Sunday, May 10, 2015

मेरी माँ


प्यारी और निराली मेरी माँ .
निश्छल भोली-भाली मेरी माँ .
 
उम्मीदों की लहर समेटे ,
बहती आई है .
जहां-तहां धारा का शोषण
सहती आई है .
फिर भी है हरियाली मेरी माँ
निश्छल भोलीभाली मेरी माँ .

सहनशीलता की सीमा
संदेह-रहित विश्वास .
कोई काम नहीं है तम का
मन में सिर्फ उजास.   
लगे क्षितिज की लाली मेरी माँ .
निश्छल भोलीभाली मेरी माँ .

नहीं जानती झूठ कपट
माँ स्नेहिल निस्पृह .
थककर हारे पाँव ,
ठहर जाने की एक वजह .
भूखे मन को थाली मेरी माँ .
निश्छल भोलीभाली मेरी माँ .

तन को खाना कपड़ा
मीठे बोल मिलें बस मन को
सत्तर पार किये माँ ने ,
कुछ शेष नहीं चिंतन को.
रिश्तों की रखवाली मेरी माँ .
निश्छल भोलीभाली मेरी माँ .

माँ जननी है ,अतुलनीय है ,
पलकों पर रखलूँ .
जो अहसास जिए हैं उसने  ,
मैं उनको चखलूँ .
रहे कभी ना खाली मेरी माँ .
निश्छल भोलीभाली मेरी माँ .

5 comments:

  1. मां के बारे में कुछ भी कहना कम है। मां जी को प्रणाम एवं शुभकामनाएं। आपने अपनी भावनाओं के माध्‍यम से उन्‍हें कविता में पिरोया, जो उनके प्रति आपका प्रेम व सम्‍मान है। और जो बहुत कुछ है एक मां के लिए।

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  2. माँ को समर्पित यह कविता कितना कुछ समेटे हैं अपने भीतर...माँ होना कितना कुछ दे जाता है एक नारी के मन को समृद्ध कर जाता है..

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  3. माँ को समर्पित शब्द जैसे सुजाग हो कर माँ का दर्शन करा रहे हैं ...
    माँ जैसा शायद दुनिया में कोई होता भी नहीं ...

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  4. Maa bs maa hr ek ehsaas me maa.......
    Aksharshah jivant abhivykti.....

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  5. भाव प्रवण कविता...कल कल बहती धारा सी अभिव्यक्ति! सुन्दर!!

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