Monday, September 1, 2014

"अबे 'होगा' क्यों ? "

बात उन दिनों की है जब मुझे पर्व और त्यौहारों की बड़ी उल्लासमय प्रतीक्षा रहती थी । यह उल्लास बचपन के कारण था या अनूठे उत्सव-आयोजनों के कारण यह पूरी तरह अलग करके तो नही कह सकती लेकिन इसमें कोई सन्देह नही कि उन दिनों हमारे गाँव में हर त्यौहार को मनाने के लिये विशेष तैयारियाँ होतीं थी । चाहे होली हो , दशहरा हो ,कृष्ण-जन्माष्टमी हो या गणेश-उत्सव ।
गणेश-उत्सव के आठ दिनों की झाँकियों की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली जाती थी जिसके निर्माता--निर्देशक ताऊजी ही होते थे । उनके द्वारा तैयार की गई झाँकियाँ अदुभुत हुआ करती थीं । जैसे एक बार उन्होंने कैलाश पर ध्यानमग्न शिव की झाँकी सजाई ।
" शिवजी निराधार बैठे ध्यान मग्न हैं ।( ध्यान रहे कि शिव प्रतिमारूप नही बल्कि सजीव हैं । किशोर भैया से छोटे देवेन्द्र को शिव के रूप में इतनी कलात्मकता से सजाया गया कि देखने वाले मंत्र-मुग्ध हुए देखते ही रह गए थे और लगभग बारह वर्ष के देबू भाई का आँखें बन्द कर घंटों तक शान्त व निश्चल  बैठे रहना भी कम आश्चर्य नही था ) जटाओं से गंग-धार फूट रही है । उनका धरती से स्पर्श केवल फर्श में गड़े त्रिशूल के द्वारा है,जिसे उन्होंने थाम रखा है । चकित दर्शक आजू-बाजू झाँकते हैं कि आखिर शिवजी अधर में बैठे किस तरह है ।"
हर दिन एक नई और अनूठी झाँकी होती थी । कभी भगवान विष्णु के क्षीरसागर-शयन की कभी माखनचोरी की तो कभी खेत में बीज बोते किसान-दम्पत्ति की ।   
आरती व प्रसाद के बाद भजन गाए जाते थे । उन दिनों गाँव में गाँव के ही बहुत अच्छा गाने-बजाने वालों की भजन-मण्डली थी दो-चार लोग बाहर से भी आजाते थे । और श्रोता भी कम रस-मर्मज्ञ नही थे । ताल और मात्राओं की जरा सी गलती पकड़ लेते थे । 
ऐसे ही एक थे बापू ।
 उन्हें गिरवर बौहरे के नाम से नई पीढ़ी का शायद ही कोई व्यक्ति जानता हो । हर कोई उन्हें बापू ही कहता था । बापू बड़े स्पष्टवादी , सरल और सहृदय थे । गोरा तांबई रंग । उच्च ललाट । लगभग पैंसठ-सत्तर वर्ष की उम्र । कसा हुआ शरीर और निश्चिन्त मुखर हँसी । उन्होंने दो-चार किताबें (कक्षाएं) ही पढ़ी होंगी लेकिन मानस-पाठ सुनते हुए वे दोहा--चौपाइयों का बड़ी गहन और व्यापक व्याख्या करते थे । जितनी आसानी से वे अपनी त्रुटि या अल्पज्ञता को स्वीकार कर लेते थे उतनी ही स्पष्टता से वे आलोचना भी करते थे । वे हर तरह के सांस्कृतिक--आयोजनों में श्रोता बनकर बैठना और प्रस्तुतियों की आवश्यक प्रशंसा या आलोचना करना कभी नही छोड़ते थे । आलोचना भी उनकी कम तीखी नही होती थी । यही कारण था कि उनके सामने गाने के लिये लोग गीत-भजनों का चुनाव सोच-समझकर करते थे । एक दिन शर्माजी बड़ी मेहनत के बाद स्वयं एक फिल्मी गीत की तर्ज पर भजन रचकर लाए ।

फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजन बनाने और गाने की परम्परा ने मौलिक ,पारम्परिक भजन व गीतों को विलुप्त सा कर दिया है । जो गीत चल पड़े हैं उन्ही पर किसी भगवान का नाम जोड़कर भजन का नाम दे दिया जाता है । मुझे याद है यह फिल्मी गीतों की तर्ज पर बने भजन मैं बचपन से ही सुनती आ रही हूँ । हालाँकि इसे विस्तार शायद गुलशन कुमार ने दिया और लक्खा जैसे प्रसिद्ध गायकों ने इसे लोकप्रियता की ऊँचाइयों पर पहुँचाया है । 
दूसरे कई लोगों की तरह मैं भी इस परम्परा को ठीक नही मानती क्योंकि कई लोग तो मात्र गीत के मुखड़ें में मनपसन्द भगवान का नाम जोड़कर धड़ाधड़ नए नए भजन बनाकर गाते रहते हैं । महिला-मण्डलियों में गाए जाते गीतों के कुछ उदाहरण देखिये---"हम तो चले आए भोले तुमको मनाने , चाहे तू माने चाहे न माने ।" ( हम तो तेरे आशिक..)
"आज तुम्हारी पूजा का खयाल दिल में आया है इसीलिये अम्बेरानी का दरबार सजाया है ।"( शायद मेरी शादी का खयाल) 
"आई हो मैया मन्दिर में तुम बहार बनके "( आए हो मेरी जिन्दगी में ) 
"मेला लगाsss"( काँटा लगा..,यह तो प्रसिद्ध भजन गायक का गीत है )
फिल्मी तर्ज पर लोग धड़ाधड़ नए नए भजन बनाकर गा रहे हैं । एलबम निकाल रहे हैं । हालाँकि गीत बनाना आसान है जबकि उसे संगीत देना बेशक कठिन काम है । 
इसलिये आसान राह यही लगती है कि फिल्मी तर्ज का इस्तेमाल कर भजन या किसी भी तरह का गीत बना लिया जाय । बड़े-बड़े संगीतकार भी तो कहीं से नकल करके या अपनी ही पुरानी धुनों में जरा सा हेरफेर करके नए गीतों की धुनें तैयार कर रहे हैं । 
हाँ तो शर्माजी एक स्वरचित भजन लेकर आए ।शर्माजी को गाने का शौक है । "गाना आए या न आए गाना चाहिये" , के सिद्धान्त पर चलते हुए वे न केवल हर जगह गाते हैं बल्कि मानते भी हैं कि उनको गाने का पर्याप्त ज्ञान व अभ्यास है । वे औरों से अच्छा गा सकते हैं ,गाते हैं । सो उन्होंने सबसे पहले हारमोनियम अपने हस्तगत किया और दो तीन बार खखारकर गला साफ करते हुए शुरु किया----
"गणपति कीर्त्तन में आना होगा , भक्तों को दर्शन देना होगा ।
मेरा सुन्दर सपना पूरा करना होगा ...।" 
उन दिनों 'जीवन-मृत्यु' का गीत-"झिलमिल सितारों का.", 'बिनाका गीतमाला' में धूम मचा रहा था । 
अब समस्या यह थी कि "सिताsssरों का " कहते हुए लता जी का स्वर-कौशल व माधुर्य कानों में जितना रस घोलता है वहीं "आना होगा " ,में शर्मा जी का कंण्ठ को भीचकर "आना..इ होगा "....कहना दाल में आए कंकड़ की तरह अखर रहा था और ऊपर से गणेश जी पर 'आना होगा' का दबाब..धौंस । बार-बार 'आना होगा' ..'लाना होगा' , 'देना होगा ' जैसे टुकड़ों को सुनते-सुनते बापू अपने आप को किसी तरह नियंत्रित करते हुए बैठे तो रहे लेकिन जैसे ही शर्मा जी उठकर चले गए ,उनका आक्रोश फूट पड़ा----"वाह री गवैया की पूँछ । 'धीय कौ मुरगा' ( बेटी का बेटा । बेवकूफ । हिकारत को व्यक्त करता स्थानीय शब्द। प्रायः बेटी की सन्तान को दूसरे कुल की माना जाता है इसलिये पोते-पोतियों से कमतर भी ) ..."आना होगा "...अरे,  होगा क्यों ?...का भगवान तेरे बाप का कर्जदार है कि तेरा नौकर, जो तेरी धौंस सुनकर दौड़ा चला आएगा ? 
दर्शक हँस हँसकर बेहाल थे पर बापू की भौंहें जो चढ़ी तो फिर दो चार कर्णप्रिय भजन सुनकर ही उतरीं ।
बापू के उस विरोध का ही प्रभाव था कि लोगों ने गीत रचते समय भावों का भी ध्यान रखना शुरु किया ।कई बार ऐसा होता है कि गीत की धुन बहुत ही अच्छी लगती है लेकिन शब्द हर जगह गाने लायक नही होते ।तब भी फिल्मी तर्ज का सहारा ले लिया जाता है ।पर वह कला की कंगाली ही कही जाएगी ।
उसी धारा में बहते हुए मैंने भी दुर्गाजी की आराधना में कुछ गीत लिखे हैं । लेकिन मैंने वे ही गीत चुने हैं जिनके श्रोता अब ज्यादा लोग नही हैं । कम से कम नई पीढ़ी तो नही । जैसे एक पुराना गीत --"तेरे सदके बलम..." मुझे बहुत प्रिय है उसे गाने के लिये मैंने भजन बनाया था--

