Sunday, March 30, 2014

ऐसा नव-नवसंवत्सर हो ।

नव-संवत्सर 2071 आप सबके लिये मंगलमय हो ।

जाग गया है मौसम अब 
सर्दी की फेंक रजाई ।
टहनी-टहनी पल्ल्व पीके,
महकी है अमराई ।
जागे जल्दी भोर   
सजा सतरंगी रंगोली ।
द्वार क्षितिज के सबसे पहले 
बिखराए रोली ।

ऐसे ही जागें,विचार भी

ऐसे ही महकें व्यवहार भी
आँखों में एक अम्बर हो 
पुलक पखेरू अन्तर हो ।
ऐसा नव संवत्सर हो 

औरों के पीछे क्यों भागें

खुद को ही पहचानें 
अपनी क्षमताओं को समझें 
भूलों को भी जानें ।
जहाँ कही हो अनाचार 
विद्रोह वहाँ तो खुल कर हो 
ऐसा नव-संवत्सर हो ।

रिश्वत का व्यापार रुके 

व्यापक भ्रष्टाचार रुके 
बैठे--ठाले नाम कमाने का 
यह कारोबार रुके ।
अपना हर दायित्त्व निभाने को 
हर कोई तत्पर हो 
ऐसा नव--संवत्सर हो ।

अँग्रेजी की आदत क्यूँ हो ?

इण्डिया माने भारत क्यूँ हो ? 
ह्रदय न समझे मतलब जिसका 
ऐसी जटिल इबारत क्यूँ हो ?
सरल भाव हों , सरल छन्द हों 
अपनी लय अपना स्वर हो 
ऐसा नव--संवत्सर हो ।

चमक-दमक के पीछे

घना तिमिर है , ध्यान रहे 
पथ में दीप जलाने वालों का
सम्मान रहे ।
ईंट फेंकने वालों को 
देने फौलादी उत्तर हो ।
ऐसा नव--संवत्सर हो 
ऐसा नव-संवत्सर हो ।
(संवत्सर 2060 गुडीपडवा के उपलक्ष्य में रचित )

Wednesday, March 19, 2014

गुजरी तारीख

कब तक बाट निहारते भटकेगा अविराम !
रे मनवा अब लौट चल, घिर आयी है शाम ।

क्यों लहरों को कोसता ,यह तूफानी मौन !

नाम लिखा कर रेत पर अमिट हुआ है कौन !

