Wednesday, December 31, 2014

घर-वापसी

नववर्ष की हार्दिक शुभ-कामनाएँ 
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एक दिन अचानक ही ऐसा हुआ था कि अपनी ही दुनिया में डूबे रहने पर हमें बडा अफसोस होने लगा था ।
अफसोस यूँ कि न तो हमें यह पता रहता था कि हमारे ही कार्यालय के श्रीमान ग कब कैसे रिश्वत लेते हुए पकडे गए । न यह कि पडोस की श्रीमती क ने ननद के घर जाते हुए कौनसे रंग की साडी पहनी थी जबकि वे मुझे खुद आकर अपना ( उनका ) घर को देखते रहने की कह कर गईँ । श्रीमती सप्रे एक दिन इस बात पर बड़ी नाखुश हुईं कि तारीफ तो दूर हमने उनके नए टाप्स देखे तक नहीं ..
हाल यह कि जिसे देखो हैरान होकर सवाल उछाल देता कि अरे ,तुम्हें यह भी नही पता कि शिक्षा मंत्री बदल गए । कि सात परसेंट डी. . बढ गया । कि अरे आपकी करेंट नालेज तो बहुत ही वीक है । द्विवेदी तो कबके भोपाल चले गए । अब संयुक्त--संचालक तो अहिरवार जी हैं । वगैरा ..वगैरा ..
अक्सर यह भी होता कि अखबार वाले का बिल दो बार अदा कर दिया जाता तो दूध वाले पर दुबारा पैसे माँगने का सन्देह होजाता...। 
अफसोस यों भी कि जहाँ लोग ताजी सामयिक रचनाएं सुना-सुना कर वाहवाही लूट रहे थे वहीं हम दिल का रोना ले कर बैठे थे । सिर्फ यादें जो कभी रुलातीं थीं कभी बहलातीं थीं हमारी हमराज थीं और प्रतीक्षा जो दाँत में फँसे तिनके की तरह हर समय हमें टीस का अहसास कराती व्यस्त रखती थी ,एकमात्र सम्बल बनी हुई थी । तीन-चार सौ गीत—कविताएँ लिख डालीं पर सब स्वालाप से सिसकते हुए । पन्त जी को लिखना नहीं था कि वियोगी होगा पहला कवि....
दिल की दुनिया में एक झंझट थोड़ी है !
हमें यह भी खेद हुआ कि एक फटेहाल स्त्री को हाथ पसारते देख कर विकल होने की बजाय हम गुलमोहर के चटक लाल फूलों और एक मीठे से अहसास में एक रिश्ता जोडने में लगे रहते थे । कचनार के फूलों पर मँडराती तितलियों के साथ विचरते हुए हमारा  खालीपन का अहसास जाग उठता था और बादलों की छाँव में सुस्ताते हुए बारिश जैसे सपने देखने लगते । 
धत् ...निराला या नवीन ऐसे ही तो कालजयी कवि नही बन गए . उन्होंने भिखारी की पीडा को समझा था । गुलाब के फूल को प्रेम का प्रतीक कहने की बजाय पच्चीस लानतें भेजी थीं कि अबे सुन बे गुलाब ...।
नवीन जी ने आदमी को जूठी पत्तल चाटते देख खुद सृष्टि के रचयिता ‘जगतपति’ को कोसा ही नहीं बल्कि मृत घोषित कर डाला । इसे कहते हैं हौसला . एक हम थे कि घोर प्रगतिवादी युग में छायावादी राग आलाप रहे थे । आत्मा को एक दिन जगाना तो था ही । सो जाग गई. वैसे भी यह रिश्ते नाते ,दिल विल ,प्रेम-व्रेम सब फरेब है । छल और धोखा है अपने आप से । कुत्ते का हड्डी चबाने जैसा सुकून भर ।
हमने खुद को समझाया कि हे मन कूप-मण्डूक रह कर दिवास्वप्न देखना बन्द कर । बाहर की दुनिया से जुड । साथ ही  हमने यह भी किया कि दिल की दीवार से तस्वीरे मुहब्बत को एक तरफ उतार कर रख दिया । और तमाम खिडकी झरोखे खोल दिये । साहित्यकारों के बीच जगह बनाने के लिये सामयिक भी तो होना था ।यही तो है जागरूकता की निशानी .
सामयिक होने के लिये सबसे कारगर तरीका है अखबार पढना और समाचार देखना । सो अखबार जिसे पहले पडोसी द्वारा पढ लिये जाने और उन्ही से खबरें सुनने पर ही पैसा-वसूली का बोध होजाता था ,खुद अक्षर-अक्षर पढने की आदत डालने का पक्का निश्चय किया ।
तभी मुझे जानकारी हुई कि चाय के साथ अखबार का बडा गहरा और अभिन्न रिश्ता है । मेरे एक परिचित हैं ,पूरा एक घंटा अखबार पढने में लगाते हैं शायद इसीलिए उनका परिवेश ज्ञान अद्भुत है ।
सो इधर टी.वी. पर इंडियन-आइडल ,सारेगामा , साराभाई और एफ.आई आर जैसे कार्यक्रम देख कर बाग-बाग होने की बजाए हमने गहन गंभीर होने के लिये समाचार चैनल खोल लेने का संकल्प लिया । 
लेकिन हो यह रहा है कि सामयिक होना काफी तकलीफदेह लगने लगा है ।
एक तो मन को आराम से बैठकर अतीत की जुगाली करने की भयंकर आदत पड़ी हुई है . हर मुश्किल को नजरंदाज करने का यह एक अचूक उपाय है . लेकिन सबसे बड़ी वजह यह कि अखबार आँगन में रोज हताशा और अविश्वास का कचरा उँडेल देते हैं । जैसे वे समाचार वाहक न होकर म्यूनिसपैलिटी वालों की कचरा वाहक गाडी हो । अच्छाई और ईमानदारी की खबरों से उनका छत्तीस का आंकड़ा है .
भ्रष्टाचार तो खैर अखबार की साँस है पर इन दिनों हत्या ,लूटपाट हुल्लडबाजी और राजनैतिक गन्दगी भी उसकी जान बने हुए हैं । दिल्ली की घटना के बाद तो बलात्कार के समाचारों की जैसे रोज ही रैलियाँ निकल रहीं हैं । कितनी भूख फट पडी है दरिन्दों की ? रिश्तों का कोई लिहाज नही है । बेटे ने माँ का गला रेत दिया । पिता ने बेटी को ही हवस का शिकार बना लिया । कैसे कैसे घिनौने समाचार पढने मजबूर होगए हैं हम । संवेदना मरने लगी है । तमाम घटनाए दर्द नही वितृष्णा पैदा करतीं हैं । कविता दर्द के खेत में उगती है , वितृष्णा और क्षोभ के रेगिस्तान में नहीं . पहले अभिव्यक्ति कमजोर या फालतू ,जैसी भी थी अब पूरी तरह लकवा मार गया है ।
उधर समाचार चैनल तो 'दुर्घटनाओं' का ही दिया खा रहे हैं .  
बुरी घटनाओ पर अच्छी कविता कैसे बने ? हम कोई भवानी प्रसाद मिश्र तो हैं नही कि कुछ भी मिल जाए और एक शानदार कविता बना डाले ।
इधर रिश्ते-नाते ,’प्रनतपाल’ ( झुके हुए का (ही) पालन करने वाला ) और ’दीनबंधु’ ( दीन-दुखी का (ही) साथी) बने हुए हैं . इसे स्पष्ट करने के लिए हमने एक ताजातरीन सिद्धांत खोजा है .हुआ यों कि सुख के सब साथी ,दुःख में न कोय ,वाली बात हमें बहुत पुरानी और व्यर्थ लग चुकी है. (यह बात वैसे अपनों के लिए है भी नहीं) क्योंकि एक लम्बे-चौड़े अनुभव से ज्ञात हुआ कि जब तक आप दीन हीन हैं , असहाय व निरीह हैं ,आपको अपनों से अपनत्त्व मिलता रहेगा ,इधर आपकी आँखों में चमक और होठों पर मुस्कान दिखी तो उधर अपनों के मन में जबरदस्त ऐंठन शुरू कि हाय राम उसके लडके ने तो यह परीक्षा भी निकाल ली ! ..कि अब तो वह घर में भी पांच सौ से कम की साडी नहीं पहनती ....कि अमुक ने इतना बढ़िया मकान बनवा लिया ? जरुर कोई बड़ा हाथ मारा होगा 
वास्तव में आपका सही अपना वह है जो आपकी ख़ुशी को हृदय से महसूस कर खुश हो .इस लिहाज से तो , हमने देखा सदन बने हैं लोगों के , अपनापन खोकर ..(नवीन) का सिद्धांत ही सामने आया है .आसपास यही सब तो देखने सुनने मिल रहा है .
हाल यह हैं कि यह है कि घुटन है , कुढन है , जलन है लेकिन सृजन नहीं है . सो बंधू हमने यही पाया है कि अपने ही ख्यालों की दुनिया में लौटना ही सही होगा .  नम ,सीलनभरी, जैसी भी है अपनी दिल की दुनिया ही अच्छी है . रोना गाना कुछ तो सार्थक निकलेगा. 
इसे आप या कोई भी , पलायनवाद कहे तो कहे . हम तो घर–वापसी की तयारी में हैं पक्का .. .. 
नव-वर्ष आप सबके लिए मंगलमय हो .   

