Monday, December 3, 2018

पूत के पाँव ...


शाला-भवन तो होना ही चाहिये .”--- रंमनपुरा के सरपंच ने गणतंत्र-दिवस समारोह में अपने भाषण में कहा . 
हमारे गाँव के लिये यह बड़ी बात है कि दो साल सीसौदिया जी ने बिना भवन और बिना किसी सुविधा के बढिया तरीके से स्कूल चलाया .कभी कोई शिकायत नहीं की बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट भी बढिया रहा ....
राजमार्ग से दो किमी अन्दर बसा गाँव रमनपुरा . मिडिल व प्राइमरी स्कूल पहले से ही थे . आगे पढने के लिये बच्चों को राजमार्ग , जो भारी ट्रकों , बसों व दूसरे वाहनों से हमेशा व्यस्त रहता है , पार करके दूसरे गाँव जाना पड़ता था . एक दो दुखद घटनाओं के बाद ,गाँव वालों की माँग पर यहाँ दो दो साल पहले ही हाईस्कूल शुरु हुआ है .हाईस्कूल नया नया खुला है . अभी तक इमारत नहीं थी . सामान के नाम प्राचार्य के लिये कुर्सी ,दो ब्लैकबोर्ड , दो टाट-पट्टियाँ ,कुछ रजिस्टर और आवश्यक प्रपत्रों के अलावा कुछ नही था सो तत्काल व्यवस्था के लिये एक उदार किसान ने गाँव के बाहर शुरु में ही अपने खेत के पास चौरस जगह और एक कमरा स्कूल के लिये दे दिया था जिसमें स्कूल के तमाम जरूरी कागजात रखे गए .. बाकी स्टाफ के लिये वहाँ चबूतरा और करीने से बिछाए गए चौरस पत्थर थे . चूँकि ज्यादातर लोग नवनियुक्त थे . सबके अन्दर पढ़ाने का जज़्बा था , प्राचार्य सीसौदिया जी कुछ अच्छा कर दिखाना चाहते थे . वैसे तो वहाँ वातावरण बहुत शान्त था . हरेभरे खेतों के बीच पेड़ों की छाँव तले पढ़ाने में किसी को कोई खास मुश्किल नही थी . लेकिन कई असुविधाएं तो थीं ही . आँधी वर्षा के समय स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी . मार्च के बाद धूप और गर्मी बढ़ जाती थी .वास्तव में वह व्यवस्था अस्थाई थी . जल्दी ही शाला-भवन तैयार होना जरूरी था .इसके लिये प्राचार्य ने सरपंच से बात की और सरपंच ने गाँव के कुछ खास लोगों से .
तय हुआ कि किसी राष्ट्रीय पर्व पर किसी नेता या मंत्री को बुलाया जाए .तभी किसी ने सलाह दी--
"अरे अपने 'परसोत्तम' को बुलवा लो . जानपहचान का है .विधायक जी का खास आदमी है .पक्की खबर है कि अबकी बार टिकट उसी को मिल रहा है . वो जरूर विधायक जी से स्कूल का फण्ड निकलवा लेगा ."
इस तरह पुरुषोत्तमसिंह गणतंत्रदिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कुर्सी पर विराजमान थे . सरपंच का बोलना जारी था--
प्रेंसीपल साब और पूरे स्टाफ ने जिस तरह स्कूल सम्हाला है वह तारीफ के काबिल है पर एक हाईस्कूल के लिये एक अच्छी सी इमारत की सखत जरूरत है जिसके लिये हम सब गाँववाले तो पूरी कोसिस करेंगे ही ,पर हमें होनहार और जुझारू नेता माननीय परसोत्तम जी से काफी उम्मीदें हैं .हमें भरोसा है कि वे जरूर गाँव के लिये कुछ करेंगे . आगे मैं उन्हीं से निवेदन कर रहा हूँ कि वे इस बारे में दो शब्द कहें .
तब लम्बे और इकहरे बदन के पुरुषोत्तमसिंह ने सबकी ओर सगर्व देखते हुए हाथ जोड़े और जोश के साथ भाषण शुरु किया --मैं सबसे पहले गाँव वालों को आजादी के दिन की हार्दिक बधाई देता हूँ . सरपंच जी ने जो कुछ कहा उसे सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई .पर मै देख रहा हूँ कि स्कूल को वहाँ से हटाकर अलग बिल्डिंग में शिफ्ट करना बहुत जरूरी है ,अनिवार्य है .न केवल इसीलिये कि  साधन-सुविधाएं नहीं हैं ,बल्कि इसलिये भी कि वह जगह स्कूल के लिये असंवैधानिक है .संविधान विरुद्ध है .
असंवैधानिक ? !—सरपंच सहित कुछ पढ़े लिखे लोगों ने सवालिया नजरों से एक दूसरे को देखा .
"मैं आपको खुलकर समझाता हूँ ."---.असंवैधानिक यानी संविधान के खिलाफ ..वो ऐसे कि कोई भी सरकारी संस्थान किसी धार्मिक स्थान पर नहीं लगना चाहिये ..
धार्मिक स्थान .! वो कहाँ है ..?”—अब प्राचार्य सहित स्टाफ के सदस्यों व कई ग्रामवासियों की सवालिया निगाहें उस नवयुवक के चेहरे पर जा चिपकीं .
.. जी हाँ में माता के मन्दिर की बात कर रहा हूँ .मैंने देखा है . स्कूल एक मन्दिर के पास लग रहा है . शिक्षा के केन्द्र को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये ..उनका सम्बन्ध किसी मन्दिर ,मस्जिद व गुरुद्वारे से नही होना चाहिये .अतः मेरा निवेदन है कि स्कूल को तुरन्त वहाँ से गाँव के किसी भवन में शिफ्ट करा दिया जाए ..जयहिन्द ..जयभारत .”
गाँव वालों में कुछ उस युवक की नई सोच से प्रभावित थे तो कुछ चकित कि यह सब किसी ने कैसे नही सोचा .
मन्दिर कहाँ हैं हमने तो नही देखा .”–प्राचार्य बोले .
अरे सर कोने में एक छोटी सी मढ़कुली है .---एक युवक हँसकर बोला .वह आपको नहीं दिखेगी .यह पड़ोस के गाँव का भावी नेता है . जो नेता को दिखता है वह किसी और को नही दिखता . दिखेगा ही नहीं अभी अभी यह एक पार्टी से जुड़ा है .
यह सुनकर प्राचार्य ने ठहाका लगाया --
तभी मैं सोचूँ कि यह उस मुद्दे को कहाँ से खींच लाया जो अभी तक किसी के दिमाग में था ही नही ...  

2 comments:

  1. वाह ! नेता जी बड़ी दूर की कौड़ी ले आये..

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