार हो । खेलों में खो,खो कबड्डी ,रूमालझपट,कोडामार और कुक्कुट युद्ध जैसे अनेक खेल होते थे । शाम पाँच बजे छुट्टी मिल जाती थी । पंडितजी दिशा-मैदान चले जाते और हम पूरी तरह आजाद ।
रात में भी दो घंटे पंडित जी की पाठशाला चलती थी । तब वे लोग पढते थे जो खेती के कामकाज या गाय-भैंसचराने के कारण दिन में नही पढ पाते थे । पंडितजी को प्रसिद्धि की आवश्यकता नही थी वे अपने काम को पूजा मानते थे इसलिये पूरी लगन व ईमानदारी से करते थे । तभी तो आज भी उनका नाम है । ...और कुछ लोग तो...माँ कुछ रुकीं और मुस्करा कर बहत्तर वर्षीय देवीराम को देखा जो अचानक हमारे वार्तालाप को सुनकर आ खडे हुए थे । वे माँ के सहपाठी रहे थे । उन्हें देखकर माँ पुलक के साथ बोलीं---"-हाँ मैं कह रही थी कि उनके कुछ शिष्य तो आज भी उनके नाम से थरथराते हैं । क्यों देवी भैया !"
देवीराम आदर ,लज्जा व बचपन की यादों की मिठास से भर उठे । माँ कहने लगीं---"देवी भैया कक्षा के सबसे फिसड्डी छात्र थे । इन्हें कई बार समझाने पर भी कुछ याद नही होता था । कभी सबक पूरा करके नही लाते थे । बस कभी 'पंडी इक्की जाऊँ ?'तो कभी 'दुक्की जाऊँ' रटते रहते थे । ( इक्की, दुक्की का प्रयोग क्रमशः पेशाब जाने व शौच जाने के लिये होता था ) इतना कहते कहते माँ की हँसी फूट पडी । मैंने देखा उनके चेहरे की झुर्रियाँ कहीं गायब होगईं हैं ।
"तब सबक याद न करने पर तुम्हारी कितनी पिटाई होती थी भैया । याद है ?"
"सब याद है, बाईसाब ,सब याद है ।"-- देवीराम जैसे किसी स्वप्न संसार की सैर कर रहे थे----"वे क्या दिन थे ! अब कहाँ वैसी पढाई और कहाँ वैसा सनेह ! वह तो मार भी अच्छी थी । उसी मार के कारण मुझ जैसा निखट्टू भी उँगलियों पर हिसाब करना सीख गया था । और सारे सबक तो मुझे ऐसे रट गए कि आज तक नही भूला । आज भी पूरा याद है । "
"कौनसे सबक ?"---मेरी जिज्ञासा जागी ।
"अरे हाँ पुस्तक के पाठ, इबारत और कठिन शब्द लिखते-पढते हम सबको याद भी होजाते थे । केवल देवीराम भैया को ही याद नही होते थे । पर एक दिन इन्होंने सारे सबक एक साथ गुरूजी को सुना दिये तब हँसते-हँसते उन्होंने इनकी पीठ खूब ठोकी थी और एक दुअन्नी इनाम भी दी थी । तो फिर आज वह सारा कंठस्थ सबक सुना ही दो भैया ।"--माँ ने आग्रह किया । मैंने माँ की बात एक बार और दोहराई । तब बहत्तर साल के देवीराम ने बारह साल के छात्र की तरह सावधान मुद्रा में खडे होकर वह सबक सुनाया--- तीन अच्छरों के शब्द जैसे बतख, महल,नगर...चार अक्षर के शब्द जैसे खटमल, अजगर, ...माला-काला, पानी-नानी, सूप-धूप ,मेला-ठेला-केला ...पीतल का रंग पीला होता है ,नीम कडवा होता है, बतासा मीठा होता है ,सडा फल मत खा, रोज दाँतों में मंजन कर , झूठ मत बोल, लज्जा नारी का भूषण होता है , गिद्ध की निगाह तेज होती है ,बर्र का डंक जहरीला होता है , मच्छर के काटने से मलेरिया होता है ,गन्दा पानी इकट्ठा मत होने दो ,पेड मत काटो ,जीवों पर दया कर, ठठ्ठा मत कर , सुबह घूमना अच्छा होता है , चोरी करना बुरी बात है मीठा खाने से दाँतों में कीडा लगता है ,मिले अच्छर याद कर जैसे--डुग्गी ,घुग्घू, झझ्झर, मच्छर, कंकड , जैसे--गिद्ध, डिब्बा, कुप्पा ...ड्यौढा एकम् ड्यौढा, ड्यौढा दूनी तीन, ड्यौढा तीय साढे चार.....एकन पन्द्रह, दूनी तीस, तिय पैंतालीस ,चौके साठ......
सबक चल रहा था लगातार बिना साँस लिये । पूर्ण विराम तो दूर कहीं अल्प-विराम भी नही । हम सबकी हँसी दबे-दबे ठहाकों में बदल गई थी पर देवीराम पूरी गंभीरता व सजगता के साथ अपना सबक सुनाए जारहे थे मानो किसी छात्र को बीच में ध्यान बंग होजाने पर सबक भूल जाने का डर हो ,भूल जाने पर गुरुजी की नाराजी का डर हो या कि वह भी दिखा देना चाहता हो कि सबक याद करने में वह किसी से कम नही है ।

