Sunday, October 28, 2012

सबरस

( यह पोस्ट पढने से पहले---
25 अक्टूबर को सलिल जी ( चला बिहारी ब्लागर बनने  ) ने अपने ब्लाग पर ध्रुवगाथा को लेकर एक विस्तृत समीक्षा लिखी है । ऐसी समीक्षा जो एक साधारण कृति को विशिष्ट बनाती है । उसे यहाँ देना अनावश्यक ही है क्योंकि सलिल जी का ब्लाग जहाँ सुविशाल मैदान की तरह  है वही यह ब्लाग घनी बस्ती के बीच गली का एक हिस्सा है । सलिल जी द्वारा समीक्षा लिखी जाना और अपने ब्लाग पर देना दोनों बातें ही मेरे लिये हितकर हैं क्योंकि पुस्तक बहुत सारे सुधी पाठकों की जानकारी में आगई है । यहाँ ग्वालियर में तो विमोचन में सामिल हुए लोगों के अलावा किसी को अभी तक खास जानकारी नही (रुचि कहाँ से होगी )। इसमें मेरी निष्क्रियता भी एक कारण है । निस्सन्देह सलिल जी  धन्यवाद कहना उनकी सहृदयता भरी परख व संवेदना  का अवमूल्यन होगा । उसे केवल अनुभव किया जासकता है ।यहाँ यह सूचना इसलिये कि कहीं किसी कारण यदि वह समीक्षा न पढ पाए हों तो कृपया यहाँ http://chalaabihari.blogspot.in/  अवश्य पढें )
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माला जीजी जेठजी को, जो गंभीर रूप से बीमार हैं ,देखने आईं हैं । वैसे यहाँ आने के लिये उन्हें किसी खास कारण की आवश्यकता नही है । जेठानी की बडी बहन होने के साथ-साथ काफी अनुभवी व्यवहार-कुशल और दुनियादारी का ज्ञान रखतीं हैं । बेबाक बोलने के लिये जानी जाने वाली माला जीजी अब लगभग सत्तर साल की हैं । छत्तीस-सैंतीस वर्ष पहले जब मैंने उन्हें देखा था पूरे घर पर उनका वैसा ही प्रभाव था जैसा किसी सभा में मुख्य अतिथि का होता है । कानों में सोने की चेन से सम्हाले भारी-भारी झुमके झुलाती वे कोई भी बात कहतीं सब हाथ बाँधे उनके श्रोता बन खडे रहते थे । सब्जी छौंकने से लेकर त्यौहार ,विवाह और जापे की रस्मों व परम्पराओं में उनका दखल था । उन्हें किसी को भी रोकने टोकने या समझाने का पूरा अधिकार मिला हुआ था । दरअसल ऐसे लोगों को कोई अधिकार दे न दे वे खुद ही हासिल कर लेते हैं बिल्कुल निर्विरोध विजयी हुए उम्मीदवार की तरह ।       
अब उनका शरीर भले ही उतना साथ नही देता और त्वचा दुबले होने पर ढीले होगए कपडों जैसी होगई है । जीजाजी ( उनके पति) रिटायर होने के छह माह बाद ही चल बसे थे । पति का साथ छूट जाने पर वैसे ही स्त्री बिना छत वाले घर जैसी हो जाती है वह भी अगर वह निःसन्तान हो तो  मुश्किलें और भी बढ जातीं हैं । जो भी हो जीजी की आवाज में आज भी वैसी ही मजबूती ,और अभिव्यक्ति उतनी ही बहुरंगी और प्रभावशाली है । 
 क्या फर्क पडता है कि जीजी के बारे में कुछ लोग अलग तरह की बातें करतेरहते  हैं । भला पीछे बोलने वालों को कौन रोक सकता है ? वे तो दबी जुबान में यहाँ-वहाँ कोने में तम्बाकू की पीक की तरह पिचकते ही रहते हैं कि यह (माला जीजी)किसी की मीत नही । नम्बर एक की कंजूस है । दाँत से काट कर एक-एक पैसा निकालती है । मास्टर (जीजी के पति) अकूत दौलत छोड कर गया है पर मजाल है कि कोई थाह तो लेजाए । देवर-जेठ को तो पासंग पानी नही पीने देती । जो कुछ है ,अपनी बहनों और अपने भाई-भतीजों को ही देकर जाएगी । अब इन अकल के दुश्मनों से पूछो कि आदमी उसी को तो अपना धन-सर्वस्व सौंपेगा जिस पर अपनी सेवा-सुरक्षा का भरोसा किया जा सके । और भरोसा करना भी क्या कम साहस का काम है ??...
खैर वह एक अलग बात है ।  
मैंने बताया कि माला जीजी अपनी बहन (मेरी जेठानी) से मिलने व बहनोईजी को देखने आईं है । अब वे मथुरा से यहाँ तक आएं और कोई उनसे मिलने भी न जाए तो अव्यावहारिकता से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें बुरा लगेगा । तुरन्त शिकायत करेंगी कि , "भैना दो कदम चल के तू  मिलने भी न आ सकै !!" सो उनके आने की खबर जैसे ही मुझे मिली ,समय निकाल कर उनसे मिलने गई ।
