Tuesday, September 27, 2016

जोड़ते हम रहे ...

राह में बिखरे काँटे हटाते रहे .
उम्रभर खाइयाँ ही पटाते रहे .

जीत लेंगे भरोसा किसी भी तरह ,
यूँ ही ताउम्र खुद को मिटाते रहे .

था ये मालूम ,तूफां उजाड़ेगा घर ,
फिर भी जीने का सामां जुटाते रहे .

आज देंगे वही कल मिलेगा हमें ,
बस यही मान सब कुछ लुटाते रहे .

वक्त आया , गया कब ? खबर ना हुई ,
राह में हम तो नजरें बिछाते रहे .

उनको लहरों का अन्दाज़ होगा नही ,
रेत पर नाम जो भी लिखाते रहे .

एक उत्तर भी आता तो कैसे भला ,
जोड़ते हम रहे , वो घटाते रहे .

चाँद सा जगमगाने की चाहत रही

पर अँधेरों से ही मात खाते रहे .

Saturday, September 24, 2016

दिवा-स्वप्न का समय नही है .


एक बार फिर उसने गैरत को ललकारा है.
सद्भावों पर जैसे यह आघात करारा है .

दिवा-स्वप्न कबतक देखोगे ?
अब तो आँखें खोलो .
कब तक व्यर्थ चुकेंगी जानें ?
कुछ तो साहस तोलो .
समझ सके ना बात समझ की ,
उसको क्या समझाना !
सीखा उसने चिनगारी सा 
जलना और जलाना .
अमन चैन से रहना उसको कहाँ गवारा है .

लगे समझने जब उदारता को कोई कमजोरी .
चोरी करके उल्टा हमें दिखाए सीनाजोरी .
बड़े प्यार से उसको उसके घर की राह दिखाओ .
अपनी ही सीमाओं में रहने का पाठ पढ़ाओ .
समझौतों वार्ताओं से कब हुआ गुजारा है ?

है इतिहास गवाह ,
कि चुप रहना डर जाना है .
औरों का मुँह तकते ही रहना  ,
मर जाना है .
छोड़ो शान्ति और समझौते ,
दो जैसे को तैसा .
अच्छी तरह बतादो 
हिन्द नहीं है ऐसा वैसा .
वीरों ने बलिदानों से ही इसे सँवारा है .

किसी शहादत पर ना हो अब कोरी नारेबाजी .
आन बान की बात नहीं है कोई सब्जी भाजी    
स्वार्थ और सत्ता से ऊपर हों अपनी सीमाएं
कोई भी गद्दार रहे ना अपने दाँए बाँए .

तर्क-भेद सब पीछे पहले देश हमारा है .

Tuesday, September 13, 2016

ग्यारहवीं कक्षा में हिन्दी का पीरियड .

