Monday, July 8, 2013

वह अजनबी

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वह , 
जो देखता रहता है चुपचाप
उफनती हुई नदी में
डूबते हुए आदमी को
तटस्थ रहकर  
उसे समझ है कि
डूबते हुए को बचाना,
हो सकता है खुद भी डूब जाना ।
या कि हिसाब लगा लेता है वह 
बचाने पर हुई हानि या लाभ के 
अनुपात का...,
हमारे शहर का तो नही है
आया है कहीं दूर से ।

वह हमारे मोहल्ला का तो नही है ,सच्ची
वह जो भीड में रहकर भी
भीड से अलग है
मुसीबतों से विलग है ।
आता है उसे खुद को 
बचा लेना ,धूल कीचड और काँटों से
पहन रखे हैं उसने 
कठोर तल वाले जूते ।
क्या परवाह कि
रौंदे जाते हैं कितने ही जीव -जन्तु
उसके यूँ चलने से ।

वह हमारी गली का नही हो सकता 
जो निरपेक्ष रहता है सदा
कंकरीट की दीवार सा
बेअसर रहते हैं हमेशा 
आँधी--तूफान ,ओले ,भूकम्प....
हर तबाही को देखता है 
नेता या किसी न्यूज-चैनल की तरह ।
  
मैं क्या करूँ उससे मिल कर  
जो स्वयं को दिखाता है अति व्यस्त 
बिना कार्य ही कार्य-भार से त्रस्त  
रहता है हमेशा यंत्रवत् ।
देता है अधूरा सा जबाब
किसी क्लर्क की तरह 
दस बार पूछने पर भी 
अटका रहता है पूछने वाला,
एक पूरे और सही
जबाब के लिये ।   
वह यकीनन नही है 
मेरे घर का ,कोई मेरा अपना ।

11 comments:

  1. सोचने पर विवश करते भाव......

    बहुत अच्छी रचना.
    सादर
    अनु

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  2. निरपेक्ष भावधारी कर्ताधर्ताओं पर विचारणीय कविता के माध्‍यम से सुन्‍दर कटाक्ष। कविता निश्चित रुप से कठोर तल के जूते पहने शासक को ज्‍वलंत प्रश्‍नों का उत्‍तर देने को विवश करती है।

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  3. अब तो ऐसे ही लोग बचे हैं गिरिजाजी :( जो उदासीन रहकर आपदा, लूटपाट, बलात्कार, हत्या की खबरें ड्राइंगरूम में बैठकर पढ़ते या देखते हैं... जब तक कि वह स्वयं उनके या उनके नजदीकी लोगों के साथ न घटे.. सामाजिकता अब हर दूसरे का दु:ख बांटने का नाम नहीं रहा..

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  4. व्यस्तों को व्यस्तता के बीच छोड़कर मस्त जीवन बिताना चाहिये, अपने लिये पूरा समय निकालते हुये।

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  5. कवि मन कोमल होता है ... वो ऐसे भाव रखता है .. पर हकीकत की जमीन पे अपने पडोसी भी ऐसे ही गोते हैं आज ... कई बार तो एक घर में रहने वाले भी ऐसे मिलते हैं आज ...

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    1. आदरणीय दिगम्बर जी यहाँ शहर ,मोहल्ला, घर आदि का अभीष्ट अर्थ भावनात्मक निकटता है । अर्थात उन लोगों से मेरा घोर अपरिचय है । दूर-दूर तक का नाता नही है ,जो लोग इतने निस्संग, स्वार्थी व निर्मम हैं । रचना को ध्यान से पढने के लिये आभारी हूँ ।

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  6. 'वह यकीनन नही है
    मेरे घर का ,कोई मेरा अपना ।'

    सच, वो जो संवेदनहीन है कैसे हो सकता है अपना!

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