Tuesday, September 24, 2013

सुने बिना ही ....

जब पूरी तरह मुझे सुने बिना ही 
तुम निकल जाते हो 
जैसे कोई जल्दबाज हॅाकर  
अखबार फेंककर
किसी दूसरी गली में होजाता है ओझल ,
 तब छोड जाते हो किसी बच्चे को 
जैसे अकेला और आकुल
किसी सुनसान, अँधेरे,
और भुतहे घर में...।

जैसे फटाक् से गिरा देता है कोई शटर

राशन के लिये 
लम्बी लाइन में लगे
किसी आदमी का 
नम्बर आने से पहले ही । 

गुल होजाती है जैसे बिजली 

अचानक रात के अँधेरे में ,
किसी बहुप्रतीक्षित पत्र को,
पढने से पहले ही...।

और जैसे थप्पड मार देता है कोई शिक्षक 

अपने छात्र को ।
उसका सवाल सुने समझे बिना ही ।

नही जाना चाहिये तुम्हें ,

या कि किसी को भी  
वह बात सुने बिना 
जो दिल में छुपी  रहती है 
दर्द की तरह 
जिन्दगी को जकडे हुए 
एक ही जगह पर ।

Sunday, September 22, 2013

'और भी हैं दुनिया में' बडे मियां'