यह लघुकथा उच्च कक्षाओं में भी हिन्दी की स्थिति बताने के लिये काफी है .कहीं छात्र पढ़ना नही चाहते और कहीं शिक्षक पढ़ाना नही चाहते या जानते . किसी एक को उत्तरदायी नही कहा जा सकता . ऐसे में हिन्दी दिवस मनाने का आडम्बर छोड़कर जरूरत है विद्यालयों में प्रारम्भ से ही हिन्दी अध्यापन की जड़ें मजबूत करने की .क्योंकि विद्यालय ही वह संस्था है जहाँ भाषा सीखने का औपचारिक आरम्भ होता है .
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छात्रो ,आज हम नौका विहार पढेंगे । सभी छात्र पुस्तक में यह पाठ निकाल लें .”
सर हम लोग किताब नहीं लाए .”
मैं भी नहीं लाया ...
और मैं भी ..
“ पाठ्य-पुस्तक जरूर लाया करें यह मैंने कई बार बताया है . खैर जो लाए हैं उन्ही के साथ मिलकर देखलो .
यस सर ,कौनसे पेज पर है ?”
बेटा ,विषय-सूची में दिया हुआ है । जरा देखो .”
विषय-सूची कहाँ है सर ?”
किताब के शुरु में ही है बेटा .शायद आज पहली बार आए हो । मैं अक्सर बताता रहता हूँ कि विषय-सूची देखकर किस तरह अन्दर का कोई भी पाठ निकाला जा सकता है .... निकाल लिया ? अच्छी बात है।.... यह छायावाद के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानन्दन पन्त की कविता है .इन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है . ये छायावाद के चार प्रमुख कवियों में से एक हैं .”
सर अब ये छायावाद क्या है ?”
दो दिन पहले ही तो मैंने इसके बारे में विस्तार से बताया था .
एक छात्र--“सर मेरे सामने नहीं बताया .
तुम आए नहीं होगे खैर....कविता के इतिहास में आधुनिक काल की ही एक अवधि है जो द्विवेदी युग के बाद सन् 1920 से प्रारम्भ होती है . इसे फिर एक बार अलग से पढ़ लेंगे .
सर क्या यह पेपर में आएगा ?”
बेटा पेपर में आएगा यह तो नही कहा जासकता लेकिन यह कई तरह से बहुत महत्त्वपूर्ण कविता है । छायावाद की सारी विशेषताएं इसमें हैं जिन्हें में साथ ही साथ तुम्हें समझाता जाऊँगा । पाठ के साथ यह जानना भी उपयोगी रहेगा .पेपर के प्रारम्भ में जो पच्चीस प्रश्न आते हैं उनमें ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं . फिर हर पाठ तो पेपर में नही आ सकता तो क्या उसे हम पढ़ेंगे नहीं .”
"लेकिन सर पहले तो किसी ने यह सब नही पढ़ाया और हम बढ़िया नम्बरों से पास भी होगए ."
"लेकिन .... ." 
एक छात्र (ऊब कर बीच में ही)--"सर आप तो पाठ पढ़ाइये .."
"हाँ हम वही करने जा रहे हैं . तो कविता है---
शान्त स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल ,अपलक अनन्त नीरव भूतल...
एक छात्र---सर ,नौका विहार का क्या मतलब है ?”
नौका यानी नाव और विहार यानी सैर करना .”
नाव की सैर ! सर इन लोगों के पास और कोई काम नही था ? खुद नाव में सैर की और कविता लिख डाली ..कितनी टफ है यार ?”
शिक्षक आवेश को दबाकर हँसते हुए --“पहले पाठ को पढ़ तो लें बेटा ,फिर दूसरी बातें करें .
ठीक है सर . आप तो पाठ पढ़ाइये .
 “हाँ.., तो कवि जिस समय नौका विहार के लिये गए ,वह रात्रि का समय था । चारों ओर बड़ी कोमल सी उजली चाँदनी फैली हुई थी । आसमान बिल्कुल साफ था और धरती पर किसी तरह का कोई शोर नही था । चारों ओर शान्ति छाई थी ……”
सर जी , डिटेल रहने दो . आप तो हमें बस इम्पौर्टेंट, इम्पौर्टेंट बता दीजिये . सभी सर हमें केवल इम्पौर्टेंट बताते हैं .”
तभी चपरासी आकर बताता है कि उन्हें प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं .इन शिक्षक महाशय को बीच में कक्षा छोड़ना अच्छा नहीं लगता लेकिन संस्था-प्रधान के आदेश को न मानने का तो सवाल ही नहीं उठता . जाकर हाथ बाँधे नतसिर खड़े होगए .
जी सर !”
अरे कौशिक ,टाइम-टेबल में थोड़ा चेंज किया है .
जी ..!”
हिन्दी का पीरियड पाँचवा ठीक रहेगा .
सर पाँचवे तक तो छात्र रुकते ही नहीं . चौथे पीरियड के बाद ही कोचिंग चले जाते हैं .
तभी तो...हिन्दी तो बच्चे वैसे ही पढ़कर पास होजाते हैं . पहले मैथ्स , साइंस और इंगलिश  जरूरी है . अभी सक्सेना जी को अंग्रेजी पढ़ाने दीजिये ..


जी सर जैसा आप कहें ..  

