Sunday, May 11, 2014

रहत अचम्भा जानिये ।

सोचा था कि माँ के लिये कुछ लिखूँ ।आधा-अधूरा कुछ लिखा भी लेकिन पोस्ट यह स्मरण हुआ ।
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"ताऊजी ,मैंने सुना है कि आप पहली कक्षा में ही स्कूल छोड आए थे ।"--मैंने एक बार उनसे पूछा --यही नही आपने मास्टर जी की मूँछें भी काट दी थीं ।"
" तो क्या करता । ससुरे मास्टर ने पहले दिन ही ऐसी संटी मारी कि खाल उधड गई थी पीठ की । बस हमने सोच लई कि इसका बदला तो लैना पडैगा आखिर किस गलती पर उसने हमको मारा ।" 
" वह सब कैसे किया ताऊजी ?"
"हमने रात में जब मास्टर जी खर्राटे भर रहे थे कैंची उठाई और चुपचाप उनकी लम्बी-लम्बी 'पूरा' ( घास का गट्ठर) जैसी 'गोंछ' कतर डालीं । सोचा सबेरे की सबेरे देखी जाएगी । " 
"फिर क्या हुआ ?"
"होता क्या अम्मा ने कह दिया लडका पढने भेजा था पिटने नही । हमें ना पढवानों ।"
फिर आगे कभी नही पढे ?"
"अरे बिटिया ,तब जे 'साटीफिकट' नही आदमी का हुनर देखा जाता था । देख आज मैं पोस्टमास्टर का ढोल टाँग कर मजे में चैन की बंसी बजा रहा हूँ अपने बँगला में । कि नही ? ये दोनों ( भाई )पढ लिये बहुत है पर बेटी, जो काम मैं कर सकता हूँ न बाबू ( मेरे पिताजी ) कर सकता है न भैया ( बडे ताऊजी भूपसिंह) । भोपाल मंत्रालय तक में बडे बडे अफसर उठकर हाथ में से बैग ले लेते हैं ।साथ बैठाकर चाय पिलाते हैं और काम तो चुटकियों में कर देते हैं । "
कुछ समय पहले ही ये संवाद हुए थे मेरे अपने छोटे ताऊजी श्री रतनलाल श्रीवास्तव के साथ ,जो आज अपनी जीवन-लीला शान के साथ पूरी कर अपने दोनों भाइयों से जा मिले हैं । 
शाम पाँच बजे यह घटना मामचौन, (मुरैना जिले का एक सुदूर गाँव) में घटी है और मैं ढाई हजार किमी दूर बैठी सजल आँखों और भरे हदय से उन्हें सिर्फ याद कर पा रही हूँ ।
 वे बीमार नही थे । बस एक-दो दिन खाना नही खाया । हम सभी का यह पक्का विश्वास था कि एक बार तो अपनी हेकडी में वे मौत को भी दुत्कारकर भगा देंगे । कहेंगे कि जा री जा , फिर आना । अभी मेरा मन नही है जाने का । लेकिन सच वही है जो कबीरदास ने कहा है ---
" नव द्वारे का पींजरा ,तामें पंछी पौन ।
 रहत अचम्भा जानिये ,गए अचम्भा कौन ।" उसके आगे भला किसी की हेकडी चलती है ?" 
दादी के तीन बेटे थे । सबसे बडे श्री भूपसिंह (किशोर भैया के पिताजी )और सबसे छोटे मेरे पिताजी श्री बाबूलाल । ये मँझले थे और आदतों व विचारों में विरले भी । अनपढ, लेकिन पढे-लिखों की बोलती बन्द कर देने वाले ।
आज़ाद खयाल ऐसे कि विवाह का बन्धन ही कभी स्वीकार नही किया । अपने भाइयों की सन्तानों में ही अपना ममत्त्व बाँटकर सन्तुष्ट थे । वे गाँव के पहले पोस्टमास्टर होने का बाकायदा आत्मसम्मान भी रखते थे । 
 मुझे नही पता कि जनसंघ के एक नेता , जिनके साथ अक्सर वे जाते रहते थे , यहाँ उनकी कितनी पहुँच थी या कि बिना स्कूल में पढे और बिना किसी सर्टिफिकेट के वे पोस्टमास्टर कैसे बने । पर लोगों के बीच उनके रौब और हमारे दरवाजे पर लगी लाल पत्र-पेटिका और सुबह शाम फर्श पर बिखरे रहते कार्ड ,अन्तर्देशीय पत्र और लिफाफे ,रजिस्ट्रियाँ , तार  चपडी ,ठप्पा ,काली स्याही आदि उनकी ताकत और नौकरी का पक्का प्रमाण थे । हम उनके कार्यक्रमों को कौतूहल से देखा करते थे ।  
