Tuesday, November 25, 2014

हिमालय की गोद में --४

26 नवम्बर --
यह वृतांत आप सबके प्रिय प्रशान्त के लिए .
आज पैंतीस वर्ष पूरे कर चुका प्रशान्त ,जो मेरा केवल बेटा ही नहीं है , बल्कि वह माँ , पिता ,मित्र  सब कुछ बनकर  रहना चाहता है .रहता है .उसकी भावनाओं का प्रतिफल मैं दे पाई हूँ या दे पाऊंगी ऐसा मुझे नही लगता . बस दिल से यही आवाज आती है  की उसे वह सब कुछ मिले जो उसकी आकांक्षाओं में है . अनंत स्नेह व शुभकामनाएँ .
------------------------------------------------------------------------------
५ नवम्बर
लाचुंग से वापस गंग्टोक
मैम , ‘सेवन-सिस्टर्स’ से ही चलें ?—लाचेन से लौटते हुए जब हम चुंगथांग पहुंचे तो रवि ने परिहास करते हुए सुलक्षणा से पूछा . वहां से गंग्टोक के लिए कोई रास्ता चुनना था .

Spend some time at one of the most picturesque and unique waterfalls in Sikkim
सेवन-सिस्टर्स फाल 
बात यह थी कि आते समय हम ‘सेवेन-सिस्टर्स’ (सिक्किम का एक प्रसिद्ध झरना) वाले रस्ते से आए थे .सुलक्षणा ने इन्टरनेट पर ‘सेवन-सिस्टर्स’ के बारे में काफी अच्छी राय पढ़ रखी थी इसलिए उसी ने रवि को खासतौर पर उसे देखने की इच्छा जताई थी लेकिन ‘सेवन-सिस्टर्स’ वाला रास्ता न केवल कच्चा था बल्कि काफी ऊबड़-खाबड़ भी था . साथ ही शारीरिक व मानसिक थकान देने वाला भी ,लेकिन उससे भी अधिक निराशा-जनक था ‘सेवन-सिस्टर्स’ फाल . वैसे और उससे कई गुना अच्छे बेशुमार झरने हमें आगे रास्ते में मिले थे .
ना भैया , अब कोई दूसरा ही रास्ता देखना . –सुलक्षणा ने कहा तो रवि ने एक हंसी बुलंद की और गाड़ी एक अलग रस्ते पर स्वतन्त्र छोडदी .यह रवि का घर लौटने का उत्साह था या उसके फोन पर बीच-बीच में आरहे संदेशों का प्रबल आग्रह था ,जो दिल कहे रुक जा रे रुक जा, की मनुहार करने वाला ,सघन वृक्षावलियों से सज्जित मनोरम रास्ता भी कार की गति को मंथर बनाने में असमर्थ हो रहा था और  कार अबाध गति से दौड़ी चली जा रही थी . सर्पिल सा रास्ता कभी तीस्ता से बतियाने के लिए नीचे झुकता तो कभी शिखरों को छूने की मंशा से ऊपर की ओर छलांग लगा देता .लगभग छः घंटे की उस फिल्म में लगभग एक से ही दृश्यों—हरीतिमाच्छादित पर्वत-शिखर , शिखरों को तकिया बनाकर जब चाहे आ पसरने वाले मनमौजी बादल , कल-कल करते उछालते-मचलते झरने , भ्रमित कर देने वाले मोड़, पत्थरों व शिलाओं को वाद-विवाद में हराकर जीत की उमंग में इतराती हुई सी निर्बाध बहती तीस्ता-- की पुनरावृत्ति होती रही फिर भी ऊब का कही कोई नाम नहीं .

 कुछ पल ओझल रहकर अचानक सामने या आजू-बाजू में प्रकट हो जाने वाली तीस्ता को देख बरबस ही सावित्री की कहानी याद आती थी कि मनचाहा वरदान देने के बाद भी यमराज जब भी 
तीस्ता-सुकुमारी  

मुड कर देखते सावित्री को पीछे आती हुई देखते थे .हारकर  उसे और एक और वरदान दे देते थे ताकि वह पीछे आना छोड़ दे .
यहाँ पर्वत शिखर भी तीस्ता को अपने साथ अनवरत चलती पाते हैं तो पूछते हैं कि अरे तीस्ता सुकुमारी ! अभी तक साथ चली आ रही हो ? अब क्या चाहिए ? अच्छा ,लो एक और झरना ले लो ..और यह एक नन्ही नदी भी सम्हालो.. बस अब ठीक है ?
पर्वत एक सलोने चंचल झरने को सस्नेह तीस्ता की गोद में डाल देता है .एक उछलती-कूदती नदी हाथ उसके हाथ में दे देता है .तीस्ता फूली नहीं समाती , लेकिन क्या पीछा छोड़ती है ? जहाँ तक  पिता पर्वतराज का स्नेहिल सम्बल मिलेगा उसका बचपन विदा नही होगा . वह वैसे ही इठलाती-इतराती और उछलती–कूदती चलेगी चंचल बालिका सी और सारा स्नेह खुद समेट, पर्वतराज का ह्रदय अशेषकर मानो पूर्ण यौवनमयी होकर ही पिता के घर से विदा होगी . भला तीस्ता के अलावा कोई और उस वात्सल्य का अधिकारी कैसे हो सकता है ! 
रवि ने आज अँधेरा होने से पहले गंग्टोक पहुंचाकर पुरस्कार का ही काम किया .वह यों कि मेरी इच्छा गंग्टोक के बाज़ार को और ठीक से देखने की और वहां की कुछ खास चीजें खरीदने की थी . मान्या की आँखें तो अँधेरा होते ही गंवई रास्ते की तरह उनीदी हो चली थी . सुलक्षणा भी काफी थक गयी थी .उसकी गर्दन में हल्का दर्द भी था .उसे कुछ दवाइयों की जरूरत थी .सो मैं और प्रशांत बाज़ार के लिए निकले लेकिन हमारी पूरी योजना पर तुषारापात होगया जब हमने बाज़ार को एकदम सुनसान देखा .सारी दुकानें बंद थीं . पता चला कि आज सिक्किम के शाही घराने के किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति का देहावसान होगया है .
सिक्किम सन १९७५ में भारत का बाईसवां राज्य बना था .सिक्किम में राजतन्त्र की स्थापना १६४२ में राजकुमार फुन्त्सोंग नामग्याल ने की थी .सिक्किम को शुरू से ही राजनैतिक संकटों का सामना करना पड़ा .कभी नेपाल और भूटान के आक्रमण कभी चीन की स्वार्थपूर्ण दया तो कभी ईस्ट-इण्डिया की दुरभिसंधियाँ . इन सारी मुसीबतों का अंत हुआ १६ मई १९७५ में जब सिक्किम की ओर से आए प्रस्ताव को स्वीकार कर उसे भारत में मिला लिया गया .इस तरह सिक्किम को एक सशक्त संरक्षण मिल गया और भारत को एक बहुत खूबसूरत राज्य . 
    
