Thursday, January 12, 2012

दो बाईयन की वार्ता

"नए साल की राम-राम ।"

"राम-राम 'भैन' , इधर कहाँ जाती है काम करने ?"

"गान्धीनगर में ।"

"तब तो खूब बढिया काम मिल गया है तुझे । कितने घर कमा रही है ?"

"यही कोई चार-पाँच घर हैं ।"
"
वहाँ तो बडे-बडे लोग रहते हैं ।पगार भी अच्छी होगी । एक घर से हजार--आठ सौ से क्या कम मिलता होगा ।"

"हओ ,काम भी तो खूब होता है । संझा--सुबेरे दोनों टैम तो पूरे घर में पौंछा लगता है । गली तक धुलाई होती है । कुकर कढाई परात भगौनी..सबके के चार-चार जोड पडे हैं ।गिलास कटोरियों का पार नही है सो जरूरत का बरतती जाती हैं और माँजने को पटकतीं जाती हैं । सबेरे जब पौंहचती हूँ तब अंबार लगा होता है बासनों का । यों भी नही कि पानी डालदें । सूख जाते हैं । जरा कहो तो कहतीं हैं अरे बाई इतना टाइम होता तो तुम्हें काहे लगाते । उनसे पूछे कोई कि टीवी देखने को टैम कहाँ से आता है । एक चम्मच के लिये भी बैठे रहते हैं कि बाई आएगी तभी धोएगी ।"

"अब काम तो सब जगह होता है कही कम तो कही ज्यादा पर पगार के संग खाना-कपडा भी अच्छा ही मिलता होगा ।"

"हाँ...सो तो है पर बहना एक बात तो है ,बडे लोगों के नाम बडे दरसन छोटे होते हैं । एक अरोरा मैडम हैं । साब तो बाहर रहते हैं । पर घर में किसी चीज की कमी नही । दो दो कारें खडीं हैं पर पैसे देने में नम्बर एक की कंजूस है । सबजी वाले से एक-एक रुपए के पीछे झिकझिक करतीं रहती हैं । सास को 'काग-बिडान्नी' करके रक्खा है । उसका पैसा तो सारा का सारा अपने 'अण्डर' में कर लिया है । और चाय तक कप गिन-गिन कर देती है । बाहर जाती है तो दूध अखबार सब बन्द कर जाती है । बिचारी बूढी मुझसे कहती है -री इमित्ती बगल से अखबार ले आना जरा.। बूढी अम्मा को अखबार पढे बिना चैन नही मिलता । भगवान ऐसे बडे आदमी होने का क्या फायदा .."

"पर तुझे तो फायदा है न । तुझे तो कोई कमी नही रखती ।"

"रख कैसे लेगी । जरा भी कसर दिखती है या जादा रौब झाडती है तो कह देती हूँ कि कल से नही आऊंगी कोई और बाई तलास लो .."

"ए बाबरी होगई है । ऐसे काम छूट जाय तो ?"

"नही री ,मेरे बिना उनका एक दिन भारी पड जाता है । एक टैम भी नही आती तो दस फोन होजाते हैं मेरे घर । मुझसे बिगाड कर अपना नुक्सान थोडी कराएगी । समझ ले कि उनके घरों में मेरे बिना चाय तक नही बन पाती । खाने का तो औडर ही करना पडता है । चल ..मेरी छोड अब अपनी बता तू कहाँ काम करती है ?"

"मैं तो एक मौहल्ला के पाँच--छह घरों में जाती हूँ । वहाँ तेरी जैसी कमाई नही है । तू तो जानती है मौहल्ला में पुराने बासिन्दे रहते हैं । छुट्टी करने पर भी कोई ऐसा गजब नही होता । काम छोडने की धौंस चल नही सकती । अगर ऐसी कोसिस करी भी तो तुरन्त सुनने मिल जाएगा ---देख रतिया काम तू नही करेगी तो यह मत समझना कि काम होगा नही हमारे हाथ-पाँव गल नही गए । सो भैन हमें तो ऐसे घरों में काम चइये जहाँ बाई के बिना काम ठप्प होजाए । मुझे भी तू अपने जैसे घर दिलवा दे कही ।"

"काम बहुत करना होगा सोचले ।"

"कर लूँगी ।"

"छुट्टी नही कर पाएगी ।"

"न कर पाऊँ..। पर धौंस तो रहेगी ..।"

"ठीक है सोचूंगी । अच्छा राम-राम !"

"राम--राम ।"

6 comments:

  1. रोचक,
    धौंस भरी इस दुनियाँ में, कहा रहे उल्लास सतत..

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  2. गिरिजा जी!
    सच्ची आइना दिखा दिया आपने समाज का.. बड़ों का, छोटों का.. और यही नहीं.. अहंकार भी.. आज समझ में आया कि अहंकार बस अहंकार होता है, छोटा बड़ा नहीं होता! मोहल्ले में "हमारे हाथ गल नहीं गए" का अहंकार और बड़े घरों के साथ "धौंस" वाला अहंकार!!
    बहुत सुन्दर संवाद!!

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  3. दोनों प्रसंग हकीकत बयान कर रहे हैं ... पर ये बभी सच है की जहां धोंस चल सकती है वहाँ हर कोई चलाना चाहता है ...

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  4. बाइयन की धौंस...
    नाम छोटे, दरशन बड़े !!

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