Monday, February 3, 2014

वीरों का कैसा हो वसन्त !

लगभग एक दशक पहले रची गई यह कविता एक आमन्त्रित रचना है जो श्रीमती सुभद्राकुमारी कुमारी चौहान की कविता के प्रत्युत्तर में संस्कार-भारती ग्वालियर द्वारा साग्रह माँगी गई रचनाओं में से एक है । पढने की दृष्टि से इस सपाट सी कविता
को श्रोताओं ने खूब पसन्द किया था  ।
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नवजीवन का संचार करे
मन रोम रोम उल्लास भरे 
नैराश्य निशा का करे अन्त 
वीरों का ऐसा हो वसन्त ।

विकसित हों नए पुष्प पल्लव 

सद्भावों का बिखरे सौरभ 
अंकुर फूटें आशाओं के,
वन-वन हरियाली हो अभिनव 

हर सुबह स्वर्ण संकल्प रचे । 

हर शाम गर्व से नाम लिखे 
आने वाले कल की खातिर 
हर रजनी तुम्हें सलाम लिखे 
पाखण्डों को पतझर दे दो 
कोयल को अपना स्वर दे दो 
श्रम के पलाश वन वन फूलें 
भावों को गुलमोहर दे दो ।
कचनारी होवे कर्मभूमि 
महके शिरीष सा शौर्य नवल 

उत्साह बने अमराई सा 

हो लक्ष्य क्षितिज के पार अमल ।

सागर सा गहरा हो चिन्तन,

विस्तार गगन सा हो अनन्त 
वीरों का ऐसा हो वसन्त ।

प्रह्लाद सा रहे बल साहस ,

आतंक जुल्म की होली में ।
प्राणों में दहके ज्वाला सी 
वह चिनगारी हो बोली में ।
केवल सीमा पर युद्ध नही ,
हर गाँव शहर एक कारगिल हैं ।
पग-पग पर जटिल मोर्चे हैं ,
जन मन निराश भय आकुल है ।
इन मोर्चों पर भी वीरों की 
उतनी ही आज जरूरत है ।
हर व्यक्ति यहाँ सेनानी हो ,
जो मर मिटने उत्साहित है ।
है भ्रष्टाचार अलाल यहाँ ।
और स्वाभिमान कंगाल यहाँ ।
सम्मान विदेशी भाषा का ,
अपनी भाषा बेहाल यहाँ ।
बढती जाती है बेकारी ।
आलस्य अशिक्षा बीमारी ।
है वर्गभेद ,झगडे विवाद ,
और राजनीति में मक्कारी ।
वीरो पहचानो दुश्मन को ,
संघर्ष रहे अविकल जारी ।
जड से उखाड दो अनाचार ,
छल स्वार्थ गुलामी गद्दारी ।
अपनी संस्कृति अपनी भाषा ,
अपना गौरव और मान रहे 
अपने आदर्श न विस्मृत हों ,
अपने बल का अनुमान रहे ।

हो चाह नींव में लगने की ,

ऊँचाई होगी दिक् दिगन्त ।
वीरों का ऐसा हो वसन्त । 
वीरों का ऐसा हो वसन्त।


9 comments:

  1. नींव से शिखर तक का वासंती वीरानुराग। वाह! बहुत सुन्‍दर।

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  2. दीदी,
    आपके अतुल शब्द सामर्थ्य और उनका कविताओं में सन्योजन न केवल चमत्कृत करता है, बल्कि अपनी सहजता (जिसे आपने परिचय में एक सपाट सी कविता कहा है) से मुग्ध करता है. एक दशक के पश्चात भी यह कविता नवीन प्रतीत हो रही है और इसमें जिन-जिन आशाओं और अपेक्षाओं की चर्चा है, हमने कुछ भी प्राप्त नहीं किया.
    दस सालों में कुछ नहीं बदला. बल्कि और बिगड़ा है! फिर भी आशा का दामन थामे हम, आपकी इस श्रेष्ठ रचना के साथ वसंत पंचमी, सस्रस्वती पूजा और वसंतोत्सव का स्वागत करते हैं!

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  3. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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  4. सागर सा गहरा हो चिन्तन,
    विस्तार गगन सा हो अनन्त
    वीरों का ऐसा हो वसन्त ...
    अप्रतिम ... शब्द, भाषा, छंद जे झंकृत करती ओज़स्वी रचना ... सामिजिक माहोल ओर उसके चरित्र की परतों को खोलते हुए ... उस सत्य से भलीभांति परिचय करवाती हुई तेज प्रवाह सी रचना है ... लाजवाब ...

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  5. हो चाह नींव में लगने की ,
    ऊँचाई होगी दिक् दिगन्त ।
    वीरों का ऐसा हो वसन्त ।

    बहुत सुंदर ! जोश भरते हुए भाव ..और ओज भरे शब्द...

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  6. हो चाह नींव में लगने की ,
    ऊँचाई होगी दिक् दिगन्त ।
    वीरों का ऐसा हो वसन्त ।
    वीरों का ऐसा हो वसन्त।

    वाह ओजस्वी भाव एवं शब्द भी ....अद्भुत ...!!

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  7. उत्साह संचालित करती कविता।

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  8. काश ऐसा ही हो वसंत... लजावाब कविता गिरिजा जी...सच मज़ा आगया पढ़कर।

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  9. बहुत खूबसूरत कविता !!! लाजवाब !
    कितने दिन बाद आपके ब्लॉग पर आया हूँ आज....और इतनी सुन्दर कविता पढ़ने को मिली!! अद्दुत!

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