हाँ.. तो हमने बाजार को बन्द पाया .अच्छा यह था कि एक-दो मेडिकल–स्टोर खुले थे सो कुछ दवाइयाँ खरीदकर प्रशांत और मैं कुछ देर शांत सूनी सड़क पर टहलते रहे. बाजार की तरह ही मन भी नीरव था .जब बाहर सब शांत और नीरव होता है तब मन बोलता है .बीते पांच दिनों की अनुभूतियाँ मन को गुंजित व आलोकित कर रही थीं वहीँ दूसरी ओर आगामी कल के विचार से मन का हाल जल-संकोच विकल भई मीना.. जैसा हो रहा था ,जब हम बागडोगरा से अलग हो जाने वाले थे . प्रशांत व सुलक्षणा वहां से कोलकता ,फिर बेंगलुरु और मैं दिल्ली ,वहां से ग्वालियर .क्योंकि बच्चों से मिलना वर्ष में एक बार ग्रीष्मावकाश में ही हो पाता है इसलिए सान्निध्य के वे पल गुल्लक में सहेजे गए पैसों जैसे लगते हैं .  
६ नवम्बर       .  
जिस समय हमने ‘याबची’ छोड़ा, हिमाद्रि-शिखर कोहरे की चादर ओढ़े उन्निद्र थे लेकिन किरनों ने  सड़कें बुहारना शुरू कर दिया था , तमाम अँधेरा झाड—समेट जाने किस कूड़ेदान में फेंक दिया गया था .सारा शहर जाग गया था .
अब ‘जाइलो’ चक्कर काटती हुई किसी झूले की तरह नीचे उतर रही थी .हमारा मन बहुत सी खूबसूरत यादों को समेटे द्रवित और कृतज्ञ होकर गंग्टोक को अलविदा कह रहा था .

सिक्किम के अंचल में पांच दिन बिताने के बाद पर्वतराज के लिए मन में जो भाव जागा है ,मुझे अपना नाम सार्थक लग रहा है . एक पिता की कठोरता व पौरुष के प्रतिरूप उत्तुंग प्रस्तर-शिखर ,और ह्रदय में अनवरत प्रवाहित स्नेह व करुणा सी अनंत-सलिला नदियाँ ,सतत कर्मशील और ऊर्जा के उपमान झरने .. धैर्य व अनुशासन का अनिवार्य अभ्यास कराते संकरे मार्ग.. एक पिता का ही तो स्वरूप है यह महानगाधिराज हिमालय .
इतने उच्च व महान न सही लेकिन कठोरता व अनुशासन के लिये मुझे काकाजी( मेरे पिता ) अक्सर याद आते हैं . साथ ही वह ‘नदी’ भी, जो कभी मेरे ‘गाँव’ से नहीं गुजरी . वह नदी आज भी मेरे लिए कही दूर टिमटिमाते हुए तारे जैसी है ...खैर..

