Tuesday, February 12, 2013

चौंतीस साल पुरानी कविता का मर्म

जयपुर वाली बुआजी के चले जाने का समाचार क्या मिला है मन में अजीब सी बेचैनी भर गई है । वे मेरी छोटी बुआ सास की देवरानी थीं लेकिन हमें ,खास तौर पर मुझे बहुत प्यार करतीं थीं सगी बुआ की तरह ही । दो साल पहले ही वे ग्वालियर से जयपुर जाकर रहने लगीं थीं । वहाँ उनके दो बेटे पहले ही स्थापित हो चुके हैं । फूफाजी  नायब तहसीलदार की नौकरी से रिटायर हो ही गए थे । दो माह पहले मेरे आग्रह पर वे मयंक की शादी में आई थीं । यह उनकी आखिरी भेंट थी यहाँ के सभी लोगों से । जिस शान-शौक ,अपन्त्वऔर उल्लास के साथ उन्होंने जीवन जिया उतनी ही निस्संगता से दुनिया को अलविदा  भी कह दिया ।
उनके बारे में बहुत कुछ है लिखने को । कभी लिखूँगी..।
बुआजी के अचानक जाने से जो अव्यक्त सी विकलता है वह यह कि मैं कई दिनों से उनसे बात करना चाह रही थी । सोचा था कि हमेशा वे ही फोन करके उलाहना देतीं हैं कि 'फोन नही कर सकती ! बहुत बडी होगई है ! भूल गई है ..अब तो.!'..अब उनकी इस शिकायत को मैं दूर कर दूँगी । पर न कर सकी । सोचते, याद करते  बैंगलोर में एक माह बीत गया । और  ग्वालियर भी लगभग एक माह ... । इन दो माह में मैं सिर्फ उनके लिये सोचती रही और सोचती ही रह गई । बुआजी हमेशा के लिये चली गईँ । अमिट सा पश्चाताप और एक पाठ  देकर कि प्रतीक्षा मत करो । समय आपके लिये कभी रुकता नही । जो सोचा है ,अभी अमल में लाने की कोशिश करो । आज अचानक सन् 1979 में लिखी कविता सामने आई तो लगा कि यह कविता  लिखी भले ही चौंतीस वर्ष पहले गई थी पर उसका सही अर्थ अब समझ में आया है । यह कविता उसी रूप में यहाँ है----
------------------------------------------------------------------------------------------------
सुबह होगई 
संसार नहा लिया रोशनी में 
रात कहीं जाकर सोगई ।
धूप ! ओ कोमल ,सुनहली धूप !
आ तुझे भरलूँ आँखों में ।
देख सकूँ सारा विश्व
स्पष्ट ...दूर दूर तक 
हटादूँ सारे भ्रम दृष्टि के 
करलूँ दूर कुहासा मन का ।

खेतों ,किनारों और सुदूर मैदानों में 
फैली हुई हरीतिमा !
शीतल ,मृदुल ,उत्फुल्ल हरीतिमा !
आ ,तुझे भरलूँ  हृदय में 
मिट जाए पथरीला उजाड
कंटीले झाड-झंखाड
लहलहाए कोमल फसलें 
उम्मीदों की स्नेह की ।

ओ नदिया की अतुल निर्मल धारा!
कल-कल बहती अविरल धारा !
आ, तुझे लहरालूँ 
अपने मन मरुस्थल में 
मिट जाए ताप-तृषा
तमाम विषमताओं का 
मलाल वृथा
मिटे जमीन का बंजरपन
अंकुराएं  दबे झुलसे बीज ।

ओ उन्मुक्त विहंगिन!
उडती  चहचहाती
आसमान के छोरों को छूती हुई
निश्चिन्त विहंगिन !
आ सिखादे मन को उडना 
उड कर छूना लेना ऊँचाइयों को 
इतना कि देख सकूँ मैं 
घर आँगन या गाँव ही नही 
देश प्रदेश विदेश...सारा विश्व..
अभिन्न, एकरस एक परिधि में ..।

यह सब करना है मुझे 
आज ..अभी  इसी क्षण 
कौन जाने कि ,
बादलों का सघन व्यापार 
आ जमे मेरे व धूप के बीच
कि हरीतिमा को रौंद डाले कोई 
'जानवर'...।
कि रोकले कोई नदी को बीच में ही 
कि  कोई निर्मम कैद करले
विहंगिन की उडानों को ।
या कि ये सब तो हों पर,
मैं ही न रहूँ
इन सबके लिये ..। 

4 comments:

  1. हर क्षण पर अब ऋण अपार है,
    मन में जड़ता का प्रसार है,
    क्या न कर लूँ, जीवन भर लूँ,
    व्यस्तमना बहता विचार है।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर रचना ................

    ReplyDelete
  3. भावपूर्ण रचना ..जाते तो सभी हैं पर कुछ हमेशा के लिए दिल में बस जाते हैं.

    ReplyDelete