Monday, August 27, 2012

यह तो सोचा ही नही था ।


कोलाहल में क्यों ख़ामोश शहर लगता है
ख़ामोशी में अब तो साफ ज़हर लगता है ।

आकर भी देखें  वो सडक बनाने वाले ,
सारा देश हादसों का ही घर लगता है ।

अपनों के बेगानेपन ने ज़ख्म दिये हैं ,
बेगानों के अपनेपन से डर लगता है ।

पाने खोने का हिसाब जो रखे जेब में ,
ऐसा प्रेमी केवल सौदागर लगता है ।

रोक न पाए वर्षा ओले आँधी तूफां
बिना छत दीवारों का यह घर लगता है ।

रखी बैग में सिर्फ जरूरत भर की चीजें
हमें पता है साँसों पर भी कर लगता है ।

पहले इतना कभी नही सोचा था हमने ,
पर जाने क्यों अब संदिग्ध सफर लगता है ।

Tuesday, August 21, 2012

दुष्यन्त कुमार ने कहा ।

मामूली बात नही है
कि अगन भटुटियों के दहाने पर बैठे हुए हम
तुमसे फूलों और बहारों की बातें कर लेते हैं ।
................................................................
मामूली बात नही है
कि जब जमीन और आसमान पर
मौत धडधडाती हो
एक कोमल सा तार पकडे
अपनी आस्था आबाद रखें
विषाक्त विस्फोटों के बीच
गाँधी और गौतम का नाम याद रक्खें
.....................................................
भूखी साँसों को राष्ट्रीयता के चिथडे पहनाएं
अभावों का शिरस्त्राण बाँधें
चारों ओर फैली विषैली गैस ओढ लें
चाहे तलुए झुलसकर काले पड जाएं
आँखों में सपनों की कीलें गड जाएं
कितनी बडी बात है
कि नजरों को घायल कर देते हैं दृश्य
जिधर पलकें उठाते हैं घृणा व द्वेष मुस्कराता है
आकाश की मुट्ठी से फिसलती हुई
बेवशी फैलती फूटती है
फिर भी हम नही छटपटाते
...........गातें हैं  एक ऐसा गीत जिसकी टेक
अहिंसा पर टूटती है ।

मामूली बात नही है दोस्तो
कि आज जब दुनिया शक्ति के मसीहों को पूजती है
हम युद्धस्थल में एक मुर्दे को शान्ति का पैगम्बर समझकर
उठाए चल रहे हैं ।
........................
बार-बार शान्ति के धोखे में
विवेक को पी जाते हैं
संवेदवहीन राष्ट्रों को
...आत्मा पर बने घाव दिखाते हैं
..........................
मामूली बात नही है दोस्तो ,
कि हम न चीखते हैं न कराहते हैं
क्योंकि मान लिया है इसी को अपनी नियति
.....यही तटस्थता है
अहिंसा, शान्ति या सह-अस्तित्त्व है
इसी के लिये तो हमने
सहा है ....।
प्राण गँवाए हैं ।
कच्छ में स्वाभिमान
कश्मीर में फूलों की हँसी
और छम्ब में मातृभूमिका अंग-भंग होजाने दिया है
चाकू और छुरे खाए हैं
( आज भी खारहे हैं )
यह मामूली बात नही है दोस्तो ।

  

Thursday, August 16, 2012

सीमाओं से परे



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कुछ माह पहले की बात है जब मैं दिल्ली जा रही थी । वहां से सुबह 9.40 पर बैंगलोर के लिये उडान थी । ग्वालियर से दिल्ली के लिये रात दो बजे गोंडवाना ऐक्सप्रेस में एस-1 में मेरी सीट आरक्षित थी । कुलश्रेष्ठ जी ने मुझे यथास्थान बिठाकर विदा ले ली । गाडी जल्दी ही चल पडी । मैंने सामान किसी तरह जमाया और निर्धारित सीट पर सोये व्यक्ति को जब सीट खाली करने के लिये कहा तो वे --"मैडम यह सीट तो मेरी ही है" कह कर फिर सोगए । बडे अजीब इन्सान हैं । रात के ढाई बजे किसी खाली सीट पर आराम से सोजाएं, इतना तो चलता है पर जब सीट वाला आकर अपनी सीट  चाहता है तब तो कायदे से उठ जाना चाहिये न । मैंने सोचा और एक बार फिर उन सज्जन को जगाने की कोशिश की । तो उन्होंने चेहरे से चादर हटाते कुछ खीज कर कहा--" आप खामखां परेशान कर रही हैं । यह सीट मेरी ही है । आपका रिजर्वेशन है किस बोगी में ?"
"एस--1 में ।" मैंने भी उसी खीज के साथ कहा । दो-तीन सामानों को लादे मैं वैसे ही काफी परेशान हो रही थी । उस पर महाशय लेटे-लेटे बडी निस्संगता से पूछताछ कर रहे थे ।
"यह एस--4 है "--उन्होंने कहा और फिर खुर्राटे लेने लगे । मुझ पर जैसे घडों पानी पड गया । वास्तव में वे अपनी जगह सही थे । गलती मेरी थी । जल्दी में और वह भी रात में  एस-1 या एस-4 ,कुछ सूझा ही नही । हालाँकि पतिदेव ने  ऐसा नही माना बोले, कि यह सब रेल वालों की गलती है । बाहर एस-1 ही लिखा था । वरना मैं क्या ऐसी गलती करता ।
सच जो भी हो  उस गलती की सजा मेरे लिये उस समय काफी कठोर  थी ।  मैं हैरान होकर असहाय सी चारों ओर देखने लगी । उस समय मैं ऐसी दशा में खडी थी जब कुछ समझ में नही आता कि क्या करें ।  सब गहरी नींद में थे । एक-दो ,जो जाग गए थे वे मुझे वहां से किसी तरह चलता करना चाह रहे थे । वैसे ही जैसे कोई पसन्दीदा कार्यक्रम के बीच आए किसी अनाहूत व अनावश्यक व्यक्ति को करना चाहता है ।  पर मैं कैसे जाती । मेरे पास दो बैग और एक स्ट्राली थी । बिलकुल चलने के समय सामान के पीछे घर में खूब बहस होती है कि क्या होगा इतना कुछ लेजाकर । कोई जंगल में जा रही हो क्या । वहाँ सब कुछ मिलता है । काफी कुछ निकाल फेंक भी दिया जाता है पर नजर बचा कर  कुछ तो वापस रख ही जाता है । शायद महिलाओं को काफी कुछ समेट कर चलने का चाव होता ही है । खास कर माँओं को । खैर...
इस तरह वे तीनों सामान हल्के तो  नही थे पर मैं  उन्हें ले जा सकती थी  अगर  आसानी से  रास्ता मिल जाता । लेकिन रास्ता तो पूरी तरह बन्द था । जैसे सडक पर ट्रक पलट जाने से यातायात ठप्प  होजाता है । यहाँ तो दूसरे रास्ते का विकल्प भी नही था ।  लोग  पुराने रद्दी कपडों की तरह डिब्बे में ठुसे हुए थे । नीचे पांव रखने को भी जगह न थी । उस पर लगभग पूरी चार बोगियाँ पार कर सीट तक पहुँचना  मेरे लिये तो नामुमकिन ही था । उधर  लोग मेरे वहाँ खडे होने पर भी आपत्ति कर रहे थे। एक सरदारजी बडी खरखरी सी आवाज में सलाह दे रहे थे---"जब कोई स्टेशन आये तो उतर कर अपने डिब्बे में चली जाना ।"
मैं बडी असहाय सी किंकर्तव्य-विमूढ खडी थी।
तभी एक सज्जन अपनी सीट से उठे, मेरा सामान उठाया और बोले --"चलिये मैडम मैं छोड देता हूँ कहाँ है आपकी सीट ?" मैंने चकित होकर उस भले इन्सान को देखा । लगा जैसे कोई देवदूत मेरी सहायता करने आया है ।
तीन भारी सामानों के साथ उन सज्जन ने मुझे न केवल मेरी सीट तक पहुँचाया बल्कि सीट खाली करवाकर (रात में खाली सीट भला कौन छोडता) मेरा सामान भी रखवाया । मैंने कृतज्ञतावश उन भाई का नाम जानना चाहा ताकि इस सहायता के लिये उन्हें याद रख सकूँ ।
पता चला कि वे  जबलपुर के अजहरअली थे । अजमेर जारहे थे । मेरे आभार व्यक्त करने पर वे बडे संकोच से बोले कि ऐसा तो उन्होंने कुछ नहीं किया है ।
लेकिन उस स्थिति में अजहर भाई ने जो मेरे लिये किया वह सचमुच आजीवन याद रखने लायक है । हमेशा की तरह इस बार भी मेरे विश्वास को बल मिला कि प्रेम की तरह ही मानवीयता भी जाति--धर्म तथा अपने-पराए की सीमाओं से ऊपर होती है । जहाँ सिर्फ संवेदना व सहानुभूति होती है । 

