Wednesday, May 29, 2013

गर्मी और मन---कुछ व्यंजनाएं

(1)
चिलचिलाती धूप 
तमतमाया रूप 
मौसम का
दौडते हैं वाहन छाती पर
लगातार,, धुँआधार
खुद को बचाए रखने 
बार-बार...बेमन
यूँ बन गया है 
कोलतार की सडक जैसा मन
(2)
एक तरफ तो
गर्मी और लू द्वारा 
फटकारा गया।
दूसरी तरफ
शानदार ,वातानुकूलित भवनों के
दरवाजों से दुत्कारा गया
सडक के किनारे
किसी गुमठी की छाँव में
हाँफते
'शेरू' सा मन
(3)
शाम ढले 
रौंदी जाती है 
कितने पैरों तले
पर हौसले ,
कभी नहीं दले
कहीं से भी 
जरा सी नमी पाकर
सिर उठाती 
मुस्कराती दूब जैसा मन
(4)
किसी सफेदपोश नेता सा सूरज
जाने कितने सब्जबाग दिखाकर 
सोखता है
रोज ही आकर
तब, अस्मिता के प्रश्न पर
होती है गमगीन
फिर भी हरियाली के कालीन
बुनने में तल्लीन
क्षीणकाय मजदूरिन सी
नदी जैसा मन

16 comments:

  1. God is love!

    Catholic blogwalking

    http://emmanuel959180.blogspot.in/

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  2. गर्मी को हारने की मन की जद्दोज़हद.....

    बहुत बढ़िया रचनाएं ..

    सादर
    अनु

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  3. बहुत उम्दा,लाजबाब रचनाए ,,क्या बात है ,,

    Recent post: ओ प्यारी लली,

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  4. बाहर अन्दर एक ताप है, एक साम्य है।

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  5. बहुत ही संवदेनशील अनुभव प्रस्‍तुत किए आपने।

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  6. दीदी!
    आज कुछ भी नहीं कहूँगा मैं!! बस अनुमति दीजिए, अपने चरण स्पर्श की!! जिन गिने चुने लोगों ने ब्लॉग जगत में 'साहित्य' ज़िंदा रखा है, उनमें आप भी शामिल हैं!! कम से कम मेरे लिये, मेरी नज़र में!!
    यहाँ 'मन' के जो भी रूप आपने दिखाए हैं वो कविता में व्यंजना के माध्यम से जीवंत हो उठे हैं... और अब तो ऐसा लगता है कि मैं खुद भी अपने अंदर इस तपती गर्मी में वही महसूस कर रहा हूँ!!

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  7. बहुत बडी बात कहदी है मेरे लिए सलिल भैया । ईश्वर करे आपकी यह राय बनी रहे ।

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  8. सलिल का कथन,कम से कम मेरे लिए महत्वपूर्ण है ..
    अब इससे अधिक आपका क्या सम्मान करूँ !
    आदर सहित गिरिजा कुलश्रेष्ठ !!

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  9. सतीश भाई जी ..शुक्रिया !
    इस भाचुकता भरी लेखिका से मिलवाने के लिए ....
    अहसासों से भरपूर सुंदर रचना !
    शुभकामनायें!
    खुश रहें ,स्वस्थ रहें !

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  10. भाव पूर्ण ... नए बिम्ब खड़े करती अर्थपूर्ण हैं सभी क्षणिकाएं ...
    लाजवाब ...

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  11. charo nazmon kee imagery crystal clear.. mumbai me bahut tez barish ho rahi hai... par hanfta hua sheroo aur koltaar kee sadak sab saaf saaf nazar aaye... dhero daad

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  12. जरा सी नमी पाकर
    सिर उठाती
    मुस्कराती दूब जैसा मन

    सभी रचनाएं लाजवाब

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  13. शाम ढले
    रौंदी जाती है
    कितने पैरों तले
    पर हौसले ,
    कभी नहीं दले
    कहीं से भी
    जरा सी नमी पाकर
    सिर उठाती
    मुस्कराती दूब जैसा मन
    Bahut Badiya Kavita hai.

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  14. बहुत उम्दा,लाजबाब रचनाए

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  15. लाजबाब रचनाए

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