तीस्ता पर बना एक  खूबसूरत पुल .दांई और भूटान के लिए रास्ता है 
बागडोगरा तक पहुंचाकर रवि ने हम लोगों से विदा ली .इन छह दिनों में वह इतना अपना सा लगने लगा कि उसका लौटना अप्रिय लग रहा था . हालाँकि उसे तो बागडोगरा से एक परिवार को सिक्किम ले जाने का दायित्त्व दो दिन पहले ही मिल चुका था और वह उस परिवार से मिलने में व्यस्त भी हो गया . एक नवम्बर को जब वह हमें लेने आया था तब भी किसी को छोड़ने आया था .हमारे जैसे लोग उसे रोज मिलते हैं .सबसे वह बेशक इसी तरह घुलमिल जाता होगा . लेकिन क्या सबको वह इतनी आत्मीयता से अपनी कहानी भी सुनाता होगा ?
अट्ठाईस-तीस वर्ष का रवि अपनी मां को खो चुका है .रिश्ते के नाम पर अपने पिता को भी .पिता ने उसकी मां के रहते ही दूसरा घर बसा लिया था .माँ ने पिता की इच्छा का विरोध नहीं किया लेकिन विमाता ने उससे व उसकी माँ से एक पिता व पति को हमेशा के लिए दूर कर दिया . कुछ समय बाद माँ चल बसी . एक गहरा ज़ख्म खाकर भी रवि ने खुद ही अपने-आप को सम्हाला . अब वह एक सुशील संगिनी के साथ अपना घर बसा चुका है. हर हफ्ता न जाने कितने दिलों में भी.... हमेशा उन्मुक्त हँसी बिखेरने वाला जिंदादिल रवि हमारी स्मृतियों में भी सदा के लिए बस गया है .
जैसे मिसरिहू में मिली ,निरस बांस की फाँस
बागडोगरा तक के निर्बाध अविरल आनंद में एक अवरोध उत्पन्न हुआ .वह यों कि बागडोगरा एयरपोर्ट पर बोर्डिंग कराते समय पता चला कि मेरी फ्लाईट (बागडोगरा से दिल्ली ) कैंसिल होगई है  अब दिल्ली के लिए जो फ्लाईट मिल रही थी वह न केवल कोलकाता से थी बल्कि लगभग छः घंटे अधिक लेने वाली थी . इसके लिए पहले बागडोगरा से कोलकाता जाना था वहां से लगभग छः घंटे बाद दिल्ली के लिए फ्लाईट थी . इस सूचना को हमने किसी हादसे की तरह सुना .खासतौर पर प्रशांत ने .वह बेहद परेशान हो गया . उसकी परेशानी के पीछे 'स्पाइसजेट' वालों की लापरवाही और खराब सेवा तो थी ही साथ ही कुछ और बातें भी थी जैसे , 
(1)     उस फ्लाईट के ( जो कैंसिल हो गयी थी) दिल्ली पहुँचने के समयानुसार प्रशांत ने ग्वालियर के लिए तीन-तीन ट्रेनों के टिकिट बुक करवा रखे थे ताकि मुझे ट्रेन छूट जाने की चिंता न सताए .लेकिन अब चिन्ताएं बढ़ ही गईं थी .
 नई फ्लाईट का दिल्ली पहुंचने का समय रात के साढ़े ग्यारह था जो मेरे लिए असुविधाजनक था .मुझे बाहर जाने आने का बहुत अनुभव नहीं है .हालांकि  मैं सम्हाल सकती हूँ लेकिन प्रशांत मेरी असुविधा और उससे ज्यादा सुरक्षा को लेकर बहुत ;चिन्तित व तनावग्रस्त होगया---मम्मी एकदम नई जगह पर अकेली इतनी देर कहाँ ,कैसे इंतजार करेगीं .दिल्ली में इतनी रात गए कहाँ जाएंगी ? लेने भी कौन आएगा ? यों तो दिल्ली में कुछ परिचत ,मित्र व रिश्तेदार हैं लेकिन ऐसे में गुडगाँव में बंटी चाचा के अलावा किसी को यह दयित्त्व नही दिया जा सकता .लेकिन क्या उन्हें आधीरात को परेशान करना ठीक होगा ?       
इन बातों का ध्यान कर बस वह स्पाइसजेट के अधिकारियों पर बरस पड़ा--- अगर फ्लाईट कैंसिल होगई थी तो उसकी सूचना देनी चाहिए थी न ?
सर , हमने फोन किया था पर आपका फोन बन्द था .
ऐसे कैसे बन्द था ? कल शाम से फोन बराबर आ रहे हैं .एयरइण्डिया के मैसेज भी तो मिले थे हमें.
आइ कान्ट डू एनिथिंग अबाउट इट सर ..?—वह कुछ लापरवाही से बोला तब प्रशान्त ने सामने वाले को उसी की भाषा में (अंग्रेजी में ) इतना खींचा कि उसने गलती मानते हुए क्षमा मांगी और कोलकता में हर सम्भव मेरी सहायता का आश्वासन दिया . इसके आलावा कोइ चारा भी नहीं था  प्रशान्त फिर भी निश्चिन्त नहीं था .
बेटा ,मैं कर लूँगी . चिंता की कोई बात ही नहीं है . मैं कोई बच्ची हूँ क्या ?—मैंने उसे समझाया—फिर लगभग आधा घंटा बाद तुम भी तो कोलकाता पहुंचने वाले हो . यह तो अच्छा ही है न कि हम कुछ पल और साथ गुजार सकेंगे .
कोलकाता में जब मैं विमान से उतरी ,स्पाइसजेट के दो कर्मचारियों ने मुझे ससम्मान उचित स्थान पर पहुंचा दिया . हालांकि उस सहायता की मुझे जरूरत नहीं थी पर यह प्रशान्त का निर्देश था .मेरे कुछ ‘अपनों’ की तरह मेरा बेटा भी मुझे ‘बच्ची’ ही मानता है न !
मुझे कभी कभी अफ़सोस होता है कि मैं उसे अभी तक अपनी ओर से निश्चिन्त नही कर सकी हूँ . यह मेरी कमजोरी है या उसका गहरा लगाव .या कि शायद दोनों ही .
४.१५ पर उनकी फ्लाईट भी कोलकाता पहुंच गई. मान्या मुझसे दोबारा मिलकर खूब चहक रही थी .उसका मन उस कहानी को पूरी सुनाने का था जो बागडोगरा तक पूरी नहीं हो पाई थी लेकिन उतना समय नहीं था .
बेंगलुरु के लिए फ्लाईट छह-दस की थी और पांच–पचास पर प्रशान्त मुझे तमाम चीजें समझा रहा था—मम्मी ,देखो वहां मोबाईल चार्ज कर लेना..उधर पानी है ..उस तरफ टायलेट है और सुनो ना...वहां खाने–पीने का सामान है ..
जूस बिस्किट ..सब कुछ तो रख दिया है तूने ..अब जा बेटा फ्लाईट का टाइम हो रहा है . सुलक्षणा चिन्तित हो रही होगी .
मम्मी मेरी बात नहीं सुनती हो .—मेरी बात पर वह कुछ खीज उठा फिर समय की कमी देख मानो खुद को समझाते हुए बोला---"ठीक है मम्मी मैं निकलता हूँ . अपना ध्यान रखना ".
 उसकी आवाज की बेवशी मैंने स्पष्ट महसूस की .मेरा दिल भर आया . मेरा पैंतीस वर्षीय बेटा ,'इसरो 'में सीनिअर साइंटिस्ट , एक पिता की तरह मेरा ध्यान रखता है एक माँ की तरह चिंता करता है .उसे यों जाते हुए देख अंदर जमी सारी बर्फ एक साथ पिघल उठी .आँखों से भरभराकर एक धारा उमड़ पड़ी .ऐसे में मुझे सचमुच ही अपने अंदर एक नासमझ सी बच्ची महसूस होती है जिसे संबल और सांत्वना की बहुत जरूरत होती है ,लेकिन तभी मुझे स्थान और परिवेश का ध्यान आया , अपनी उम्र ,पद और समझ की  समझ आई और तुरंत सभ्य लोगों की तरह टायलेट में जाकर आँखें धो आई . 
प्रशान्त-सुलक्षणा बेंगलुरु में घर भी पहुंच गए तब भी मैं कोलकाता एयरपोर्ट पर बोर्डिंग का इंतजार कर रही थी .
साढ़े ग्यारह पर विमान दिल्ली पहुंचा . बंटी भैया ,सोनिया ( उनकी पत्नी ) और पांच साल का बेटा मेरे इंतजार में खड़े थे .बंटी भैया का असली नाम बड़ा क्लासिक है (जो मुझे याद भी नहीं है ) पर उन्हें सभी इसी नाम से जानते हैं . उन्हें भी इसी नाम से पुकारना अच्छा लगता है. वे हमारी छोटी बुआ सास की सात बेटियों के इकलौते भाई हैं . देखने में जितने शांत सौम्य उतने ही विचारों व व्यवहार में आत्मीय और शालीन.