"अरे ,लाली आगई!"--मुझे देखते ही जीजी फुलझडी की तरह चमक उठीं । मैंने देखा ,सदा की तरह चमचमाते दाँतों का मजबूत घेरा जीजी के गालों को धँसने से बचाए है। आँखें भले ही कुछ और छोटी लग रहीं थीं पर उनमें मानो ऐक्सरे और अल्ट्रा मशीनें आज भी फिट है आदमी के अन्दर के मांस-मज्जा और हड्डियों को परखने में सक्षम ।
"आप कैसी हैं जीजी ?"
"अरे लाली कैसी का हैं ,बस दिन पूरे करनौ समझौ ।(रुआँसी होकर) जे देखौ लला की हालियत..देखी ना जा सकै। गले से कौर नीचे ना उतरै । रात के दो-दो बजे तक नींद ना आवै..। राम ने ना जाने माथे पै का लिख दीनौ है..।" --बोलते-बोलते लगा कि उनका गला बैठ गया है ।आँसू हैं कि बस निकल ही नही रहे हैं ।
"सो तो है ..। लेकिन जीजी ईश्वर की कृपा से सब ठीक होजाएगा आप चिन्ता न करें ..।"
मैंने उनके दुख को कम करने की नीयत से कहा पर वे ओज भरी आवाज में मुझे लगभग ललकारते हुए बोली--"अरे ऐसौ कहीं हो सकै लाली ,कि अपने आदमी की चिन्ता न होवै ? ऐसे में कही ध्यान भी लग सकै का ? तेरे जीजाजी (उनके पति) बीमार थे ढाई महीने बिस्तर पर टट्टी-पेसाब कराया (नाक एकदम ऊपर खींचते हुए) । दाग ना लगने दियौ बदन पर । पूरा गाँव कहै कि सेवा करौ तो माला भाभी जैसी नही तो नही । का मजाल कि उधर एक मक्खी तक झाँके । अब उन ने भी का कम सुख कराए जब तक वे ठीक रहे मेरे पाँव मैले ना होने दिये । एक दिन मायके नही जाने देते थे लाली । सब कहते कि राम-सीता जैसी जोडी है (गहरी साँस)..बजार में हर मौसम और फेसन की चीज पहले हमारे घर आती थी । पर दिन एकसे तो रहने से रहे बिटिया । अब हाथ-पाँव ना चलै किसी का सहारा तो लेना पडेगा लाली ,सो मंटू (जीजी के भाई का बेटा) और उसकी बहू को पास रखा है । इतना बडा दो मंजिला मकान और जमाना है खराब ,भैन मेरी, अकेले कोई भी आकर डुकरिया का गला दबा कर(घबराते हुए) माल-मसाला ले चम्पत होजावै कौन को पतौ चलैगौ ! पर भैना ऐसे ही कोई किसी के घर रह सके है ? कुछ तो उम्मीद दिखै । तभी तो कोई अपना घर छोडकर रहने तैयार होगा । सो एक मकान मंटू के लिये बनवा दिया है हाथरस में और पचास हज्जार की एफ.डी करा रक्खी है । मंटू कभी जे ना कह सकै कि कंजूस बुआ ने सेंतमेंत ही इतनी सेवा करवा ली । लाली , भगवान का दिया सब कुछ है बस एक सन्तान नही दी । सो अब तो एकई उम्मीद है कि बाँकेबिहारी की किरपा से मंटू की बहू की गोद हरी होजावै तो घर में किलकारियाँ गूँजै । पर आजकल की छोरियाँ हैं न ,अपने मन की करे हैं ।(आवेश के साथ) ऊपर से जे टी.वी. वालों की बेसरमी देखो, कैसी-कैसी चीजें दिखाते हैं । छोरियन कों खुल्लेआम घूमना -फिरना और अच्छा पहनना-ओढना तो खूब चइये पर ससुराल के नाम से दूर भागें हैं । घर-गिरस्ती के लच्छन तो जानै ही नाइ ।का घर सम्हालेंगी और का सेवा करेंगी । ब्याह  भी करलें पर बच्चा पैदा करने की जहमत ना उठा सके हैं । अपनों दूध ना पिला सकैं हैं । फिर भला ब्याह करने की भी जरूरत का है ।
कोई कैसी भी हो पर मंटू की बहू तो आपकी सेवा करती है न जीजी
अर् रे ...सो तो सेवा जीजान लगा कर करे है । कोई काम ना करने देवै । पर लाली वही बात है न कि  तीन साल होने को आए...
तो तीन साल कोई ज्यादा नही हैं ---मैंने अपने प्रगतिसील होने का प्रमाण देना चाहा तो वे बुरा मान गईं । जोर देकर बोलीं---नही लाली तुम जेई तो नही जानौ, बाल-बच्चा तौ सुरू में होजाए तो ठीक नही लगाओ डाक्टरों के चक्कर......।"
मुझे वहाँ से जल्दी जाना था वरना जीजी  समझ के कलश  में से  कोई और भी रस निकाल कर टेस्ट करातीं तीं...। बाकी फिर कभी ।
        

