Monday, August 27, 2012

यह तो सोचा ही नही था ।


कोलाहल में क्यों ख़ामोश शहर लगता है
ख़ामोशी में अब तो साफ ज़हर लगता है ।

आकर भी देखें  वो सडक बनाने वाले ,
सारा देश हादसों का ही घर लगता है ।

अपनों के बेगानेपन ने ज़ख्म दिये हैं ,
बेगानों के अपनेपन से डर लगता है ।

पाने खोने का हिसाब जो रखे जेब में ,
ऐसा प्रेमी केवल सौदागर लगता है ।

रोक न पाए वर्षा ओले आँधी तूफां
बिना छत दीवारों का यह घर लगता है ।

रखी बैग में सिर्फ जरूरत भर की चीजें
हमें पता है साँसों पर भी कर लगता है ।

पहले इतना कभी नही सोचा था हमने ,
पर जाने क्यों अब संदिग्ध सफर लगता है ।

Tuesday, August 21, 2012

दुष्यन्त कुमार ने कहा ।

मामूली बात नही है
कि अगन भटुटियों के दहाने पर बैठे हुए हम
तुमसे फूलों और बहारों की बातें कर लेते हैं ।
................................................................
मामूली बात नही है
कि जब जमीन और आसमान पर
मौत धडधडाती हो
एक कोमल सा तार पकडे
अपनी आस्था आबाद रखें
विषाक्त विस्फोटों के बीच
गाँधी और गौतम का नाम याद रक्खें
.....................................................
भूखी साँसों को राष्ट्रीयता के चिथडे पहनाएं
अभावों का शिरस्त्राण बाँधें
चारों ओर फैली विषैली गैस ओढ लें
चाहे तलुए झुलसकर काले पड जाएं
आँखों में सपनों की कीलें गड जाएं
कितनी बडी बात है
कि नजरों को घायल कर देते हैं दृश्य
जिधर पलकें उठाते हैं घृणा व द्वेष मुस्कराता है
आकाश की मुट्ठी से फिसलती हुई
बेवशी फैलती फूटती है
फिर भी हम नही छटपटाते
...........गातें हैं  एक ऐसा गीत जिसकी टेक
अहिंसा पर टूटती है ।

मामूली बात नही है दोस्तो
कि आज जब दुनिया शक्ति के मसीहों को पूजती है
हम युद्धस्थल में एक मुर्दे को शान्ति का पैगम्बर समझकर
उठाए चल रहे हैं ।
........................
बार-बार शान्ति के धोखे में
विवेक को पी जाते हैं
संवेदवहीन राष्ट्रों को
...आत्मा पर बने घाव दिखाते हैं
..........................
मामूली बात नही है दोस्तो ,
कि हम न चीखते हैं न कराहते हैं
क्योंकि मान लिया है इसी को अपनी नियति
.....यही तटस्थता है
अहिंसा, शान्ति या सह-अस्तित्त्व है
इसी के लिये तो हमने
सहा है ....।
प्राण गँवाए हैं ।
कच्छ में स्वाभिमान
कश्मीर में फूलों की हँसी
और छम्ब में मातृभूमिका अंग-भंग होजाने दिया है
चाकू और छुरे खाए हैं
( आज भी खारहे हैं )
यह मामूली बात नही है दोस्तो ।

  

