Tuesday, February 24, 2015

झलकियाँ

परसों गाँव जाना हुआ .चौदह घंटे और लगभग तीन सौ किमी की थकान भरी यात्रा में कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो सामान्य नहीं कही जा सकतीं .बल्कि काफी गंभीर भी हैं  . आप भी देखें  .
(1)   नोट पर वोट
गत रविवार को ग्राम-पंचायत व जनपद पंचायत के चुनाव हुए. परिणाम आना शेष है लेकिन इस वार्तालाप से , जो बस में यात्रा कर रहे दो लोगों के बीच बेझिझक हो रहा था , प्रतीत होता था कि परिणाम की घोषणा मात्र औपचारिकता ही है.----
..और ‘ठाकुस्साब’ कराइ आए चुनाब ?
हाँ भैया कराइ आए .
कौन की दमदारी दीखि रई है ?
का बतावें साब ! उम्मीदवार एक ते बढकर एक हैं दोनों . झूरि कें रुपैया खर्च कर रहे हैं .
अब तौ ‘चुनाइ’ पईसावारेनि कौ ही रहि गयो है.
का बोटरनि की खरीदबे की ‘कोकिस’ भई है ?  
“अरे माराज ! सौ-दो सौ नईं ..हजार-पांसौ नई ..पांच-पांच हजार दए गए हैं एक-एक बोट के .
पाँच हजार ? बस्स ?—एक दूसरा आदमी बोला—हमाए गाम में दस से लैकें बीस-पच्चीस हजार तक में बिचे हैंगे बोट.
आएsss !!
सच्ची ! गऊ माता की सौं .सालनि ते जो बाहर रहि रहे हैं वे भी सब बुलबाइ लए गए .चौधरी जी के बहू-बेटा एमदाबाद ते का सेंतमेंत में आइ गए ? और तौ और ..गाम की ब्याही-थ्याई लड़कियां जिनकी सादी दस-दस ,पंद्रह-पंद्रह साल पेलें ही हैगई हती बे भी बोट डारिबे आईं . काए से के बिनकौ नाम लिस्ट में से नई हटाओ हतो .मैंने सुनी है कै ऐसें पूरे पचास हजार खर्च करे हैं रमले ने .