Tuesday, September 6, 2016

विश्वास की विजय

शिक्षक-दिवस पर विशेष
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बात सन् 1973 के दिसम्बर माह की है जब मैं पहाड़गढ़ पढ़ने जाती थी . उस समय दसवीं कक्षा में थी और अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं शुरु होगईं थीं. वैसे तो मैं पढ़ने के लिये गाँव से ही जाती थी पर परीक्षा और कुछ कड़कती ठंड के कारण काकाजी ने अपने एक सुपरिचित शिक्षक के मकान में किराए पर एक कमरा ले लिया था .जहाँ मैं और मेरा छोटा भाई रह रहे थे , ग्यारहवीं में पढ़ रही एकमात्र लड़की उर्मिला मकान मालिक की भतीजी और परिवार के ही कुछ लड़के भी थे .
वे रोज नकल करके खूब कॉपियाँ भरने की डींगें हाँका करते थे . और मुझे सत्यवादी हरिश्चन्द्र की नानी कहकर चिढ़ाया करते थे . इसका कारण था कि मैं उनकी नकल वाली बात का विरोध करती रहती थी . काकाजी ने शुरु से ही हमें नकल से दस कोस दूर रहने की सीख दी थी . मुझे खूब याद है जब मैं उनके साथ बड़बारी में थी तब पाँचवी बोर्ड की परीक्षा में एक शिक्षक ने अपने साथी शिक्षक ( मेरे पिताजी )की बेटी होने के कारण एक उत्तर बताना चाहा तो पिताजी ने उसे लगभग डाँटते हुए कहा था--- सिकरवार मेरी बेटी अगर फेल भी होती है तो होजाने दो पर उसे बताने की जरूरत नहीं . वह जो भी लिखती है उसे खुद लिखने दो .
बचपन में सीखी बात दिल-दिमाग में जैसे चिपककर रह जाती है . मैंने खुद कभी नकल का सहारा नहीं लिया न ही अपने बच्चों को लेने दिया . आज भी जबकि परीक्षाओं में नकल के इतिहास बनते हैं , मैं छात्रों को नकल के भरोसे न रहने की सलाह देती रहती हूँ  . खैर...
जिस दिन नागरिक शास्त्र का पेपर था मेरे एक दो पाठ तैयार नहीं थे . यह विषय मुझे बड़ा उबाऊ लगता था ( आज भी ) .शायद इसलिये कि पढ़ाने वाले सर कभी समझाकर पढ़ाते नहीं थे . विषय कोई कठिन नहीं होता अगर उसे सही तरीके से पढ़ाया जाय . नागरिकशास्त्र में मुझे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का चुनाव और मौलिक अधिकारों में संवैधानिक उपचारों का अधिकार बन्दी-प्रत्यक्षीकरण, परमादेश वगैरा जरा भी समझ में नहीं आते थे .प्रजातंत्र की परिभाषा भी केवल लिंकन वाली याद थी .पर जनता द्वारा ,जनता के लिये जनता का शासन क्या पहेली है समझ में नहीं आता था  . मेरी कमजोरी उन साथियों को मालूम थी सो पेपर के एक दिन पहले ही मेरे सामने उन्होंने विस्तार से नकल--महात्म्य पढां . कई तर्क दिये कि—
तू दिन रात रटती रहती है तब भी उतने नम्बर नहीं ला पाती जितने हम लोग एक रात की मेहनत में ले आते हैं .”
कि जब बिना मेहनत के ठीक ठाक नम्बर मिल जाते हैं तो फिर रटने में आँखें फोड़ने से क्या फायदा ?”
चल हम यह नहीं कहते कि नकल के भरोसे रहो , पर जहाँ एक दो नम्बर से ही परसेंटेज डाउन हो रहा हो वहाँ थोड़ी बहुत नकल तो चलती है .
और सच्ची बताना क्या तुझे अच्छा लगेगा जब कम पढ़ने वाले नकल करके तुझसे ज्यादा नम्बर मार लेंगे . सर लोग तुझे कैसे होशियार बताते रहते हैं .... भैया हम तो तेरे भले की कह रहे हैं .मान या न मान तेरी मर्जी .