अनजाने भेजा गया बिना पते का पत्र

अनबूझा यों उड रहा यत्र-तत्र-सर्वत्र ।

सीखा कभी न तैरना गहरा पारावार

दो अक्षर की नाव पर हम उतरे मँझधार ।

बुला रहा कोई कहीं ,था कोरा अन्दाज 

पर्वत लौटाते रहे ,मेरी ही आवाज ।

अनजाना यह शहर है भीड भरा बाजार

कोई अपना सा हमें मिल जाता एक बार ।

टहनी-टहनी फूटती है पल्लव सी पीर

रोम-रोम चुभने लगा बनकर शूल समीर ।

पर्वत रहते बेअसर क्या वर्षा तूफान

क्या धरती की वेदना , क्या सागर का मान ।

रटीरटायी सी कोई एक उबाऊ सीख

रहे कैलेन्डर में सदा हम गुजरी तारीख ।

 बूटे-बूटे में लिखा है यह किसका नाम

चप्पे-चप्पे में घुला रंग वही अभिराम ।

Thursday, March 13, 2014

एक के दो , दो के चार ।

एक संस्मरण 
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मेरे मिष्ठान्न--प्रेम को मेरे सभी परिजन जानते हैं । ताऊजी के परिवार में किशोर भैया को और हमारे बीच मुझे ,दोनों को बचपन में ही चींटों की उपाधि मिल चुकी थी । जहाँ मिठाई दिखी हम हाजिर । किशोर भैया का इरादा तो शीशी में शहद भरकर जेब में डाले रहने का रहता था कि जब चाहो थोडा सा चख लो । ऐसा वो कई बार कर भी चुके थे । मैं बतादूँ कि मैं इस प्रेम में अपनी तीन दाढें और एक दाँत गँवा चुकी हूँ अभी एक दो जाने की कतार में हैं । खैर ..मेरे उस प्रेम की एक रोचक और अभूतपूर्व दास्तान है । तब मैं नौवीं में पढती थी । 
सन् 1973 की होली थी । 
होली पर हमारे गाँव में भाँग पीने का बडा चलन था । क्या बूढे और क्या बच्चे ..यहाँ तक कि महिलाएं भी बेहिचक भाँग पी लेती थीं । दूध बादाम कालीमिर्च के साथ सिल-बट्टा पर घोंटी गई भाँग । पूर्णिमा की रात होली जलाने के बाद भला कौन सोता । फाग और रसिया गाते हुए लोग गलियों में खूब हंगामा करते थे । कहीं रज्जू काछी अपनी भैंस को खुद ही हाँकता हुआ चिल्लाता जाता था --"अरे भैया, मेरी भैंस को भड्या ( डाकू) लिये जा रहे हैं बचाओ ।" कहीं शर्मा जी चबूतरा पर खडे होकर लश्कर ( ग्वालियर ) के बाजार की हलचल का सजीव प्रसारण करते । तो कहीं कोई भाभी भैया से रो रोकर शिकायत करती कि उन्होंने खींच कर भाभी की नाक कुछ ज्यादा लम्बी करदी है । 
मैं भांग जैसी चीजों से हमेशा दूर रहती आई हूँ । शुरु में अपनी मर्जी से तो कम, लेकिन काकाजी के डर और माँ की नैतिक शिक्षाओं के कारण । बाद में किसी भी नशा से नफरत करना निजी सिद्धान्त बन गया । नशा और नशेबाज दोनों से मेरा पता नही किस जन्म का बैर है । हाँ भाँग वाले तमाशे मुझे बडे रोचक लगते थे । लेकिन एक दिन मैं खुद तमाशा बन गई । 
हुआ यों कि जब काकाजी स्कूल चले गए तो मैं उनके कमरे में ,जिसे वे कचहरी कहा करते थे ,सफाई करने गई । वहीं अलमारी में एक काँच की शीशी में बडी ही सुन्दर और स्वादिष्ट दिखने वाली चीज देखी । उसमें  हरी पत्तियों के चूरे के साथ घी शक्कर और बादाम के कतरे भी थे । मन नही माना । शीशी खोलकर थोडा निकाल कर चखा । गजब का स्वाद था । शायद मैंने कहीं लिखा भी है कि काकाजी आयुर्वेद में खासी जानकारियाँ रखते थे । नाडी देखकर ही बता देते थे कि वात कुपित है या पित्त । अपने लिये और कभी-कभी हमारे लिये स्वादिष्ट और पौष्टिक पाक भी बनवाते थे । मुझे शीशी में वैसा ही कुछ लगा । एक फंकी ली तो फिर हाथ रुका ही नही । यह जानते हुए भी कि मैं चोरी जैसा कुछ गलत कर रही हूँ मैंने चार-पाँच चुटकियाँ भर कर मुँह में डाल ही लीं । मिठाई को सामने पाकर मेरा खुद पर काबू नही रहता । ( अब तो बच्चे टोकने लगे हैं और डाक्टर ने भी चेतावनी दे दी है इसलिये नियन्त्रण कर रही हूँ ) 
ज्यादा ले लूँगी तो काकाजी तुरन्त भाँप लेंगे---यह सोचकर शराफत के साथ मैंने शीशी बन्द कर वहीं रखदी । और बाहर गली में निकल गई । पर यह क्या ..। थोडी देर बाद आसपास कुछ घूमता हुआ सा लगने लगा । उधर पुष्पाजीजी पानी भरने के लिये बुलाने आगईं । मैंने कहा-- "मेरी गर्दन और सिर तो है ही नही कलशा कहाँ रखूँगी ।" पुष्पाजीजी ने मुझे भेदिया नजरों से देखा ।
"बेशरम , सच बता तूने क्या खाया है ।"  
"पुष्पाजीजी !"--मुझे बडे जोर की हँसी आई और हँसती चली गई । हँसते-हँसते बोली---
"लेकिन पुष्पाजीजी तुम दो कैसे होगई हो । अरे दो नही तीन चार ...इधर भी ,पुष्पाजीजी ,उधर भी...पुष्पा...।" 
"अब पक्का होगया किसी ने तुझे भाँग पिलादी है । "पुष्पाजीजी ने मुझे खींचकर घर ले जाते हुए कहा । 
"तुम बेकार शक कर रही हो । जहाँ चाहो कसम ले लो । सच्ची मैंने भाँग नही खाई ।" मैं पुरजोर अपनी सफाई दिये जारही थी पर मानता कौन ?  
इसके बाद मुझे याद नही । जब होश आया तो बहुत से लोग मेरे आसपास खडे थे । मैं बहुत शर्मिन्दा हुई । खास तौर पर काकाजी के सामने । लेकिन आश्चर्य !! काकाजी ,जो हमें सिर्फ सजाएं सुनाते थे ,मेरे लिये शिकंजी और लस्सी तैयार कर रहे थे । 
वह मेरे जीवन का पहला और अन्तिम अनुभव था । 