श्रीमती ग ने आखिर लीलावती के आगे हाथ जोड लिये । कहा--"मुझे बख्श दे मेरी माँ ! मैं तुझसे हार गई हूँ ।" 
और तभी मुझे एक कहानी याद आगई जो बचपन में माँ सुनाया करती थी । संक्षेप में कहानी कुछ यों थी -- 
दो भाई थे । बडे मियां और छोटे मियां । एक दिन बेरोजगारी से तंग आकर दोंनों ने तय किया कि एक भाई को नौकरी करने जाना चाहिये । बडे भाई ने कहा तू छोटा है । काम मैं करूँगा । तू मेरा इन्तजार करना ।
 इस तरह बडे भाई ने घूमघाम कर एक दम्पत्ति के यहाँ नौकरी करली । उनमें  बेगम तो सीधी थी पर शौहर बडा काइंया था । उसने बडे मियां के सामने शर्त रखीं---जो भी काम कहें ,उसे करना होगा । खाने के नाम केवल पत्ता भर खिचडी मिलेगी । सबसे खास बात यह कि अगर हम तुझे काम से हटाएं तो हम अपने नाक कान देंगे और डबल पगार भी । लेकिन अगर तूने काम छोडा तो अपने नाक-कान  तो देने ही होंगे , पैसा भी नही मिलेगा सो अलग । मंजूर है ?" 
"मंजूर है-"--बडे भाई ने कहा और काम पर जुट गया । सुबह से शाम ,देर रात तक वह काम में भिडा रहता था । जंगल से लकडी लाना । घोडों की मालिश ,दाना पानी , खाना पकाना , कपडे धोना ,घर की सफाई आदि जो भी काम मिलता पूरे मन से करता था । पर सीधा होने के साथ कुछ बुद्धू भी था । खिचडी के लिये जो भी पत्ता बेर ,बरगद , पाखर, पीपल मिलता ले आता । उस पर भला कितनी खिचडी मिलती । इस तरह दिन भर में एक डेढ या अधिक से अधिक दो चमचा भर खिचडी मिलती थी । और कुछ खाना शर्त में था नही सो भूखे ही वक्त गुजारना पडता था । महीना भर में कुछ कमाना तो दूर ,बडे मियां को खुद को खडा रखना भी दुश्वार होगया । हड्डियाँ--पसलियाँ बाहर झाँकने लगीं थीं । अन्त में उसे उसे खयाल आया कि ऐसे मरने से तो अपने भाई के साथ भूखे रह कर मरना ज्यादा ठीक होगा ।
" मुझे माफ करें अब मुझसे काम नही होगा ।"   ए"क दिन उसने कह ही दिया । 
"खुद जारहे हो तो शर्त के मुताबिक अपने नाक-कान दे कर जाओ ।" और बडे मियांजी -'लौट के बुद्धू घर को आए' वाली कहावत के अनुसार अपने नाक-कान देकर घर लौट आए । 
फिर छोटे भाई ने कैसे सूझबूझ व चालाकी से उस दम्पत्ति नाकों चने बिनवाए और कैसे  अपने भाई का बदला लिया ,यह बेहद रोचक किस्सा है । सो फिर कभी । 
अभी तो मेरा ध्यान श्रीमती ग और लीलावती के प्रसंग पर है । लीला काफी चतुर ,फुर्तीली और हाजिर जबाब युवती कपडे धोने का काम करती है । ग काफी संवेदनामयी महिला है । मुसीबत में किसी को ना नही कह पातीं । लीला ने एक दिन अपने बच्चे लाकर 'ग' के सामने खडे कर दिये और अपनी व्यथा-कथा सुनादी ।
"दीदी थोडी मेहरबानी होजाए । आपके करे मेरे बच्चे परीक्षा दे सकेंगे । इनकी फीस नही भर पाई हूँ सो मास्टर किलास में नही घुसने देरहे । कहते हैं पहले फीस लाओ । दीदी फीस नही भरी तो बच्चों का साल बरबाद होजाएगा ।"
"तो मैं क्या करूँ ?"
"बस दो हजार रुपए दे दो दीदी । तुम्हारा एहसान रहेगा । मैं जैसे कहोगी पटा दूँगी ।"
