Friday, October 3, 2014

"राम राम !...खोलो रानी चन्दन किवाड़ ..."



" दशहरा ..विजयादशमी . शौर्य युद्ध और विजय का प्रतीक-पर्व . राजा रघु की कुबेर पर विजय , राम की रावण पर विजय . कुबेर ने उपहार स्वरूप अपना खजाना खोल दिया और राजा रघु ने प्राप्त सारा धन प्रजा में बाँट दिया . उसी याद में कहीं कहीं स्वर्ण-स्वरूप शमी के पत्ते लुटाए जाते हैं . दशहरा न्याय और सत्य की जीत का त्यौहार है . बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार है . वचन-पालन और दानशीलता का तयौहार है .
यह सब मैंने तीसरी-चौथी कक्षा में ही पढ़ लिया था .हर साल दशहरे की सुबह लोगों को उत्साह से अपने ट्रैक्टर जीप मोटर साइकिल ,साइकिल ,औजार ,मशीन और वाहनों को साफ करते देखती थी . हमारे घर भी काकाजी की साइकिल और माँ की सिलाई मशीन की सफाई होती थी  . जिनके पास बन्दूकें थीं वे बड़े गर्व से अपनी 'दोनाली' ,'पँचफैरा' और 'मौजर' निकालकर साफ करते थे . और साफ करने के बाद एक दो फायर भी कर देते थे . क्योंकि इसी दिन से बच्चों को पटाखे चलाने का लायसेन्स मिल जाता था . सो वे बड़ी आतुरता से दशहरे की प्रतीक्षा करते थे .
दशहरे की प्रतीक्षा मुझे भी रहती थी लेकिन दूसरे कारणों से . एक तो यही था कि बीस-पच्चीस दिन स्कूल जाने का कोई झंझट नहीं था .तब स्कूलों में दशहरा से दीपावली तक छुट्टी होजाती थी . हम लोग सुबह सुबह स्कूल जाने की बजाय खेतों की मेड़ पर ओस भीगी घास पर चल सकते थे .पूरब के क्षितिज पर सूरज को उभरता हुआ देख सकते थे .उस समय हमें गन्ने के खेत से आती मीठी खुशबू ललचाती थी . तोरई और कद्दू की बेलों में चमकते बड़े बड़े फूल लुभाते थे . मिट्टी में दबे शकरकन्द और मूँगफलियाँ बाहर निकाल लेने का आग्रह करते थे .
दशहरे की प्रतीक्षा का दूसरा और सबसे बड़ा कारण दशहरे की बहुत ही उल्लासमय शाम थी जब दूधिया चाँदनी के रुपहले विस्तार में सारा गाँव एक परिवार जैसा लगता था . लोग द्वार द्वार पर जाते परस्पर मिलते .राम राम कहते और नारियल बताशे की भेंट ग्रहण करते . चाँद के पूरा गोल होने में अभी भले ही चार-पाँच दिन बाकी होते पर गाँव की गलियाँ चाँदनी की झील में नहाकर निखर जातीं थीं । तब चाँदनी शायद ज्यादा चमकीली ,ठण्डी और मोहक हुआ करती थी ।
चाँदनी अपने पूरे सौन्दर्य के साथ झमकती हुई पेड़ों और मुँडेरों से उतरती हुई आहिस्ता से चबूतरों पर और फिर गलियों में बिखरने लगती तब लोग दरी बिछाकर ,थालियों में नारियल के टुकड़े , बतासे ,लोंग इलायची सजाकर अपने अपने द्वार पर बैठ जाते थे और मिलने आने वाले लोगों को राम राम कहकर नारियल बतासे आदि देते थे । लगभग रात के एक बजे तक , जब तक कि नींद पलकों पर मनों वजन नही लाद देती और हर चौथे पल जम्हाँइयों (उबासियों) के कारण लोगों के चेहरे विकृत नही होने लगते ,तब तक गली में राम राम का सिलसिला चलता रहता और गलियों में मंगलवारी हाट जैसा माहौल बना रहता था लेकिन स्नेह और उल्लास भरा... हमारे चबूतरा पर काकाजी बैठते थे फिर जब वे 'राम राम' के लिये गाँव में निकलते तब माँ 'राम-राम ' के लिये चबूतरा पर बैठ जातीं थीं ।