Friday, March 7, 2014

एक असाधारण समीक्षा

महिला --दिवस के बहाने एक बार फिर ....
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हमारे संस्कृत के अध्यापक अक्सर कहा करते थे--"कवि करोति काव्यान् ,रसं जानाति पण्डितः ।" उस समय यह बात सिर के ऊपर से गुजर जाती थी । इसका मर्म समझा जब श्री मनोज जी जी ने 'रमपतिया' कविता की समीक्षा लिखी । एक असाधारण समीक्षा । साथ ही यह भी समझ में आया कि समीक्षकों का ही प्रताप है कि कुछ साधारण रचनाएं प्रसिद्धि पा जाती हैं जबकि उनसे श्रेष्ठ रचनाएं धूल खाती रहतीं हैं । 
यह सच है कि 'रमपतिया' का खाका खींचने में समय नही लगा पर उसे निष्कर्ष तक पहुँचाने के लिये बहुत सोचना पडा । रमपतिया एक काल्पनिक पात्र है जिसमें मुझसे सर्वथा भिन्न ,तीन स्त्रियाँ मिलकर एक सम्पूर्ण स्त्री का स्वरूप लेकर मुझे आन्दोलित करतीं हैं । पर ऐसी कोई महिला है भी तो उसकी साहित्यिक उपलब्धि क्या सिर्फ उसका आलंकारिक वर्णन है ? काफी सोचने पर जब अन्तिम पंक्तियाँ लिखी गईं तब कविता सार्थक प्रतीत हुई । 
इसमें कोई सन्देह नही कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में यह एक समर्थ और सशक्त रचना है लेकिन इसे असाधारण शक्ति व सार्थकता देती है मेरे आदरणीय भाई सलिल जी और श्री मनोज जी की गहरी और तीक्ष्ण दृष्टि । रचना में जो उन्होंने देखा ,लिखते समय मेरे दिमाग में नही था । कविता तो मेरे प्रिय और आदरणीय लगभग सभी पाठकों ने पढी है  (फिर भी आप चाहें तो पुनःयहाँ पढ सकते हैं ) शायद समीक्षा भी ,लेकिन बहुत बाद में विचार आया कि इतनी अच्छी समीक्षा से क्यों न मैं अपने ब्लाग को भी समृद्ध करूँ । इसलिये विलम्ब से ही सही मनोज जी के प्रति पुनः कृतज्ञता व्यक्त करते हुए , महिला-दिवस पर उस पूर्व-प्रकाशित कविता की  असाधारण समीक्षा यहाँ दे रही हूँ ।    
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रमपतिया.....गिरिजा जी की असाधारण कविता
मनोज कुमार
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गिरिजा कुलश्रेष्ठ की एक कविता पर आज नज़र पड़ी। गिरिजा जी का ब्लॉग Yeh Mera Jahaan है। इस ब्लॉग पर अपने परिचय में गिरिजा जी कहती हैं - जीवन के पाँच दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ। अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है। दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ । फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है । इसी तलाश में उनकी भेंट एक ग्रामीण महिला रमपतिया से होती है और होता है सृजन रमपतिया की याद में कविता का।