" बस दो हजार ??"---ग को अजीब लगा । घर बैठा पति अक्सर शराब में धुत रहता है । केवल कभी-कभी कपडों पर प्रेस करके पाँच--पचास रुपए कमा लेता है जो उसकी ठर्रा की बोतल में ही चले जाते हैं । और घरों में कपडे धोकर गुजारा करने वाली लीला दो हजार के लिये 'बस' कह रही है ?बच्चों को सरकारी स्कूल में क्यों नही पढाती जहाँ कोई फीस नही है अगर है भी तो बहुत कम । खाना ,किताबें ,यूनिफार्म तथा छात्रवृत्ति अलग मिलती है । लेकिन ग इतने सालों के अनुभव से जान चुकी है कि जो लोग बच्चों के भविष्य के प्रति सजग हैं ,वे सरकारी स्कूलों की बजाय प्राइवेट स्कूलों में भेज कर और बच्चे को "ए फार एप्पल" रटते देख उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त ( या भ्रमित ) होजाते हैं । लीला भी उन्ही में से है । हालांकि यह लोगों का व्यक्तिगत मामला है । लेकिन ग चूँकि बात की तह तक जाकर देख-समझ चुकी है इसलिये उसे यह खर्च बिल्कुल अनावश्यक लगा । इसलिये एकदम हाँ नही कहा । 
"दीदी आपके लिये कोई बडी बात नही है । मुझे पता है कि आप मना नही करोगी और यह न सोचें कि मैं ऐसे ही ले रही हूँ "--लीला ग को चुप देखकर याचना के स्वर में बोली--
"चाहें तो कपडे धुलवा लेना नही तो तीन-चार किश्तों में पटा दूँगी ।" 
ग ने एक माँ को देखा । माँ के पीछे खडे दो बच्चों को देखा और बच्चों की आँखों में मासूम सवाल देखे और पाँच-पाँच सौ के चार नोट लाकर रख दिये । 
"तो दीदी कपडे धो दिया करूँगी ?"
"लीला मैं अपने कपडे तो किसी से धुलवाती नही हूँ हाँ तुम चाहो तो आयुष के कपडे धो दिया करना । कालेज व पढाई के कारण उसके पास समय नही रहता । इस तरह तुम्हें भी आसानी होगी --ग ने कहा ।
रोज आऊँ या एक दिन छोड कर । क्या है कि रोज तो कपडे निकलेंगे नही ।
रोज न सही एक दिन छोड कर आजाना  लेकिन उसमें लापरवाही मत करना ।"
कैसी बात करती हो दीदी । मेरा काम देख लेना तब कहना । लीला ने उस दिन तो मन लगाकर कपडे धोए । 
इस बात को पाँच महीने बीत गए । इन पाँच महीनों में लीला पच्चीस दिन भी कपडे धोने नही आई । और जब भी आई कपडों को ऐसे ही कूट-पखार कर डाल गई जैसे कोई मुसीबत टालता है । इस बीच ग को खुद ही कपडे धोते और लीला के साथ लगभग इसी तरह के संवाद करते--करते आधा वर्ष निकल गया-
"लीला ,आयुष कह रहा था तुम कालर वगैरा ठीक से साफ नही करती । बहन जरा ठीक से ....।" 
"नही दीदी ,मेरे धुले कपडों को कोई ऐब नही लगा सकता ।" ---लीला बीच में ही बोल पडती है ।
"लेकिन मैंने खुद देखा ।"
"तो रह गया होगा । वैसे मैं तो...।" 
"अच्छा छोडो  ,कल तुम  क्यों नही आई ? रात भर कपडे पडे रहे दूसरे दिन बदबू आने लगी तब मैंने ही धोए जबकि एक दिन छोड कर आने का तय हुआ था न । मैंने इसी भरोसे कपडे पाउडर में भिगो कर रखे थे ।"
"रखे होंगे दीदी ,लेकिन  हुआ यह कि मैं बहन के लडके की 'बड्डे' में चली गई थी ।" 
"बड्डे में ?"---एक बार तो ग के अन्दर गरमाहट आई । जन्मदिन मनाने के लिये काम ही छोड दिया । लेकिन तंगहाल स्त्री से क्या कहे, संयम रखते हुए कहा --"बर्थ डे तो शाम को मनाया होगा लीला । कपडे तो दिन में धुलने होते हैं ।"  
"मैं तो दिन में आई थी पर तुम्हारा ताला लगा था ।"
"उफ्..." ग के अन्दर इस बार उबाल सा उठा । वह कितनी बार बता चुकी कि सवा दस बजे मैं हर हाल में स्कूल निकल जाती हूँ  और आयुष भी ।लीला, नौ सवा नौ तक कपडे धो जाया कर । इसके बाद आएगी तो ताला तो मिलेगा ही ।
"तो क्या करूँ दीदी उसी समय बोरिंग आती है । और उसी समय एक घंटे के लिये लाइट भी रहती है । फिर कटौती होती है । उस समय रोटी न बनाऊँ तो दिन भर भूखे रहना पडेगा कि नही ?"
"तो खाना हीटर पर ही बनाती है ? चूल्हा या गैस .?"..
"अरे दीदी ! जब मुफत में काम चल रहा है तो गैस खर्च क्यों करे ? और लकडी तो बाबा के मोल आ रही हैं । बिजली तो 'डारैक्ट' मिल जाती है । कोई खरचा नही ..।"