Saturday, August 11, 2012

सच


गैरों सी हर खुशी रही
हर दर्द रहा  खामोश
रहा सुलगता सूने में ही
मन का छप्पर , सच ।

बाहर से तो यह मकान
कुछ शानदार लगता है
कभी झाँकना भीतर
दीवारें हैं जर्जर , सच ।

झूठ बोल कर वो जीते
हम हारे सच कह कर भी
ऐसे हैं हालात कि
जीना है मर मर कर , सच ।


कहने की आजादी
केवल कहने भर की है
एक शब्द पर ही तन जाते
कितने खंजर , सच ।

चार पीढियाँ एक साथ
रहतीं थीं कभी यहाँ
अब दो ही लोगों को
लगता है छोटा घर ,सच ।

कहाँ बचोगे ,कहने, सुनने
और देखने से ।
बेमानी है बनना अब
बापू के बन्दर , सच ।

समझ न आता कहीं कहीं तो
पूरा भाषण भी
कहीं उतर जाते गहरे में
दो ही अक्षर , सच ।

2004

Wednesday, August 8, 2012

मातृवेदी की राह पर


स्वतन्त्रता के महायज्ञ में 'मातृवेदी संगठन' ने जो काम किया वह इसलिये और भी वन्दनीय है कि उसके संस्थापक व अध्यक्ष पं. गेंदालाल दीक्षित जो वीर क्रान्तिकारी बिस्मिल के गुरु व मित्र थे , आजादी की राह में चुपचाप तन मन और धन से समर्पित होगए । बहुत दिनों तक कोई नही जान पाया कि अस्पताल में अनाम ही चला गया यह शख्स एक महान क्रान्तिकारी था और एक ऐसी चिनगारी अपने साथियों के सीने में सुलगा गया जो या तो रक्त से बुझ सकती थी या आजादी की शीतल बयार से । वे अनाम सिर्फ इसलिये रहे कि कोई उनसे क्रान्तिकारियों का भेद न पा सके । आजादी के इन दीवानों को यश की कामना नही थी बस एक जुनून था कि भारतमाता की बेडियों को तोड फेंकना है ।