Thursday, August 16, 2012

सीमाओं से परे



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कुछ माह पहले की बात है जब मैं दिल्ली जा रही थी । वहां से सुबह 9.40 पर बैंगलोर के लिये उडान थी । ग्वालियर से दिल्ली के लिये रात दो बजे गोंडवाना ऐक्सप्रेस में एस-1 में मेरी सीट आरक्षित थी । कुलश्रेष्ठ जी ने मुझे यथास्थान बिठाकर विदा ले ली । गाडी जल्दी ही चल पडी । मैंने सामान किसी तरह जमाया और निर्धारित सीट पर सोये व्यक्ति को जब सीट खाली करने के लिये कहा तो वे --"मैडम यह सीट तो मेरी ही है" कह कर फिर सोगए । बडे अजीब इन्सान हैं । रात के ढाई बजे किसी खाली सीट पर आराम से सोजाएं, इतना तो चलता है पर जब सीट वाला आकर अपनी सीट  चाहता है तब तो कायदे से उठ जाना चाहिये न । मैंने सोचा और एक बार फिर उन सज्जन को जगाने की कोशिश की । तो उन्होंने चेहरे से चादर हटाते कुछ खीज कर कहा--" आप खामखां परेशान कर रही हैं । यह सीट मेरी ही है । आपका रिजर्वेशन है किस बोगी में ?"
"एस--1 में ।" मैंने भी उसी खीज के साथ कहा । दो-तीन सामानों को लादे मैं वैसे ही काफी परेशान हो रही थी । उस पर महाशय लेटे-लेटे बडी निस्संगता से पूछताछ कर रहे थे ।
"यह एस--4 है "--उन्होंने कहा और फिर खुर्राटे लेने लगे । मुझ पर जैसे घडों पानी पड गया । वास्तव में वे अपनी जगह सही थे । गलती मेरी थी । जल्दी में और वह भी रात में  एस-1 या एस-4 ,कुछ सूझा ही नही । हालाँकि पतिदेव ने  ऐसा नही माना बोले, कि यह सब रेल वालों की गलती है । बाहर एस-1 ही लिखा था । वरना मैं क्या ऐसी गलती करता ।
सच जो भी हो  उस गलती की सजा मेरे लिये उस समय काफी कठोर  थी ।  मैं हैरान होकर असहाय सी चारों ओर देखने लगी । उस समय मैं ऐसी दशा में खडी थी जब कुछ समझ में नही आता कि क्या करें ।  सब गहरी नींद में थे । एक-दो ,जो जाग गए थे वे मुझे वहां से किसी तरह चलता करना चाह रहे थे । वैसे ही जैसे कोई पसन्दीदा कार्यक्रम के बीच आए किसी अनाहूत व अनावश्यक व्यक्ति को करना चाहता है ।  पर मैं कैसे जाती । मेरे पास दो बैग और एक स्ट्राली थी । बिलकुल चलने के समय सामान के पीछे घर में खूब बहस होती है कि क्या होगा इतना कुछ लेजाकर । कोई जंगल में जा रही हो क्या । वहाँ सब कुछ मिलता है । काफी कुछ निकाल फेंक भी दिया जाता है पर नजर बचा कर  कुछ तो वापस रख ही जाता है । शायद महिलाओं को काफी कुछ समेट कर चलने का चाव होता ही है । खास कर माँओं को । खैर...
इस तरह वे तीनों सामान हल्के तो  नही थे पर मैं  उन्हें ले जा सकती थी  अगर  आसानी से  रास्ता मिल जाता । लेकिन रास्ता तो पूरी तरह बन्द था । जैसे सडक पर ट्रक पलट जाने से यातायात ठप्प  होजाता है । यहाँ तो दूसरे रास्ते का विकल्प भी नही था ।  लोग  पुराने रद्दी कपडों की तरह डिब्बे में ठुसे हुए थे । नीचे पांव रखने को भी जगह न थी । उस पर लगभग पूरी चार बोगियाँ पार कर सीट तक पहुँचना  मेरे लिये तो नामुमकिन ही था । उधर  लोग मेरे वहाँ खडे होने पर भी आपत्ति कर रहे थे। एक सरदारजी बडी खरखरी सी आवाज में सलाह दे रहे थे---"जब कोई स्टेशन आये तो उतर कर अपने डिब्बे में चली जाना ।"
मैं बडी असहाय सी किंकर्तव्य-विमूढ खडी थी।
तभी एक सज्जन अपनी सीट से उठे, मेरा सामान उठाया और बोले --"चलिये मैडम मैं छोड देता हूँ कहाँ है आपकी सीट ?" मैंने चकित होकर उस भले इन्सान को देखा । लगा जैसे कोई देवदूत मेरी सहायता करने आया है ।
तीन भारी सामानों के साथ उन सज्जन ने मुझे न केवल मेरी सीट तक पहुँचाया बल्कि सीट खाली करवाकर (रात में खाली सीट भला कौन छोडता) मेरा सामान भी रखवाया । मैंने कृतज्ञतावश उन भाई का नाम जानना चाहा ताकि इस सहायता के लिये उन्हें याद रख सकूँ ।
पता चला कि वे  जबलपुर के अजहरअली थे । अजमेर जारहे थे । मेरे आभार व्यक्त करने पर वे बडे संकोच से बोले कि ऐसा तो उन्होंने कुछ नहीं किया है ।
लेकिन उस स्थिति में अजहर भाई ने जो मेरे लिये किया वह सचमुच आजीवन याद रखने लायक है । हमेशा की तरह इस बार भी मेरे विश्वास को बल मिला कि प्रेम की तरह ही मानवीयता भी जाति--धर्म तथा अपने-पराए की सीमाओं से ऊपर होती है । जहाँ सिर्फ संवेदना व सहानुभूति होती है । 