"लेकिन दूसरे घरों में भी तो  सुबह समय से काम कर जाती हो । तभी कुछ देर के लिये मेरे यहाँ भी आ सकती हो कि नही ?" रोज तो नहीं न आना ..।
"आप कह तो सही रही हैं पर..।"
"सोचो लीला मुझ पर क्या बीतती है जब स्कूल से लौटकर बाल्टी भर कपडे धोती हूँ ।" ---ग बेवशी भरे लहजे में कहती है । रुपए जो फँस गए हैं ।दो हजार इतने कम भी नही होते कि भुला दिये जाएं । और लीला लौटाने में असमर्थता जताए तो भुलाए भी जा सकते हैं । 
"सो तो है दीदी पर सब मजबूरी कराती है ।--लीला पर कोई असर नही होता ।बडप्पन से कहती है -- "अब देखो, आज मैं मजबूर न होती तो क्यों घर-घर भटकती फिरती ? क्यों तुम इतना कह लेतीं "
"मैं ??"...अब ग का धैर्य टूटने लगता है ---"मैंने तो अभी कुछ कहा ही कहाँ है । यह तो चोरी और सीनाजोरी वाली बात होगई ।"   
"हे भगवान अब तो चोरी भी लगा रहीं हैं दीदी ! हम गरीब जरूर हैं पर किसी का सोना पडा रहे देखते तक नही हैं । कहलो दीदी । हमें तो भगवान ने सुनने के लिये ही बनाया है ।" 
"बकवास बन्द कर लीला और अपने घर जा । गलती की जो ...।"  ऐसे में ग पूरी तरह आपे से बाहर होजाती है। 
"जा ही तो रही ही हूँ दीदी ,गुस्सा काहे हो रही हैं ।"
लीला आराम से चली जाती है और ग' संयम खो देने की ग्लानि से भर जाती है । उसे काम लेना ही नही आता शायद । उसे अपनी तरह ही अपना काम समय पर और सही ढंग से करने वाले लोग ही पसन्द हैं । अगर देर होती है तो वह कैसे अपना टिफिन लिये बिना स्कूल चली जाती है । भूखा रहना मंजूर है प्राचार्य की डाँट सुनने की बजाय । लीला चाहे तो समय पर आराम से काम कर सकती है । वह भी सप्ताह में तीन दिन ही तो आना है लेकिन उसे मालूम है कि यह काम वह रुपए चुकाने के लिये कर रही है रुपए तो मिलेंगे नही । उसे लीला पर नही उसके तरीकों और सोच पर गुस्सा आता है । आते ही पहले तो आदेश सा छोडती है --"दीदी जरा बढिया सी चाय तो बनादो ।" 
चाहे वह स्कूल के लिये तैयार हो रही हो ,चाय बना ही देती है । खाने-पीने की चीजों के लिये वह वशभर नही टालती । 
पर लीला कपडे भी ऐसे धोती है मानो कोई बहुत बडा एहसान कर रही हो । वह भी लगातार बडबडाते हुए---"यह शर्ट का कालर कितना चीकट हो रहा है । यह टीशर्ट तो साफ ही नही होती कितना ही रगडो । दीदी जींस के लिये गरम पानी दिया करो । अरे इतने कपडे कहाँ से इकट्ठे कर लिये ?"
"लीला पूरे सप्ताह बाद बाद आएगी तो कपडे तो मिलेंगे न ! तुम तो एक दिन छोड कर आने वाली थी न ?"
"अब आप तो सब कहती हो , पर मुझे भी तो सहूलियत देखनी पडेगी ।" 
सहूलियत...अब ग का धैर्य टूटने लगा है । नानी कहती थी --आस पराई जो करे जीवत ही मर जाय..। महज रुपए वसूलने के लिये लीला के भरोसे ऐसे वह कब तक खुद को जलाती रहेगी । उससे कोई सहारा तो मिलने से रहा । ना , अब नही । इससे तो अच्छा है कि वह अपना काम खुद करलो । 
"कितने रुपए कट गए दीदी ? लिखती रहना । मैं तो भूल जाती हूँ ।"--एक दिन लीला ने पूछा तो 'ग' ने आखिर कह ही दिया---"जितने कटने थे उतने कट गए मेरी माँ । अब मुझे बख्श दे । जो बाकी रह गए हैं उन्हें चाहे तो देना नही तो मेरी तरफ से बच्चों के लिये भेंट समझ लेना ..। अब मैं कपडे खुद धो लिया करूँगी ।"
"आपकी मर्जी दीदी मैंने तो मना किया नही ।"  --लीला जैसे मुक्त होकर बोली । ठीक ही तो है उसने खुद मना कहाँ किया । हाँ 'ग 'से करवा लिया । 
और इस तरह पैसों से हाथ धोकर अब 'ग 'कपडे खुद ही धोरही है ।