ससुराल में जिन छोटे बड़ों की आत्मीयता मुझे प्राप्त है उनमें ये बुआजी सबसे आगे हैं . कम सुनती हैं . बिना मशीन के बिलकुल नहीं .पर संवादों में कभी कोई कमी नहीं होती . मुझे देख वे खिल उठीं . क्योंकि छह बजे शताब्दी प्रस्थान कर देती है इसलिए गुडगाँव से सुबह पांच बजे निकलना ही था पर यह सुनकर पहले तो वे मानने ही तैयार न थीं पर मैंने अपनी मजबूरी बताई ,तब वे मान गईं. सो हममें से रात भर कोई नहीं सोया . इन छोटी बुआ जी के बारे में कभी अलग से लिखना ही होगा . फिलहाल यही कि ऐसे लोग दुर्लभ  हैं आज के दौर में ..     

Thursday, November 13, 2014

हिमालय की गोद में --3

लाचेन से लाचुंग 
----------------
'गुरुडोंगमार' से लौटते हुए हम सब बहुत थके हुए थे । सिर भारी हो रहा था ,लेकिन आराम करने का अवकाश नही था । 'ईकोनेस्ट'  में दोपहर का भोजन मात्र सब्जी और पनीर के साथ चावल के रूप में मिला । रोटियाँ नही थीं । कारण पूछने पर खाना परोसने वाली छोटी सी लड़की ने संकोच के साथ कहा--"आंटी (गृहस्वामिनी) बाहर गईं हैं सो रोटियाँ बनाने वाला कोई नही है ।"

"कोई बात नही गुड़िया । खाना बहुत अच्छा है ।"--प्रशान्त ने कहा । यह सुनकर लड़की काफी सहज लगने लगी ।  
 मुझे चावल कम पसन्द हैं । सो मैंने कम ही खाया । सफर की दृष्टि से मेरे लिये यह अच्छा ही है । घंटों गाड़ी में बैठे-बैठे विधिवत् पाचन नही होपाता ।
हालांकि उस समय तन-मन दोनों को ही कुछ देर आराम की जरूरत महसूस हो रही थी लेकिन विश्राम की चाह लक्ष्य प्राप्ति में हमेशा ही बाधा बनती है फिर जब रवि ने लेट होजाने पर रास्ते में अँधेरा होजाने की बात भी कही तो फिर रुकने का प्रश्न ही नही था । पहाड़ी जंगलों के अँधेरे ,सँकरे और सुनसान रास्तों पर चलने से अच्छा था कि बिना रुके चल पड़ते ।
लाचेन और गंग्टोक के बीच में 'चुंगथांग' कस्बा है जो लाचेन और लाचुंग नदियों के संगम पर बसा है । 

ये दोनों नदियाँ भी असंख्य झरनों की तरह ही तीस्ता में मिलकर तीस्ता होजातीं हैं । एकता और समन्वय का यह बहुत ही अनुकरणीय उदाहरण है ,जिसका परिणाम है सिक्किम की वादियों को जीवन ,सौन्दर्य व संगीत देने वाली सदानीरा तीस्ता । हल्दी की एक गाँठ रखकर पंसारी बनने का अहं या अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग आलापने की प्रवृत्ति कभी उदार विस्तृत और सुन्दर परिणाम नही दे सकती ।
यहीं से एक रास्ता लाचुंग के लिये जाता है। सिक्किम का यह भाग अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर और विकसित है । पहाड़ ,नदी और झरनों का वैभव तो पूरे सिक्किम में कदम-कदम पर बिखरा है पर इधर सड़कें अधिकांशतः पक्की हैं । जहाँ नही हैं वहाँ बनाई जा रही हैं ।

लाचुंग का विहंगम दृश्य
लगभग 9600 फीट की ऊँचाई पर बसा खूबसूरत पहाड़ी कस्बा लाचुंग उत्तरी सिक्किम का आखिरी जिला है । लम्बाई में बसा यह कस्बा अपनी पूरी सुन्दरता व जीवन्तता के साथ अपने मेहमानों का स्वागत करता है । कस्बा के अन्तिम हिस्से में बने होटल 'फॉर्चूना' में हमारा रात्रि विश्राम था । यहाँ आरामदायक कमरों के साथ खाना भी काफी अच्छा मिला ।
 सुबह सात बजे हम लोग युमथांग घाटी की ओर निकल पड़े । रात में बारिश होगई थी इसलिये युमथांग घाटी में प्रभूत मात्रा में बर्फ बिखरी मिलने की पूरी संभावना थी । और वही हुआ । युमथांग के लिये सड़क अच्छी है सो रवि गाड़ी को और भी उन्मुक्त होकर चला रहा था और साथ ही हमें बताता भी जा रहा था कि वो जो पत्थरों का ढेर है भूकम्प से हुई तबाही की निशानी है । ..ये बुरांश के पेड़ हैं । अगर आप फरवरी मार्च में आते तो पूरी घाटी बुराँश के फूलों से लदी मिलती ..। 
बुरांश की बात चली तो मुझे उत्तराखण्ड के भाई हेमराज बालसखा की याद आई ( जो अब नही है ) भाई हेमराज मुझे बाल-साहित्य की एक कार्यशाला में मिले थे । बहुत ही सरल सहज संवेदनशील रचनाकार होने के साथ अच्छे शिक्षक भी थे । अपने पत्रों में वे अक्सर बर्फ और बुराँश के फूलों की चर्चा करते थे । बुराँश शायद उत्तराखण्ड का राज्य-पुष्प भी है । वहाँ के राज्य शिक्षा-केन्द्र की पाठ्य-पुस्तकों में कक्षा 7 की हिन्दी की पुस्तक का नाम भी बुरांश है । उसी में मेरी एक कहानी भी है । खैर...
युमथांग वैली तक पहुँचते-पहुँचते हम सबका उल्लास उत्तेजना में बदल गया । हिमालय पूरे दल-बदल सहित पत्ते-पत्ते पर आ जमा था । हरे पेड़-पौधे पूरी तरह सफेद थे । सुलक्षणा बार बार 'ओ माइ गॉड' कहकर कहते छोटे बच्चों की तरह चहक रही थी और वही क्यों ,मेरा भी तो वही हाल था । बर्फ की बारिश ने हमें तन-मन सहित पूरी तरह भिगो दिया ।

