Monday, July 22, 2019

हिमालय के कोट में टँका हुआ फूल ---अन्तिम भाग

 .पिछली पोस्ट-- भाग दो
19 मई की सुबह हमने 'रामदा' से विदा ली और पुनाखा की ओर चल पड़े . फिर से वही खूबसूरत वादियों का सिलसिला शुरु हुआ .मैं अगर उस तरह याद करूँ जिस तरह बचपन में रट रटकर हम लोग मायने याद करते थे तो रटूँगी , "भूटान माने हरियाली.... भूटान माने सदाबहार पर्वत....भूटान माने कल कल बहतीं निर्मल नदियाँ.....भूटान माने ढेर सारे फूलों से भरी क्यारियाँ..., भूटान माने झरने , भूटान माने शान्त भीड़ रहित बाजार ,भूटान माने अपने काम से काम रखने वाले सीधे शान्त लोग , ..भूटान माने......"
दोचुला पास का एक दृश्य
थिम्पू से चलते हुए बीच रास्ते में दोचुला-पास नामक एक बहुत ही मनोरम स्थान है ,जो सतह से लगभग 3020 मीटर ऊँचाई पर है इसलिये यहाँ अपेक्षाकृत अधिक सर्दी थी .यहाँ 108 सुन्दर स्तूप हैं .जो किसी युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के स्मारक हैं . चारों ओर खूबसरत और सिर्फ खूबसूरत नज़ारा था .विकास ने बताया कि बादल न होते तो यहाँ से सामने हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दिखतीं . यह जगह इतनी मनोरम थी कि जाने के लिये मन तैयार ही नही हो रहा था . लेकिन जाना तो था ही . पुनाखा हमारी प्रतीक्षा जो कर रहा था .
दो चुला पास का एक और चित्र 
थिम्पू से 70-71 कि मी दूर 'पो छू' और 'मो छू' (छू यानी नदी .पो पितृ रूपा और मो मातृ रूपा) के किनारे बसा सुन्दर शहर पुनाखा भूटान का एक जिला है . पहले यह भूटान की राजधानी हुआ करता था . समुद्र तल से लगभग 1200 मीटर ही ऊँचे बसे पुनाखा के लिये अब हमारी गाड़ी नीचे उतर रही थी .
पुनाखा पहुँचने तक रास्तेभर हमारी आँखें हरी भरी वादियों में विचरती रहीं और मन नदी की मचलती धारा के साथ उन्मुक्त बहता रहा लेकिन पुनाखा पहुँचकर कुछ कुछ व्यग्रता बढ़ने लगी थी क्योंकि 'ईको लॉज' का, जहाँ हमें ठहरना था पता नही चल रहा था .जो पुनाखा से कुछ आगे बांगडी कस्बा में था ,पर कहाँ था यह सही और स्पष्ट बताने में गूगल भी असमर्थ था . 
ईकोलॉज के प्रांगण में  .
नेहा लगातार लॉज की स्वामिनी से सम्पर्क बनाए थी . आखिर बड़ी मशक्कत के बाद हम ईकोलॉज पहुँच गए .हालाँकि पहुँचते पहुँचते हमारी हालत खासी पतली हो गई थी .एक तो हरे भरे जंगल के बीच सुन्दर सड़कों से गुजरने के बाद हमारे सामने एक बहुत ही ऊबड़-खाबड़ , अनिश्चित सा पहाड़ी रास्ता, बिल्कुल कच्चा ,टेढ़ा मेढ़ा और सँकरा था जिस पर एक ही गाड़ी निकल सकती थी .उसका हर मोड़ पर हमें आशंकित कर रहा था .उस पर बहुत नीचे नदी बाहें ,..कहना चहिये मुँह फैलाए बह रही थी . फिर यह भी तय नहीं था कि ईको लॉज है कितनी दूर . विकास अनुमान से गाड़ी बढ़ाए जा रहा था .


पुल जो भारत भूटान मैत्री का प्रतीक है .

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ईको लॉज
पहुँचकर लगा कि हम एक बिल्कुल अलग दुनिया में आ गए हैं . जहाँ सेव के सिर्फ दो किशोरवय  पौधे  थे, एक अमरूद और दो आड़ू के पेड़  थे ,गुलाब की झाड़ियों और हवा के अलावा थे तो पुरानी शैली के तीन चार कमरे , पवन चक्की दो तीन बिल्लियाँ और तीन चार सुन्दर लड़कियाँ . इसके अलावा किचिन ,डाइनिंग हाल भी था . शायद उस कथित लॉज को शुरु हुए एक या दो साल से अधिक नहीं हुआ था .