"मेरे देखो न गुण, रखलो शरण ,
अम्बे सुनलो अब मेरी पुकार ।
आखिरी आसरा तेरा द्वाsssर ...।

टूटी है नैया ,सुन मेरी मैया 
सागर है गहरा अपार ।
उल्टी हवाएं गुम हैं दिशाएं कैसे मैं जाऊँगी पार.. ।।
देखो मैया  जाऊँगी कैसे मैं पा....र । मेरे देखो न ...।

सुख हो या दुख हो ,तू ना विमुख हो 
हर पल रहे तेरा ध्यान 
चलती रहूँ मैं ,गाती रहूँ मैं टूटे न लय और तान ।
अम्ब मेरी टूटे न लय और ता....न । मेरे देखो न गुन..।"
(एक कड़ी और भी है)
शब्दों और भावों के प्रति यहाँ जो चैतन्यता दिख रही है उसके पीछे कहीं न कहीं बापू के उस सवाल " होगा क्यों"  से मिली प्रेरणा भी है । ऐसे लोग अब बहुत कम रह गए हैं ।



5 comments:


  1. भक्ति के उज्ज्वल और विह्वल कर देने वाले संगीत के स्थान जगह जब सिनेमा आदि के गानों में जोड़-तोड़ कर पैच लगाए जाने लगते हैं तब मन में वे तन्मय भाव नहीं जागते - मुझे लगता है ये हृदय से निकली भावनाएँ नहीं उनका दिखाऊ आरोपण मात्र है.

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  2. बहुत रोचक संस्मरण..और भजनों का होता फिल्मीकरण...कल यहाँ गणेश पूजा का विसर्जन कार्यक्रम था, फ़िल्मी गीत धड़ल्ले से बजाये जा रहे थे अब उन पर भजन भी कौन बनाये..

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  3. दीदी! आज तो आपने मेरे अन्दर रुके हुये भावों को (आपके शब्दों में कहूँ तो पॉलिथीन से जाम हुई नालियों की तरह) एक प्रवाह दे दिया!

    1. बापू जी जैसे लोग सही माने में संगीतमर्मज्ञ थे! मैं स्वयम के विषय में यही कहता हूँ कि साहित्य सृजन मेरे बस का नहीं, किंतु अच्छे-बुरे साहित्य की पहचान ही मुझे साहित्य की परख का गुण प्रदान करती है! बापू जी को नमन!!