Monday, September 16, 2013

मातृभाषा --शिक्षा का सही माध्यम

14 सितम्बर ( हिन्दी-दिवस) 
--------------------------------------
भाषा और शिक्षा 
भाषा अभिव्यक्ति का सबसे उपयुक्त और सशक्त माध्यम है । किसी भी व्यक्ति का बौद्धिक विकास, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना की समझ ,विचार ,दृष्टिकोण एवं जीवन--दर्शन उसकी भाषा से ही निर्धारित होता है । भाषा कोई भी हो वह आन्तरिक विकास के द्वार खोलती है । ज्ञान दृष्टिकोण , और अनुभव के विस्तार को व्यापक बनाती है । 
भाषा महज एक विषय नही ठोस आधार है जिस पर शिक्षा का भवन खडा होता है । धरती है जिस पर ज्ञान की फसलें लहलहातीं हैं । इसलिये  जहाँ तक शिक्षा व ज्ञानार्जन का प्रश्न है ,माध्यम के रूप में ऐसी भाषा होनी चाहिये जो सहज ही आत्मसात् होसके । 
मातृभाषा ही शिक्षा का सही माध्यम 
एक सात साल की बच्ची याद कर रही थी --"द सन राइजेज इन द ईस्ट । द सन् राइजेज....।" चार-पाँच बार रटने के बाद वह अचानक माँ से पूछ बैठी --"इसका मतलब क्या होता है मम्मी ?" 
मैंने कहा---"इसे अब तुम ऐेसे याद करो--'सूरज पूर्व में उगता है' ।" 
"इसमें याद क्या करना । वो तो मुझे पता ही है ।"-- बच्ची तपाक् से बोली । 
इसी तरह एक दिन एक प्रसिद्ध कान्वेन्ट के सातवीं कक्षा के एक छात्र से प्रसंगवश ,जैसी कि आमतौर पर शिक्षक की आदत ( अच्छी या बुरी ) प्रश्न करने की होती है, मैंने पूछा ---
"पृथ्वी पर कितने महासागर हैं ?" वह मेरी ओर देखने लगा फिर बोला--"क्या ,कितने हैं ?"
" बच्चे की उलझन सही है "--मुझे याद आया । अच्छे माने जाने वाले अंग्रेजी स्कूलों में हिन्दी में समझाना तो दूर हिन्दी बोलना तक वर्जित है । जब बच्चा प्रश्न ही न समझेगा तो उत्तर कैसे देगा । "हाउ मैनी ओसन्स ऑन द अर्थ ?" जब मैंने पूछा तो उसने तुरन्त कहा-- 
"ओ ,ऐसे पूछिये न ! देअर आर फाइव ओशन्स ऑन द अर्थ ।" 
"शाबास । तो बताओ ओशन के बारे में क्या जानते हो ?" 
"यह ओसन होता क्या है ?" --मेरे इस सवाल पर वह बगलें झाँकने लगा । जाहिर है कि उसे समुद्र के बारे में कुछ मालूम ही नही था ।
इन दोनों उदाहरणों में से पहले में दूसरी भाषा के माध्यम से पढाई करने की कठिनाई का सच है । और दूसरे में छात्र में पढने व रटने की क्षमता तो है पर समझ का अभाव है । इसमें शिक्षक की सही भूमिका की कमी तो है ही लेकिन जहाँ रटा कर कोर्स पूरा कराने की विवशता हो वहाँ समझाने की गुंजाइश ही कहाँ होती है ?
 विषय को पढ़ना और विषय को समझते हुए पढ़ना बिल्कुल अलग बातें हैं । लिपि याद करने पर किसी भी भाषा या विषय को पढा़ तो जासकता है लेकिन समझते हुए पढ़ना मातृभाषा में जितना सहज व सरल होता है अन्य भाषा में नही । अन्य भाषा के माध्यम में वही ज्ञान काफी श्रमसाध्य होजाता है जो अपनी भाषा में सहज ही आत्मसात् होता है ।