यह सब आज श्री श्याम सरीन जी ने हमारे विद्यालय में छात्रों को बताया । श्री श्याम सरीन आकाशवाणी ग्वालियर के पूर्व उद्घोषक हैं । वे वर्षों तक अपनी आवाज के जादू से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध करते रहे हैं । वास्तव में श्री सरीन जी का यह परिचय अधूरा है । सही-सही पूरा तो अभी मैं भी नही बता सकती क्योंकि आज से पहले उनसे मेरा परिचय रेडियो के माध्यम से ही था । लेकिन आज जो परिचय हुआ वह इस विश्वास को मजबूत करने के लिये पर्याप्त है कि जीवन केवल हमारा नही है उस पर समाज व देश का भी अधिकार है । और इसे हर व्यक्ति को समझना चाहिये ।
सरीन जी के बारे में उल्लेखनीय बात एक तो यही है कि सेवा-निवृत्ति के बाद वे एक संगठन से जुड कर शेष जीवन को बहुत ही सार्थक रूप में लगाए हैं । उनके संगठन का नाम भी 'मातृवेदी' है । इसके माध्यम से वे वीर क्रान्तिकारी शहीदों की शौर्य-गाथाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं । दूसरी यह कि इसके लिये वे संचार माध्यमों के मोहताज नही है जबकि आज सिर्फ पौधे को हाथ भर लगाकर वृक्षारोपण का नाम करने वाले महानुभाव बिना फोटोग्राफर के एक कदम नही चलते । और तीसरी सबसे बडी बात यह कि हर बात उनकी आत्मा से ,रोम-रोम से निकलती प्रतीत होती है । हृदय से निकली उनकी एक एक बात आज कितनी प्रभावशाली थी इसका अनुमान इसी से लगाया जासकता है कि विद्यार्थी जो किसी भी भाषण को ,और पढाने का तरीका रोचक न हुआ तो पाठ्यक्रम के ही किसी प्रसंग को भी ध्यान से नही सुनते वे और हम सब पूरे ढाई घंटे खामोशी से सुनते और रोमांचित होते रहे । सब कुछ पढा व सुना हुआ था पर आज वही सब अधिक प्रभावशाली लग रहा था । यही है अभिव्यक्ति का जादू । अन्तर से निकली आवाज का असर । क्या आश्चर्य है कि जीवन की प्रभात बेला में ही सारे सुख छोड सर्वस्व समर्पण के लिये  गान्धी जी के साथ आगए थे । ( असहयोग आन्दोलन तक तो हर नौजवान उनकी आवाज के साथ ही था )  और सुभाषचन्द्र बोस के जोशीले नारे पर आबालवृद्ध नर-नारी खूनी हस्ताक्षर करने और भारत माता के चरणों में शीश चढाने के लिये दीवाने होगए थे ।
आग तो दिलों में आज भी है उसे सही दिशा में हवा देने वालों की जरूरत है । इसके लिये सशक्त स्वर में क्रान्ति व क्रान्तिकारियों का गौरवगान पहली जरूरत है । देश के हर बच्चे को पता होना चाहिये कि जिस निश्चिन्तता के साथ हवा में साँस ले रहा है वह कितनी अनमोल है । एक राष्ट्रीय भावना ही तो है जो देश से हर तरह के भ्रष्टाचार को मिटा सकती है। हर नागरिक को ईमानदार व कर्मठ बना सकती है । एक देशभक्त नागरिक भ्रष्ट नही होसकता । देशभक्ति आएगी आजादी के इतिहास को समझने से । अपने भूगोल को जानने से । मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का भाव होने से ।अपने भारतीय होने पर गर्व करने से ।
सरीन जी यही सब कर रहे हैं । बिना कोई शोर किये । ऐतिहासिक मातृवेदी संगठन की राह पर चलते हुए । मौन-मूक एक जमीन तैयार कर रहे हैं जिसमें राष्ट्रीयता के फूल खिलें । आत्मगौरव की फसलें लहलहाएं । वह यों कि अब किसी को आजादी के लिये विदेशी शक्ति से टकराने के लिये प्राण देकर देशभक्त कहलाने की आवश्यकता नही है । आज आवश्यकता है ईमानदारी से अपने दायित्त्वों के निर्वाह की । आवश्यकता है अनुचित के प्रति असहमति की। आवश्यकता है स्वार्थ से ऊपर समाज व देश के लिये सोचने की । यही नही अब ऐसे विचारों व अभियानों का बिना आडम्बर के प्रचार-प्रसार  भी होना चाहिये  ।
मेरे लिये वह हर व्यक्ति आदरणीय है जो ऐसा सोचता  है और इस दिशा में कदम रखता है ।


Thursday, August 2, 2012

एक सन्देश भाई के लिये


बाबुल ने जो बाग लगाया
मैया ने सींचा है ।
उसकी हरियाली ने भैया
सदा हमें खींचा है ।
उसकी रौनक चली न जाए
इतना रखना याद
भैया इतनी सी फरियाद ।

तुम उसकी करना रखवाली
जैसे करता माली
टहनी-टहनी रहे पल्लवित
महके डाली डाली ।
नेह सींचते रहना तुम
मैं दूँगी इसको खाद
भैया इतनी सी फरियाद

एक आँगन में हम-तुम खेले
लडे और रूठे थे ।
खींचतान भी होती थी पर
झगडे वे झूठे थे ।
सच थे ,सच हैं और रहें सच
अन्तर के संवाद ।
भैया इतनी सी फरियाद ।

द्वीपों ने बाँटी है चाहे
नदिया की यह धारा
नही विभाजित हो अपना यह
बन्धन प्यारा-न्यारा ।
भरती रहे उमंगें मन में
हर छोटी सी याद
भैया इतनी है फरियाद ।

तुझ पर वारूँ सारी खुशियाँ
दुनियाभर का नेह ।
कोई भी दीवार न हो
हर दूर रहे सन्देह ।
अटल रहे विश्वास हमारा
उम्मीदें आबाद ।
भैया इतनी सी फरियाद ।