    2. "इसलिये आसान राह यही लगती है कि फिल्मी तर्ज का इस्तेमाल कर भजन या किसी भी तरह का गीत बना लिया जाय."
    यह अपने आप में एक विवाद का विषय रहा है, दीदी. पुराने समय में एक बड़ा कवि वर्ग यह मानता था कि गीत पहले लिखे जाने चाहिये और फिर उनकी धुनें बनाई जानी चाहिये, जबकि फिल्म उद्योग में धुनें पहले बनती हैं और गीत बाद में लिखे जाते रहे हैं. आज भी यही परिपाटी चली आ रही है. इसीलिये बनी बनाई धुनों पर (फ़िल्मी गीतों की धुनें) भजन बना लेना लोगों को आसान लगा.
    हालाँकि यही कठिन परीक्षा भी होती है रचनाकार के लिये. आपके समान रचनाकार हो तो जो रचना जन्म लेती है वो आपके इस पोस्ट की शोभा बढ़ा रही है और अधकचरे रचनाकार जो गीत रचते हैं वो है - भोलाs भोलाss भोलाsss!! आयाs आयाss आयाsss!! (तोहफाs तोहफाss तोहफाsss...)!!

    3. मेरे एक संगीतकार मित्र, जिनके किसी भी गीत संगीत मेरी स्वीकृति के बिना पूरा नहीं होता था, से पहले बार मैंने सीखा था कि गायक और गायिका के लिये अलग अलग धुनें बनाई जाती हैं और जो गीत दोनों स्वर में गाया जाता है (युगल-गीत नहीं, स्वतंत्र गीत) उसकी धुनें भी अलग हुआ करती हैं. (मेरी एक पोस्ट में मैंने इसका ज़िक्र किया है और उस पोस्ट पर आई टिप्पणी में इस विषय को विस्तार भी दिया था)
    इसलिये शर्मा जी की दुर्दशा का कारण इसी में छिपा है (मुझे हँसी आ रही है)... बेचारे शर्मा जी ने गायिका की धुन अपने लिये चुन ली, जो उनकी संगीत की अपरिपक्वता को दर्शाता है और बापू जी की दाल का कंकड़ कम, कान की चींटी अधिक बन गया!

    4. आना होगा, लाना होगा जैसी बातों का जवाब तो बस सलीम-जावेद या अमिताभ बच्चन ही दे सकते हैं - आज, खुश तो बहुत होगे तुम...!!

    5. आपकी भाभी के भजन सुनकर (जो उन्होंने अपनी डायरी में लिख रखे हैं अपनी महिला मण्डली की सखियों से सुनकर) मुझे हमेशा हँसी आती है! और वे समझती हैं कि मैं ईश्वर या उनके आराध्य का अपमान कर रहा हूँ. अब आप ही बताइये कौन अपमान कर रहा है ईश्वर का.

    6. गुलशन कुमार जी की चर्चा पर चुप हूँ. क्योंकि जो कहना चाहता हूँ उसके लिये यह विषय मुनासिब नहीं. एक पोस्ट है मन में बहुत दिनों से. शायद मेरी अगली पोस्ट हो!

    वैसे मेरा भजन तो परमात्मा के साथ वार्तालाप के रूप में ही हो जाता है! मज़ेदार पोस्ट दीदी!!

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    1. वाह...यह टिप्पणी तो खुद एक पूरी पोस्ट है सलिल भैया । और 'कान में चींटी'! कितना सार्थक व सटीक प्रयोग । कर्णकटु संगीत के लिये दाल में कंकड़ इतना फिट कहाँ है । टिप्पणियों में ही आप कितना कुछ कह देते हैं ।

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  4. बहुत ही रोचक संस्मरण .... गुज़रे समय में कितना उत्साह होता था हर बात का जो आज कहीं खो सा गया है बनावटी जीवन के परिवेश में ... बाकी सलिल जी ने पूरा विश्लेषण कर दिया है जहां तक फ़िल्मी गीतों पर भजन बनाने की बात है मेरा मत भी यही कहता है की इससे गरिमा में कमी जरूर आई है ...

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