बेमौसम की बारिश में फसल के लिये हानिकारक होते हुए भी ओलों के लिये मन में जबरदस्त आकर्षण होता है, जो बटोरते बटोरते पिघलकर उँगलियों से फिसल जाते हैं पर यहाँ तो बर्फ का अपार वैभव बिखरा था । जितनी चाहो उठालो । गेंद बनाकर उछालो । सचमुच वह एक अद्भुत अपूर्व अनुभव था । विशेष बात यह कि इसके बावज़ूद वहाँ चुभन वाली सर्दी नही थी ।
लगभग 12000 फीट की ऊँचाई पर स्थित युमथांग-वैली का भ्रमण इस यात्रा का सबसे प्यारा और अविस्मरणीय अनुभव है । इससे प्रशान्त इतना उत्साहित हुआ कि रवि को अतिरिक्त तीन हजार रुपए देकर जीरो-पॉइंट तक चलने तैयार होगया । जीरो-पॉइंट पहले हमारी भ्रमण-योजना में नही था ।

शून्यता ही महसूस होती है यहाँ 
कम से कम 15000 फीट की ऊँचाई पर स्थित जीरो-पॉइंट अपने नाम के अनुरूप शून्य का ही अनुभव कराता है जैसे इसके आगे अब कुछ नही है । चारों ओर बर्फ ही बर्फ । बर्फ के शिखर, बर्फ की चट्टानें ,बर्फ की रेत और बर्फ से ही पिघलकर बहती नीली नदी । 
उस सीमातीत बर्फ के मैदान में अगर चाय-काफी, मैगी ,चाट आदि की दुकानें सजाए , साग्रह बुलाते , जीवन के रंग बिखेरते सस्मित चेहरे न होते तो मुझे वह पॉइंट सुन्दर कम वीरान और भयावह ज्यादा लगता । भले ही मेरी सोच संकीर्ण , भीरु या आध्यात्म तक पहुँचने में असमर्थ है पर वास्तव में मनुष्य-विहीन प्रकृति मुझे लुभाती नही है। 
ऋषि-मुनि हिमालय ऐसे ही दुर्गम और वीरान स्थानों में , कन्दराओं में एकचित्त होकर ईश्वर का ध्यान करते होंगे । हम साधारण लोगों के वश की बात कहाँ ?


शून्य में भी जीवन 
प्रशान्त जब उत्साहित होता है तो अपने साथ सबको खींच लेता है चाहे कोई चाहे न चाहे और उसके साथ मुझे भी किसी परेशानी का अनुभव नही होता । यह मन की बात है । मैंने भी मान्या व सुलक्षणा के साथ बर्फ की रेत अंजुरी में भर कर देखी एक दूसरे पर फेंकी । फोटोग्राफी की । बर्फीले पानी को छूकर देखा । लेकिन शरीर मन का साथ कहाँ तक देता । साँस तो पहले से ही कमजोर बैलों के कन्धों पर बहुत ज्यादा भरी हुई गाड़ी की तरह या प्रतिकूल हवा में किसी तरह पैडल मार कर खींची जारही साइकिल की तरह मुश्किल से आ जा रही थी उस पर हड्डियों तक को जमा देने वाली ठण्डक । मुझ पर अचानक बेहोशी सी छाने लगी । मैं प्रशान्त को बिना बताए तेजी से गाड़ी की ओर आगई । वह मेरी दशा से अनभिज्ञ पुकारता ही रहा --"मम्मी आओ ! देखो कितना अच्छा लग रहा है !"
'मुझे परेशान पाकर वह ज्यादा परेशान होजाएगा' --मैं उसके उल्लास को कम नही करना चाहती थी साथ ही यह भी कि जो भी परेशानी है कुछ क्षणों की है ,यही सोचकर मैं किसी तरह से गाड़ी तक आगई । पर वह सचमुच एक भयावह अनुभव था । एक असहनीय सी बेचैनी । हाथों व पैरों की उँगलियाँ गल नही जैसे जल रही थीं । साँस लेना मुश्किल हो रहा था । 
रवि ने तुरन्त गर्म कॉफी का कप मेरी उँगलियों में थमाया । प्रशान्त-सुलक्षणा भी शायद मेरे इस तरह चले आने के कारण ही गाड़ी पर लौट आए । 
"क्या हुआ मम्मी ?"
"बस थोड़ी सी सर्दी है ।"--मैंने उन्हें निश्चिन्त करने के लिये कहा पर मुझे काफी बेचैनी हो रही थी । सुलक्षणा ने मेरी हथेलियों को रगड़ा । कुछ धूप की गर्माहट भी मिली । कुछ देर बाद मैं सामान्य होगई।

'जीरो-पॉइंट' से लौटते समय एक परिपूर्ण अनुभव के साथ थकान भी थी । यमथांग वैली में सुलक्षणा फिर से कुछ देर और हिमाच्छादित पेड़-पौधों के साथ और बोल-बतियाना चाहती थी ।
"अब बर्फ शायद नही मिलेगी ।"--मैंने कहा पर सुलक्षणा को यह कतई स्वीकार्य न था । बच्चों की तरह मचलकर बोली---"मम्मी ऐसा न कहो । बर्फ तो मिलनी चाहिये । "लेकिन बर्फ सचमुच नही मिली । बारिश के कारण जमी बर्फ को धूप ने धो डाला था । पेड़ धुले-निखरे खड़े थे ।

बर्फ की चादर उतर गई
कुछ ही दूर पर गर्म पानी का स्रोत है । बर्फ के बीच गरम पानी ..है न चमत्कार । अभी तक हमने गौरी कुण्ड के बारे में सुना था कि वहाँ एक कुण्ड में इतना गर्म पानी रहता है कि उसमें चावल पक जाते हैं पर यहाँ तो साक्षात् पानी छूकर देखा । चावल पकने जितना गर्म न सही पर गर्म था ,यही क्या कम विस्मय की बात है । 

युमथांग-वैली और जीरो-पॉइंट हमारे इस सफर के अन्तिम भ्रमण-स्थल थे । अब हमें लाचुंग लौटकर शाम होने तक गंग्तोक पहुँचना था और अगली सुबह बागडोगरा ।

