Thursday, September 4, 2014

दो लघुकथाएं

(1)
सम्मान
एक बड़े प्रतिष्ठान ने प्राचार्य से योग्य शिक्षकों के नाम देने को कहा ताकि शिक्षक दिवस पर उन्हें सम्मानित किया जा सके । प्राचार्य ने हिसाब लगाया कि कौन इस समय उनके काम का है कौन नहीं। व्याख्याता 'स' उनके सारे बिलों पर बिना किसी आपत्ति के 'पेड बाई मी' लिख देता है । 'प' किफायती दामों में स्कूल का सामान उपलब्ध कराता है जिससे काफी बचत होजाती है । श्रीमती 'ल' को तो जरूर लिया जाना चाहिये । वह कहीं भी जाती है उपहार लाना नही भूलती और हमेशा विनम्रता की हद तक झुककर रहती है । और 'अ' को तो छोड़ा ही नही जासकता क्योंकि उस जैसा वाक्पटु कोई नही । जेडी साहब के सामने अपने स्कूल और प्राचार्य की ऐसी बात रखी कि साहब खुश होकर चले गए । ऐसे शिक्षकों को सम्मान जरूर मिलना चाहिये ।
"और सर ये रामकुमार और कुसुम ....?"
"अरे इन्हें छोड़ो "--प्राचार्य ने अपने खास सलाहकार नलिन की बात को गीले कपड़े की तरह झटक दिया ।
"ये संस्था के किसी काम के नही । बस रजिस्टर लेकर कक्षा में जाने और पढ़ाने के अलावा कोई काम नही करते । संस्था ऐसे लोगों के भरोसे नही चलती । हाँ तुम अपना नाम भी लिख लेना ..।"
"जी सर ।" नलिन ने खुश होकर कहा और जल्दी-जल्दी प्राचार्य जी द्वारा प्रस्तावित नामों को टाइप करने लगा ।
( सन् 2006 में )
(2)
प्रतिफल 
गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़े गजानन बाबू ने बेचारगी के साथ शिक्षा-विभाग की उस तिमंजिला इमारत को देखा जिसमें अधिकारी और बाबुओं की तो बात ही क्या है , चपरासी तक उन्हें भाव नही दे रहा था । बारह बजे से अब चार बजे तक तक चार बार लौटाए जा चुके थे ।हर बार एक ही उत्तर---"माड़साब , आपसे कितनी बार कहें कि अभी बड़े बाबू नही हैं कुर्सी पर ! कल-सल फिर चक्कर लगा जाना ।"
पीछे मास्टर जी उसकी बड़बड़ाहट को साफ सुन रहे थे ---"बड़े चेंटूराम हैं । पता नही क्यों रिटायर होने के साथ आदमी की अकल भी रिटायर होजाती है ।" 
घर में पत्नी भी यही कहती ह--"जिन्दगी भर बच्चों को पढ़ाते रहे पर खुद काम का कुछ नही सीखा ।  इतना भी नही है कि दफ्तर में ही अपने रुके कामों को करवा लें । चप्पल घिस रहे हैं फालतू ही...।"
" पत्नी शायद ठीक ही कहती है "---गजाननबाबू कभी कभी निराशा के अँधेरे में घिर जाते हैं ।
सचमुच बच्चों को पढ़ाने और महीना बाद वेतन के रुपए गिनने के अलावा उन्होंने कुछ नही जाना । कब कौनसी किश्त लगी , किस माह में कितने रुपए ,क्यों कट गए जानने की जरूरत नहीं समझी । हाँ अध्यापन कार्य में कभी शिथिलता या गिरावट नही आने दी । लेकिन क्या हुआ ! पेंशन प्रकरण को लेकर दफ्तर के चक्कर लगाते दो माह होने को आए पर कोई सुनवाई नही । वे साथी जो खुद कभी कक्षाओं में नही गए और गजाननबाबू के अध्यापन का मजाक उड़ाया करते थे ,अधिकारियों के साथ ठाठ से गाड़ियों में घूम रहे हैं ।
"तो क्या उनकी कार्यनिष्ठा गलत साबित होगई है ? क्या अब मूल्यों व आदर्शों का कोई महत्त्व नही रह गया है ? क्या उनके परिश्रम और ईमानदारी का यही प्रतिफल है ?" 
इन सवालों में उलझे हुए से गजानन बाबू हताश होकर लौटने का विचार कर रहे थे । उनके धुले सफेद कपड़े धूल से मलिन हो रहे थे । होठों पर पपड़ियाँ जम रही थी । चेहरे पर निराशा भरी थकान की कालिमा थी ।
इस तरह तो उन्हें कोई पूछने वाला नही है । यह सोचकर वे लौट ही रहे थे कि एक सरकारी जीप बगल से गुजरी । कुछ आगे गई, फिर पीछे लौटी । ड्राइवर सीट से ही कोई खिड़की में से झाँका । शायद कोई बड़ा अधिकारी था । 
"आप यहाँ !"--कहकर वह नीचे उतरा और पैरों में झुकगया । गजाननबाबू हक्के-बक्के से खड़े थे । 
"आपने मुझे नही पहचाना लेकिन मैंने तो देखते ही जान लिया ।"
"कौन ?...राजीव ?"
"बिल्कुल सही । आपकी कक्षा का सबसे शरारती और सबसे ज्यादा डाँट खाने वाला राजीव । आपने जो कुछ मुझे दिया उसी के कारण आज मैं यहाँ हूँ । आप यहाँ किसी काम से आए होंगे न ? लेकिन अब आपको चिन्ता करने की जरूरत नही है।" 
गजाननबाबू चकित और गद्दगद् हदय से इस आकस्मिक भारी परिवर्तन को देख उनकी आँखें भर आई । अपने कार्य का इससे बड़ा प्रतिफल किसी शिक्षक के लिये और क्या होसकता है । 
(सन् 1994 में रचित )
शुभ-तारिका में प्रकाशित)