उस रुपहली रात में बच्चे खास तौर पर उत्साहित रहते थे । उन्हें उन्मुक्त होकर उजली गलियों में घूमते हुए ज्यादा से ज्यादा 'चटक' या 'खुरैरी' ( स्थानीय बोली में नारियल के टुकड़े )और बतासे पाने का सुनहरा मौका जो मिलता था ।
उसी समय हाथों में टेसू लिये लड़कों की टोली भी द्वार पर आ धमकती और गा उठती थी---
"टेसू आए घर के द्वार
खोलो रानी चन्दन किवार
चन्द चन्द के टके बनाए
एक टके की पन्नी मँगाई ....।"
या
"मेरा टेसू यहीं अड़ा
खाने माँगे दही बड़ा ।
दही बड़ा में पन्नी
धर दो एक अठन्नी ।"
दशहरा के दिन से ही टेसू और झाँझी द्वार द्वार पर आने लगते थे . क्योंकि दोनों का ही विवाह होने वाला होता है इसलिये जिस गली में टेसू की टोली होती उसमें झाँझी नहीं जाती . पूर्णिमा के दिन बड़े उल्लासमय आयोजन में टेसू और झाँझी का विवाह रचाया जाता . (साँझी के बारे में आपने पढ़ा ही होगा )
उन दिनों जब गाँव में बिजली नही थी ,चाँदनी रात किसी सौभाग्य से कम नही होती थी । कहाँ अँधेरे के साम्राज्य में प्राणपण से संघर्ष करती लालटेन या दिये की टिमटिमाती रोशनी और कहाँ अँधेरे को सुदूर कोने में खदेड़ने वाले ,रुपहले उजाले के अजस्र स्रोत---चन्द्रदेव । मनुष्य ही क्या पेड़-पौधे भी उनके साक्षात्कार का उत्सव मनाते थे ।
साधन-हीनता विषाद का मूल नही होती । विषाद के मूल होता है साधनहीनता का अहसास जिससे तब किसी का परिचय था ही नही । उस साधनहीन सम्पन्नता का एक अलग आनन्द था । मेरा विचार है कि प्रकृति के हर उपादान में ईश्वर की स्थापना मनुष्य ने भौतिक साधनों के अभाव में ही की होगी .
दशहरे की वह रात अनौखी हुआ करती थी . कोई छोटा-बड़ा या अमीर-गरीब नही । सब सबके दरवाजे पर जाकर अभिवादन में राम राम कहते हाथ जोड़ते हैं . अंजुरी आगे बढ़ाते हैं और दूसरे ही पल अंजुरी नारियल बतासों से भरी होती है ।
आज किसी को रावण याद नहीं . याद होगा भी क्यों  वह तो वीर पुरुषोत्तम राम के हाथों मारा जा  चुका है . सब केवल राम को याद कर रहे हैं । राम की विजय का उत्सव मना रहे हैं . गलियाँ राम राम ध्वनि से गूँज रही हैं । साहस ,शौर्य और शील के पर्याय राम के स्मरण से  . ऐसे में रावण का क्या काम ? जहाँ 'राम' हैं वहाँ 'रावण' नहीं होसकता . होगा भी तो वह राम के हाथों मारा जाएगा जरूरी है राम का होना .                         
सचमुच मुझे याद नही कि तब दूर दूर तक भी धोखा ,बेईमानी, हत्या , बलात्कार जैसे अपराध का कोई किस्सा सुना गया हो ।
रावण-दहन केवल रामलीला के दौरान होता था . मैंने कहीं पढ़ा है कि अच्छाई के प्रचार से अच्छाई बढ़ती है और बुराई के प्रचार से बुराई । रावण ( बुराई का प्रतीक) को याद करना एक तरह से बुराई को जीवित रखना ही तो है । हम रावण बनाते हैं इसलिये उसे जलाने का नाटक करते हैं . गन्दगी फैलती है तभी तो सफाई-अभियान की जरूरत होती है । शायद इसीलिये हमारे गाँव में रावण को जलाने की परम्परा कभी नही रही ( अब पता नही ) पहली बार मैंने रावण जलाने का दृश्य एक फिल्म में देखा था ( शायद रेशम की डोरी) .वास्तव में  मेरे लिये दशहरा 'रावण 'के अन्त से अधिक 'राम' की विजय का पर्व है .राम का स्मरण करने और नारियल-बतासे लेने देने का पर्व है ।