Saturday, July 28, 2012

सावन के गीतों में जीवन के रंग----3


दूसरे लोकगीतों की तरह सावन के गीतों में भी लोक जीवन के गहरे और पक्के
रंग मिलते हैं जिनमें हास-परिहास है । रिश्तों में उलाहने हैं ,टीस है ,तो अपराजेय अपनापन भी है ,वह सहिष्णुता भी है जो किसी भी मुसीबत में अडिग रहने का प्रशिक्षण देती है । इनमें उल्लास है तो वेदना भी है लेकिन वह सब हृदय को एक सशक्त भाव-भूमि देता है जिस पर निर्भय चलते चले जाओ ,कभी पराजय व निराशा राह नही रोकेंगीँ ।
यहाँ ऐसे ही कुछ और गीत हैं ।
(1) सावन का महीना और पीहर की गलियाँ
--------------------------------------------------
सावन की फुहारें बचपन के गलियारों में ले जाकर भिगो देतीं हैं । मायके की गलियाँ उसे पुकारतीं हैं । बिछडी सहेलियों से मिलने की आकांक्षा मन की नदी में जैसे उमंगों की बाढ उमडाती है । बाबुल की गलियों में, मैया के आँगन में, बाग-बगीचों ,कूल-किनारों ,झूले-हिंडोलों और गीतों मल्हारों में साँस लेने की चाह में वह दिन रात माँ-जाये की प्रतीक्षा करती है । कब वह लीले घोडे पर सवार होकर अपनी बहन को लिवाने आएगा । बहन उसकी राह में पलक पाँवडे बिछाती है । उसके मलमल के कुरते के लिये महीन सूत कातती है । और गाती है---बहना नै लेखौ पठायौ ,वीरन .....(भाई का नाम.)...मोहे लै जाउ ..धुरही पछैंया है हठ परी..।
बहन-बेटी के बिना कैसा सावन ..। भाई बहिन को लिवाने उसकी ससुराल पहुँच ही जाता है । बहन फूली नही समाती । उसका रोम-रोम गाने लगता है--
आयौ री मेरौ माँ--जायौ वीर ,बाबुल ने लेन पठाइयौ ..।
तुम कहौ ए सासु पीहर जाउँ ,बारौ बीरन लैने आइयौ ...
तुम कहौ ए ननदी पीहर जाउँ ,छोटौ बीरन लैने आइयौ ।
सास तो फिर भी मान जाती है आखिर वह भी एक माँ है लेकिन निर्मम ननदिया को यह स्वीकार नही कि भाभी भरे त्यौहार में ,काम के समय मायके जा बैठे । वह कहती है--
जितनौ ए भावज कोठीनि नाज (अनाज) उतनौ पीसि धर जाइयो
जितनौ ए भावज कुँअलनि नीर ,उतनौ भरि धरि जाइयो ।
ननद पूरी तानाशाह है । उसकी बात टालने का साहस भाभी में कहाँ । पर मायके जाने से रोकना शायद सबसे बडा दुख होता है स्त्री का वह भी सावन में । भाभी बेचारी कह तो कुछ नही पाती ,इसलिये ननद के लिये कुकल्पनाएं करके ही मन को समझा लेती है--
सब घर ए बहना आय़ौ है ताव (बुखार)
ननद को आयौ बेलिया इकतरौ (मलेरिया)
सब घर ए बहना उतरौ है ताव ननदी कों लैगयौ बेलिया इकतरौ ।
पीहर जाने पर प्रतिबन्ध लगाने वाले के लिये ऐसी कल्पना एक सुकून देती है कि ननद को मलेरिया होगया है और ऐसा हुआ है कि दुष्टा ननद को लेकर ही जाएगा ।चलो पीछा छूटा । पर ऐसी कल्पनाएं केवल मन के क्रन्दन को शान्त करने के लिये होती है जैसे अपच होने पर वमन करना और कुछ नही । थोडी बहुत नानुकर के बाद बहू को पीहर भेज ही दिया गया । बहू की सारी शिकायतें खत्म । आमतौर पर हर लडकी ननद भी होती है और भाभी भी । इसलिये यह कहानी लगभग सभी की है जीवन की सच्चाई से जुडी । कोई बनावट नही कोई छल नही ।
(2)
मायके जाने के लिये मान-मनुहार का एक और जीवन्त चित्र--
सावन का हरा-भरा महीना है । पत्नी पीहर जाने को जितनी उतावली है पति उतना ही रोकने को ।
पत्नी---आई है सावन की बहार हम तौ पिय जाइँगे अपने माइकैं हो राज...।
पति को अचरज हुआ । पूछने लगा---
को तुनकों ए गोरी आए लैनहार ,को तुमको लायौ डोली पालकी हो राज...
पत्नी---वीsssरन ए हमें आए लैनहार, धीमर तौ लायौ डोली-पालकी हो राज ..।
पति --घर में ही ए गोरी हिंडोला गढाऊँ, झूला रेशम कौ रूपे पाटुली हो राज..।
फेरौ तौ हे गोरी डोलीया कहार भइया कों फेरौ राजी राजिया हो राज..।
( हे गोरी मायके जाकर क्या करोगी मैं घर में ही हिंडोला गढवा दूँगा ,रेशम की रस्सी और चाँदी की पटली बनवा दूँगा । तुम कहारों को वापस भेजदो और भैया राजा को मैं लौटा देता हूँ । लेकिन पत्नी को सावन में मायके तो जाना ही है न सो वह पति को कहती है--हे राजाजी झूला झूलने को तुम्हारी प्यारी बहन तो है मैं तो मायके जाऊँगी ही ) पति और भी प्रलोभन देता है---
माथे कौ ए गोरी बेंदा गढाऊँ ,बेसरि मुल्याऊँ तेरी मौज की हो राज ..।( मैं तेरे लिये माथे का टीका और नथ गढवा देता हूँ पर तू मायके न जा ) लेकिन मायके के लिये पहले से ही बकस तैयार कर बैठी पत्नी कोई प्रलोभन मानने राजी नही है---
बेंदा बेसरि राजा कछु न सुहाय हम तौ पिय जाइँगे अपने मायके हो राज..।
इसके आगे तो पति के पास कोई तर्क शेष नही रहता । आखिर वह भी तो पत्नी की खुशी चाहता है । हार कर कहता है ---पीहर जाउ गोरी नाही बिसराउ ,दस दिन रहि कै घर कों आइयो हो राज...।
(3)
एक अन्य गीत में एक सुन्दर षोडशी कृषक बाला भरी डलिया उठवाने खडी है । कोई दिखे तो मदद माँगे । उस कोमलांगी में इतनी शक्ति कहाँ कि इतनी भारी डलिया को अकेली ही उठा कर सिर पर रखले । तभी एक बटोही वहाँ आ निकलता है ।  कृषक बाला बटोही से डलिया उठवाने का निहोरा करती है ।
"डलना है भारी बटोहिया , तुम नैकु सहारौ देउ कै मेंहदी रंगै चढी...।"
वह बाँका बटोही कहता है कि डलिया तो उचवा दूँगा पर मेहनताना क्या देगी--" जो तोहि डलना उचाइयों ,मोहि काहा मजूरी देहि कै मेंहदी रंगै चढी...।" बाला कहती है --"हाथ कौ दैऊगी तोहि मूँदरा ,औरु गले कौ हार कै मेंहदी रंग चढी महाराज..।"
बटोही को हार--मूँदरा नही चाहिये उसकी मंशा तो कुछ और ही है कहता है--
"जो तोहि डलना उचाइयौं गोरी सी नार ,तू मेरी घरधनि होइ कै मेंहदी रंगै चढी महाराज..।"
वाह रे बटोही मन में इतना पाप भरा है कि जरा डलिया उठवाने के बहाने ही बाहर आगया । स्त्री को क्या तूने अपने खेत में लगी भाजी समझ लिया है कि जब मन करे तोडले । वह उसे दुतकार देती है---
"तो सौ तौ भरै मेरौ पानी बटोही ,मौ सी तौ मलि मलि नहाए कै मेंहदी रंगै चढी...।"
बटोही शर्मिन्दा होकर रूपसी की डलिया उचवा देता है ।
किसी क्षेत्र को आन्तरिक रूप से पूरी तरह समझने के लिये वहाँ के लोकगीतों व परम्पराओं को देखना ही होगा ।  
हालाँकि ये लोकगीत एक सीमित क्षेत्र के हैं लेकिन दूसरे लोकगीतों की तरह ही ये भी जनजीवन से गहरे जुडे हैं । सावन में जब बादलों की तरह मेंहदी का रंग भी गहरा होने लगता है , बाडों पर करेला और कुम्हडा की बेले फूल उठतीं है ,बागों में झूलों पर ऊँची पीगें होड लेतीं हैं तब चाँदनी के रुपहले जादुई संसार में कोकिल-कंठी तानें गूँज उठतीं हैं तब मानो जीवन ही मुखर होजाता है । पहर पल बन जाते हैं । गीत जीवन को गति देते हैं उल्लास भरी ऊर्जा देते हैं । आज जरूरत हैं लोकगीतों में बिखरे वैभव को खोजने की जहाँ जिन्दगी अपनी पूरी सच्चाई के साथ मौजूद है ।