अगली कड़ी में समापन । 

Tuesday, November 11, 2014

हिमालय की गोद में --2

3 नवम्बर
गंग्टोक से लाचेन

----------------------
कल नाथुला से लौटते हुए अँधेरा होगया था और इतनी थकान भी होगई कि बाजार जाकर कुछ शॉपिंग करने का विचार छोड़ना ही पड़ा । यहाँ जितनी जल्दी सुबह होती है ( हालाँकि सूरज किसी सभापति की तरह देर से ही आता है और शाम होने से पहले ही चल भी देता है ।) उससे कही ज्यादा जल्दी शाम होजाती है । चार बजे ही सूरज पर्वत के पार जाने की तैयारी कर लेता है इसीलिये सभी कार्यालय चार बजे बन्द होजाते हैं (जैसा रवि ने बताया) ।
आज लाचेन पहुँचना है । कल शाम को ही तय होगया था कि साढ़े सात बजे तक हम लोग निकल जाएंगे लेकिन रवि का दस बजे तक कोई अता-पता नही । होटल मालिक लामाजी सहित सभी परेशान हैं । कई बार कोशिश करने पर फोन द्वारा पता चला कि वह कहीं ट्रैफिक में फँसा है । 

व्यग्रता भरी प्रतीक्षावधि का अन्त दस बजे हुआ । तब तक सफर का उत्साह असन्तोष व हल्के तनाव में बदल चुका था लेकिन रवि का चेहरा देख रोष जताने की इच्छा लगभग खत्म होगई ।
लगभग 28 वर्ष का स्वस्थ सुन्दर हँसमुख रवि राय कुशल ड्राइवर है । बातों बातों में उसका बुलन्द ठहाका किसी तेज जलधारा की तरह खामोशी और उदासीनता की कालिमा को दूर बहा लेजाता है । देता है । हँसते समय उसकी छोटी-छोटी आँखें लगभग बन्द होजातीं हैं ।
रवि भाई आज का सफर कुछ ज्यादा ही लेट होगया --प्रशान्त ने कहा तो वह बड़े विश्वास से बोला--नही सर ..हाँ कुछ लेट तो हुआ है पर हम टाइम से पहुँच जाएंगे ।
लाचेन गंग्टोक से लगभग 130 कि.मी.दूर है । साधारण रास्ते में, फिर ज़ाइलो जैसी गाड़ी के लिये  लगभग ढाई या बमुश्किल तीन घटे का सफर है लेकिन लाचेन पहुँचते पहुँचते अँधेरा होगया ।

इलायची के पौधे । इलायची जमीन में मूँगफली की तरह लगती हैं ।
खूबसूरत तीस्ता हर मोड़ पर हमारे साथ रही

याद नही आता कि कितने शिखर पार किये या कि दो चार शिखरों पर ही गाड़ी ऊपर नीचे घूमती रही । कभी खिड़की से शिखर के ऊपरी भाग में कोई गाड़ी चलती दिखती तो आँखें खुली की खुली रह जातीं थीं कि हमें वहाँ तक जाना होगा या कि नीचे झाँकने पर हैरानी होती कि क्या इतने नीचे जाकर आ रहे हैं । सभी शिखर एक जैसे । नीचे तीस्ता नदी की कल कल बहती चंचल धारा हर मोड़ पर हमारे साथ थी । सघन वन के बीच सँकरा मार्ग घनी केशराशि के बीच निकाली गई माँग जैसा था जो वहाँ से गुजरते हुए ही नजर आता था ।
अगर जरा सी चूक से सैकड़ों फीट नीचे तीस्ता में जल समाधि लेने की आशंका को कोई जगह न मिले तो उस मार्ग में अपने आपको भुला देने के अनगिन मनोहर उपादान हैं। समझ में ही नही आता कि कदम कदम पर माँ की गोद से मचलकर उतरते चंचल बालक जैसे झरनों को गिना जाय या ,छोटी छोटी चट्टानों पर उछल-कूद करती तीस्ता की नीलाभ हरीतिमा वाली धारा की उन्मुक्तता के साथ साहचर्य बनाया जाय या घने जंगल में सुनसान रास्तों पर विचरती किशोरियों को अभयदान देती हुई सी पवित्र घाटियों पर मुग्ध हुआ जाय या पहाड़ की ममतामयी गोद में आराम से एक-दो घरों में ही पूरा गाँव बसा लेने की प्रवृत्ति पर चकित हुआ जाय या फिर कठिन दुर्गम राहों को आत्मसात् कर ,सीमित आवश्यकताओं में ही परिपूर्णता का अहसास करने वाली अलौकिक सी चेतना के आगे नत-मस्तक हुआ जाय ..। इतनी व्यस्तता में कैसी दुर्गम दूरी और कैसी थकान ।

छोटे चंचल झरने तो पग पग पर आपका स्वागत करते हैं ।

लाचेन में लामाजी ने कोई ईको-नेस्ट नामक होटल बुक किया था । मजे की बात यह हुई कि इस नामके होटल की जानकारी किसी को नही थी । ऊपर से नीचे ,इधर से उधर कई चक्कर लगाने और लोगों से पूछने के बाद जो मकान हमें ईकोनेस्ट के नाम पर मिला वहाँ से तो हम कई बार गुजरे थे ।
ईको नेस्ट होटल क्या ,एक मकान था जो घर भी था और उसी में तीन-चार कमरों को कुछ साज-सज्जा व सुविधायुक्त बनाकर होटल का रूप भी दे दिया था । वहीं एक कमरे में खाने का इन्तजाम था जिसे गृह-स्वामिनी ही संचालित करती थी । सो खाना अपने घर जैसा ही मिला ।
गहराती रात और सर्दी के चलते देर तक जागना-बतियाना संभव नही था । पर इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि हमें तीन बजे ही जागकर तैयार होना था । चार बजे तक हर हाल में गुरुडोंगमार झील की ओर प्रस्थान जो करना था ।
दरअसल लाचेन में रात्रि विश्राम उस लगभग 17500 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित झील तक पहुँचने का पड़ाव मात्र है।


4 नवम्बर
सुबह चार बजे जबकि आसमान में तारे पूरी चमक के साथ जगमगा रहे थे । दूर दूर तक सिर्फ अँधेरा था । न कोई पहाड़ न कोई नदी । बस अँधेरा और अँधेरा । लगातार एक घंटे तक गाड़ी की हेडलाइट में सिर्फ रास्ता दिखाई देता रहा । हमारे आगे दो गाड़ियाँ और भी थीं जो गुरुडोंगमार लेक जा रही थीं । सुनसान में तो एक चिड़िया भी सम्बल बन जाती है पर यह हमारा विचार था । रवि तो "चल अकेला...", वाली बेफिक्री के साथ गाने सुनकर झूमता हुआ गाड़ी चलाने में तल्लीन था ।
जब सुर्मई धु्न्ध धीरे धीरे धूसर उजाले में बदलने लगी थी हम ऐसी जगह पहुँच चुके थे जहाँ हरियाली के नाम पर एक झाड़ी भी नही थी । बस गन्तव्य तक पहुँचने की जल्दी में हड़बड़ाती-भागती ,चट्टानों से फिसलती-फलांगती तीस्ता नदी थी ,मटमैली पथरीली जमीन थी ,ऊबड़-खाबड़ रास्ता था और सिर पर सफेद तौलिया सी लपेटे मटमैले धूसर पहाड़ थे । चोटियों पर जैसे किसी ने बड़ी बेतरतीबी से चूना बिखरा दिया था । 