Monday, December 22, 2014

कोहरे में डूबी सुबह


ग्वालियर में इस समय गजब की सर्दी है . सुबह नौ-दस  बजे भी चारों ओर कोहरे की मोटी चादर फैली रहती है . अभी  कही कुछ नहीं दिखाई दे रहा . ऐसे में मुझे अपनी यह लगभग छत्तीस वर्ष  पहले  लिखी कविता को यहाँ देने का बहाना मिल गया .यह भी कि अभी नया कुछ नहीं लिखा सो यही सही .
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अभी जब मेरी पलकों में समाया था कोई स्वप्न .
नीम के झुरमुट में चहचहा उठीं चिड़ियाँ चिंता-मग्न.
अरे अरे ,कहाँ गया वह सामने वाला पीपल ?
कौन ले गया बरगद ,इमली ,नीम ,गुडहल ?.
कहाँ है नीला नारंगी आसमान ?
तब देखकर मैं भी हैरान ,
कि सचमुच नहीं हैं अपनी जगह
दीनू की दुकान 
सरपंच की अटारी और मंगलू का मकान
सामने दिखने वाला  खूबसूरत मानमन्दिर ( ग्वालियर दुर्ग ) कहाँ गया  ?
फैलू की झोपडी पर सेम-लौकी का वितान
धुंध में डूबे हैं दिशाओं के छोर
चारों ओर
सारे दृश्य अदृश्य
सुनाई दे रही हैं सिर्फ आवाजें,
चाकी के गीत
चिड़ियों का कलरव
गाड़ीवाले की हांक
किसी की साफ होती नाक
फैला है एक धुंधला सा पारभासी आवरण
कदाचित्
बहेलिया चाँद ने
तारक-विहग पकड़ने
फैलाया है जाल

या सर्दी से कंपकंपाती धरती ने
सुलगाया है अलाव
उड़ रहा है धुँआ
 .
या आकाश के गली-कूचों में
हो रही है सफाई
या फिर रात की ड्यूटी कर  
लौट रहा है प्रतिहारी चाँद
उड़ रही है धूल .

या फिर ‘गुजर’ गयी रजनी
उदास रजनीश कर रहा है
उसका अंतिम-संस्कार
या कि   
यह धुंधलका जो
फैल गया है भ्रष्टाचार की तरह
किसी की साजिश है
सूरज को रोकने की .
नहीं दिखा अभी तक .

बहुत अखरता है यों
'सूरज' का बंदी होजाना .

Saturday, December 6, 2014

"हमहूँ चुनेंगे सरकार"