Tuesday, October 9, 2012

एक कविता अपनों के लिये


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बुझने को है अब हर शिकायत  
तेल खत्म होते दीपक जैसी
शिकायत कि ,
अब क्यों नही मिलते हो तुम
उस तरह, 
जिस तरह तय था हमारे बीच 
मिलते रहने का ,
बाँटते हुए वह सब जो 
सह्य नही होता कभी अकेले ही ।
शिकायत कि ,
तुम अब कभी-कभार 
सडक पर ही मिल गए 
परिचित की तरह निभाते हो
अपनेपन की रस्म ,
व्यस्तता के सुनिश्चित बहानों के साथ ।
साथ बैठ कर चाय पीते हुए भी 
करते हो हमेशा इधर-उधर की बातें
हवा में उडते रेशों की तरह 
नही बताते कि पिछली शाम 
तुम क्यों थे इतने परेशान 
पूछते भी नही कि क्या है वह बात जो 
चलने नही दे रही मुझे दो कदम भी आगे 
महीनों से ...। 
शिकायत कि , 
क्यों नही सोचते तुम  
मेरे लिये वैसा ही
जैसा सोचती रही हूँ मैं तुम्हारे लिये
हमेशा तुम्हें साथ रखते हुए...।
शिकायत कि ,
तुम अनजान बन रहे हो 
एक पारदर्शी दीवार से 
जो बन रही है हमारे बीच अनजाने ही ।
तुम्हें परवाह नही है जरा भी कि 
महसूस नही कर सकते हम 
एक दूसरे को छूकर ।
क्या तुम कभी समझ पाओगे कि 
यूँ शिकायतों का बुझ जाना 
स्वीकार लेना है रिश्तों की दूरियों को
जैसे स्वीकार लिया है लोगों ने 
कार्य-व्यवहार में,
भ्रष्टाचार को ।
दुखः तो यह है कि 
तुम्हें दुख नही है,
फिक्र भी नही है 
यूँ शिकायतों के मिट जाने की 