इसलिये आप सभी अपनों को दशहरा की राम राम और नारियल-बतासे की सादर , सस्नेह भेंट ।

10 comments:

  1. आपकी इस यादों की चाँदनी में हम भी नहा गये... हमारे यहाँ ऐसा कोई प्रचलन नहीं था... हमने यह सब नहीं देखा-सुना.. आप्की इस पोस्ट का आनन्द भी नहीं ले पा रहा हूँ.. टीवी पर पटना में हुई दुर्घटना का समाचार है. हताहत व्यक्तियों के परिजनों के साथ सम्वेदनाएँ!!

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    1. बहुत ही दुखद व दुर्भाग्य पूर्ण । प्रशासन की सबसे बड़ी लापरवाही यह कि यह जानते हुए भी कि यह आयोजन प्रतिवर्ष बड़े स्तर पर होता है । भारी जन समूह उपस्थित होता है , कोई सुचारु व्यवस्था नही होती । लोगों की अधीरता भी इन दुर्घटनाओं को भीषण बना देती है ।

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  2. अपने बचपन में -मध्य प्रदेश में - हमने भी यह सब देखा है - नये कपड़े पहन कर ,शमी की पूजा में जाना ,पत्तियों की लूट घर-घर में सोना देना ,सत्कार पाना और हमारी ओर शाम को रावण भी जलाया जाता था.
    बचपन के उन दृष्यों के वर्णन बड़े मनोरम बन पड़े हैं ,वह वातावरण , लोक-भाषा के पुट ने निर्मित कर दिया ,यह लोक -गीत हमने भी सुने और 'चिटक 'खाई है .वातावरण में तब यह प्रदूषण नहीं था (लोगों के मनों में भी नहीं ),चाँदनी उज्ज्वल होती थी ,और बिजली की रोशनी न होने से ,उसकी वास्तवित द्युति आभासित होती थी .अब भी वहाँ यह सब होता होगा पर हम बहुत दूर चले आए हैं .
    बहुत अच्छा लिखा है आपने ,बहुत सहज और प्रभावशाली!

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  3. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/10/2014-5.html

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  4. सत्संग का महत्त्व भी इसीलिए ज्यादा हो जाता है ... अच्छे लोगों की संगती में अच्छे विचार आते हैं ... बुराई न देखो तो अच्छाई ही सब जगह नज़र आएगी ... इसलिए राम राम कहना और उसको याद रखना ही उचित है ... आज की पीड़ी को आप संस्मरण के माध्यम से बहुत कुछ कहने का प्रयास कर रही हैं ...

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  5. जैसे कुछ अदभुत सा अहसास हुआ इस संस्मरण को पढ़ के...काश ! वो दौर हमने भी देखा होता ।

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  6. आज भी चाँदनी मन पर फैली है

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  7. टेसू झेंझी के विवाह का स्मरण मुझे भी है झांझी को लेकर घर घर राख के ऊपर रख कर थपकी देते हुए नचाते हुए गाना गण "मेरी झेंझी को नाम मटुकिया री चलो घरे चलें" दशहरा के पर्व पर शमी के पत्तियों का सोना कहकर आदान प्रदान भी याद है रामलीला देखने के लिए अपनी बोरी लेकर जाना आगे की जगह लूटना सब कुछ एक सपना सा लगता है अपने न जाने कितनी सोई स्मृतियों को जग दिया आभार

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  8. टेसू झेंझी के विवाह का स्मरण मुझे भी है झांझी को लेकर घर घर राख के ऊपर रख कर थपकी देते हुए नचाते हुए गाना गण "मेरी झेंझी को नाम मटुकिया री चलो घरे चलें" दशहरा के पर्व पर शमी के पत्तियों का सोना कहकर आदान प्रदान भी याद है रामलीला देखने के लिए अपनी बोरी लेकर जाना आगे की जगह लूटना सब कुछ एक सपना सा लगता है अपने न जाने कितनी सोई स्मृतियों को जग दिया आभार

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