Saturday, August 11, 2012

सच


गैरों सी हर खुशी रही
हर दर्द रहा  खामोश
रहा सुलगता सूने में ही
मन का छप्पर , सच ।

बाहर से तो यह मकान
कुछ शानदार लगता है
कभी झाँकना भीतर
दीवारें हैं जर्जर , सच ।

झूठ बोल कर वो जीते
हम हारे सच कह कर भी
ऐसे हैं हालात कि
जीना है मर मर कर , सच ।


कहने की आजादी
केवल कहने भर की है
एक शब्द पर ही तन जाते
कितने खंजर , सच ।

चार पीढियाँ एक साथ
रहतीं थीं कभी यहाँ
अब दो ही लोगों को
लगता है छोटा घर ,सच ।

कहाँ बचोगे ,कहने, सुनने
और देखने से ।
बेमानी है बनना अब
बापू के बन्दर , सच ।

समझ न आता कहीं कहीं तो
पूरा भाषण भी
कहीं उतर जाते गहरे में
दो ही अक्षर , सच ।

2004

Wednesday, August 8, 2012

मातृवेदी की राह पर


स्वतन्त्रता के महायज्ञ में 'मातृवेदी संगठन' ने जो काम किया वह इसलिये और भी वन्दनीय है कि उसके संस्थापक व अध्यक्ष पं. गेंदालाल दीक्षित जो वीर क्रान्तिकारी बिस्मिल के गुरु व मित्र थे , आजादी की राह में चुपचाप तन मन और धन से समर्पित होगए । बहुत दिनों तक कोई नही जान पाया कि अस्पताल में अनाम ही चला गया यह शख्स एक महान क्रान्तिकारी था और एक ऐसी चिनगारी अपने साथियों के सीने में सुलगा गया जो या तो रक्त से बुझ सकती थी या आजादी की शीतल बयार से । वे अनाम सिर्फ इसलिये रहे कि कोई उनसे क्रान्तिकारियों का भेद न पा सके । आजादी के इन दीवानों को यश की कामना नही थी बस एक जुनून था कि भारतमाता की बेडियों को तोड फेंकना है ।