सही है भैया . खर्च करिकै ही तौ कमाई कौ जरिया निकरेगो . आदमी सोचता है कि जीतिबे के बाद कोऊ पूछिबे बारो नई हैं सो अबई जो मिल रऔ है झटक लेउ .. 
(२)
बात की बात
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एक और दो के सिक्कों की तरह निरन्तर छोटे और हल्के होते जारहे आकार की बसें, कुछ तो इतनी छोटी कि लोग उन्हें 'कट्टा' ( काटकर छोटी करदी गई ) कहते हैं ,ज्यादातर खिडकियों के चटके या गायब होते शीशे ,समझू साहू के बैल की तरह समय से पहले ही खटारा होजाने पर भी सेवा देने की मजबूरी ,उस पर थैले में जरूरत से ज्यादा ठूँसे गए कपड़ों की तरह भरी सवारियाँ फिर भी चलते-चलते और सवारियों को भरने की वासना से भरा दरवाजे पर लटका चिल्लाता कंडक्टर...किराए के पीछे होते आवश्यक विवाद ..अस्सी-नब्बे की फिल्मों के घिसे-पिटे चलताऊ गीत ,...मुरैना-सबलगढ़ रोड और उससे जुडी देहाती सड़कों पर अपने ही नियमों-तरीकों से चलने वाली बसों का ही नहीं , ग्वालियर तक आने वाली ज्यादातर कस्बाई प्राइवेट बसों का भी भौतिक व आध्यात्मिक स्वरूप यही है अगर नहीं है तो चार-छः महीने में हो जाने की पूरी गारंटी है .
किस्सा सबलगढ़ से आरही ऐसी ही एक बस का है . बस पूरी तरह भर चुकी थी .भरने का अर्थ तो आप शायद जानते ही होंगे .यानी एक भी पाँव टिकाने की जगह कहीं रह गई है तो बस हरगिज भरी नहीं मानी जाएगी .खैर ..जब कन्डक्टर को यकीन होगया कि अब इसमें तिनके के लिए भी जगह नहीं है तो उसने विजेता की तरह चलोssss. कहते हुए ड्राइवर को चलने का संकेत दिया .इसके बाद शुरू हुआ किराया लेने का महाभियान.
ईश्वर ही जाने कि इस तरह ठसाठस भरी सवारियों के बीच किराया वसूलने का कठिन प्रशिक्षण कंडक्टर कहाँ लेता है .और सवारियाँ ,जिनमें बच्चे बूढे या जवान ही नहीं ,बच्चों को हाथ में पकडे ,गोद में लिए महिलाएं भी होतीं हैं , कैसे उसे निकलने का रास्ता देतीं हैं .यही नहीं उसे पूरा ध्यान होता है कि अमुक सवारी कहा तक की है . कितनी ही भीड़ हो कोई व्यक्ति 'भटपुरा' का किराया देकर 'सिकरौदा' ( बमुश्किल दो किमी) तक नहीं जा सकता . दूर बस के गेट पर भी खड़ा कन्डक्टर टोक देता हैओ बाबा , ए भैया ..कहाँ ? उतरना नहीं है क्या ? जौरा के टिकट में मुरैना जाना है क्या ? उल्लू समझ रखा है? क्या कहा ?.पचास का नोट दिया था ?अबे किसी और को ...बनाना .तेरे जैसे पांच सौ पैंसठ आते हैं रोज .."
लेकिन जरुरत होने पर उन्हें भूलना भी बखूबी आता है . एक ग्रामीणा के मामले में ऐसा ही हुआ . कंडक्टर ने किराए के चालीस रुपए मांगे .औरत ने तीस रुपए दिए .
 दस और ला ..
काय के दस ?
 किराए के और काए के .                                                
 हमसे तीस की बात हुई थी .
 ,स्याणी ! कोई तीस-बीस की बात नहीं हुई .चालीस से उनतालीस भी नहीं चलेंगे ."
चलाने तो पड़ेंगे .मैं इकतीस भी नहीं दूंगी. "
"वाह वा ! कह तो ऐसे रही है जैसे शिवराजसिंग' की भतीजी हो .चल चल,मेरा टैम खराब मत कर ."
"ए ! कहकर मुकरै मत. तूने तीस की बात की थी. 
अपने मन से ?चल  उतर जा . किसी दूसरी बस से आजाना जो तीस नहीं मुफ्त में ले जाए .
 मुफतखोर होगा तू . मैं इसी बस से जाउंगी . तू उतार के तो देख .
 फिर बैठी रह . बस नहीं जा रही ( ड्राइवर से ) ओए बंद करदे .
बस ड्राइवर कंडक्टर के हुक्म का गुलाम होता है. वह कहे तो चले वह कहे तो रुके . उसने बस रोकदी .
औरत लापरवाही के भाव से अडिग खड़ी रही . सवारियों में हलचल हुई . एक दो पढ़े लिखे और कुछ समझदार माने जाने वाले लोगों ने समझाया
अरे बाई क्यों जिद्द करती है . किराया चालीस ही है . कंडक्टर कोई गलत पैसे नहीं मांग रहा .
 तुम बड़े सिफरासी (सिफारशी) बनते हो ..औरत ने आँखें तरेर कहाकिराए का मुझे भी पता है पर मैं तो दूसरी बस में जा रही थी . यह कंडक्टर उससे पहले चलने की और तीस रुपए देने की कहकर ले लाया और यहाँ पलट गया.. 
झूठ बोल रही है .
झूठ बोलता होगा तू और तेरा खानदान .मैं तो पूरा ही किराया देती हूँ .फिर दस रुपया कोई बड़ी सामा( खजाना) नहीं ,पर बात की बात है .तूने झूठ क्यों बोला ? ऐसे ही सीट देने की कहकर बिठा लेते हो  पर सीट नहीं देते .दुनिया बावरी है क्या ? ले ये तीस रख और अपना रास्ता नाप ..
कंडक्टर अवाक्..
बात तो सही है .-एक-दो लोगों ने कहा .
अरे भाई चलो चलो वैसे ही देर हो रही है बस में बैठे लोग कहने लगे .
अब कंडक्टर के पास ड्राइवर को चलने का संकेत देने लम्बी सीटी बजाने के अलावा कोई चारा नहीं था .

    

Friday, February 20, 2015

गीत

नेह या अपनत्व की , जब बात आई  है ,
हाय अपनी चेतना हमने सुलाई है .

अन्यथा टुकड़ों बिखर जाता हृदय गलकर .
क्योंकि तट विश्वास के रह खूब मल-मलकर
कालिमा संदेह की हमने छुटाई है
नेह या अपनत्व की जब बात आई है
.
स्रोत सूखे जा रहे , निर्झर बहेंगे क्या !
कर लिया अवरुद्ध वाणी को , कहेंगे क्या !
सच कहा जब जब, करारी मात खाई है .
नेह या अपनत्व की जब बात आई  है .

आँधियों में भी जलाए हैं दिए हमने .
दोष किसको दें तिमिर का , अब लगा लगने .
ढल गया सूरज तभी यह रात आई है .
नेह या अपनत्व की जब बात आई है .

होगए हैं शब्द घर से बेदखल तबसे .
अतिक्रमण संवेदनाओं पर हुआ जबसे .
जो लिखी दिल पर इबारत ही मिटाई है .
नेह या अपनत्व की जब बात आई है .
हाय अपनी चेतना हमने सुलाई है .
(सन १९९० में रचित . नेह या अपनत्व की ' के स्थान पर पहले 'प्यार की ,विश्वास की जब ..' था . परिवर्तन से कोई निखार आया तो नहीं लगता बल्कि एक व्यवधान सा ही उत्पन्न हुआ है .)  