"मैम अभी खाना तो नहीं मिलेगा .आप लेट होगए ...खाने के लिये एक घंटा पहले ऑर्डर करना पड़ता है . आपको वेट करना पड़ेगा ." दो सुन्दर लड़कियों ने कहा . मैंने पहले भी लिखा है कि भूटान में हमने हर जगह लड़कियों को ही काम करते देखा . वहाँ एक दो लड़के थे पर सहायक के रूप में ही थे .
उनकी बात सुनकर बड़ी हताशा हुई क्योंकि उस समय सभी भूखे थे .उन्होंने वहाँ की किन्ही वनस्पतियों से बना बिना दूध की चाय जैसा पेय दिया . कुछ आराम के बाद हम लोग नहा कर ताजा हुए तो खाने के नाम पर सिर्फ नूडल्स से ही सन्तोष करना पड़ा . उसी समय एक और कार आई तो नेहा हँसकर बोली –"लो मम्मी केवल हमी बेवकूफ नहीं बने हैं...
पुनाखा जोंग के लिये इस पुल से जाते हैं 
जो भी हो ,नाम कितना अच्छा है, 'ईको-लॉज' , नाम को वहाँ की आबोहवा सार्थक कर रही है ."वास्तव में वहाँ का परिदृश्य भी बड़ा ही मोहक और लुभावना था . नीचे फिर दो नदियों का संगम दिख रहा था .सामने पहाड़ में खिलौने जैसी कारें परिक्रमा सी करती हुई उतर रहीं थीं . 
पुनाखा में जोंग और सस्पेंशन ब्रिज देखने की योजना थी . 
नेहा ने पहुँचते पहुँचते कहा था-
"मम्मी अब तो यहाँ से कल ही उतरेंगे . जोंग वोंग कुछ नही देखना ." मैं भी नेहा से सहमत थी .उस रास्ते से उतरना फिर लौटना और फिर अगली सुबह उतरकर आगे जाना उस समय हमें काफी असुविधा भरा और खतरनाक लग रहा था . हमारी बात सुनकर विकास हँस पड़ा .बोला –"आपको चिन्ता करने की जरूरत नहीं मैडम . मैं हूँ ना .."
पुनाखा जेोंग
वह बेशक बड़ा नेक खुशमिजाज और काफी कुशल ड्राइवर था .  
पुनाखा जोंग ---यह जोंग पुनाखा का ही नही ,भूटान भर का सबसे बड़ा और प्रमुख बौद्ध मन्दिर है जो 'पो छू' और 'मो छू' के संगम पर बना है .इसका निर्माण सन् 1637 में शबदरूंग नगवांग नामग्याल द्वारा प्रशासकीय कार्यों के सम्पादन हेतु कराया था ( यह जानकारी गूगल से साभार ) जोंग तक पर्यटक बहुत ही सुन्दर पुल से होकर जाते हैं जो पो छू पर खूबसूरत पारम्परिक शैली में बना है .पुनाखा जोंग देखना भूटान भ्रमण का एक बहुत प्यारा और खूबसूरत अनुभव रहा . यहाँ हमने बहुत सारे फोटोग्राफ लिये .
पुनाखा जोंग के बाद सस्पेंशन ब्रिज भी देखा . लोहे की बड़ी मोटी जंजीरों से बँधा यह काफी लम्बा पुल मो छू पर बना है .एक और मठ चिमी लखांग भ्रमण भी योजना में था पर समय कम था , फिर वहां अधिकतर सन्तान के इच्छुक दम्पत्ति ही जाते हैं .फिर इतने सुन्दर स्थान ( जोंग) को देखने के बाद अब कुछ देखने का मन भी नहीं था .
अँधेरा होने से पहले हम वापस ईको लॉज आ गए . शाम के खाने में चावल ,चीज के साथ बना पत्ता गोभी , चीज आलू ,तीखी ,चटनी ,मोमोज और के अलावा कॉर्न सूप था .
ईकोलॉज की सुहानी सुबह ने विगत कल की सारी परेशानियों को भुला दिया .शुरुआत होने के कारण अभी वहां कुछ असुविधाएं हैं पर जगह शानदार है .
पारो नदी 
संगम
पारो –20 मई को पुनाखा से पारो जाने के लिये हम थिम्पू लौटे और शहर के बाहर से ही पारो के लिये निकल पड़े . फुनशुलिंग –थिम्पू मार्ग में बीच में भारत की सहायता से बना जो पुल है ,और जहाँ पारो छू और थिम्पू छू का सुन्दर संगम है .और वहीं से पारो शहर के लिये हम फिर एक बहुत खूबसूरत यात्रा पर निकल पड़े .पहाड़ों के बीच चौरस घाटी में बसा पारो भूटान का सबसे सुन्दर शहर है और भूटान का एक मात्र हवाई-अड्डा भी . कहा जाता है कि यह दुनिया की उन खतरनाक हवाई पट्टियों में से एक है जहाँ प्लेन की लैंडिंग हर पायलट नहीं कर सकता . पर्वत शिखरों के बीच घाटी में लैंडिंग के लिये विशेष ट्रेनिंग दी जाती है . यहाँ दो ही ऐरोप्लेन है एक सरकारी और एक निजी . खैर ...