समाप्त ।

Tuesday, July 24, 2012

सावन के लोकगीतों में आख्यान--2


पिछली पोस्ट में आपने तीन दुखान्त आख्यानक गीतों के विषय में पढा । आज कुछ और गीत हैं जो पूर्ण आख्यान तो नहीं कहे जासकते पर संवाद उन्हें कथा जैसा ही रूप देते हैं । इनमें वाक् चातुर्य ,रूप-सौंन्दर्य तथा स्नेह--माधुर्य पूरे प्रभाव के साथ उपस्थित है । तत्कालीन समाज में वर्ग ,जाति आदि के कठोर बन्धनों के बावजूद तब भी न तो रूप-सौन्दर्य के जादू को बाँधा जा सका न ही प्रेम पर पहरा लगाया जा सका । क्योंकि यह तो सदा से ही मानव के स्वभाव से अभिन्न रूप से जुडा है ।
(4) धोबिन
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इस मधुर गीत में धोबी की रूपवती कन्या अपने जातीय गौरव व स्वाभिमान के साथ हमारे सामने आती है । वह रूपवती व रूपगर्विता ही नही वाक् पटु और चतुर भी है । कपडे धोना उसका पुश्तैनी व्यवसाय है जिसे वह स्वाभिमान के साथ निभाती है और रोज तालाब पर जो बगुलों की पंक्तियोंसे सज्जित रहता है ,कपडे धोने जाती है । एक दिन  एक बाँका 'सिपहिया' उधर से गुजरता है । उसकी नजर जब कपडे धोने जैसा कठोर कार्य करती हुई उस सुन्दर कोमलांगी षोडशी पर पडती है तो मुग्ध हुआ खडा रह जाता है और टोकने से अपने आपको रोक नही पाता ---
"धोबी वारी हौले-धीरे धोउ ,पतली कमर लचका लगै, ..तोरी गोरी बहियनि झटका लगै "
युवती को एक अजनबी का यों टोकना अजीब लगता है कहती है कि ,यह 'धोबीवारी' क्या लगा रखी है । हमारा नाम राजकुँवरि है । और यह तो हमारा काम है , तुम्हें क्या पडी है । अपनी राह जाओ---
जे तौ ढोला हमरौ है काम अरे तोहि हमारी ढोला का परी जी महाराज..। अरे गहि लेउ अपनी ही गैल कों जी महाराज..।
लेकिन युवती के प्रखर रूपजाल में उलझा सिपहिया आगे बढे तो कैसे । वह राजकुँवरि को रिझाने के लिये अपने महलों बगीचों का और तमाम वैभव का बखान करता है । लेकिन उसके लिये वही श्रेष्ठ है जो उसका अपना है । कहती है---"महलनि कौं का देखिहों ,मेरी एक झोंपडिया कौ मोल ...बागनि कौं का देखिहों , मेरी एक निबरिया कौ मोल..।"
हे राजा तुम मुझे अपना वैभव क्या दिखाते हो तुम्मेहारे महल मेरी एक झोंपडी का मोल भर हैं और तुम्हारे बाग-बगीचे मेरे एक नीम के पेड से ज्यादा मूल्यवान नही हैं । तब राजा असली बात पर आता है । कहता है --"तुम धनि रूप सरूप ,सुन्दर सूरति मेरे मन बसी ।"
चतुर राजकुँवरि मुस्कराई---अच्छा यह बात है तो क्या मेरे साथ कपडे धुलवा सकोगे ? मेरे पिता के गदहे चरा सकोगे ?
"जो तुम्हें धोबिन की है साध अरे कपडा धुवाऔ मेरे संग ही जी महाराज , अरे गदहा चराऔ मेरे बाप के जी महाराज ।"
प्रेम जो न करवाए कम है । मुग्ध सिपहिया घर बार वर्ग जाति सब कुछ भूल गया । प्रेयसी की परीक्षा में पास होने के लिये उसने अपनी घोडी को एक पेड से बाँध दिया और सब कुछ किया -
"कसि कम्मर बाँधी फेंट, घोडी तौ बाँधी करील ते जी महाराज । धोबिन ने धोई लादी
(गठरी) तीनि ,राजाजी ने धोई पूरी डेढ सौ ।"
जब राजाजी परीक्षा में खरे उतरे तब राजकुँवरि ने अपनी स्वीकारोक्ति दे दी । पिता से कह दिया---बाबुल मनचाहे वरु मोहि मिलि गए जी महाराज...।
फिर तो 'तेल माँगर' हुआ 'हल्दी मेहदी और काजल' लगा और सातों फेरे होगए । राजकुँवरि ससुराल पहुँच गई । सास रूपवती बहू देख प्रसन्न तो हुई पर यह जानना भी तो जरूरी था कि उसका वंश बढाने वाली आखिर  है किस जाति ,वंश की । सो सास ने कुल गोत्र पूछा ---"काहा गोत ,कहा नाम है अरे बहूअरि कौन की धीय बताइयो जी महाराज ..।" राजकुँवर गर्व के साथ उत्तर देती है ---",सासूजी हम धोबी वारी धीय राजकुँवरि म्हारौ नाम है ..।"