उनकी बढ चढकर बोलने की आदत थी । बडे ताऊजी और पिताजी को यह जरा भी पसन्द नही था । पर वे इसे अपनी राजसी प्रवृत्ति का जरूरी भाग मानते थे । हम सब ताऊजी की ऐसी शेखियों पर खूब हँसते थे पर कभी शर्मिन्दा भी होना पडता था । जब भी गाँव में अपने घर जाती थी , वे गाँव वालों से मेरा परिचय कराते कहते---" देखो हमारी बेटी , कालेज में लेक्चरार है ।"
"ताऊजी."--मैं शर्म से पानी-पानी होजाती थी --"मैं अभी सिर्फ प्राइमरी की मास्टरनी हूँ । लेक्चरर नही .....।" ( तब मैं प्राइमरी स्कूल में ही थी )
" अरे आज नही है तो क्या , कल हो जाएगी, देखना ।'--वे विश्वास से कहते ---" और पता है, इससे मेरी शान कितनी बढ जाती है ।"
कच्ची लेकिन थोडी बडी पाटौर ( खपरैल) को वे बँगला कहते थे उनका डाकघर भी था और जो हमेशा कन्नौजी इत्र से महकता रहता था । वे उसमें उसी शान से रहते थे जिस शान से उन दिनों जमींदार-जागीरदार रहते थे । जब भी बाहर निकलते थे बडे विशिष्ट व्यक्ति की तरह । नील-टिनोपाल से झकाझक हुए सफेद धोती-कुरता , बालों में ब्राह्मी आँवला तेल ,कानों में 'कदम्ब' या 'काला-भूत' का फाहा और हाथों में चमडे का काला बैग । भले ही उसमें उनके केवल लँगोट-तौलिया ही रखे हों और अपनी कुलीनता के गर्व से भरे सीना ताने झूमती हुई चाल । 
राह चलते जब कोई उन्हें सिर झुकाकर  "लालाजी राम राम" कहता तो वे उसे अभयदान देने की मुद्रा में सिर हिलाकर उत्तर देते थे । उन दिनों फर्श, गैस लालटेन हारमोनियम ,ढोलक जैसी चीजें केवल ताऊजी के बँगला में ही मिलती थीं । और इसका उन्हें बराबर भान था । अपनी कीमत कैसे कायम रखी जाती है कोई उनसे सीखता । 
हम चार भाई-बहिन हालाँकि उनके सान्निध्य में कम रहे । पिताजी कुछ कारणों से हम सबको लेकर घर छोडकर चले गए थे जबकि बडे ताऊजी (जो प्रकृति से कलाकार शान्त और लडाई-झगडों से दूर रहने वाले थे ) की छहों सन्तानें छोटे ताऊजी की छत्रछाया में पलीं । उन सभी पर छोटे ताऊजी की बेबाकी ,ज़िन्दादिली और हर तरह के संघर्ष के लिये तत्पर रहने का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । वे अपने पक्ष के लिये जितने अडिग और मजबूत दिखाई देते हैं , हम लोग नही । छोटे ताऊजी से दूर रहकर हमें उपलब्धियाँ तो मिलीं पर सबसे बडी हानि भी हुई । 
। आज उस पीढी के तीनों ही भाई नही हैं । मामचौन में लालाओं का इकलौता घर छत-विहीन सा होगया है । बँगला अब बँगला नही रह गया । हारमोनियम के सुर टूट गए हैं । दीवारें भुरभुराकर गिर रहीं हैं । आँगन टुकडों में बिखर गया है ।
लेकिन इससे उन्हें क्या । वे तो "जियो तो ऐसे जियो कि सब तुम्हारा है " ,वाली सोच के साथ जिए और उसी फकीराना अन्दाज़ के साथ दुनिया को छोड गए कि दुनिया री अब तू हमारे लायक नही रही । जा रहे हैं । तू भी क्या याद करेगी कि कोई था । 
उनके समग्र व्यक्तित्त्व के लिये मुझे आज ठाकुर रोशनसिंह( काकोरी काण्ड) की पंक्तियाँ याद आ रही हैं---- 
"जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन 
वरना कितने पैदा होते हैं कितने चले जाते हैं ।" 