यह सब आज श्री श्याम सरीन जी ने हमारे विद्यालय में छात्रों को बताया । श्री श्याम सरीन आकाशवाणी ग्वालियर के पूर्व उद्घोषक हैं । वे वर्षों तक अपनी आवाज के जादू से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध करते रहे हैं । वास्तव में श्री सरीन जी का यह परिचय अधूरा है । सही-सही पूरा तो अभी मैं भी नही बता सकती क्योंकि आज से पहले उनसे मेरा परिचय रेडियो के माध्यम से ही था । लेकिन आज जो परिचय हुआ वह इस विश्वास को मजबूत करने के लिये पर्याप्त है कि जीवन केवल हमारा नही है उस पर समाज व देश का भी अधिकार है । और इसे हर व्यक्ति को समझना चाहिये ।
सरीन जी के बारे में उल्लेखनीय बात एक तो यही है कि सेवा-निवृत्ति के बाद वे एक संगठन से जुड कर शेष जीवन को बहुत ही सार्थक रूप में लगाए हैं । उनके संगठन का नाम भी 'मातृवेदी' है । इसके माध्यम से वे वीर क्रान्तिकारी शहीदों की शौर्य-गाथाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं । दूसरी यह कि इसके लिये वे संचार माध्यमों के मोहताज नही है जबकि आज सिर्फ पौधे को हाथ भर लगाकर वृक्षारोपण का नाम करने वाले महानुभाव बिना फोटोग्राफर के एक कदम नही चलते । और तीसरी सबसे बडी बात यह कि हर बात उनकी आत्मा से ,रोम-रोम से निकलती प्रतीत होती है । हृदय से निकली उनकी एक एक बात आज कितनी प्रभावशाली थी इसका अनुमान इसी से लगाया जासकता है कि विद्यार्थी जो किसी भी भाषण को ,और पढाने का तरीका रोचक न हुआ तो पाठ्यक्रम के ही किसी प्रसंग को भी ध्यान से नही सुनते वे और हम सब पूरे ढाई घंटे खामोशी से सुनते और रोमांचित होते रहे । सब कुछ पढा व सुना हुआ था पर आज वही सब अधिक प्रभावशाली लग रहा था । यही है अभिव्यक्ति का जादू । अन्तर से निकली आवाज का असर । क्या आश्चर्य है कि जीवन की प्रभात बेला में ही सारे सुख छोड सर्वस्व समर्पण के लिये  गान्धी जी के साथ आगए थे । ( असहयोग आन्दोलन तक तो हर नौजवान उनकी आवाज के साथ ही था )  और सुभाषचन्द्र बोस के जोशीले नारे पर आबालवृद्ध नर-नारी खूनी हस्ताक्षर करने और भारत माता के चरणों में शीश चढाने के लिये दीवाने होगए थे ।
आग तो दिलों में आज भी है उसे सही दिशा में हवा देने वालों की जरूरत है । इसके लिये सशक्त स्वर में क्रान्ति व क्रान्तिकारियों का गौरवगान पहली जरूरत है । देश के हर बच्चे को पता होना चाहिये कि जिस निश्चिन्तता के साथ हवा में साँस ले रहा है वह कितनी अनमोल है । एक राष्ट्रीय भावना ही तो है जो देश से हर तरह के भ्रष्टाचार को मिटा सकती है। हर नागरिक को ईमानदार व कर्मठ बना सकती है । एक देशभक्त नागरिक भ्रष्ट नही होसकता । देशभक्ति आएगी आजादी के इतिहास को समझने से । अपने भूगोल को जानने से । मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का भाव होने से ।अपने भारतीय होने पर गर्व करने से ।
सरीन जी यही सब कर रहे हैं । बिना कोई शोर किये । ऐतिहासिक मातृवेदी संगठन की राह पर चलते हुए । मौन-मूक एक जमीन तैयार कर रहे हैं जिसमें राष्ट्रीयता के फूल खिलें । आत्मगौरव की फसलें लहलहाएं । वह यों कि अब किसी को आजादी के लिये विदेशी शक्ति से टकराने के लिये प्राण देकर देशभक्त कहलाने की आवश्यकता नही है । आज आवश्यकता है ईमानदारी से अपने दायित्त्वों के निर्वाह की । आवश्यकता है अनुचित के प्रति असहमति की। आवश्यकता है स्वार्थ से ऊपर समाज व देश के लिये सोचने की । यही नही अब ऐसे विचारों व अभियानों का बिना आडम्बर के प्रचार-प्रसार  भी होना चाहिये  ।
मेरे लिये वह हर व्यक्ति आदरणीय है जो ऐसा सोचता  है और इस दिशा में कदम रखता है ।


Thursday, August 2, 2012

एक सन्देश भाई के लिये


बाबुल ने जो बाग लगाया
मैया ने सींचा है ।
उसकी हरियाली ने भैया
सदा हमें खींचा है ।
उसकी रौनक चली न जाए
इतना रखना याद
भैया इतनी सी फरियाद ।

तुम उसकी करना रखवाली
जैसे करता माली
टहनी-टहनी रहे पल्लवित
महके डाली डाली ।
नेह सींचते रहना तुम
मैं दूँगी इसको खाद
भैया इतनी सी फरियाद

एक आँगन में हम-तुम खेले
लडे और रूठे थे ।
खींचतान भी होती थी पर
झगडे वे झूठे थे ।
सच थे ,सच हैं और रहें सच
अन्तर के संवाद ।
भैया इतनी सी फरियाद ।

द्वीपों ने बाँटी है चाहे
नदिया की यह धारा
नही विभाजित हो अपना यह
बन्धन प्यारा-न्यारा ।
भरती रहे उमंगें मन में
हर छोटी सी याद
भैया इतनी है फरियाद ।

तुझ पर वारूँ सारी खुशियाँ
दुनियाभर का नेह ।
कोई भी दीवार न हो
हर दूर रहे सन्देह ।
अटल रहे विश्वास हमारा
उम्मीदें आबाद ।
भैया इतनी सी फरियाद ।