नगर निगम चुनाव पिछले दो चुनावों ( विधान-सभा ,लोकसभा ) से इस रूप में अलग था कि कंट्रोल-यूनिट के साथ दो बैलेट–यूनिट मशीनें थीं–एक महापौर के चुनाव हेतु ,दूसरी पार्षद को चुनने के लिए .खास बात यह कि दोनों मशीनों की बैलेट-बटन दबाने पर ही मतदान सम्म्पन्न होना था . पहली बैलेट को दबाने पर हल्की सी बीप आती थी और दूसरी दबाने पर लम्बी .लम्बी बीप एक मतदान पूरा होने का सूचक थी .उसके बिना मतदान पूर्ण नहीं होना था . हमें  जो पोलिंग बूथ मिला वह शहर के एक अत्यंत पिछड़े इलाके में था जहां सुचारू रुप से तो टायलेट की व्यवस्था भी नही  थी हालाँकि वहां शांतिपूर्ण मतदान सम्पन्न होगया, जबकि शहर में कई जगह झगड़ा व हंगामा हुआ .एक वार्ड में तो उपद्रवियों ने पीठासीन अधिकारी तक को पीटा और कंट्रोल-यूनिट को तोड़ दिया . खैर...
सुबह छह बजे चार अभिकर्त्ताओं (अलग-अलग दलों के एजेंट ) के सामने ‘मोकपोल’ (दिखावटी मतदान )  कराया गया .उसके बाद सात बजे से शाम पांच बजे तक मतदान का समय था .
चूँकि अधिकतर मतदाता मतदान की इस नई प्रक्रिया से अनभिज्ञ थे इसीलिए प्रक्रिया उतनी सहज व सुचारू नहीं थी  .मेरे साथ साथ तीनों मतदान अधिकारी भी लगातार मतदाताओं को पार्षद व महापौर के लिए अलग मशीनों में बटन दबाने का निर्देश देते रहे ताकि सही और पूर्ण मतदान हो सके . उस अवधि में हमें लगा कि टेलीविजन के तमाम चैनलों पर इस मतदान की प्रक्रिया का प्रचार होना चाहिए था . मतदान के दौरान इस विषयक कई रोचक व गंभीर प्रसंग सामने आए.
(1)
ठीक सात बजे कक्ष के बाहर मतदाताओं की कतार लग गयी . पहला मतदाता लगभग चालीस वर्ष का जो देखने में शिक्षित व समझदार व्यक्ति लग रहा था ,तीनों मतदान अधिकारियों से अनुमोदित होकर गर्व और प्रसन्नता ( पहला मतदाता होने की ) को सायास छुपाए आया .
महापौर और पार्षद दोनों के लिए वोट देना है .वहां रखी दोनों मशीनों में बटन दबाना है . —प्रशिक्षण में इस वाक्य पर खासा ध्यान दिया गया था वही लगभग सबने दोहराया .
मालूम है .—वह आत्मविश्वास से भरा बूथ के अंदर गया और फुर्ती से एक बैलेट का बटन दबाया .हल्की बीप की आवाज  आई
.आवाज तेज तो नहीं आई —वह उसी बटन को दो-तीन बार दबाते हुए बोला .
अब दूसरी मशीन का बटन दबाओ . बटन दबाते ही एक लम्बी बीप आई .मतदाता ने अपनी सफलता पर खुश होकर कहा-- .अरे वाह यह तो कमाल होगया .नया सिस्टम है . 
(२ )
अरे ओ अम्मा कहाँ जारही हो ? स्याही तो लगवा लो.—मतदान अधिकारी न.३ ने बूढी अम्मा को रोका जो पर्ची लेकर सीधी ई वी एम (इलैक्ट्रिक वोटिंग मशीन ) की और बढ़ी जा रही थी .अम्मा ठिठकी फिर लौटकर स्याही लगवा ली.
अम्मा दोंनों मशीनों में बटन दबाना .
हओ बेटा .—कहकर बुढ़िया ओट में चली गयी .और कुछ ही पलों में बाहर आगई .
अम्मा अभी वोट नहीं हुआ .
ए...! कैसें ना भयो . मैनें तौ बटन दबाई हती .—यह कह कर वह बाहर चलदी .
अरे रुको अम्मा .
काए ?
मैडम आप देखलो---एक नम्बर अधिकारी ने कहा तो मैंने नियमानुसार दो एजेंट अपने साथ बुलाए . यह नियम है . हम अकेले ही किसी मतदाता से मतदान नहीं करवा सकते .साथ एक दो (पार्टियों ) अभिकर्त्ताओं को लेना जरूरी है.
अब बटन दबाओ अम्मा
ए..लो ..
नहीं दबा ...सीटी नहीं बजी .
ए दबाइ तौ रई हूँ -उसने दो तीन बार बटन दबाते हुए कहा .
मैंने देखा ,वह एक ही मशीन के बटनों को दबाए जा रही थी .
अम्मा इस मशीन में तो तुमने वोट डाल दिया .अब वो जो बगल में दूसरी रखी है उसमें दबाओ .
हओ...
लम्बी सीटी बजी तब दूसरे मतदाता को आने दिया .
लम्बी बीप का आना उतना ही सुकून दे रहा था जितना खाना खाने के बाद भरपूर डकार का आना .
(२)    
एक पहलवान टाइप आदमी निकास के रस्ते अंदर घुसा . 
अरे ,इधर से नहीं ,उधर उस दरवाजे से आना है भाई .
क्यों इधर से का दिक्कित है ?
इधर से वोट देकर निकलने का रास्ता है .
अरे कहूँ से आओ जाओ ,का फर्क है! 'मुख्ख' काम है बोट देना सो.. !वह अड़ गया . उसके तेवर कुछ ठीक नहीं लग रहे थे .
चलिए आप उधर जाकर पर्ची दिखादे . कोई विवाद न हो इसलिए मैंने उसे मतदान अधिकारी नं.एक की और जाने को कहा. मतदाता रजिस्टर की चिह्नित प्रति उसी के अधिकार में होती है .
"लाओ पर्ची दो ." 
"ये लो ."--उसने शान से पर्ची दिखाई .
"आपका वोट यहाँ नहीं है ."अधिकारी ने रजिस्टर पलटते हुए कहा .
"यहाँ नहीं है ? मतलब ?"
"मतलब कि इस मतदाता रजिस्टर में आपका नाम नहीं है ."
"मैं तो हमेशा यही वोट डाला है .ध्यान से देखो मेरा नाम ,इसी में है."
"नहीं है भाई.मानते क्यों नहीं हो ?"उसका नाम सचमुच नहीं था. 
"कैसे मानूं ? यह साजिस है विरोधियों की . मेरा नाम हटवाया गया है पर मैं वोट डाले बिना नहीं जाऊंगा .लगभग पैतलीस पार का वह आदमी अड़ गया
"राजवीर भाई , आप ही इन्हें समझाएं नहीं तो बी.एल.ओ को बुलवाओ ."--मैंने एक एजेंट को बुलाया .उसने बताया--
"मैडम इस बार पर्चियों में बड़ा घाल-मेल हुआ है . लोगों के बूथ ही नहीं कही कही तो वार्ड ही बदल गए हैं . कितने ही वोटर पर्चियां लिए भटक रहे हैं ."
जब वहां के 'बीएलओ' को बुलवाया गया तब समस्या का निराकरण हुआ .
इसके बाद वहां नियुक्त आरक्षक को इसका खास खयाल रखने कहा गया कि आने वाला मतदाता इसी बूथ का हो और प्रवेश द्वार से ही प्रवेश करे .
(३)
यह वोटिंग मशीन तो खराब है मैडम —ओमपुरी-स्टाइल में एक नेतानुमा महाशय ने कुछ इस तरह घोषणा की मानो वह मशीन का विशेषज्ञ हो .
"क्या हुआ ?"
"अरे मैडम ,बटन दबता ही नहीं है . एकदम फ्राड है."
कहाँ दबा रहे हो ?"
मैंने देखा तो विस्मय हुआ . वे सज्जन उम्मीदवारों के नाम पर ऊँगली का दबाब बना रहे थे .
महोदय इन नामों के सामने बने ये जो गोल गड्ढे से दिख रहे हैं उनमें दबाना है .
अच्छा ?
(४)
ए बाई नैक बतइयो तौ ,बटन कहाँ दबानौ है –एक अधेड़ महिला ने मुझे बुलाया .
हाँ बोलो .
कौनसा बटन दबाऊ ? कछु समझ में ना आइ रयो .
मैं असमंजस में . मैं कैसे बता सकती हूँ कि कौनसा बटन दबाना है ! मैंने अभिकर्त्ताओं की राय ली .उनहोंने कहा—मैडम आप डलवा दो वो जिस पर भी कहे. 
तुम्हें पार्षद के लिए किसे वोट देना चाहती हो ? धीरे से मेरे कान में बोलदो -मैंने धीरे से पूछा .
दरबज्जे पे.
उपर से पांचवे नम्बर को दबादो ..दबा दिया ? ठीक अब महापौर के लिए ?
पतिंग पे .
देखो , उपर से छठे नम्बर पर है पतंग उसी के सामने का बटन दबाओ..—मैंने जिज्ञासावश देखा तो पाया कि उसने NOTA दबा दिया था और बेशक उसे इसका भान भी नहीं था .
इसके बाद हमने तय किया कि कम से कम ऐसी महिलाओं को हम पूरा सहयोग दें और देना ही पड़ा क्योंकि अधिकांश महिलाएं गलती कर रही थीं .
लेकिन एक महिला ने मुझे दूर से ही टोक दिया—
इधर क्या देख रही हो ?मैं वोट डाल रही हूँ
“ मैं कुछ नहीं कर रही हूँ . मुझे लगा कि आपको सहायता की जरूरत तो नहीं है."
"मुझे सहायता की जरूरत नहीं है .और आप क्यों करेंगी सहायता ? ये गलत है , अवैध है..."
मुझे नसीहत देने वाली वह महिला नियमानुसार तो सही थी लेकिन मैं भी गलत कहाँ थी ? गलत होता दल विशेष के लिए वोटिंग की प्रेरणा देना या दबाब बनाना. बिना हमारी सहायता के तो आधी वोटिंग भी नहीं हो पाती या जो होती वह गलत होती .
प्रमुख राष्ट्रीय दलों के उन अभिकर्त्ताओं ने उस महिला को समझाया तब वह वहां से टली लेकिन मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि कोई मतदाता खासतौर पर महिला इतनी जागरूक है .
काश ऐसे ही सभी मतदाता होते .





