Tuesday, November 26, 2013

एक दिन --दो गीत

आज प्रशान्त (गुल्लू) का जन्मदिन है । मेरे लिये एक अत्यन्त शुभ-दिन दिन । अनेक आशीषों और वरदानों का दिन । पहली रचना उसी के लिये । दूसरी कविता अपने वीर जवानों के लिये जो देश की रक्षा और संकट के समय प्राणों की बाजी लगा देते हैं ।
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(1)
क्या लिखूँ आज तेरे लिये
मेरे प्रथम कोमल गीत 
मेरे वत्स !
मेरे मीत !
अवाक् हूँ
फिसल जाते हैं शब्द
पारे की बूँदों की तरह
मेरी उँगलियों से ।
अव्यक्त है वह अहसास 
,जो होता है 
याद कर तेरी सस्मित आँखों को ।

तेरी आवाज  

धूप की तरह बिखर जाती है 
सुबह-सुबह 
भर देती है उजाला 
घर के कोने-कोने में 
अँधेरे बन्द कमरों में भी ।

साफ कर देती है धूल ।
जो जमी होती है अलमारियों में
सोफा ,शीशा किताबों और डायरियों पर 
रात के अँधेरों में लग गए जाले ,
जो लिपट जाते हैं चेहरे पर, बालों में 
उतार देती है ,
रोज की अभ्यस्त कामवाली की तरह

चाहती हूँ लौटाना तुझे वह सब 

जो दिया है तूने मुझे सबसे पहले  
मिले तुझे वह सब 
जो मेरे मन में है  हमेशा । 
और क्या दूँ तुझे 
मेरे वत्स , मेरे मीत
 मेरे प्रथम कोमल गीत ।


  जन्मदिन--26 नवम्बर 1978
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मुम्बई के आतंकी हमले में काम आए वीरों के सम्मान में----
(2)
मातृ-भूमि का ऋण उतार कर वीर जवान चले 
कर्म भूमि का पथ सँवार कर हो कुर्बान चले ।

दुश्मन ने आतंक मचाया
निर्दोषों का खून बहाया ।
धधक रहीं थीं जब दीवारें 
सहमे प्राण ,देश थर्राया ।
कूद पढे वे तूफां बन कर वीर जवान चले ।
अमर हुए वे जीवन देकर योद्धा थे विरले ।

सिखा गए वे हमको ,चुप रहना ,डर जाना है 
समझौतों पर चलते ही रहना, मर जाना है ।
लगे समझने जब उदारता को कोई कमजोरी 
चोरी करके भी शैतान दिखाए सीनाजोरी 
ईँट लगे तो फेंको पत्थर ,हम सबको इतना समझाकर 
वीर जवान चले ,हो कुर्बान चले ।

छोडो स्वार्थ और समझौते दो जैसे को तैसा । 
सबको समझादो ,यह देश नही है ऐसा वैसा 
स्वार्थ और सत्ता से ऊपर हों अपनी सीमाएं ।
अब गद्दार रहे ना हरगिज अपने दाँए-बाँए । 
बैंगलोर मुम्बई या जयपुर 
रहे न कोई भी यों डरकर  
दुश्मन हाथ मले ,वीर जवान चले ।

किसी शहादत पर भी ना हो कोरी नारेबाजी ।
आन बान का सौदा है यह नही है कोई भाजी ।
दिन में स्वप्न देखने वालों की निंदिया को तोडो ।
आस्तीन के साँपों को अब दूध पिलाना छोडो । 
जीवन का मकसद पूरा कर ,वीर जवान चले ।
यही सबक हम सबको देकर ,हो कुर्बान चले ।

(15 दिस 2008 को रचित) 

7 comments:

  1. प्रशांत के लिए मंगलकामनाएं , साथ ही उसे बधाई भी कि आप जैसी माँ पायी है !

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  2. Didi.. Maan tabhi maan kahalati hai jab wah pratham santaan ko janm deti hai.. Ek ehsaas jiska sukh duniya mein sirf aurat ko haasil hai.. Aapki kavita wo sab kahti hai.. Aapke tamaam aashirwaadon me, mera bhi swar sammilit paayen.
    Aaj ke din un veer jawanon ko aapne jis tarah is kavita ke maadhyam se sammanit kiya hai, main natmastak hoon!!

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  3. shubhkamnayen....................sundar racna veeron ke liye................

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  4. man ke bhaav kagaj par utarate hai to kavita ban jaate hai. sundar. shaubhkamanaye .

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  5. प्रशांत को हमारी ओर से भी मंगल कामनाएं..दोनों ही रचनाएँ भावपूर्ण हैं..बधाई !

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  6. कविता में वीरों को प्रति उपजा भाव सम्‍माननीय है। प्रशांत जी को शुभकामनाएं।

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  7. प्रशांत को जनम दिन की शुभकामनायें ...
    दोनों रचनाएं मन को छूती हैं ... मुंबई के वीरों को नमन है ...

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