स्त्री पर स्तरीय कविताएँ कम ही मिलती हैं। गिरिजा जी ने एक साधारण स्त्री पर असाधारण कविता रची है। कविता में नारी चरित्र और उसके जीवन से जुड़ी समस्त घटनाओं को उसके तीन भावों हँसना, रोना और प्रतिकार करना के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। कवयित्री ने हँसी और रुदन का इतना बारीकी से चित्रण किया है कि स्त्री को उसकी हँसी भी उतना ही सशक्त बनाती है, जितना उसका रुदन। कविता के अंतिम भाग में, जहाँ आम स्त्रियाँ (रमपतिया के परिवेश की) आँसू बहाती हैं, वहाँ रमपतिया नारी चरित्र को सशक्त रूप से मुखरित करते हुए चीत्कार करती है, विरोध जताती है और अपने रुदन को अपनी असमर्थता और लाचारी नहीं बनने देती। एक साधारण सी स्त्री रमपतिया के माध्यम से गिरिजा जी ने जहाँ नारीजनित स्वाभाविक ईर्ष्या को चित्रित किया है वहीं उसके स्वाभाविक गुण प्रेम को भी उद्घाटित किया है और अपने सम्मान, स्वाभिमान और अधिकार के लिए संकोच छोड़ मजबूती के साथ सामना करने के लिए उठ खड़े होने वाले  चरित्र के साथ नारीत्व को शक्ति दी भी है।
इस कविता में माटी की गंध और गँवई मिज़ाज पैहम है। वह एक ऐसी स्त्री है जो जीवन के हर पल का आनंद उठाती है। उसकी हँसी निश्छल है, वह  भोली है, सरल है और जीवट वाली स्त्री है। वह जीवन के हर छोटे-बड़े पल को हँसकर जीना जानती है और उनका खुलकर आनन्द भी लेती है।
"रमपतिया तुम हँसती थी
दिल खोल कर
एक बडी बुलन्द हँसी ।
छोटी-छोटी बातों पर ही "
कविता के प्रारम्भ में इस ग्रामीण, निरक्षर स्‍त्री की, गली-नुक्कड़ तक गूँजती हँसी से हमारा परिचय होता है. किन्तु इस साधारण सी घटना के मध्य कवयित्री ने हौले से जीवन की उन दुरूह परिस्थितियों को भी पाठक के समक्ष रखा जिनके बीच आम आदमी हँसी की कल्पना भी नहीं कर सकता और यही उस नारी की विजय है, क्योंकि उसकी हँसी से---
"हो जाते थे शर्मसार
सारे अभाव और दुख ,चिन्ता कि
शाम को कैसे जलेगा चूल्हा
या कैसे चुकेगा रामधन बौहरे का कर्जा
बढते गर्भ की तरह चढते ब्याज के साथ ।"
हम पाते हैं कि इन संघर्षों के बावज़ूद भी उसके चरित्र में संकोच का भाव, एक ग़रीबी का गर्व, एक गंवईपन का स्वाभिमान है। गिरिजा जी ने अपनी कविता के लिए कोई भारी-भरकम विषय नहीं उठाया है, फिर भी उनकी इस कविता की यात्रा करते हुए हम पाते हैं कि उन्होंने कुछ ऐसा अवश्‍य कहा हैं, जिसे नया न कहते हुए भी हल्‍का नहीं कहा जा सकता।
सरल, सहज रमपतिया इतनी हँस-मुख है कि कोई भी अभाव उसकी हँसी को म्लान नहीं कर पाया। कारण अगर दिल को आघात पहुँचाने वाला हो तो वह रोती भी है। अपने किसी नजदीकी की मौत पर या फसल, जो गरीब के जीवन यापन का एक मात्र आधार है, या भले ही अपने पति द्वारा दिल को दुखाए जाने पर। हर बार रमपतिया ने अपने दुख को मुखर अभिव्यक्त करके अपने से पूरी तरह बाहर कर दिया और फिर पहले की तरह ही सहज हो गई। यहाँ नाली में फँसी पॉलीथीन बिम्ब बहुत स्वाभाविक प्रयोग है। जिस प्रकार नाली में जब पॉलीथीन फँस जाती है तो कचरा अन्दर ही जमा होने लगता है और जब तेज बहाव में वही पॉलीथीन एक झटके में निकलती है तो बहाव बहुत सहज हो जाता है। गहन दुख की भी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही है। वर्णन कवयित्री के शब्दों में ही देखें
"तुम रोती थीं गला फाड कर
रुदन को आसमान तक पहुँचाने
तुम्हारे साथ रोतीं थीं दीवारें
आँगन ,छत , गली मोहल्ला और पूरा..गाँव
उफनती थी आँसुओं की बाढ
नाली में फंसी पालीथिन की तरह
रुके हुए दर्द बह जाते थे
तेज धार में ।"