Tuesday, November 25, 2014

हिमालय की गोद में --४

26 नवम्बर --
यह वृतांत आप सबके प्रिय प्रशान्त के लिए .
आज पैंतीस वर्ष पूरे कर चुका प्रशान्त ,जो मेरा केवल बेटा ही नहीं है , बल्कि वह माँ , पिता ,मित्र  सब कुछ बनकर  रहना चाहता है .रहता है .उसकी भावनाओं का प्रतिफल मैं दे पाई हूँ या दे पाऊंगी ऐसा मुझे नही लगता . बस दिल से यही आवाज आती है  की उसे वह सब कुछ मिले जो उसकी आकांक्षाओं में है . अनंत स्नेह व शुभकामनाएँ .
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५ नवम्बर
लाचुंग से वापस गंग्टोक
मैम , ‘सेवन-सिस्टर्स’ से ही चलें ?—लाचेन से लौटते हुए जब हम चुंगथांग पहुंचे तो रवि ने परिहास करते हुए सुलक्षणा से पूछा . वहां से गंग्टोक के लिए कोई रास्ता चुनना था .

Spend some time at one of the most picturesque and unique waterfalls in Sikkim
सेवन-सिस्टर्स फाल 
बात यह थी कि आते समय हम ‘सेवेन-सिस्टर्स’ (सिक्किम का एक प्रसिद्ध झरना) वाले रस्ते से आए थे .सुलक्षणा ने इन्टरनेट पर ‘सेवन-सिस्टर्स’ के बारे में काफी अच्छी राय पढ़ रखी थी इसलिए उसी ने रवि को खासतौर पर उसे देखने की इच्छा जताई थी लेकिन ‘सेवन-सिस्टर्स’ वाला रास्ता न केवल कच्चा था बल्कि काफी ऊबड़-खाबड़ भी था . साथ ही शारीरिक व मानसिक थकान देने वाला भी ,लेकिन उससे भी अधिक निराशा-जनक था ‘सेवन-सिस्टर्स’ फाल . वैसे और उससे कई गुना अच्छे बेशुमार झरने हमें आगे रास्ते में मिले थे .
ना भैया , अब कोई दूसरा ही रास्ता देखना . –सुलक्षणा ने कहा तो रवि ने एक हंसी बुलंद की और गाड़ी एक अलग रस्ते पर स्वतन्त्र छोडदी .यह रवि का घर लौटने का उत्साह था या उसके फोन पर बीच-बीच में आरहे संदेशों का प्रबल आग्रह था ,जो दिल कहे रुक जा रे रुक जा, की मनुहार करने वाला ,सघन वृक्षावलियों से सज्जित मनोरम रास्ता भी कार की गति को मंथर बनाने में असमर्थ हो रहा था और  कार अबाध गति से दौड़ी चली जा रही थी . सर्पिल सा रास्ता कभी तीस्ता से बतियाने के लिए नीचे झुकता तो कभी शिखरों को छूने की मंशा से ऊपर की ओर छलांग लगा देता .लगभग छः घंटे की उस फिल्म में लगभग एक से ही दृश्यों—हरीतिमाच्छादित पर्वत-शिखर , शिखरों को तकिया बनाकर जब चाहे आ पसरने वाले मनमौजी बादल , कल-कल करते उछालते-मचलते झरने , भ्रमित कर देने वाले मोड़, पत्थरों व शिलाओं को वाद-विवाद में हराकर जीत की उमंग में इतराती हुई सी निर्बाध बहती तीस्ता-- की पुनरावृत्ति होती रही फिर भी ऊब का कही कोई नाम नहीं .