Thursday, October 4, 2012

लोकार्पण---एक रपट


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1 अक्टूबर 2012 को 'ध्रुवगाथा' और 'अपनी खिडकी से' का लोकार्पण होना था सो होगया । इसकी सूचना तथा अखबार से लिया गया छायाचित्र मयंक ने और बाद में सुश्री कुन्दा जोगलेकर ने पहले ही फेसबुक पर डालकर मेरा काम पूरा कर दिया ।  वही सूचना यहाँ भी है ।
लोकार्पण में जो विशेष बात थी वह यह कि मुझे कुछ विशेष नही करना पडा । फोन सूचना से ही शहर के अनेक सहृदय साहित्यकार  जो थोडा बहुत मुझे जानते थे ,आगए थे । सारी व्यवस्था आदरणीया श्रीमती अन्नपूर्णा जी  ने की थी । उसमें अंजेश मित्तल जी ,भाई लोकेन्द्र सिंह (ब्लाग 'अपना पंचू' ) और मेरे पुत्रतुल्य मोनू व हनी का विशेष सहयोग रहा । पुस्तकों का लोकार्पण  डा.पूनम चन्द तिवारी( पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष जी.वि.वि.) ,डा. जगदीश तोमर( वरिष्ठ साहित्यकार एवं निदेशक प्रेमचन्द सृजन-पीठ उज्जैन) डा. दिवाकर विद्यालंकार जी(प्रकाण्ड विद्वान एवं शिक्षाविद्)डा.अन्नपूर्णा भदौरिया(हिन्दी विभागाध्यक्ष जी.वि.वि.) एवं श्री प्रकाश मिश्र जी ( कविता के सशक्त हस्ताक्षर ) ने किया । इन विद्वान साहित्यकारों ने जिस तरह दोनों पुस्तकों की विस्तार से समीक्षा व प्रशंसा की , मुझे विश्वास नही हो रहा था कि यह सब मेरी रचनाओं के विषय में और मेरे लिये कह रहे हैं । डा. विद्यालंकार जी ने ध्रुवगाथा पर एक विस्तृत वक्तव्य देते हुए कहा कि ध्रुवगाथा को उन्होंने एक ही बैठक में पढ डाला । बिना रुके बिना ऊबे । जब किसी लेखक और पाठक की अनुभूतियाँ एकाकार होजातीं है उसे रचना का साधारणीकरण (जनरलाइजेशन) कहते हैं । ध्रुवगाथा पढते समय उन्हें यह तीव्रता से महसूस हुआ और कई बार उनकी आँखें नम हुईं । डा. जगदीश तोमर ने 'अपनी खिडकी से' कहानी संग्रह को एक अद्भुत और अरसे बाद सामने आया एक पठनीय कहानी-संग्रह बताया साथ ही पतंग ,आज्ञा का पालन, बिल्लू का बस्ता आदि कहानियों की विस्तार से चर्चा की । श्री प्रकाश मिश्र जी व डा. अन्नपूर्णा दीदी ने भी मुक्त-कंठ से दोनों पुस्तकों को अत्यन्त रोचक स्तरीय व स्वागत योग्य कृति बताया ।
इस बीच कुछ कमियाँ भी अखरीं । जैसे कि बैंगलोर से तीनों भाई शिकायत कर रहे थे कि कार्यक्रम  इतनी जल्दी में क्यों रखा गया कि हममें से कोई न आ सका । मेरे पास कैमरा था लेकिन पर्स से निकालने का ध्यान ही न रहा । यह फोटो मैंने कहीं से माँग कर लिया है ।  जिन्हें अध्यक्षता करनी थी वे एक हडताल में फँसे रहे और अन्त तक न आ सके । लोकार्पण के लिये रखी गई पुस्तकें रंगीन पेपर में लपेट कर रखी जातीं हैं यह मुझे मालूम ही नही था । अन्नपूर्णा दीदी ने मुझे अचरज से देखते हुए कहा -- "अरे गिरिजा , तुम्हें आज तक यह भी नही मालूम !" 
वह  तो  ऐन मौके पर भाई  लोकेन्द्र सिंह व मोनू के प्रयासों से बात सम्हाल ली गई ।और एक कमी यह भी लगी कि ग्वालियर  में हिन्दी भाषा व साहित्य जगत के  भीष्म पितामह कहे जाने वाले डा. पूनमचन्द तिवारी जी को बोलने का अवसर नही दिया गया । 'खजुराहो' के रचयिता डा. तिवारी जी नब्बे साल से ऊपर के हैं ( दाँए से दूसरे )पर उनमें जितना हिन्दी के प्रति समर्पण भाव है उतनी ही सक्रियता भी है । वे जब बोलने खडे होते हैं सबसे पहले पूछते हैं --"आपकी माँ कौन है ? हिन्दी या अंग्रेजी ?"  और फिर एक लम्बा व्याख्यान शुरु । कार्यक्रम कोई भी हो अगर तिवारी जी बोलेंगे तो देश में हिन्दी की दुर्दशा पर जरूर बोलेंगे । अब हाल यह है कि किसी कार्यक्रम में तिवारी जी आते हैं तो आयोजक पहले ही कहदेते हैं, " क्या !! तिवारी जी का भाषण ??,ना भैया भूल कर भी ऐसा न करना । आधा -पौन घंटा खा जाएंगे ।" पर मेरा विचार है कि इतने वयोवृद्ध विद्वान को हमें जरूर सुनना चाहिये । उनकी सन्तुष्टि  के लिये ही सही । वे तो कगार पर खडे हैं । आँखों में बच्चों की सी लालसा व भोलापन है । पता नही कब वह आवाज कहीं खोजाए । वे हर जगह पहुँच जाते हैं यह क्या कम है । मुझे भी आपाधापी में ख्याल न रहा वरना संचालिका कादम्बरी जी से  जी से कह ही देती । सम्मान ग्रहण करके वे जब बिना बोले चले गए तब मुझे अहसास हुआ कि शायद वे बोलने का अवसर न मिलने के कारण रुष्ट होगए । मुझे कुछ ठीक नही लगा पर कुछ लोगों ने कहा --"अरे ठीक है  सब समय से निपटगया । वरना अभी आधा पौन घंटा जाता ।"
खैर कार्यक्रम के लिये मैं जैसा सोच रही थी उससे कुछ ठीक ही होगया ।