Wednesday, May 6, 2015

बुढ़ापे में माँ

माँ की स्तुति में तमाम कविताएँ लिखी जातीं हैं .माँ को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा दिया जाता है .निस्संदेह माँ अतुलनीय होती है लेकिन यह भी सच है कि उम्र ढलने और अशक्त होने पर माँ को उचित आदर सम्मान और उसकी भावनाओं का ध्यान रखने वाले बहुत कम होते हैं . अधिकांशतः जो देखा जाता है वह इस कविता में है .
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"माँ होगई बीमार माँ का क्या होगा ?"
बूढी और लाचार माँ का क्या होगा ?"

चिन्ता है यह सन्तानों की
जने उसी के इन्सानों की
दिनभर कोसे बहू ,परोसे
सुबह-शाम थाली तानों की
उम्र होगई भार
माँ का क्या होगा ?
 
जब तक हाथ-पाँव चलते थे ।
कितने स्वप्न छाँव पलते थे ।
नई धूप सी माँ की ममता ,
कितने चम्पक-वन खिलते थे ।
अब जैसे अंगार,
माँ का क्या होगा ?

बेटे की दुनिया न्यारी है
सुख सुविधाएं भी सारी हैं ।
सपने और उडानें मन में 
जगमग-जगमग उजियारी है ?
उसके दृग अँधियार
माँ का क्या होगा ।

जो सबको दुनिया में लाई
पाला और पहचान बनाई ।
जिसका आँचल छाँव धूप में
और शीत में नरम रजाई
वह अब है बेकार .
माँ का क्या होगा ?

सुनलो नालायक सन्तानो !
चाहे मानो या ना मानो
है वरदान दुआएं माँ की 
असर दुआओं का पहचानो ।
कहो न यूँ धिक्कार कि

माँ का क्या होगा ?

6 comments:

  1. सचमुच सन्तान जब अपनी सुख-सुविधा के आड़े आती वृद्धा माँ को एक कर्त्तव्य मात्र मानकर झेलती है तो माँ की स्तुति में लिखी कविताएँ प्रश्न उठाने पर विवश करती हैं....माँ तो तब भी दुआएं ही देती है

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  2. यह बात दुखदायी तो है।

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  3. माँ, हमेशा संतान समर्थ हो गई हो तब भी उसके प्रति कर्तव्यशीला बनी रहे ,स्वयं को दाँव लगाती रहे यह आशा रखना - ,यह उसके साथ अन्याय है .उसकी सुविधा और प्रसन्नता भी उतनी ही वांछनीय है जितनी और सब की .माँ निरीह और विवश न रहे इसी में दोनों का गौरव है .

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    1. Lekin maa aisa kam hi hota hai
      Jahaan tak maine dekha hai Sachchai ko kadvi hi paya hai .log baahr kuchh or andar kuchh hote hain .jo nahi hain ve abhinandniy hain.

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  4. ऐसी सोच रखने वाली ओलाद किसी भी काम की नहीं ... जबकि माँ फिर भी सोचती है बच्चों के ही बारे में ... उनके विकास के बारे में ... आभागे होते हैं जो माँ के साथ नहीं रह पाते ...

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