 कुछ पल ओझल रहकर अचानक सामने या आजू-बाजू में प्रकट हो जाने वाली तीस्ता को देख बरबस ही सावित्री की कहानी याद आती थी कि मनचाहा वरदान देने के बाद भी यमराज जब भी 
तीस्ता-सुकुमारी  

मुड कर देखते सावित्री को पीछे आती हुई देखते थे .हारकर  उसे और एक और वरदान दे देते थे ताकि वह पीछे आना छोड़ दे .
यहाँ पर्वत शिखर भी तीस्ता को अपने साथ अनवरत चलती पाते हैं तो पूछते हैं कि अरे तीस्ता सुकुमारी ! अभी तक साथ चली आ रही हो ? अब क्या चाहिए ? अच्छा ,लो एक और झरना ले लो ..और यह एक नन्ही नदी भी सम्हालो.. बस अब ठीक है ?
पर्वत एक सलोने चंचल झरने को सस्नेह तीस्ता की गोद में डाल देता है .एक उछलती-कूदती नदी हाथ उसके हाथ में दे देता है .तीस्ता फूली नहीं समाती , लेकिन क्या पीछा छोड़ती है ? जहाँ तक  पिता पर्वतराज का स्नेहिल सम्बल मिलेगा उसका बचपन विदा नही होगा . वह वैसे ही इठलाती-इतराती और उछलती–कूदती चलेगी चंचल बालिका सी और सारा स्नेह खुद समेट, पर्वतराज का ह्रदय अशेषकर मानो पूर्ण यौवनमयी होकर ही पिता के घर से विदा होगी . भला तीस्ता के अलावा कोई और उस वात्सल्य का अधिकारी कैसे हो सकता है ! 
रवि ने आज अँधेरा होने से पहले गंग्टोक पहुंचाकर पुरस्कार का ही काम किया .वह यों कि मेरी इच्छा गंग्टोक के बाज़ार को और ठीक से देखने की और वहां की कुछ खास चीजें खरीदने की थी . मान्या की आँखें तो अँधेरा होते ही गंवई रास्ते की तरह उनीदी हो चली थी . सुलक्षणा भी काफी थक गयी थी .उसकी गर्दन में हल्का दर्द भी था .उसे कुछ दवाइयों की जरूरत थी .सो मैं और प्रशांत बाज़ार के लिए निकले लेकिन हमारी पूरी योजना पर तुषारापात होगया जब हमने बाज़ार को एकदम सुनसान देखा .सारी दुकानें बंद थीं . पता चला कि आज सिक्किम के शाही घराने के किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति का देहावसान होगया है .
सिक्किम सन १९७५ में भारत का बाईसवां राज्य बना था .सिक्किम में राजतन्त्र की स्थापना १६४२ में राजकुमार फुन्त्सोंग नामग्याल ने की थी .सिक्किम को शुरू से ही राजनैतिक संकटों का सामना करना पड़ा .कभी नेपाल और भूटान के आक्रमण कभी चीन की स्वार्थपूर्ण दया तो कभी ईस्ट-इण्डिया की दुरभिसंधियाँ . इन सारी मुसीबतों का अंत हुआ १६ मई १९७५ में जब सिक्किम की ओर से आए प्रस्ताव को स्वीकार कर उसे भारत में मिला लिया गया .इस तरह सिक्किम को एक सशक्त संरक्षण मिल गया और भारत को एक बहुत खूबसूरत राज्य . 
    
हाँ.. तो हमने बाजार को बन्द पाया .अच्छा यह था कि एक-दो मेडिकल–स्टोर खुले थे सो कुछ दवाइयाँ खरीदकर प्रशांत और मैं कुछ देर शांत सूनी सड़क पर टहलते रहे. बाजार की तरह ही मन भी नीरव था .जब बाहर सब शांत और नीरव होता है तब मन बोलता है .बीते पांच दिनों की अनुभूतियाँ मन को गुंजित व आलोकित कर रही थीं वहीँ दूसरी ओर आगामी कल के विचार से मन का हाल जल-संकोच विकल भई मीना.. जैसा हो रहा था ,जब हम बागडोगरा से अलग हो जाने वाले थे . प्रशांत व सुलक्षणा वहां से कोलकता ,फिर बेंगलुरु और मैं दिल्ली ,वहां से ग्वालियर .क्योंकि बच्चों से मिलना वर्ष में एक बार ग्रीष्मावकाश में ही हो पाता है इसलिए सान्निध्य के वे पल गुल्लक में सहेजे गए पैसों जैसे लगते हैं .  
६ नवम्बर       .  
जिस समय हमने ‘याबची’ छोड़ा, हिमाद्रि-शिखर कोहरे की चादर ओढ़े उन्निद्र थे लेकिन किरनों ने  सड़कें बुहारना शुरू कर दिया था , तमाम अँधेरा झाड—समेट जाने किस कूड़ेदान में फेंक दिया गया था .सारा शहर जाग गया था .
अब ‘जाइलो’ चक्कर काटती हुई किसी झूले की तरह नीचे उतर रही थी .हमारा मन बहुत सी खूबसूरत यादों को समेटे द्रवित और कृतज्ञ होकर गंग्टोक को अलविदा कह रहा था .

सिक्किम के अंचल में पांच दिन बिताने के बाद पर्वतराज के लिए मन में जो भाव जागा है ,मुझे अपना नाम सार्थक लग रहा है . एक पिता की कठोरता व पौरुष के प्रतिरूप उत्तुंग प्रस्तर-शिखर ,और ह्रदय में अनवरत प्रवाहित स्नेह व करुणा सी अनंत-सलिला नदियाँ ,सतत कर्मशील और ऊर्जा के उपमान झरने .. धैर्य व अनुशासन का अनिवार्य अभ्यास कराते संकरे मार्ग.. एक पिता का ही तो स्वरूप है यह महानगाधिराज हिमालय .
इतने उच्च व महान न सही लेकिन कठोरता व अनुशासन के लिये मुझे काकाजी( मेरे पिता ) अक्सर याद आते हैं . साथ ही वह ‘नदी’ भी, जो कभी मेरे ‘गाँव’ से नहीं गुजरी . वह नदी आज भी मेरे लिए कही दूर टिमटिमाते हुए तारे जैसी है ...खैर..