सुन कर सास ने माथा पीटा---"भए बेटा पूत--कपूत अरे गोरी के कारण धोबी है गए ..।"
तब आत्मसम्मान सहित वह सासुजी को दिलासा देती है---"मति सासुलि पछताउ, एक के देऊँगी सासु चौगुने जी महाराज ..।"
 दुखी ना हो सासजी , मैं ऐसे ही नही आगई हूँ । सतभाँवरी हूँ । आपके एक बेटे के बदले मैं आपको चार बेटे दूँगी । ब्याहता बहू की शान ही अलग होती है । और तुम हो कि मेरी जाति देख रही हो "
"ब्याही धन ऐसी सरूप जैसे 'बन्देजी पौंमचा',ओढत फीकौ लागियो और धोवत-धोवत नित नई ।"
मैं ब्याहता हूँ 'बन्देजी पौंमचा' की तरह जो भले ही चटक रंग का न हो पर सालों साल धोते-पहनते नया बना रहता है । (बन्देजी पौंमचा देशज शब्द हैं जिनका प्रचलित अर्थ नही मालूम शायद कपडे की एक किस्म का नाम हैं )
अब ऐसी रूपवान और चतुर बहू पाकर कौनसी सास प्रसन्न न होगी ।
(5)
कलारिन
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एक समय था जब समाज में जाति और वर्ग का भेद काफी गहरा था । उच्चवर्ग निम्न माने जाने वाले लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रखता था । लेकिन उसकी सुन्दर स्त्रियों पर अपनी नजर डालने व सम्बन्ध बनाने में जरा भी नही हिचकता था । प्रेमचन्द जी ने इसे बखूबी चित्रित किया है । इस गीत में भी ऐसा ही कुछ है लेकिन चतुर रूपवती कलारिन ऐसे लोलुप प्रेमियों का उपचार करना जानती है । यह सब इस गीत में देखने लायक है ।
एक रूपरसिक ढोला पानी पीने के बहाने सुन्दर कलारिन से मिलने जाता है । कहता है-- हे सुन्दर कलारिन अपना दरवाजा खोल दे हमें प्यास लगी है पानी पिलादे । (कलरिया री फरसौ ( काँटों व टहनियों से बना कपाट) दै खोल ,प्यासे मरत ढोला दूरि के जी महाराज ..।)
कलारिन ऐसे रसिक मनचलों को खूब जानती है कहती है---ना मेरे घर लोटा है न डोर और मेरे पति भी नही हैं ।
"ना मेरें लोटा ना डोर ,अरे घर ही जु नईं हैं मेरे साहिबा जी महाराज..।"
इसके अलावा हे ढोला मेरी छाती में विष की गाँठ है । मेरे हाथ का पानी पीओगे तो मर ही जाओगे।
"मेरे आँचर विस की है गाँठ ,जोई पियैगौ मरि जाइगौ जी महाराज ..।"
"जौ तेरे विस की है गाँठ कैसें जिये तेरौ साहिबा जी महाराज..।"
{अच्छा ऐसी बात है तो तेरा पति कैसे जिन्दा है ?}
"यह तुम क्या जानो ?" चतुर कलारिन कहती है--"मेरे साहिब तो जहर मारने व साँपों को वश में करने की कला जानते हैं ।"
ढोला हार नही मानता कहता है----"कुछ भी हो , हे रूपसी तू तो फूल जैसी है । तुझे मैं पगडी में लगाना चाहता हूँ । ये तेरे लम्बे-लम्बे केस हैं इन्हें मैं ओढना-बिछाना चाहता हूँ ।"
(ऐसी बनी है जैसे फूल ए कलार की, तोहि पगडी में धरि लै चलौं जी महाराज ।
गोरी तेरे लम्बे--लम्बे केस आधे बिछावौं आधे ओढियों जी महाराज ।)
उत्तर मिलता है---ये केस तो मेरी माँ ने पाले पोसे हैं इन पर तुम्हारा कोई हक नही । गद्दा बिछालो और दुपटा ओढलो ।( जे तौ मैया के पोसे केस गद्दा बिछावौ दुपटा ओढियो जी महाराज..।
ढोला फिर कहता है---"गोरी तेरे बडे--बडे नैन , नैन मिलाई तोसे हों करूँ जी महाराज."..
उत्तर मिलता है ---"ये नैन तुम्हारे वश में हो ही नही सकते । ये तो अलबेले (पति) के वश में पडे हैं।"
ढोला बात बदल कर कहता है----"अरे ये तुम्हारे घर में अँधेरा क्यों है ।"
कलारिन---मेरे पास न रुई है न तेल और मेरे साहिब भी घर नही हैं । (शायद अँधेरे की बात सुन कर यह मनचला लौट जाए ) लेकिन उसका लौटना इतना सहज नही है कहता है---अच्छा तेल नही है । बाती भी नही है । तो कोई बात नही मैं शहर में तेली बसा दूँगा । कडेरे बसा दूँगा चिन्ता किस बात की । ( एक समय गाँवों में तेली व कडेरे ही तेल व रुई उपलब्ध कराते थे )
( "तेली बसाऊँ जा ही सहर में ...अरे झमकि उजेरौ गोरी दीवला जी महाराज" )
