Thursday, October 2, 2014

दोराहे ऐसे भी होते हैं ।

आजकल दुर्गाजी की झाँकियों से हर सडक ,चौराहा व गली जगमगा रही है । मधुर ,कर्णकटु ,भक्तिमय और फूहड सभी तरह के भजनों से हर दिशा संगीतमय (कोलाहलमय) है ।


बात कुछ यों हुई कि अंजना (छोटी बहन) ने शाम को अपने घर बुलाया । भजनों का कार्यक्रम था । जैसा कि नवरात्रि में अधिकतर होता है । उसके घर में प्रति वर्ष नवरात्रि में देवी की स्थापना होती है । 
मैंने उल्लासपूर्वक हाँ कहदी । हालांकि स्कूल के बाद ऐसे किसी कार्यक्रम में जाने का हौसला नही रह जाता ,पर जाने कबसे गीत-भजन गाए ,सुने नही थे । उसने रमा और सुधा ( मौसेरी बहनें) को भी फोन कर दिया था । रमा मेरे पडोस में ही है । सुधा कुछ दूर सेवा नगर में । अंजना हम तीनों से अलग न्यू- कालोनी में । 
सुधा के बिना हमारी मण्डली अधूरी है । वह जब ढोलक पर थाप देती है सुनने वाले वाह कहने विवश होजाते हैं । खराब गीत भी उसकी ताल के साथ समा बाँध देता है । इसीलिये वह भजन-मण्डली में विशेष सम्मान और स्थान पाकर हम सबसे आगे है । 
मैं उसके बिना भजन गाने का मन नही बना पाती । मेरी आवाज वैसे ही बहुत मन्द और दुर्बल सी है पर एक-दो गीत तो मुझे गाने ही पडते हैं । इसलिये जहाँ भी भजन कार्यक्रम होता है मैं सुधा को आगे रखती हूँ । अंजना नए-पुराने बहुत सारे भजनों को कंठस्थ रखने के लिये याद की जाती है । जबकि मैं जहाँ देखो डायरी लिये फिरती हूँ । अपने लिखे भजन या कविताएं ही मुझे याद नही ।  
मैंने तय किया कि मैं किलागेट (घर) आने की बजाय शाम को स्कूल से सीधी न्यूकालोनी पहुँच जाऊंगी और रमा-सुधा वहीं जाकर मिल जाएंगी । चारों बहनें मिलकर खूब आनन्दित होंगी ।
लेकिन स्कूल से निकलते समय तेज वर्षा हो रही थी । मुझे तय किया कार्यक्रम रद्द होता हुआ लगा । फोन करने पर पता चला कि रमा की तबियत भी कुछ खराब होगई है । वह न जा सकेगी । रमा नही तो सुधा भी नही । गजब का तालमेल है दोनों में । रह गई मैं अकेली  जैसा कि अक्सर होता है । ऐसे मैं जैसे एक दोराहे पर खड़ी रह जाती हूँ । इधर जाऊँ या उधर जाऊं के दो छोर जैसे किन्ही अनजान हाथों में होते हैं । मैं कुण्ठित सी उस भँवर से चाहकर भी बाहर नही आ पाती । 
अंजना के घर जाऊँ या न जाऊँ --  मैं इसी ऊहापोह में डूबी खड़ी थी कि बगल में किलागेट वाला टेम्पो आ खड़ा हुआ । जबकि न्यू कॉलोनी के लिये मुझे हजीरा वाला टेम्पो लेना था । 
"चलो ,छोड़ो , घर चलते हैं ।"--मैंने स्वयं को मुक्त करते हुए सोचा---"हल्की बारिश तो अब भी हो रही है । साथ में पानी की बोतल, छतरी, किताबें और दिनभर की ड्यूटी के बाद थकान भी । यहाँ गाँव या अपना घर तो है नही कि जैसी भी हालत में हो पहुँच जाओ । बहन की ससुराल है । हुलिया का कुछ ध्यान तो रखना चाहिये और फिर ऐसा कौनसा अनिवार्य है पहुँचना । नवरात्रि के भजनों का ही तो कार्यक्रम है । अंजना से फिर किसी दिन ऐसे ही मिल आऊँगी ।"
उधर टेम्पो ड्राइवर ,जो रोज आने जाने के कारण जानता है ,बोला---"मैडम चलना हो तो जल्दी बैठो । अभी जाम लगजाएगा ।"
सोचने का इतना टाइम नही था । मैं लपककर टेम्पो में चढ़ गई । वैसे भी मुझे स्कूल से सीधे घर आने की ऐसी भयंकर आदत पडी हुई है कि अक्सर घर में घुसने पर याद आता है कि अरे चाय बनाने के लिये शक्कर नही है या कि और कई जरूरी चीजें, लेकिन घर आने के बाद जो कपड़े बदल लिये तो फिर जरूरतें पड़ी रहें एक तरफ । कौन फिर से दूसरे कपड़े पहने !कौन बाजार जाए ! 
सुनीता (कामवाली) जब कई दिनों तक झाडू टूटने या बर्तन का साबुन खत्म होने की शिकायत करते करते और मेरी ," आज भूल गई कल ले आऊँगी", सुनते-सुनते थक जाती है ,तो वह खुद ही खरीद लाती है और पैसे माँग लेती है । खैर...