सस्पेंशन ब्रिज
पारो के रास्ते में पारो छू सबसे खूबसूरत प्रसंग रहा . पूरे रास्ते इसकी उछलती मचलती धवल धारा हमें उत्साह और सौन्दर्य के गीत सुनाती सिखाती रही . एक जगह चौरस किनारे पर हम लोग इसकी धारा में उतर गए . शीतल जल में आचमन किया . आँखों को धोया . रोम रोम में इसकी ठण्डक को भर लिया .  नदी सचमुच धरती की ही नहीं हम प्राणियों की भी जीवन रेखा है . एक समय था जब नदी हमारा घर-आँगन थी . अब उससे मिलने के लिये समय योजना बनानी पड़ती है . बरसों बाद हुए इस मिलन से आत्मा तृप्त होगईं . रेत में पड़े सुन्दर सुडौल व सुनहरी रुपहली चमक वाले कंकड़ किसी अमूल्य धन से लग रहे थे . मैंने और विवेक ने कुछ कंकड़ तो बटोरे भी . यह हमारे भ्रमण का सचमुच बेहद प्यारा और याद रखने लायक अनुभव रहा .
शहर में पहुँचकर पहला काम था भोजन की तलाश . क्योंकि उस समय होटल में खाना मिलने वाला नही था .वैसे भी हमारा होटल 'उदुम्बरा' शहर से कुछ दूर था जहाँ विकास के अनुसार कोई रेस्टोरेंट नहीं मिलने वाला था . पारो में शाकाहारी होटल मिलना हमें काफी मुश्किल लगा . काफी तलाशने पर एक शाकाहारी होटल मिला --'ऑल सीजन.' वहीं हम सबने खाना खाया . जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि भूटान में मिर्च मसाले और चीज़ का इस्तेमाल बहुत होता है .वहाँ भी था .शाही पनीर रंग से नहीं , लाल मिर्च की भरमार से लाल था . यहाँ तक कि पनीर के साथ साबुत लाल मिर्च भी पड़ी थीं . मिर्च की चटनी तो वहाँ हर खाने के साथ मिलती है
उदुम्बराउत्कृष्ट कलात्मक शैली में बना बहुत खूबसूरत होटल है . संयोग यह कि हर बार हमारे बाजू में नदी जरूर रही है . उदुम्बरा के पीछे भी नदी का कलरव बराबर सुनाई दे रहा था . कुछ देर आराम करके हम नेशनल म्यूजियम और रिनपुंग जोंग देखने निकल गए . भूटान का राष्ट्रीय संग्रहालय एक सांस्कृतिक संग्रहालय है . यहाँ भूटान की सम्पूर्ण संस्कृति ,वन सम्पदा ,पशु पक्षी ,नृत्य, वेशभूषा सबके दर्शन होते हैं . हर प्रतीक और भाव को प्रदर्शित करते मुखौटे यहाँ का बड़ा आकर्षण है .हालाँकि सीमित समय में वह सब विस्तार से नहीं देखा जा सकता .
उदुम्बरा होटल  का शिल्प दर्शनीय है .
इसके नीचे रिनपुंग जोंग ( बौद्ध मठ ) है. यहाँ आध्यात्मिक ज्ञान देने वाले भिक्षु व भिक्षुणियाँ नियुक्त हैं .चाहे बौद्धमठ हों ,मन्दिर हों या कोई भवन भूटानी वास्तुकला का सौन्दर्य हर जगह बिखरा हुआ है .
जोंग से नीचे फिर वहीं चंचल प्रवाहिनी पारो नदी थी . जिसकी नयनाभिराम धारा पर बहुत सुन्दर प्राचीन पुल है ..विकास ने विवेक को तीर चलाने वाली खास जगह भी बताई .
पारो का बाजार भी काफी सुन्दर और शान्त है . यहाँ भी हमने कुछ चीजें खरीदीं .
टाइगर्स नेस्ट (मॉनेस्ट्री)
21 मई
भूटान भ्रमण का सबसे कठिन किन्तु रोचक व महत्त्वपूर्ण स्थान है पारो तकसांग यानी टाइगर्स नेस्ट जो दूर से पहाड़ में टँगा हुआ सा प्रतीत होता है ,हमारे अशोक चिह्न की तरह भूटान का राष्ट्रीय प्रतीक भी है .लगभग सवा तीन हजार मीटर की ऊँचाई पर स्थित टाइगर्स नेस्ट पर लगभग ग्यारह कि.मी. की चढ़ाई द्वारा पहुँचा जाता है .