तीस्ता पर बना एक  खूबसूरत पुल .दांई और भूटान के लिए रास्ता है 
बागडोगरा तक पहुंचाकर रवि ने हम लोगों से विदा ली .इन छह दिनों में वह इतना अपना सा लगने लगा कि उसका लौटना अप्रिय लग रहा था . हालाँकि उसे तो बागडोगरा से एक परिवार को सिक्किम ले जाने का दायित्त्व दो दिन पहले ही मिल चुका था और वह उस परिवार से मिलने में व्यस्त भी हो गया . एक नवम्बर को जब वह हमें लेने आया था तब भी किसी को छोड़ने आया था .हमारे जैसे लोग उसे रोज मिलते हैं .सबसे वह बेशक इसी तरह घुलमिल जाता होगा . लेकिन क्या सबको वह इतनी आत्मीयता से अपनी कहानी भी सुनाता होगा ?
अट्ठाईस-तीस वर्ष का रवि अपनी मां को खो चुका है .रिश्ते के नाम पर अपने पिता को भी .पिता ने उसकी मां के रहते ही दूसरा घर बसा लिया था .माँ ने पिता की इच्छा का विरोध नहीं किया लेकिन विमाता ने उससे व उसकी माँ से एक पिता व पति को हमेशा के लिए दूर कर दिया . कुछ समय बाद माँ चल बसी . एक गहरा ज़ख्म खाकर भी रवि ने खुद ही अपने-आप को सम्हाला . अब वह एक सुशील संगिनी के साथ अपना घर बसा चुका है. हर हफ्ता न जाने कितने दिलों में भी.... हमेशा उन्मुक्त हँसी बिखेरने वाला जिंदादिल रवि हमारी स्मृतियों में भी सदा के लिए बस गया है .
जैसे मिसरिहू में मिली ,निरस बांस की फाँस
बागडोगरा तक के निर्बाध अविरल आनंद में एक अवरोध उत्पन्न हुआ .वह यों कि बागडोगरा एयरपोर्ट पर बोर्डिंग कराते समय पता चला कि मेरी फ्लाईट (बागडोगरा से दिल्ली ) कैंसिल होगई है  अब दिल्ली के लिए जो फ्लाईट मिल रही थी वह न केवल कोलकाता से थी बल्कि लगभग छः घंटे अधिक लेने वाली थी . इसके लिए पहले बागडोगरा से कोलकाता जाना था वहां से लगभग छः घंटे बाद दिल्ली के लिए फ्लाईट थी . इस सूचना को हमने किसी हादसे की तरह सुना .खासतौर पर प्रशांत ने .वह बेहद परेशान हो गया . उसकी परेशानी के पीछे 'स्पाइसजेट' वालों की लापरवाही और खराब सेवा तो थी ही साथ ही कुछ और बातें भी थी जैसे , 
(1)     उस फ्लाईट के ( जो कैंसिल हो गयी थी) दिल्ली पहुँचने के समयानुसार प्रशांत ने ग्वालियर के लिए तीन-तीन ट्रेनों के टिकिट बुक करवा रखे थे ताकि मुझे ट्रेन छूट जाने की चिंता न सताए .लेकिन अब चिन्ताएं बढ़ ही गईं थी .
 नई फ्लाईट का दिल्ली पहुंचने का समय रात के साढ़े ग्यारह था जो मेरे लिए असुविधाजनक था .मुझे बाहर जाने आने का बहुत अनुभव नहीं है .हालांकि  मैं सम्हाल सकती हूँ लेकिन प्रशांत मेरी असुविधा और उससे ज्यादा सुरक्षा को लेकर बहुत ;चिन्तित व तनावग्रस्त होगया---मम्मी एकदम नई जगह पर अकेली इतनी देर कहाँ ,कैसे इंतजार करेगीं .दिल्ली में इतनी रात गए कहाँ जाएंगी ? लेने भी कौन आएगा ? यों तो दिल्ली में कुछ परिचत ,मित्र व रिश्तेदार हैं लेकिन ऐसे में गुडगाँव में बंटी चाचा के अलावा किसी को यह दयित्त्व नही दिया जा सकता .लेकिन क्या उन्हें आधीरात को परेशान करना ठीक होगा ?       
इन बातों का ध्यान कर बस वह स्पाइसजेट के अधिकारियों पर बरस पड़ा--- अगर फ्लाईट कैंसिल होगई थी तो उसकी सूचना देनी चाहिए थी न ?
सर , हमने फोन किया था पर आपका फोन बन्द था .
ऐसे कैसे बन्द था ? कल शाम से फोन बराबर आ रहे हैं .एयरइण्डिया के मैसेज भी तो मिले थे हमें.
आइ कान्ट डू एनिथिंग अबाउट इट सर ..?—वह कुछ लापरवाही से बोला तब प्रशान्त ने सामने वाले को उसी की भाषा में (अंग्रेजी में ) इतना खींचा कि उसने गलती मानते हुए क्षमा मांगी और कोलकता में हर सम्भव मेरी सहायता का आश्वासन दिया . इसके आलावा कोइ चारा भी नहीं था  प्रशान्त फिर भी निश्चिन्त नहीं था .
बेटा ,मैं कर लूँगी . चिंता की कोई बात ही नहीं है . मैं कोई बच्ची हूँ क्या ?—मैंने उसे समझाया—फिर लगभग आधा घंटा बाद तुम भी तो कोलकाता पहुंचने वाले हो . यह तो अच्छा ही है न कि हम कुछ पल और साथ गुजार सकेंगे .
कोलकाता में जब मैं विमान से उतरी ,स्पाइसजेट के दो कर्मचारियों ने मुझे ससम्मान उचित स्थान पर पहुंचा दिया . हालांकि उस सहायता की मुझे जरूरत नहीं थी पर यह प्रशान्त का निर्देश था .मेरे कुछ ‘अपनों’ की तरह मेरा बेटा भी मुझे ‘बच्ची’ ही मानता है न !
मुझे कभी कभी अफ़सोस होता है कि मैं उसे अभी तक अपनी ओर से निश्चिन्त नही कर सकी हूँ . यह मेरी कमजोरी है या उसका गहरा लगाव .या कि शायद दोनों ही .
४.१५ पर उनकी फ्लाईट भी कोलकाता पहुंच गई. मान्या मुझसे दोबारा मिलकर खूब चहक रही थी .उसका मन उस कहानी को पूरी सुनाने का था जो बागडोगरा तक पूरी नहीं हो पाई थी लेकिन उतना समय नहीं था .
बेंगलुरु के लिए फ्लाईट छह-दस की थी और पांच–पचास पर प्रशान्त मुझे तमाम चीजें समझा रहा था—मम्मी ,देखो वहां मोबाईल चार्ज कर लेना..उधर पानी है ..उस तरफ टायलेट है और सुनो ना...वहां खाने–पीने का सामान है ..
जूस बिस्किट ..सब कुछ तो रख दिया है तूने ..अब जा बेटा फ्लाईट का टाइम हो रहा है . सुलक्षणा चिन्तित हो रही होगी .
मम्मी मेरी बात नहीं सुनती हो .—मेरी बात पर वह कुछ खीज उठा फिर समय की कमी देख मानो खुद को समझाते हुए बोला---"ठीक है मम्मी मैं निकलता हूँ . अपना ध्यान रखना ".
 उसकी आवाज की बेवशी मैंने स्पष्ट महसूस की .मेरा दिल भर आया . मेरा पैंतीस वर्षीय बेटा ,'इसरो 'में सीनिअर साइंटिस्ट , एक पिता की तरह मेरा ध्यान रखता है एक माँ की तरह चिंता करता है .उसे यों जाते हुए देख अंदर जमी सारी बर्फ एक साथ पिघल उठी .आँखों से भरभराकर एक धारा उमड़ पड़ी .ऐसे में मुझे सचमुच ही अपने अंदर एक नासमझ सी बच्ची महसूस होती है जिसे संबल और सांत्वना की बहुत जरूरत होती है ,लेकिन तभी मुझे स्थान और परिवेश का ध्यान आया , अपनी उम्र ,पद और समझ की  समझ आई और तुरंत सभ्य लोगों की तरह टायलेट में जाकर आँखें धो आई . 
प्रशान्त-सुलक्षणा बेंगलुरु में घर भी पहुंच गए तब भी मैं कोलकाता एयरपोर्ट पर बोर्डिंग का इंतजार कर रही थी .
साढ़े ग्यारह पर विमान दिल्ली पहुंचा . बंटी भैया ,सोनिया ( उनकी पत्नी ) और पांच साल का बेटा मेरे इंतजार में खड़े थे .बंटी भैया का असली नाम बड़ा क्लासिक है (जो मुझे याद भी नहीं है ) पर उन्हें सभी इसी नाम से जानते हैं . उन्हें भी इसी नाम से पुकारना अच्छा लगता है. वे हमारी छोटी बुआ सास की सात बेटियों के इकलौते भाई हैं . देखने में जितने शांत सौम्य उतने ही विचारों व व्यवहार में आत्मीय और शालीन.