यही कारण है कि विश्व के लगभग सभी देशों में अपनी भाषा को प्राथमिकता दी जाती है । रूस में तो एक कहावत भी बद्दुआ के रूप में प्रचलित है जो मातृभाषा के महत्त्व को बड़ी गंभीरता से व्यक्त करती है----"अल्लाह तेरे बच्चों को उस भाषा से वंचित करे जिसमें तू बोलती है ।" 
सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर जी ने भी कहा है कि व्यक्ति मातृभाषा में ही अच्छी तरह सीख समझ सकता है । क्योंकि वही हमारे हदय के सर्वाधिक निकट होती है । मातृभाषा में ही व्यक्ति पूर्णता व सच्चाई के साथ स्वयं को व्यक्त भी कर सकता है । 'गीतांजली '(गुरुदेव) 'रामचरितमानस ','गोदान' जैसी विश्व-प्रसिद्ध कृतियाँ मातृभाषा में ही लिखी गईं हैं ।
वास्तव में मातृभाषा कब अनायास ही हमारे व्यक्तित्त्व का हिस्सा बन जाती है पता नही चलता । उसमें पारंगत होने के लिये अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता नही होती । इसलिये आवश्यकतानुसार भाषा कोई भी सीखें ,लेकिन शिक्षा के लिये मातृभाषा ही सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है । 
अंग्रेजी माध्यम का सच--
ज्ञान व सारे तथ्य तो एक ही होते हैं चाहे उसे अंग्रेजी माध्यम से सीखें या हिन्दी माध्यम से या किसी अन्य भाषा के सहारे । महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें किस माध्यम से आसानी से आत्मसात् किया जासकता है । जब गन्तव्य तक पहुँचने का  सही ,आसान व छोटा रास्ता हमें मालूम हो तो लम्बे और कठिन मार्ग से जाने की जरूरत क्या है । डा. प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा है कि,---"अँग्रेजी माध्यम में छात्रों का अधिकांश समय तो अधकचरी रटन्त में ही नष्ट होजाता है । यही समय व शक्ति ज्ञानार्जन व योग्यता विस्तार में लगाई जाए तो उनका कितना गुणात्मक विकास होगा ।" सही तो है । पेट भरने की चिन्ता में लगे लोगों के लिये चिन्तन व सृजन की बातें बेमानी ही हैं ।  
अंग्रेजी माध्यम के विस्तार का कारण कुछ लोगों ,बल्कि अधिकांश लोगों का यह विचार है कि इससे  अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार होजाता है जो आज की सर्वाधिक आवश्यकता है । आज शिक्षा पर भी बाजारवाद बुरी तरह से हावी है । वैश्विक उदारवाद की अवधारणा के बीच विदेशी प्रभाव और नियंत्रण के कारण लोगों का यह विश्वास दृढ होगया है कि अंग्रेजी ही अच्छी नौकरी मिलने व उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है । विकास का पर्याय है । 
यह बात  सच है भी तो कुछ ही हद तक सच है । पूरा सच नही । पहली बात तो यह कि शिक्षा का पहला उद्देश्य ज्ञानार्जन है जिसके लिये अंग्रेजी माध्यम ( न कि अँग्रेजी भाषा-ज्ञान ) अनावश्यक है । दूसरे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और तकनीकी क्षेत्रों को छोड दें तो अँग्रेजी के बिना भी योग्य व शिक्षित व्यक्ति नौकरी भी कर रहे हैं और सन्तुष्टि व आत्मसन्तोष के साथ । आखिर कम्पनियाँ ही तो  देश को नही चला रहीं । चीन, जापान ,रूस और फ्रांस जैसे अनेक विकसित देश हैं जहाँ अपनी भाषा ( अँग्रेजी नही ) के बल पर उन्नति हुई है । 