कहते हैं कि बार बार बोला गया झूठ भी सच्चा प्रतीत होने लगता है . मुझे भी लगा कि संवैधानिक उपचारों की एक चिट बनाकर रखलूँ . जब ये सब लोग हमेशा नकल करते हैं तो मेरा एक बार करना बहुत गलत तो नहीं होगा . सो चूड़ीदार पायजामा की कमर मोड़कर एक चिट रख ही ली .और इस बात से अनजान कि यह बात न केवल प्रकाश वगैरा को मालूम है बल्कि उन्होंने कक्षा के एक शरारती लड़के को बता भी दी है . मैं आराम से अपनी डेस्क पर बैठ गई . उस दिन हमारे कमरे में मूँदड़ा सर की ड्यूटी थी . यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि स्कूल में दो लोग श्री डी एस मिश्रा और श्री ओपी मूँदड़ा बहुत ही शानदार तरीके से स्कूल आते थे . साफ-सुथरे शानदार कपड़े , चमचमाते जूते ,..उनके आते ही क्लासरूम महक से भर जाता था . उतने ही शानदार तरीके से पढ़ाते भी थे .मिश्रा जी हिन्दी के और मूँदड़ा जी इतिहास के लेक्चरर थे . पर मूँदड़ा जी अपेक्षाकृत छात्रों के अधिक निकट थे . वे छात्रों से हँसी-मजाक और हल्की-फुल्की छेड़छाड़ भी करते रहते थे और जब पढ़ाते तो इस तरह जैसे दादी नानी कहानियाँ सुनाया करती हैं . चाहे वह फ्रांस की क्रान्ति हो , इंगलैण्ड का उद्भव या नेपोलियन का पराभव... वे क्लास में घूम घूम कर मौखिक सुनाते थे .हम सब दम साधे सुनते रहते थे . मैं उनसे बहुत प्रभावित थी . वास्तव में वे क्लास में यह कहकर अक्सर मेरा हौसला भी बढ़ाया करते थे कि देखो छोटी सी लड़की अकेली इतनी दूर पैदल चलकर गाँव से पढ़ने आती है और पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती है ,यह कितनी अच्छी बात है . 
उस दिन में अजीब सा अनुभव कर रही थी . पहली बार चोरी या कत्ल करने वाले की तरह . उस पर जब कॉपी पेपर लेकर कक्ष में मूँदड़ा सर आए तो मेरी घबराहट और बढ़ गई . लगा जैसे वे ऐक्स-रे की तरह कपड़े में छुपी चिट को भी देखलेंगे . वैसे भी जो सर कक्षा में पढ़ाते हुए बड़े सहज रहते थे वे परीक्षा में ड्यूटी देते समय अपने चेहरे पर हैरान कर देने वाली खास किस्म की कठोरता और अजनबियत चिपका लेते थे कि कुछ पूछते हुए भी डर लगे . फिर वे सर थे मूँदड़ा जी जिनके प्रति आदर और भय का मिश्रित भाव था . सर ने पेपर बाँट दिये तो थोड़ी बहुत चल रही खुसर-फुसर भी बन्द होगई . केवल सर के जूतों की चाप सुनी जा रही थी . पेपर देखकर मेरी घबराहट तो कम होगई . पेपर सरल था . चिट वाला प्रश्न उसमें था ही नहीं पर होता तो भी मैं चिट निकालने की सोच भी नहीं सकती थी पर पायजामा में रखी चिट लाल चींटी की तरह काट रही थी . और तभी यह हुआ कि उस शरारती लड़के ने बड़ी धृष्टता के साथ गाइड का एक पेज सामने फैला लिया .वह क्लास में मुझसे कड़ी स्पर्धा ( द्वेष भी कह सकते हैं ) रखता था और किसी न किसी तरह मुझे पीछे छोड़ने की फिराक में भी रहता था .कुछ दिन पहले सर ने मेरे कारण ही उसको डाँटा भी था .
इस तरह सरेआम सामने नकल रखी देख मूँदड़ा सर को हैरानी भी हुई और क्रोध भी आया .
क्यों बे !...क्या है यह ?”
नकल है सर .—वह ढिठाई के साथ बोला .
अयं !...ऐसी हिम्मत ! कमाल है . लगता है आगे पढ़ना नहीं है तुझे .
मैं ही क्यों सर आगे वाले लोग भी तो लाए हैं नकल .
आगे तो किसी के पास नहीं है .
तलाशी लेकर देखलो सर , नहीं निकले तो फिर आपके जूते और मेरा सिर .”--उसने कहा तो मेरे नीचे की जमीन जैसे धँसकने लगी .  
किसकी बात कर रहा है , सामन्त की ?”
नहीं सर और आगे .
रमेश ?”
और आगे .
उसके आगे कहने के साथ ही सर मेरे पास आकर रुक गए . मेरी साँसें थम सी गईं . अगर सर पूछते तो मैं निश्चित ही स्वीकार कर लेती क्योंकि मुझे झूठ बोलना नहीं आता . कभी कोशिश की भी है तो पकड़ी गई हूँ . सर ने एक बार मुझे ध्यान से देखा और फिर पीछे उस लड़के के पास जाकर कड़ककर बोले—स्डैण्ड अप
क्यों सर ? मैंने क्या किया ? बस नकल ही तो बताई है .
गलत बताई है क्योंकि वह लड़की नकल नहीं ला सकती .
आपको इतना भरोसा है ?”
भरोसा है . वह नकल के भरोसे रहने वालों में नहीं है . और बेटा यह काम तेरा नहीं है . चुपचाप पेपर करो नहीं तो कॉपी देकर अपने घर जाओ .

मैं ग्लानि से भर उठी . और कई दिनों तक खुद से आँखें चुराती रही . वह मेरा पहला और अन्तिम प्रयास था . गाँव में लगभग बीस साल सर्विस करने के बाद जब मैंने 1997 में ग्वालियर स्थानान्तरण के लिये आवेदन किया तब भाग्य से उपसंचालक पद पर श्री मूँदड़ा जी थे . वे मुझे तुरन्त पहचान गए और मेरे बिना कुछ कहे मेरा स्थानान्तरण कर दिया . आज वे नहीं हैं पर उनके विश्वास ने मुझे एक सही दिशा दी . जो लोग सिर्फ कमियाँ या बुराइयाँ ढूँढ़ते रहते हैं वे उनके बारे में कई तरह की बातें करते हैं . लेकिन मेरे हृदय में आज भी वे मेरे श्रद्धेय आदर्श गुरु हैं .