ससुराल में जिन छोटे बड़ों की आत्मीयता मुझे प्राप्त है उनमें ये बुआजी सबसे आगे हैं . कम सुनती हैं . बिना मशीन के बिलकुल नहीं .पर संवादों में कभी कोई कमी नहीं होती . मुझे देख वे खिल उठीं . क्योंकि छह बजे शताब्दी प्रस्थान कर देती है इसलिए गुडगाँव से सुबह पांच बजे निकलना ही था पर यह सुनकर पहले तो वे मानने ही तैयार न थीं पर मैंने अपनी मजबूरी बताई ,तब वे मान गईं. सो हममें से रात भर कोई नहीं सोया . इन छोटी बुआ जी के बारे में कभी अलग से लिखना ही होगा . फिलहाल यही कि ऐसे लोग दुर्लभ  हैं आज के दौर में ..     

Thursday, November 13, 2014

हिमालय की गोद में --3

लाचेन से लाचुंग 
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'गुरुडोंगमार' से लौटते हुए हम सब बहुत थके हुए थे । सिर भारी हो रहा था ,लेकिन आराम करने का अवकाश नही था । 'ईकोनेस्ट'  में दोपहर का भोजन मात्र सब्जी और पनीर के साथ चावल के रूप में मिला । रोटियाँ नही थीं । कारण पूछने पर खाना परोसने वाली छोटी सी लड़की ने संकोच के साथ कहा--"आंटी (गृहस्वामिनी) बाहर गईं हैं सो रोटियाँ बनाने वाला कोई नही है ।"

"कोई बात नही गुड़िया । खाना बहुत अच्छा है ।"--प्रशान्त ने कहा । यह सुनकर लड़की काफी सहज लगने लगी ।  
 मुझे चावल कम पसन्द हैं । सो मैंने कम ही खाया । सफर की दृष्टि से मेरे लिये यह अच्छा ही है । घंटों गाड़ी में बैठे-बैठे विधिवत् पाचन नही होपाता ।
हालांकि उस समय तन-मन दोनों को ही कुछ देर आराम की जरूरत महसूस हो रही थी लेकिन विश्राम की चाह लक्ष्य प्राप्ति में हमेशा ही बाधा बनती है फिर जब रवि ने लेट होजाने पर रास्ते में अँधेरा होजाने की बात भी कही तो फिर रुकने का प्रश्न ही नही था । पहाड़ी जंगलों के अँधेरे ,सँकरे और सुनसान रास्तों पर चलने से अच्छा था कि बिना रुके चल पड़ते ।
लाचेन और गंग्टोक के बीच में 'चुंगथांग' कस्बा है जो लाचेन और लाचुंग नदियों के संगम पर बसा है । 

ये दोनों नदियाँ भी असंख्य झरनों की तरह ही तीस्ता में मिलकर तीस्ता होजातीं हैं । एकता और समन्वय का यह बहुत ही अनुकरणीय उदाहरण है ,जिसका परिणाम है सिक्किम की वादियों को जीवन ,सौन्दर्य व संगीत देने वाली सदानीरा तीस्ता । हल्दी की एक गाँठ रखकर पंसारी बनने का अहं या अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग आलापने की प्रवृत्ति कभी उदार विस्तृत और सुन्दर परिणाम नही दे सकती ।
यहीं से एक रास्ता लाचुंग के लिये जाता है। सिक्किम का यह भाग अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर और विकसित है । पहाड़ ,नदी और झरनों का वैभव तो पूरे सिक्किम में कदम-कदम पर बिखरा है पर इधर सड़कें अधिकांशतः पक्की हैं । जहाँ नही हैं वहाँ बनाई जा रही हैं ।

लाचुंग का विहंगम दृश्य
लगभग 9600 फीट की ऊँचाई पर बसा खूबसूरत पहाड़ी कस्बा लाचुंग उत्तरी सिक्किम का आखिरी जिला है । लम्बाई में बसा यह कस्बा अपनी पूरी सुन्दरता व जीवन्तता के साथ अपने मेहमानों का स्वागत करता है । कस्बा के अन्तिम हिस्से में बने होटल 'फॉर्चूना' में हमारा रात्रि विश्राम था । यहाँ आरामदायक कमरों के साथ खाना भी काफी अच्छा मिला ।
 सुबह सात बजे हम लोग युमथांग घाटी की ओर निकल पड़े । रात में बारिश होगई थी इसलिये युमथांग घाटी में प्रभूत मात्रा में बर्फ बिखरी मिलने की पूरी संभावना थी । और वही हुआ । युमथांग के लिये सड़क अच्छी है सो रवि गाड़ी को और भी उन्मुक्त होकर चला रहा था और साथ ही हमें बताता भी जा रहा था कि वो जो पत्थरों का ढेर है भूकम्प से हुई तबाही की निशानी है । ..ये बुरांश के पेड़ हैं । अगर आप फरवरी मार्च में आते तो पूरी घाटी बुराँश के फूलों से लदी मिलती ..। 
बुरांश की बात चली तो मुझे उत्तराखण्ड के भाई हेमराज बालसखा की याद आई ( जो अब नही है ) भाई हेमराज मुझे बाल-साहित्य की एक कार्यशाला में मिले थे । बहुत ही सरल सहज संवेदनशील रचनाकार होने के साथ अच्छे शिक्षक भी थे । अपने पत्रों में वे अक्सर बर्फ और बुराँश के फूलों की चर्चा करते थे । बुराँश शायद उत्तराखण्ड का राज्य-पुष्प भी है । वहाँ के राज्य शिक्षा-केन्द्र की पाठ्य-पुस्तकों में कक्षा 7 की हिन्दी की पुस्तक का नाम भी बुरांश है । उसी में मेरी एक कहानी भी है । खैर...
युमथांग वैली तक पहुँचते-पहुँचते हम सबका उल्लास उत्तेजना में बदल गया । हिमालय पूरे दल-बदल सहित पत्ते-पत्ते पर आ जमा था । हरे पेड़-पौधे पूरी तरह सफेद थे । सुलक्षणा बार बार 'ओ माइ गॉड' कहकर कहते छोटे बच्चों की तरह चहक रही थी और वही क्यों ,मेरा भी तो वही हाल था । बर्फ की बारिश ने हमें तन-मन सहित पूरी तरह भिगो दिया ।