अब तो हद ही होगई । धृष्टता की भी सीमा होती है । यह ढीठ तो टलता ही नही । कलारिन आखिर झुँझलाकर कह ही देती है ---"जा रे ढोला निपट अजान ,तोहि हमारी का परी । घर ही जु नई है म्हारे साहिबा ..तोहि हमारी का परी ।"
अरे निपट अज्ञान, तुझे करना क्या है । जा अपना रास्ता देख । तेरी समझ में नही आता कि मेरे साहिब (पति) घर नहीं हैं । तेरी इन बातों का आखिर मतलब क्या है ।
इतनी निस्संगता पाकर 'ढोला' निराश होकर चला जाता है । उसके पास उस निष्ठुर रूपसी को कोसने के अलावा और कोई चारा नही है----अरी पाषाणी तुझे काला नाग डस जाए , भादों की बिजली तुझ पर टूट पडे । और न जाने क्या--क्या....। ("अरे डसियो तोहि कारौ ही नाग...। तडपि मरियो भादों बीजुरी । आस निरासौ तेनें मैं कियौ ।" )
(6)
मनिहार
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ससुराल में बहू की ननद से बडी सहेली और ननद से बडी बैरिन और कोई नही । ननद सहेली बन जाए तो सब कुछ आसान और दुश्मनी पर उतर आए तो बस तनाव ही तनाव ।
यहाँ ननद--भावज सहेलियाँ हैं । छज्जे पर बैठीं मन बहलाव कर रहीं हैं कि गली में मनिहार (चूडीवाला) की टेर सुनाई देती है । भाभी ननद से मनुहार करती है---
"जाऊ ननद बाई मनिरा बुलाइ लाऊ ,ए जी हरे कलर कौ ,लाल-गुलाबी कलर कौ चूडौ पैरियो जी राज..।"
मनिहार आता है और रंग-बिरंगी चूडियों का वैभव आँगन में फैला देता है । भाभी मुग्ध हुई कई चूडे पसन्द करती है लेकिन एक उसे बहुत ही भाता है । पूछती है --अरे मनिहार भैया ,इस चूडे का मोल क्या लोगे ।
"कै लाख ए मनिरा बीरन चूडे कौ मोल ऐ , अरे मनिरा,  कै लाख कहिये जाके दाम हैं जी राज..।"
मनिहार कहता है --
"नौ लाख ए गोरी चुरिला कौ मोल ,ए नैक दस लाख ए री जाकौ मोल है जी राज..।"
लेकिन इतना मँहगा चूडा कैसे खरीदे । प्रियतम तो परदेस हैं । इतना मोल कौन चुकाएगा ..।
मनिहार उस भोलीभाली कोमलांगी के असमंजस को समझ जाता है । बडी उदारता से कहता है--
"तेरी बँहियन कौ गोरी मोल न लेंगे , अरे नैक हँसि-हँसि कैं पहरौ जा रंग चूरिला जी राज...।"
गोरी मनपसन्द चूडा पहन कर फूली न समाई । उसकी गोरी--गोरी लमछारी बाँहों में चूडे की शोभा और बढ गई । पर जैसे ही घर चलने लगी पर मनिहार उसके अपूर्व  सौन्दर्य पर रीझ उठता है । चूडे की कीमत के बदले कम से कम दो पल नयनों को रूप का अमृत तो पीने दे । मनिहार  उससे रुकने की मनुहार करता है । वह कुलवती वधू मनिहार को अपनी सास ,जेठानी ,देवरानी ,ननद सबका वास्ता देती है । मनिहार उसे बहलाता है---हे रूपसी ,तेरी सास को चरखा भेंट कर दूँगा । जेठानी को दुधारी भैंस दूँगा । देवरानी को हार गढवा दूँगा और ननद को ससुराल भिजवा दूँगा ।तू कुछ देर तो ठहरजा ।
" सासू कौं हे गोरी चरखा मुल्याइ दऊँ ,जिठनी कौं हे गोरी भैंस मुल्याइ दऊँ ।"
लेकिन उस कुलीना को बहलाना आसान नही है । वह अपने पति का वास्ता देकर विनम्रता पूर्वक मनिहार को टाल कर घर चली जाती है । लेकिन घर पर ननद की लगाई आग उसकी प्रतीक्षा कर रही होती है । सास, जेठानी सब सन्देह करती हैं कि आखिर इतना मँहगा चूडा मनिहार ने मुफ्त में कैसे पहना दिया----
"कैसे जा चूडे कौ मोल मुल्यानौ ,ए बहू का हर मोल चुकाइयौ जी राज...।"
बहू के सामने यह बडा धर्मसंकट था । सही तो है पराए आदमी ने कैसे इतना मँहगा चूडा बिना मोल लिये पहना दिया । बहू ने चतुराई से काम लिया । बोली --मनिहार तो मेरा मुँहबोला भाई है ।
"मनिरा कौ लरिका म्हारौ बीरन जो कहिये ,ए सासू चुरिला कौ मोल कैसे माँगियो जी राज..।"
अब भाई बहिन को चाहे तो लाख का चूडा पहनाए या दस लाख का । इसमें किसी को भला क्या ऐतराज हो सकता है ।

 जारी.........