Friday, February 13, 2015

आँगन में 'चाँदनी '.


क्या हुआ कि
टहनियों के झुरमुट रोक लेते है राह
वर्जनाएं लगाए खड़ी हैं
दीवारें और मुँडेरें ‘
डराते हैं अँधेरे 
पर रुकता नहीं कभी , 
उतरना 'चाँदनी' का
आँगन में ।
किसी न किसी झरोखे से
झाँक ही जाती है वह
दबे पाँव
मुस्कराकर,
भर देती है उजाला 
कोने-कोने में।
आँखों में , मन में . .
   
एक नियामत ही तो है
यों उतर आना 'चाँदनी' का 
आँगन में .  

Sunday, February 1, 2015

पचहत्तर पार करती माँ

(1)
पचहत्तर पार करती माँ 
अब बेचैनी के साथ महसूस करती है , 
कि वक्त , जो कभी सुनहरा भविष्य हुआ करता था,
गुजर गया है कभी का
वर्त्तमान होकर ,बिना बताए ही .
बिना पूछे अपने साथ लेगया सारे अनुमान ,
उम्मीदों का सामान जाने कहाँ ! ..कि
उम्मीदें कि बच्चे बड़े होंगे ,
पढ़ लिखकर काबिल बनेंगे,
नहीं सालेगा कभी किसी को 
किसी तनाव का भाव 
भाव का अभाव 
जी सकेंगी कछ दिन अपनी तरह से .
इसी तरह के स्वप्न देखती हुई माँ 
नकार देती थी, आँगन -गली में 
पसरा हुआ अँधेरा .
अँधेरा भी छँटगया धीरे धीरे 
बच्चे बड़े हुए ,काबिल बने
पर शायद कहीं दबा छुपा रह गया है
अभाव का भाव ,
जो फैल रहा है रेगिस्तान सा   .
कगार की ओर बढ़ती जा रही माँ के मन में   
वह वर्त्तमान को   
अनचाहे समाचार की तरह पढकर 
सरका देतीं हैं किसी कोने में . 
और जा बैठती हैं अतीत के आँगन में 
बतियाने सुख-दुख अपने आप से 
अतीत जो कभी भविष्य हुआ करता था 
माँ ,
हैरानी यह नही है कि नही है अब उसके पास कोई सपना अपना 
हैरानी तो ..और उससे ज्यादा खेद है कि
सन्तानें नहीं दे पाती ,
शायद देना नहीं चाहती ,
माँ को कुछ नए सपने और ..
उनके पूरा होने का विश्वास भी 
या कि माँ को आश्वस्त कर सकने लायक कोई सपना उनके पास 
है ही नहीं . 

(२)
माँ अब छोटो-छोटी बातों पर 
बड़ी चिंताएं करती हैं 
जैसे सुबह कोहरा देख आशंकित हो जाती है 
पता नहीं आज सूरज निकलेगा भी या नहीं .
रजाई में दुबकी आतंकित सी
इंतजार करती हैं धूप का .
हर आधा घंटे में पूछती हैं--
"अब कितने बजे होंगे ? 
अरे ,अभी नौ ही ..? 
दिन बहुत ही धीरे रत्ती-रत्ती सरक रहा है ?"
उन्हें याद नहीं रहता कि
आज नाश्ते में क्या खाया था ?
या कि कुछ खाया भी है या नहीं .
कि चाय ले चुकी हैं दो बार 
और ,कि दवा की खुराक अभी ली नहीं है 
एक बार भी . 
पूछतीं रहतीं हैं अक्सर 
नाती की पढ़ाई और नौकरी के बारे में 
कई बार सुनकर भी ध्यान नही रहता 
कि बेटी तो कब की बन चुकी है 
दो बच्चों की दादी भी . 

माँ ऐसे ही जी रही है .
अतीत को पी रही हैं चाय की तरह 
पचहत्तर पार करती माँ , 
जो ,मुश्किलों को अनजाना अतिथि मानकर  
वे उसे जल्दी ही चलता करने तैयार  रहती थी ,
यादों में बसाए हुए हैं गुजरे समय को 
एक पश्चाताप के साथ ,
जो चला गया उनसे मिले बिना ही .

जो कभी नही डरती थीं 
घर में निकले ,सांप, बिच्छू या 
घाट पर रहते कथित मसान से भी  
अब डरती हैं गैस-चूल्हा जलाने या 
टेलीविजन चालू करने में भी . 
उससे भी ज्यादा डरतीं हैं माँ ,
किसी के नाराज होने से  
अपने बीमार होने से ..
पर सबसे ज्यादा डरतीं हैं माँ 
बच्चों की परेशानी और असुविधा के ख्याल से