ऐसा लगता है रमपतिया अचानक व्यक्तिवाचक संज्ञा से जातिवाचक संज्ञा हो जाती है और हर उस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जिसके आँसू दिल दुखने पर आसमान के परमात्मा तक पहुँचने की शक्ति रखते हों.
तीसरे भाग में नारी को प्रताड़ित करने वालों और उपेक्षिता समझने वालों को रमपतिया के माध्यम से दिखाया है कि वह हंसती है मगर हंसते हुए जुल्म, अन्याय, उपेक्षा और चरित्र पर आक्रमण नहीं सह सकती। वह रोती है, मगर आँचल में छिपकर आँसू नहीं बहाती.---
"चीख-चीख कर जगा देती थी
सोया आसमान ।
भर देती थी चूल्हे में पानी
जेंव लो रोटी|
मारलो ।
काट कर डाल दो
रमपतिया नही सहेगी
कोई भी मनमानी ।"
और यही कविता की ऊंचाई है जो उस स्त्री के साथ परवान चढी है जिसका चरित्र एक कोमल ह्रदय नारी का भी है और अन्याय का विरोध करती चंडिका का भी!
"रमपतिया,
ओ अनपढ देहाती स्त्री
काला अक्षर भैंस बराबर
पर मुझे लगता है कि उस हर स्त्री को
तुम्हारी ही जरूरत है जिसने
नही जाना -समझा 
अपने आपको आज तक
तुम्हारी तरह ।"
इस कविता की जो बात मुझे अच्छी लगी वह यह कि वह न तो ज़्यादा क्रांति की बात करती हैं, न चटपट मज़ेदार कविता की रचना ही । स्त्री और उसका संघर्ष ही इसका बुनियादी लय है। परिवर्तन की बात है तो वह सिर्फ़ रस्मी जोश तक सीमित नहीं है । ये सब कुछ इनकी रचना में बुनियादी सवालों से टकराते हुए है। इनकी लेखनी से जो निकला है वह दिल और दिमाग के बीच खींचतान पैदा करता है। क्योंकि इन्होंने घिसते जाने के बीच अपने को सिरजने की और शोषण के प्रति उसके विरोध को उस स्त्री की जद्दोजहद को परिचित बिंबों से उतारा है।
इस कविता में एक ओर जहाँ उत्पीडन, शोषण, अनाचार और अत्याचार जैसी सामाजिक विसंगतियों के प्रति ध्यान आकृष्ट किया गया है तो दूसरी ओर मानवीय संवेदना, ममत्व, दया, कारुण्य भाव एवं विद्रोह की भावना अत्यधिक प्रखर है। नारी मन की गहराई, उसका अन्तर्द्वन्द्व, नारी उत्पीड़न, मान-अपमान में समान भावुक मन की उमंगे, संवेदनशीलता, सहिष्णुता आदि पर काव्य में अभिव्यक्ति दी गई है, जो कि वस्तुतः सुलझी हुई वैचारिकता की प्रतीक है।
कविता में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी है। गिरिजा जी ने ग्रामीण स्त्री के जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी भा्षा काव्यात्मक है, लेकिन उसमें उलझाव नहीं है। कविता में प्रयोग किये गए परिवेश ग्रामीण हैं किन्तु दो जगह बड़ी सुंदरता से उन्होंने जिन बिम्बों का प्रयोग किया है वह उल्लेखनीय है. “बढते गर्भ की तरह चढते ब्याज के साथ” तथा “नाली में फंसी पालीथिन की तरह रुके हुए दर्द बह जाते थे” अपने आप में एक बेहतरीन प्रयोग है और अपना एक अलग मुहावरा रचती हैं। इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। इस कविता की स्थानिकता या ग्रामीण वातावरण इसकी सीमा नहीं है, इसकी ताक़त है। स्त्री जीवन के सामान्य घटनाक्रम के द्वारा इन्होंने जीवन के बड़े अर्थों को सम्प्रेषित करने की सच्ची कोशिश की है।
इस बदलते समय में सभ्‍यता की ऊपरी चमक-दमक के भीतर उजड़ती सभ्‍यता, सूखती और सिकुड़ती संस्‍कृति की इस त्रासद स्थिति में कवि का कर्त्तव्‍य होता है कि वह उदात्त को नहीं, साधारण को भी अपनी कविता में ग्रहण करे। यही आमजन सभ्‍यता और संस्‍कृति की नींव मजबूत रखते हैं । इसीलिए इस कविता में संवेदना का विस्तार व्‍यापक रूप से देखा जा सकता है।