लेकिन अब मुश्किल यह हुई कि इधर तो मेरा टेम्पो में बैठना हुआ और उधर दिल--दिमाग में यह खयाल बुरी तरह उछल-कूद करने लगा कि अंजना मेरा इन्तजार कर रही होगी । ससुराल के माहौल में मुझे साथ पाकर उसे कितनी खुशी होगी । फिर यह बारिश कौनसी मुसीबत है ! सर्दियाँ होतीं तो फिर भी मुश्किल होती । अभी तो सितम्बर हैं । ये मन की बहानेबाजियाँ ही तो है जो मुझे अक्सर अवसरों से वंचित कर देतीं है । मुझे अंजना के पास जाना चाहिये । वहाँ भी सब कुछ घर जैसा ही तो है । उसकी सास ननदें मुझे कितना मान देतीं हैं ! देखते ही खुश होजातीं हैं । रोज-रोज तो ऐसे बुलावे आते नही है । घर भी अभी ऐसा कौनसा अर्जेन्ट काम पडा है ! 
बस अब मुझे टेम्पो में बैठे रहना मुश्किल लगने लगा । लगने लगा क्या मुश्किल हो ही गया ।
"भैया जरा रोकना ।"-- मैंने ड्राइवर को कहा । वह परिचित था सो कुछ हैरान सा बोला ---"क्यों मैडम चलना नही है ?" मैंने बात बनाई--
"नही भाई कुछ काम याद आगया है । देर से जाऊँगी ।" टेम्पो तीन-चार सौ मीटर दूर ही चला कि मैं उतर पडी ।  
हजीरा और किलागेट की सडक का अलगाव आगे जाकर फूलबाग चौराहे पर होता है जहाँ से एक सडक किलागेट बाईं ओर मुड जाती है । हजीरा के लिये सड़क सीधी जाकर पड़ाव चौराहे से बाई ओर मुड़ती हैं । मैं फूलबाग भी उतर सकती थी लेकिन इतना सब्र कहाँ ! 
अब मैं शिन्दे की छावनी पर खड़ी हजीरा के टेम्पो का इन्तजार कर रही थी ।पाँच बजे सभी टेम्पो इस तरह भरे चलते हैं मानो लोग किसी मेला के लिये जारहे हों । ठसाठस भरे वाहन चिढ़ाते हुए से सर्राटे से निकल रहे थे । जो ड्राइवर सवारियों को पुकार-पुकार कर बुलाते हैं वे अब देख भी नही रहे थे । मुझे अपने आप पर गुस्सा आया । गाड़ी चलाना जानती तो इस तरह आश्रित नही रहती । पेजर पर एक-दोबार कोशिश की थी । चला भी ली थी। साइकिल तो बचपन में चलाती ही थी । पर अब सबको यह डर रहता है कि मैं गाड़ी चलाऊंगी तो हाथ-पाँव तोड़ लूँगी । मुझे गाड़ी चलाने की अनुमति नही है । अब तो मेरा भी विश्वास कमजोर होचुका है । ऑटो की अपनी मुश्किलें हैं । कभी बहुत देर से आए तो कभी समय से पहले ही आ खड़ा हो । पूरी तरह उसी के आश्रित । रोज अलग से तय करो तो एक ही दिन में सौ रुपए तो समझ ही लो । बात कंजूसी की कम नजरिये की अधिक है । जब आठ या दस रुपए में काम चलता हो तो पचास रुपए क्यों खर्च किये जाएं ?
इससे तो अच्छा है कि वे रुपए सुनीता के बच्चों को दे दिये जाएं । इसलिये  अभीतक टेम्पो ही अपना आने जाने का साधन बना हुआ है । 
तकरीबन पन्द्रह मिनट इसी तरह खड़ी रही । कोई भी समझ सकता है कि वे पन्द्गह मिनट किस तरह पन्द्रह दिनों जितने बड़े और बोझिल होगए थे । पछता रही थी कि आखिर अच्छा भला टेम्पो छोड़ दिया । ऐसी बड़ी भजनों की पड़ी थी कि अब बीच में खड़ी हूँ फालतू ही । 
हाल यह था कि जहाँ के लिये भी साधन पहले मिलता मैं जाने तैयार थी । तभी संयोग से किलागेट वाला ही एक खाली टेम्पो सामने आकर रुका । वह भी रोज का परिचित ड्राइवर । आग्रह पूर्वक बोला --"आइये मैडम ।"
मुझे लगा जैसे संकट की घड़ी में कोई अपना आगया ।
वैसे भी किसी टेम्पो में इस तरह खाली सीट अभी आधे घण्टे तक मिलने वाली नही थी । मैं हजीरा जाने का विचार छोड़ फिर किलागेट के लिये बैठ गई । लगा कि एक झंझट से बच गई हूँ । क्या पता गुड्डी के यहाँ कितनी देर लगती । घर लौटने तक खूब अँधेरा होजाता । फिर दूसरे तमाम काम भी उतने ही लेट होते । आज कोई छूटा हुआ काम पूरा कर लूँगी । वगैरा...वगैरा..।
लेकिन रास्ते भर मैं फिर यही सोचती रही कि गुड्डी मेरा कितना इन्तजार कर रही होगी । कितना बुरा लगेगा उसे । काश मैं मन पक्का करके चली जाती । चली ही जाती न ? 