बर्फ को देखना रोम रोम में एक उल्लासमय तरंग जगा देता है । पहाड़ और समुद्र को देखने की अनुभूति लगभग समान ही महसूस हुई फिर भी जाने क्यों पहाड़ मुझे ज्यादा निकट महसूस होते हैं। हरियाली से पूर्ण वंचित हिमाच्छादित श्रृंग सांसारिक माया-मोह से मुक्त हुए तपलीन ऋषि की तरह शान्त ध्यान-मग्न लग रहे थे।
लाचेन से गुरुडोंगमार के लम्बे बर्फीले और थकान भरे सफर में थांगू नामक छोटी सी जगह पड़ाव का कार्य करती है । यहाँ चाय मैगी आदि के साथ बर्फ पर चलने के लिये जूते मिलते हैं । दुर्गम मार्ग में ऐसे पड़ाव अपने घर की अनुभूति देते हैं । बीच बीच में सेना के जवानों का भी सहयोग कम नही होता ।

गुरुडोंगमार झील--एक अलौकिक सा दृश्य

गुरुडोंगमार झील हिमालय की अत्यन्त ऊँचाई पर स्थित झीलों में से एक है । बताया गया कि गुरुडोंगमार बौद्ध गुरु पद्मसंभव का ही एक नाम है । कुछ के मतानुसार से झील का सम्बन्ध गुरुनानक से भी है ।
लगभग 17400 फीट ऊँचाई पर गुरुडोंगमार झील
झील के किनारे पहुँचकर हमारी आँखें झँपकना ही भूल गईं । निरभ्र नीले आकाश तले हिमाच्छादित शिखरों के बीच और नीली झील का सौन्दर्य अनुपम था । आसमान जैसे हमारे अगल-बगल था । झील बहुत बड़ी नही है पर एक बहुत बड़ी नदी को आकार देती है । इसी से निकलती धारा आगे तीस्ता नदी का रूप ले लेती है । रवि ने बताया कि असल में तो तीस्ता का उद्गम एक और झील है-शू लामो, जो यहाँ से चार पाँच कि.मी. दूर है ।
तीस्ता झील में से यों अपना रास्ता बना रही है
वहाँ सेना की इजाजत के बिना नही जाया जा सकता । इज़ाजत ले भी लेते पर हमारे पाँव तो इज़ाजत देने तैयार ही नही थे । वैसे भी वहाँ देर तक नही रुका जा सकता था । बेहद बर्फीली हवा के थपेड़ों के साथ साँसों पर भी एक शिकंजा सा कस जाता है । लगता है कि नसों में खून है ही नही । प्रशान्त के साथ मैं भी नीचे झील तक पहुँच गई । लेकिन वापस चढ़कर आना बहुत भारी पड़ गया ।
वापसी में एक बार फिर थांगू में रुके । लौटते हुए हमेशा ही रास्ता अपेक्षाकृत आसान व सुन्दर लगता है । पर इतना सुन्दर (और खतरनाक भी) होगा यह जाते समय अँधेरे में नही दिखा था ।


पर्वत तेरे कितने रंग
 ऊचाई कम होने के साथ ही पहाड़ों की हरियाली लौट आई थी पर काफी सँकरा और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर खतरे की आशंका उस सौन्दर्यानुभूति में किसी रोड़े की तरह आरही थी ।कभी अचानक आया अँधेरा मोड़ साँसों को स्थिर कर देता ,था पर तीस्ता माँ की तरह हर समय हमारी उँगली थामे रही , यह कहते हुए कि डरने की क्या बात है ।
"झील के लिये इतनी जल्दी जाने का कारण समझ नही आया रवि "--मेरी बहुत देर से कुनमुनाती हुई जिज्ञासा आखिर उठकर बैठ ही गई । रवि ने उसका समाधान करते हुए कहा कि ग्यारह बजे के बाद यहाँ कोई नही रुकता क्योंकि यहाँ हवाएं तेज होजातीं हैं । कंकड़-पत्थर तक उड़ने लगते हैं ।
"तो सैनिक ?"
"उन्होंने तूफानों से दोस्ती करली है।" यह कहकर रवि हँस पड़ा । मैं एक बार फिर सेना के लिये नत-मस्तक होगई । 
लाचेन तक उतरते उतरते सूरज भी उतरने लौटने को तैयार था । हमने जल्दी-जल्दी खाना खाया क्योंकि अँधेरा होने से पहले हमें लाचुंग जो पहुँचना था ।

जारी......।

Sunday, November 9, 2014

छह दिन हिमालय की गोद में




2 नवम्बर --गंग्टोक की सुहानी सुबह ।
-----------------------------
आँखें खुलते ही सामने दूर शिखरों पर चमकती हुई धूप ने मन में ढेर सारा उजाला भर दिया है । शहर के ऊपरी भाग में पेड़ों पर धूप की वह सुनहरी चिड़िया चहचहाने लगी है पर नीचे हिस्से में सड़कों पर अभी धुँधलका सा है । पहाड़ पर गहरी हरियाली के बीच अटके किरणों के उजले लाल सुनहरे गुच्छे देख अनायास ही मन से निकल उठता है--"ये कौन चित्रकार है ।"

धूप और धुन्ध का यह अद्भुत सम्मिलन मैंने पहली बार देखा हैं जो हिमालय में ही संभव है । बाहर हल्की सर्दी है पर सौ कदम चलने पर ही वह हाँफ और हल्की ऊष्मा में बदल जाती है अगर वे सौ कदम चढ़ाई की ओर हों । यहाँ सड़कों पर चलना ही अपने आप में भस्त्रिका प्राणायाम का जबरदस्त अभ्यास है ।
शायद यह शिखरों पर गूँजती सी धूप की ही ओप है कि मटमैली सी छाँव में डूबी सड़कें गलियाँ भी कुनमुनाती हुई जाग चुकीं हैं । यावची होटल के आरामदायक कमरे से दिखती सुदूर कंचनजंघा की दुग्ध-धवल चोटी ने मन को आश्चर्य और पुलक भर दिया है ।