बेमौसम की बारिश में फसल के लिये हानिकारक होते हुए भी ओलों के लिये मन में जबरदस्त आकर्षण होता है, जो बटोरते बटोरते पिघलकर उँगलियों से फिसल जाते हैं पर यहाँ तो बर्फ का अपार वैभव बिखरा था । जितनी चाहो उठालो । गेंद बनाकर उछालो । सचमुच वह एक अद्भुत अपूर्व अनुभव था । विशेष बात यह कि इसके बावज़ूद वहाँ चुभन वाली सर्दी नही थी ।
लगभग 12000 फीट की ऊँचाई पर स्थित युमथांग-वैली का भ्रमण इस यात्रा का सबसे प्यारा और अविस्मरणीय अनुभव है । इससे प्रशान्त इतना उत्साहित हुआ कि रवि को अतिरिक्त तीन हजार रुपए देकर जीरो-पॉइंट तक चलने तैयार होगया । जीरो-पॉइंट पहले हमारी भ्रमण-योजना में नही था ।

शून्यता ही महसूस होती है यहाँ 
कम से कम 15000 फीट की ऊँचाई पर स्थित जीरो-पॉइंट अपने नाम के अनुरूप शून्य का ही अनुभव कराता है जैसे इसके आगे अब कुछ नही है । चारों ओर बर्फ ही बर्फ । बर्फ के शिखर, बर्फ की चट्टानें ,बर्फ की रेत और बर्फ से ही पिघलकर बहती नीली नदी । 
उस सीमातीत बर्फ के मैदान में अगर चाय-काफी, मैगी ,चाट आदि की दुकानें सजाए , साग्रह बुलाते , जीवन के रंग बिखेरते सस्मित चेहरे न होते तो मुझे वह पॉइंट सुन्दर कम वीरान और भयावह ज्यादा लगता । भले ही मेरी सोच संकीर्ण , भीरु या आध्यात्म तक पहुँचने में असमर्थ है पर वास्तव में मनुष्य-विहीन प्रकृति मुझे लुभाती नही है। 
ऋषि-मुनि हिमालय ऐसे ही दुर्गम और वीरान स्थानों में , कन्दराओं में एकचित्त होकर ईश्वर का ध्यान करते होंगे । हम साधारण लोगों के वश की बात कहाँ ?


शून्य में भी जीवन 
प्रशान्त जब उत्साहित होता है तो अपने साथ सबको खींच लेता है चाहे कोई चाहे न चाहे और उसके साथ मुझे भी किसी परेशानी का अनुभव नही होता । यह मन की बात है । मैंने भी मान्या व सुलक्षणा के साथ बर्फ की रेत अंजुरी में भर कर देखी एक दूसरे पर फेंकी । फोटोग्राफी की । बर्फीले पानी को छूकर देखा । लेकिन शरीर मन का साथ कहाँ तक देता । साँस तो पहले से ही कमजोर बैलों के कन्धों पर बहुत ज्यादा भरी हुई गाड़ी की तरह या प्रतिकूल हवा में किसी तरह पैडल मार कर खींची जारही साइकिल की तरह मुश्किल से आ जा रही थी उस पर हड्डियों तक को जमा देने वाली ठण्डक । मुझ पर अचानक बेहोशी सी छाने लगी । मैं प्रशान्त को बिना बताए तेजी से गाड़ी की ओर आगई । वह मेरी दशा से अनभिज्ञ पुकारता ही रहा --"मम्मी आओ ! देखो कितना अच्छा लग रहा है !"
'मुझे परेशान पाकर वह ज्यादा परेशान होजाएगा' --मैं उसके उल्लास को कम नही करना चाहती थी साथ ही यह भी कि जो भी परेशानी है कुछ क्षणों की है ,यही सोचकर मैं किसी तरह से गाड़ी तक आगई । पर वह सचमुच एक भयावह अनुभव था । एक असहनीय सी बेचैनी । हाथों व पैरों की उँगलियाँ गल नही जैसे जल रही थीं । साँस लेना मुश्किल हो रहा था । 
रवि ने तुरन्त गर्म कॉफी का कप मेरी उँगलियों में थमाया । प्रशान्त-सुलक्षणा भी शायद मेरे इस तरह चले आने के कारण ही गाड़ी पर लौट आए । 
"क्या हुआ मम्मी ?"
"बस थोड़ी सी सर्दी है ।"--मैंने उन्हें निश्चिन्त करने के लिये कहा पर मुझे काफी बेचैनी हो रही थी । सुलक्षणा ने मेरी हथेलियों को रगड़ा । कुछ धूप की गर्माहट भी मिली । कुछ देर बाद मैं सामान्य होगई।

'जीरो-पॉइंट' से लौटते समय एक परिपूर्ण अनुभव के साथ थकान भी थी । यमथांग वैली में सुलक्षणा फिर से कुछ देर और हिमाच्छादित पेड़-पौधों के साथ और बोल-बतियाना चाहती थी ।
"अब बर्फ शायद नही मिलेगी ।"--मैंने कहा पर सुलक्षणा को यह कतई स्वीकार्य न था । बच्चों की तरह मचलकर बोली---"मम्मी ऐसा न कहो । बर्फ तो मिलनी चाहिये । "लेकिन बर्फ सचमुच नही मिली । बारिश के कारण जमी बर्फ को धूप ने धो डाला था । पेड़ धुले-निखरे खड़े थे ।

बर्फ की चादर उतर गई
कुछ ही दूर पर गर्म पानी का स्रोत है । बर्फ के बीच गरम पानी ..है न चमत्कार । अभी तक हमने गौरी कुण्ड के बारे में सुना था कि वहाँ एक कुण्ड में इतना गर्म पानी रहता है कि उसमें चावल पक जाते हैं पर यहाँ तो साक्षात् पानी छूकर देखा । चावल पकने जितना गर्म न सही पर गर्म था ,यही क्या कम विस्मय की बात है । 

युमथांग-वैली और जीरो-पॉइंट हमारे इस सफर के अन्तिम भ्रमण-स्थल थे । अब हमें लाचुंग लौटकर शाम होने तक गंग्तोक पहुँचना था और अगली सुबह बागडोगरा ।

अगली कड़ी में समापन ।