चलिये , मान भी लें कि अंग्रेजी आवश्यक है  ही ,तो कौन कहता है कि मातृभाषा में पढ़ कर शिक्षित हुआ व्यक्ति अंग्रेजी में पारंगत नही हो सकता । बल्कि अधिक सरलता से हो सकता है । और हुआ भी है । डा. अब्दुल कलाम, डा. कृष्ण कुमार जैसे असंख्य उदाहरण हमारे देश में मौजूद हैं । तथ्य यह है कि जो छात्र पहले हिन्दी में ( अपनी मातृभाषा में ) संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण ,वाक्य आदि समझ चुके होते हैं वे नाउन ,प्रोनाउन ,वर्ब, एडजेक्टिव आदि बड़ी आसानी से समझ लेते हैं और याद कर लेते हैं । हम लोग विद्यालय में हिन्दी निबन्ध-लेखन ,शुद्ध व सुलेख-लेखन जैसी प्रतियोगिताएं कराते रहते हैं । मुझे यह देख कर सुखद आश्चर्य होता है कि विजयी प्रतिभागी अधिकतर अँग्रेजी माध्यम वाले  भी वे ही छात्र होते हैं जो अपनी कक्षा में हर विषय में शीर्ष पर हैं । यानी जिनकी हिन्दी अच्छी है वे ही अँग्रेजी में भी आगे हैं । 
हाँ अँग्रेजी माध्यम से संवाद-शैली और तौर-तरीके में अवश्य परिवर्तन आता है (वह भी केवल अच्छे स्कूलों में ) जो छात्र को 'कॅान्फिडेंस' और 'एडवांस' होने का अहसास अवश्य देता है लेकिन उसका ज्ञान से क्या सम्बन्ध ? ज्ञान तो स्वतः आत्मविश्वास का पर्याय है  क्योंकि ज्ञान  व्यक्तित्त्व को  विस्तार देता है . अतः बार-बार यह कहने की आवश्यकता नही कि ज्ञान का विस्तार अपनी भाषा के माध्यम से ही ज्यादा सहज सुलभ होता है । 
वास्तव में जब हमारा परिवेश हिन्दी का है तो शिक्षा अंग्रेजी में क्यों ? 
इससे भी एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भाषा और संस्कृति  का साथ अभिन्न होता है हम जिस भाषा को अपनाएंगे  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हमारी जीवन शैली  और विचार भी वैसे ही बनेंगे  . इसीलिये  भारतेन्दु जी बहुत पहले ही कह गए कि -"निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नति कौ मूल .."
अँग्रेजी माध्यम के प्रसार के पीछे यह तथ्य भी सर्वमान्य बन गया है कि हिन्दी माध्यम वाले स्कूलों में अच्छी पढ़ाई नही होती । अगर यह सच भी है तो इसमें शिक्षकों व दूसरी व्यवस्थाओं का दोष है हिन्दी माध्यम का नही । अँग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में माध्यम की कठिनाई के कारण अधिक श्रम करना पडता है ज्ञान के विस्तार के लिये नही ।  
जितना श्रम शिक्षक व छात्र अँग्रेजी माध्यम में करते हैं उससे आधा भी जहाँ हिन्दी माध्यम में करते हैं वहाँ शिक्षा व ज्ञान निश्चित ही शिखर पर देखा जासकता है । 
उल्लेखनीय है कि  यहाँ अँग्रेजी भाषा का विरोध नही है ।  भाषा कोई भी हो वह हृदय और मस्तिष्क के कपाट खोलती है . व्यक्तित्त्व  का विकास करती है .  भाषा का महत्त्व तो स्वयंसिद्ध है . लेकिन यह  भी निर्विवाद है कि शिक्षा का सर्वोत्तम माध्यम मातृभाषा ही है ।