Monday, August 27, 2012

यह तो सोचा ही नही था ।


कोलाहल में क्यों ख़ामोश शहर लगता है
ख़ामोशी में अब तो साफ ज़हर लगता है ।

आकर भी देखें  वो सडक बनाने वाले ,
सारा देश हादसों का ही घर लगता है ।

अपनों के बेगानेपन ने ज़ख्म दिये हैं ,
बेगानों के अपनेपन से डर लगता है ।

पाने खोने का हिसाब जो रखे जेब में ,
ऐसा प्रेमी केवल सौदागर लगता है ।

रोक न पाए वर्षा ओले आँधी तूफां
बिना छत दीवारों का यह घर लगता है ।

रखी बैग में सिर्फ जरूरत भर की चीजें
हमें पता है साँसों पर भी कर लगता है ।

पहले इतना कभी नही सोचा था हमने ,
पर जाने क्यों अब संदिग्ध सफर लगता है ।

11 comments:

  1. वाह ...बहुत खूब।

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  2. अत्यन्त प्रभावी रचना..

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  3. सही कहा आपने कि जो पाने-खोने का हिसाब किताब रखे वह प्रेमी सौदागर लगता है, और यह जहां ऐसे सौदागरों का घर लगता है।

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  4. बहुत खूब .. सभी शेर लाजवाब हैं ... कुछ न कुछ सोचने पे मजबूर करते हैं ...
    अपनों के बेगानेपन ने जख्म दिये हैं ... ये शेर तो सबसे अचा लगा .. सच का लेखा जोखा बयान करता हुआ ...

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  5. सचमुच अब सफर में वह निडरता कहाँ..हर पल सजग रहना पड़ता है.

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  6. मेरा कमेन्ट पहले स्पैम में गया फिर डिलीट हो गया, कोई बात नहीं.. मुझे यह रचना बहुत पसंद आयी.. इतने अच्छे बिम्ब और इतना सहज शिल्प.. बरबस वाह निकल जाती है मुँह से..
    जो पहला कमेन्ट मैंने कविता में किया था वो तो बस प्रवाह में लिखा गया था, दुबारा नहीं लिख सकता!!
    इस बार संभालकर स्पैम से निकालिएगा दीदी!! :)

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    1. फिर से कमेंट मिल गया !!! अपनी गलती का मलाल अब कुछ कम हुआ ।

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  7. गिरिजा दीदी, ये शहर-शहर का हाल नहीं ये तो देश की पीड़ा है,,, निश्चित ही देश के दुर्दिन देख कर आपका मन व्यथित होगा और आपकी पीड़ा कविता में साफ़ दिख रही है .. लेकिन मुश्किल यह है कि हमारी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है... हम सबको मिलकर तस्वीर बदलने के प्रयास करने होंगे

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