8 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (03.10.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1755)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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  2. दीदी! जैसा कि आप हमेशा कहती रहती हैं कि हम दोनों भाई-बहन की बातें बहुत मिलती जुलती हैं, आज की पोस्ट में भी ऐसी कई बातें दिखीं. ऑफिस से घर लौटकर कपड़े बदलने के बाद दुनिया इधर की उधर हो जाए मैं नहीं निकलने वाला, ऑफिस से छूटने के बाद सीधा घर भागने की इच्छा, गाड़ी चलाने से डर लगना और ड्राइवर पर निर्भर करना.

    आज आपने ग्वालियर का जो नक्शा खींचा है, लगता है कि कभी ग्वालियर जाना हुआ तो इन्हीं दोराहे/चौराहे पर किसी टेम्पो वाले से "किला गेट वाली मैडम" के घर ले चलो भर ही कहना पड़ेगा. बहुत हुआ तो कह देंगे - अरे वही जो रहती खारे कुँए के पास हैं लेकिन गाती बड़ा मीठा हैं.

    लेकिन एक बात अलग रही दीदी! हमारी अम्मा बचपन से कहती थीं (उस ज़माने में फोन नहीं होते थे) कि किसी कारण तुम अगर किसी के घर कहकर न जा सको तो उसके घर जाकर उसको बता आओ कि तुम नहीं आ सकते! भले ही वो समझ जाए कि आज बारिश के कारण तुम नहीं आ सकते! किसी को इंतज़ार में रखना अच्छी बात नहीं!

    आज आपने और भी बहनों से मिला दिया!

    एक और बात जिसका इस पोस्ट का कोई सम्बन्ध नहीं. आज भी जब कभी मैं किसी दोराहे पर निर्णय नहीं कर पाता कि किधर जाना है तो जो रास्ता मैं अन्दाज़े से चुनता हूँ वो कभी भी सही नहीं निकला! :)

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    1. आपने सही कहा कि इन्तज़ार कराना ठीक नही । मेरी उससे बात होगई थी । आपकी इस बात ने ही मुझे जताया है कि रात में सोचने वाली बात नही थी । अब ,जो सही था वही लिख रही हूँ ।
      और हाँ...आपकी बहन का इतना भी नाम नही है कि आपके इतने भर कह देने से कोई बता दे ।

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  3. अक्सर ऐसा ही होता है .

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  4. उहापोह में अक्सर ऐसा भी हो जाता है जो हम कतई नहीं चाहते ...
    विजयादशमी की शुभकामनायें!

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  5. कई बार बिल्‍कुल ऐसा होता है .... पर मन इन सारी परीस्थितियों के आगे नहीं मानता तो बस नहीं मानता ............
    विजयादशमी पर्व की अनंत शुभकामनायें
    सादर

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  6. दो राहे पर कभीना कभी खडा होना ही पडता है। घर जाने की जल्दी हमारी पीढी की नोकरीशुदा महिलाओं का कॉमन फेक्टर होगा। कपडे बदलने के बाद बाहर ना निकलने की बात भी मुझे मेहृरी ही लगी। और ग्वालियर की भी बहुत याद आई। शिंदे की छावनी फूल बाग, से इंदर गंज और लोहिया बाजार सब कुछ याद आ गया और अपना साइंस कॉलेज भी।

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  7. आपके ही साथ नहीं ऐसा हर किसी के साथ अक्सर होता है ... इधर उधर के बीच में समय भी निकल जाता है और मायूसी भी रह जाती है ... अच्छा संस्मरण ... सुखद अनुभूति देता हुआ ...

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