15 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 06 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बहुत सुन्‍दर और शिक्षाप्रद।

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  3. सुंदर कहानियाँ सुंदर सीख।

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  4. शिक्षा और शिक्षक का जितना अवमूल्यन हुआ है ,वह कहीं गहरे चुभता है .लेकिन गिरावट समाज में कहां नहीं है.बस ,सच्चे शिक्षक का आत्म-सम्मान बना रहे ,उसे दयनीय होते कभी न देखना पड़े - यही मनाती हूँ !

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  5. दोनो ही लघुकथाओं का सार ... बेहद प्रेरक है
    शिक्षक दिवस की अनंत शुभकामनाएं

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  6. man ko sparsh kar gai aapki kahaniyaa..behtareen
    guru sadaiv pujniya hai

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  7. दोनों कहानियां व्यवस्था पर तंज करती हैं। दूसरी कहानी का सुखद पहलू भावविभोर करता है !

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  8. वैसे आदर्श शिक्षक को पढ़ाने का प्रतिफल तो कक्षा में ही मिल जाता है...सुंदर कहानियाँ..

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  9. दोनों कहानियाँ बहुत अच्छी थी...दूसरी कहानी का अंत बड़ा खूबसूरत :)

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  10. फिल्म सारांश का वो शिक्षक याद आ गया जो विदेश में मारे गए अपने पुत्र की अस्थियाँ लेने सरकारी दफ्तर में धक्के खा रहा होता है और अधिकारी उससे कहता है कि यहाँ हर किसी को अपना टीवी और वीसीआर लेने की जल्दी है। और अंत में उस वृद्ध शिक्षक का यह रिमार्क कि शायद हमसे ही कोई चूक हो गयी।
    पहली कथा तो मेरी खुद की व्यथा रही है, लेकिन आप जैसे शिक्षकों का आशीर्वाद रहा है कि मेरी घटना पहली कथा जैसी घटी मेरे साथ, लेकिन अंत दूसरी कथा सा हुआ।
    बहुत ही जीवंत और यथार्थ कथाएँ।

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  11. फिल्म सारांश का वो शिक्षक याद आ गया जो विदेश में मारे गए अपने पुत्र की अस्थियाँ लेने सरकारी दफ्तर में धक्के खा रहा होता है और अधिकारी उससे कहता है कि यहाँ हर किसी को अपना टीवी और वीसीआर लेने की जल्दी है। और अंत में उस वृद्ध शिक्षक का यह रिमार्क कि शायद हमसे ही कोई चूक हो गयी।
    पहली कथा तो मेरी खुद की व्यथा रही है, लेकिन आप जैसे शिक्षकों का आशीर्वाद रहा है कि मेरी घटना पहली कथा जैसी घटी मेरे साथ, लेकिन अंत दूसरी कथा सा हुआ।
    बहुत ही जीवंत और यथार्थ कथाएँ।

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  12. वाह...सुन्दर पोस्ट...
    समस्त ब्लॉगर मित्रों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@हिन्दी
    और@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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