Saturday, March 1, 2014

धवल धार का काला सच


" कल से दूध 50 रुपए लीटर मिलेगा ।"---दूध वाले ने कल ही सुना दिया ताकि आम आदमी तय कर सके कि चाय को चुल्लूभर दूध दिखाने की भी उसकी औकात है या नही । 
इतनी औकात तो अब बेशक है । गरीबी रेखा के बहुत नीचे वाले लोगों को जरूर थोडी मुश्किल है लेकिन सौ या दो सौ मिली लीटर दूध तो वे भी ले ही लेते हैं ।
सरकारी मूल्य पचास रुपए प्रति लीटर होगया है तो भैंस पालने वालों ने भी पचास कर दिया । एकदम पाँच रुपए की बढत । इसमें कोई आश्चर्य या खेद की बात नही ।
दरअसल मूल्य माँग और पूर्ति के आधार पर तय होता है । पनीर, चीज़ और दूध के अन्य उत्पादों का व्यापक उपयोग न केवल दूध के दामों को उच्च से उच्चतर ले जा रहा है बल्कि  गंभीर भ्रष्टाचार को बढावा भी दे रहा है । कच्ची सडक और इमारत बनाकर या बच्चों के दलिया और ब्रेड को बाजार में बेचकर रुपया खाने से भी कहीं अधिक गंभीर ।
अब मुद्दा केवल आर्थिक स्तर का नही रह गया है । 
यहाँ मुद्दा वस्तु की शुद्धता और ग्राहक के साथ हो रहे धोखे का है । नैतिक मूल्य एवं मानवीय संवेदनाओं की हत्या भी एक दूसरा पहलू है । 
अब एक बडा प्रश्न यह है कि पूरी कीमत चुकाने में समर्थ होने के बावज़ूद क्या ग्राहक को चुल्लूभर दूध भी अब उपयोग में लाना चाहिये या दूध व दूध से बनी चीजों को हमेशा के लिये त्याग देना चाहिये । स्वस्थ-अस्वस्थ ,बच्चे ,बूढे ,महिलाएं...सभी के लिये दूध उत्तम पथ्य है लेकिन कौनसा दूध ? नकली और जहरीला दूध ?  
यूरिया ,वाशिंग पाउडर , रिफाइन्ड व अन्य रासायनिकों के साथ बनाया गया कृत्रिम दूध ,पनीर, मावा धडल्ले से खपाया जा रहा है---इसे अखबार और समाचार चैनल प्रायः रोज ही परोसते रहते हैं । साथ ही उसे पकडने के समाचार भी लेकिन कभी उन लोगों की गिरफ्तारी का समाचार नही पढा गया । क्यों अखबारों की चीख-पुकार के बावजूद कोई कार्यवाही नही होती ?
आम आदमी समस्याएं को पढता है पर उसके समाधान का सुखद समाचार उसकी किस्मत में है ही नही । पैसा कमाने का जुनून इस तरह हावी होगया है कि उचित-अनुचित का भेद ही मिट गया है । अब 'मुहब्बत और जंग' नही , पैसा कमाने के लिये सब कुछ जायज़ है । यह प्रवृत्ति भी क्या हत्या या आतंकवादी गतिविधि जैसी ही भयानक नही है ? 
क्या विश्वास और ईमान की हत्या करने वाले लोगों का अपराध किसी हत्यारे के अपराध से कम है ? मेरे विचार से तो उससे भी अधिक भयानक और वीभत्स है । पर उनके लिये सजा क्यों नही ? क्यों उनका अपराध सिर्फ पैसा कमाने के लिये पकडा जाता है ?  
अब एक और कठोर सत्य----    
गाँव में आय का कोई निश्चित साधन न होने के कारण या कि जो है उससे ज्यादा कमाने के उद्देश्य से लोग शहर में आकर दूध का धन्धा अपना रहे हैं । हालाँकि गाँवों में जहाँ पशुपालन काफी आसान है ,वही शहर में बहुत ही मँहगा और मुश्किलों भरा है । इसमें कोई सन्देह नही कि दूधवाले जिस कठोर परिश्रम ,गोबर गन्दगी को सहकर लोगों के बर्तन में दूध पहुँचाते हैं , वह निश्चित ही काफी कठिन व असुविधाजनक है । उनके प्रयासों से ही कुछ रुपए देकर ग्राहक शुद्ध दूध ले पाते हैं और साथ ही कृत्रिम दूध के जहर से बचे रहते हैं लेकिन इस शुद्ध दूध के पीछे भी एक भयानक काला सच है जिसे प्रायः नही देखा जाता । 