14 comments:

  1. निराला व्यक्तित्व था उनका भी !

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  2. बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व रहे!

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  3. "जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन
    वरना कितने पैदा होते हैं कितने चले जाते हैं ।

    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    RECENT POST आम बस तुम आम हो

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  4. ऐसे फक्कड़ प्रभावशाली व्यक्तित्व ही अपनी चाप छोड़ के जाते हैं दिलों पर जो जीते जी भुलाई नहीं जाती ...

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  5. बहुत रोचक संस्मरण..उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि..

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  6. यह श्रीवास्तव लोगों का प्रकृति प्रदत्त गुण है. आज ताऊ जी का संस्मरण सुनकर मुझे मेरी अम्मा याद आ रही हैं. बिलकुल ताऊ जी की महिला संस्करण. उनकी इस दबंगई पर हम आज भी यही कहते हैं कि भई हमारी अम्मा श्रीवास्तव हैं, इनसे पंगा न लेना.
    स्कूल में एक बार एक मास्टर ने मेरे भाई को पीटा. दूसरे दिन अम्मा स्कूल पहुँच गयीं, जबकि घर के सारे लोग (हमारे दादा जी और चाचा जी) कहने लगे जाने दो. अम्मा ने स्कूल जाकर मास्टर से यह कबूल करवाया कि उसने ग़लती से पिटाई की थी दूसरे लड़के के धोखे में और जब भरे मैदान में उसने अम्मा से झुककर माफ़ी माँगी तब उन्हें चैन पड़ा. सिर्फ मिडिल पास हैं, मगर रौब अभी भी वही. हमारा सब कुछ "बंगला", खेत, अनाज सब बचा हुआ है सिर्फ उनकी बदौलत.
    आप भी कहेंगी मैं कहाँ अपनी हाँकने लगा. आख़िर में अपने डॉक्टर बच्चन जिन्होंने अपनी आत्म कथा में ख़ुद लिखा है:
    ज़िन्दगी भर मैं कलम घिसता रहा,
    नाल थी मेरी कटी तलवार से!

    ताऊ जी की पावन स्मृति को मेरा प्रणाम!! कहाँ गये वो लोग!!

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  7. वे निश्चित ही ह्रदय सम्राट थे। मृत्‍यु पर वश नहीं अन्‍यथा हमारे ताऊजी जैसे लोग ही हमेशा दुनिया को चाहिए, ताकि नौसिखिए और अकादमिक ज्ञान का खोखला पिटारा सिर पर लादे घूमनेवाले उनसे जीवन का सच्‍चा अौर व्‍यावहारिक ज्ञान सीखने के साथ-साथ अपने पक्षसमर्थन के लिए अडिग और डटे रहने की मूल्‍यवान मनोवृत्ति सीख सकें। ऐसे मानव अधिकार ज्ञानधारी तथा उनके लिए युद्धरत महामना बहुत कम ही होते हैं। उन्‍हें एक बार पुन: हार्दिक नमन तथा आपके सजल नेत्रों के लिए मेरी सम्‍वेदनाएं स्‍वीकार करें।

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  8. ब्लॉग बुलेटिन की ८५० वीं बुलेटिन खेल खतम पैसा हजम - 850 वीं ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  9. प्रभावशाली व्यक्तित्व था ताऊजी का।

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  10. ताऊ जी से दबंग और विशिष्ट शख्शियत वाले लोग आज तो विरले ही हैं.
    हमारे गाँव में भी एक शख़्स थे जिन्होंने जिंदगी मेँ कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा , पर लोग उन्हें मुंशी जी कहते थे. कारण- वे अच्छों-अच्छों को चुटकियों में सबक सिखा देते थे। वे खुद जिंदगी से पढ़े हुए थे.
    ताऊ जी की पावन स्मृति को नमन!

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  11. सच में बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व के इन्सान थे वो....बहुत ही अच्छा संस्मरण लगा मुझे ये !!! मुझे भी याद अचानक आ गए वो सारे कहानियां जो पापा सुनाते हैं दादाजी के बारे में....यहाँ तक की नाना जी की भी कुछ बातें याद आयीं....शायद उन्हें भी कभी लिखूं मैं ब्लॉग पर...:)

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  12. अपने अनोखे ढंग से आपने अपने ममत्व को याद किया...

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  13. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...साथ ही साथ आप की नयी पुस्तक के लिए भी बधाई...
    नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)

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  14. सबसे अच्छी बात कि दबंगई न्याय पाने के लिए ,सिर्फ़ अपनी ही चलाने के लिए नहीं -इसीलिये प्रणम्य भी !

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