गंग्टोक--हिमालय की गोद में बसा खूबसूरत शहर

प्रशान्त की तमाम आशंकाओं को मिटाती हुई ( वह मेरी चिन्ता किसी माँ की तरह करता है ) मैं कल 1नवम्बर को दिल्ली से बागडोगरा (पश्चिम बंगाल) पहुँच ही गई । दिल्ली से बागडोगरा तक का वायुमार्गीय सफर दो घंटे बीस मिनट का है । 'गो-एअर' का हवाईजहाज बादलों की जमीन पर सरकता हुआ ठीक एक-पचपन पर बागडोगरा एअरपोर्ट पर उतरा । कुछ ही देर बाद बैंगलोर से प्रशान्त व सुलक्षणा आगए । मान्या दौड़ती हुई आई और मुझसे लिपट गई मेरी सारी थकान छूमन्तर होगई । उत्साह से परिपूर्ण सुलक्षणा ने मुझे किसी अभिभावक की तरह शाबाशी देने के अन्दाज में कहा---वाह मम्मी...यह हुई न बात !"
फिर प्रशान्त से बोली---"देखा , मैं न कहती थी कि मम्मी 'मैनेज' कर सकतीं हैं ?"
एयरपोर्ट के बाहर 'ज़ाइलो' के साथ एक पहाड़ी युवक रवि राय हमारा इन्तज़ार कर रहा था ।
बागडोगरा से रांगपो तक पश्चिम बंगाल है उसके बाद सिक्किम शुरु होता है साथ ही तीस्ता नदी का मनोरम अंचल जिसे थामकर चलते हुए माँ के स्नेह की सी अनुभूति होती है ।


जब हम गंग्टोक पहुँचे ,आसमान जैसे अपना साज-सामान लेकर पहाड़ों में उतर आया था । उसने बेशुमार सितारों से पहाड़ों का बदन सजा दिया था । जिधर देखो सिर्फ दीपमालिकाएं जगमगा रहीं थीं । कहीं सुदूर जुगनू से भी चमक रहे थे ।
गंग्टोक काफी साफसुथरा और सुन्दर हराभरा शहर है । ढालान पर बसे इस शहर की व्यवस्था दर्शनीय है और अनुकरणीय भी । 
पैदल चलने वालों के लिये मजबूत रेलिंग वाला फुटपाथ है ।

बाजार में किसी भी तरह का वाहन ले जाना वर्जित है । कल शाम मुझे बड़ा अच्छा लगा कि लोग किसी मेले की तरह महात्मा गान्धी रोड बाजार में टहल रहे थे । बच्चे सड़क पर दौड़ रहे थे । बीच बीच में बैठने के लिये बैंच भी रखी गईं हैं ।

कविता सार्थक होगई
सुबह आठ बजते-बजते हम लोग नाथुला के लिये निकल पड़े हैं । नाथुला चौकी 14200 फीट की ऊँचाई पर भारत-चीन सीमा पर बनी है । गंग्टोक से नाथुला तक का लगभग पचपन किलोमीटर ( जैसा कि ड्राइवर ने बताया ) का रास्ता काफी संकरा और दुर्गम है । उत्तुंग शिखरों की उँगली थामे सँकरे पथरीले कच्चे और धूलभरे रास्ते पर चलती गाड़ियाँ उन बच्चों जैसी लग रही थीं जो किसी भी तरह अपनी जिद पूरी करना चाहते हैं ।


नाथुला-चौकी  
नथुला चौकी पर पहुँचना एक अद्भुत रोमांचक अनुभव है ।सर्वथा प्रतिकूल मौसम ,बर्फ की चट्टानों के बीच जहाँ साँस लेना भी कठिन होता है , जवानों का अपने देश की सुरक्षा के लिये अडिगता के साथ डटे रहना गर्व , कृतज्ञता और श्रद्धा से भर देता है । तब समझ में आता है कि माखनलाल चतुर्वेदी जी ने ऐसा ही कुछ अनुभव कर लिखा होगा---
"मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक ।"
अपनी सीमाओं के वीर प्रहरियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने कविता की कुछ पंक्तियाँ मेरे मुँह से भी बरबस ही फूट पड़ीं--
..."जहाँ हवा भी जम जाती है
तुम भरते हुंकार ।
नज़र जमाए दुश्मन पर
हर आहट पर टंकार ।
पन्थ तुम्हारे पुष्प बना मन
करता अभिनन्दन ।
मातृभूमि के पहरेदारो
मेरा तुम्हें नमन ।"
मेरे साथ कई लोगों ने दोहराया---"मातृभूमि के पहरेदारो मेरा तुम्हें नमन ।"
कविता सुनकर जवानों की आँखों में जो भाव देखा , मुझे लगा कि कविता को ,जो सिर्फ कल्पनाओं व भावनाओंवश लिखी थी , अब सही अर्थ मिला है । सचमुच सारा देश उनका ऋणी है । 

एक बार किसी ने कहा था कि यह तो उनकी नौकरी है ,ड्यूटी है..। वे लोग आकर देखें कि ऐसी दुर्गम जगह पर क्या कोई सिर्फ वेतन के लिये जा सकता है ? वहाँ तो, 'सीस काट कर भुँइ धरै चलै हमारे साथ' वाला जज़्बा रखने वाले ही जा सकते हैं । उनके उत्सर्ग को मोल क्या चुकाया जा सकता है ? देश के लिये जीने मरने वाले लोग अपनी सुविधाएं नही देखते । ऐसा होता तो देश कभी आजाद ही नही होता ।


  
मुझे आश्चर्य के साथ खेद भी हुआ कि देश की सबसे महत्त्वपूर्ण व संवेदनशील जगह कितनी उपेक्षित व वीरान सी है । हालाँकि मुश्किल है फिर भी बहुत ज्यादा जरूरी है कि उस रास्ते को चौड़ा और सुगम बनाया जाए । ताकि मातृभूमि के वे पहरेदार वीर जांबाज अपने लक्ष्य तक का सफर आसानी से तय करके लक्ष्य पर डटे रहने के लिये ऊर्जा बचा सकें । निश्चित ही यह हमें चीन से सीखना चाहिये ।
 
जारी...........