वैसे तो पशुओं या दूसरे प्राणियों के अधिकार व जीवन को छीनकर ही मानव जीवन आबाद है । रोज लाखों-करोडों मासूम ज़िन्दगियाँ मानव का आहार बनतीं हैं । सुबह कई बस्तियों में नालियों में पानी की जगह खून बहता है । सरेआम दुकानों में खाल उतरे जानवर लटके रहते हैं । 
यही नही उनके अधिकार भी मानवीय आवश्यकताओं की भेंट चढते हैं । चाहे वह माँस ,शहद या दूध हो । 
सच तो यही है कि भैंस या किसी भी माँ का दूध सिर्फ उसके बच्चे के लिये ही होता है । मधुमक्खियाँ भी शहद अपने बच्चों के लिये ही जुटातीं हैं हमारे लिये नही ,लेकिन व्यवसाय व मानवीय उपयोगिता के चलते इस तथ्य को कुछ अनदेखा करना तो स्वाभाविक भी है और व्यावहारिक भी । लेकिन जिस निर्ममता के साथ बाजारवादी मानसिकता सामने आ रही है वह मानवता पर एक गहरा प्रश्न छोडती है कि यह व्यावसायिकता आखिर किस हद तक जाएगी ।
सब जानते हैं कि बच्चे को पिलाने के लिये ही माँ का दूध उमडता है । इसलिये गाय-भैंस आदि का दूध निकालने से पहले उसके बच्चे को छोड दिया जाता है और जैसे ही दूध की धार तेज होती है बच्चे को हटा लिया जाता है और दूध बर्तन में दुह लिया जाता है । 
गाँवों में जहाँ अभी बाजार इतनी हृदयहीनता के साथ नही फैला है ,लोग बच्चे को शुरु में दूध पीने से एकदम नही हटाते और बाद में भी छोडे हुए दूध को पीने के लिये बच्चे को छोड देते हैं । हालाँकि अब डेयरी-सिस्टम के कारण लोग उतने उदार नही रहे लेकिन शहर में दूध का व्यवसाय जिस अमानवीयता के साथ चल रहा है देखकर दूध के उपयोग पर ही खेद होने लगा है । 
होता यह है कि अगर भैंस ने पडा ( नर-शिशु ) को जन्म दिया है तो वह कुछ ही दिन माँ का दूध चख पाता है । फिर उसे भूखा रखा जाता है ताकि वह जल्दी ही दुनिया से विदा ले ले और मालिक का दाने-चारे का खर्च बच जाए । अब बिना बच्चे के दूध कैसे निकले इसके लिये एक उपाय है इंजेक्शन द्वारा भैंस की नसों में एक दवा पहुँचाई जाती है ,जो नसों में उत्तेजना पैदा करती है और भैंस का दूध अनायास ही उमड आता है । कृषक इसका उपयोग फल व सब्जियों की जल्दी और ज्यादा बढत के लिये उपयोग में लाते हैं । उन सब्जियों की तरह ही यह दूध भी काफी हानिकारक होता है । 
चूँकि जानकार लोग इंजेक्शन वाले दूध को लेने से इनकार करने लगे हैं इसलिये कुछ भैंसवाले एक और अमानवीय तरीका अपनाते हैं । मृत पडा ( बच्चे ) का सिर काटकर उसकी माँ के सामने रख देते हैं ताकि वह अपने बच्चे का मुख देखकर दूध दे सके । यह एक हृदय-विदारक सच है । एक माँ के साथ किया गया क्रूर छल । ऐसे दूध वालों के पास कई तर्क हैं जिनमें सबसे प्रमुख है कि वे कोई धोखा नही कर रहे । ग्राहकों को कम से कम नकली और हानिकारक दूध तो नही दे रहे । केवल मिट्टी हुए शरीर का ही तो उपयोग कर रहे हैं ।
इस उत्तर के बाद ग्राहक को निरुत्तर होना ही है । संवेदनाओं को कहीं दफ़न कर अब जब ,"अपना काम बनता तो भाड में जाए जनता " वाली मानसिकता फल-फूल रही है तब दोष किसे दिया जाय ,क्रेता या विक्रेता को या फिर पूरे समाज को।