चढाई के लिये तैयार
"सुबह जल्दी तैयार होजाना सर ...ताकि लौटते हुए शाम न हो .कम से कम आठ घंटे लगेंगे लौटने तक ."--शाम को विकास ने जाते जाते कहा था . सुबह मन में उत्साह लेकर हम आठ बजे निकल पड़े . विकास ने हमें उस जगह छोड़ दिया जहाँ से टाइगर्स नेस्ट की चढ़ाई शुरु होती है . वहाँ पचास रुपए प्रति एक के हिसाब से स्टिकें मिल रही थी . हमने चार खरीदीं .और टेकते हुए चल दिये . लाठी टेककर चलते हुए मुझे याद आया कि जब मैं बहुत छोटी थी ,गाँव में एक बूढ़ी नानी थी लाठी टेकते हुए चलती और कहती जाती थी –राम राम कहे जा , जा ही गैल गहे जा ..
जो चढ़ने में असमर्थ या कमजोर थे उनके लिये पाँच सौ रुपए में खच्चर भी उपलब्ध थे . हमने खच्चर नहीं लिये . हम्प्टा वैली ( हिमाचल प्रदेश ) की ट्रैकिंग के बाद मुझे खुद पर बड़ा यकीन होगया था कि मैं कहीं भी चढ़कर जा सकती हूँ .गत जनवरी में हम 2400 सीढ़ियाँ चढ़कर तिरुपति दर्शन के लिये भी गए थे . इसलिये मुझे खुद पर काफी भरोसा था पर एक-डेढ़ कि मी की चढ़ाई के बाद मेरी साँस बेकाबू सी होने लगी . मन्नू ने मेरी कलाई पर हार्टबीट बताने वाली घड़ी पहना दी थी . धड़कनों की गति देखकर मन्नू ने मेरे व विहान के लिये दो खच्चर बुलाए पर मैंने मना कर दिया . जब नेहा और मन्नू के ज्यादा कहा तो किसी तरह खच्चर पर बैठ तो गई पर बड़ा अजीब लगा . पता नही कैसे लोग आराम से हुमकते हुए बैठे जाते हैं .
"मेरे तो गिरने की पूरी संभावना है मन्नू .मैं तो ऐसे ही ठीक हूँ ."-यह कहकर मैं तुरन्त उतर पड़ी . अकेले विहान को लेकर खच्चर चल पड़ा . वह स्थिति सचमुच बहुत मुश्किल हो गई थी .खच्चर तो चलते क्या भागते हैं .उनके साथ चलना तो केवल उनके मालिकों का ही काम है . पर विहान को अकेला थो नही जाने दिया जा सकता था .
कैपेट एरिया , जहाँ मैं विहान रुके थे , से टाइगर्स नेस्ट का दृश्य
"मैं साथ जाती हूँ ." –कहकर नेहा बिना किसी विमर्श के खच्चर के साथ चलदी . किसी को भी सोचने का समय नहीं मिला कि जिस रास्ते पर दस बीस कदम एक साथ चलकर रुकना जरूरी लग रहा था उस पर नेहा जिसने कभी धूप या धूल का सामना नहीं किया वह खच्चर की गति से कैसे जाएगी .वह जल्दी ही नजरों से ओझल हो गई . मेरा कलेजा रह रहकर मुँह तक आ रहा था कि खच्चर के साथ लगभग दौड़ती नेहा पर क्या बीत रही होगी जबकि मेरी हालत दस कदम एक साथ चलने की नही थी . मन्नू मेरे लिये हर दस पन्द्रह कदम पर रुक जाता था . पछता भी रहे थे कि जो मेरे लिये जो खच्चर तय किया था उसी पर नेहा क्यों न बैठ गई . पर इतना सोचने का वक्त ही न मिला . 
दरअसल थकान का कारण केवल चढ़ाई नहीं थी .तिरुपति का रास्ता बहुत ही सुविधाजनक और शानदार था .जबकि टाइगर्स नेस्ट का रास्ता कच्चा धूलभरा सँकरा और ऊबड़खाबड़ है उस पर आते जाते धूल का गुबार छोड़ते जाते खच्चरों से बचना भी किसी संघर्ष से कम नहीं था . इतने प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण स्थान का रास्ता निश्चित ही काफी असुविधा भरा और निराशाजनक लगा .
नेहा विहान के साथ लगभग पौन घंटा पहले ही पहुँच गई थी .उसे ठीकठाक देखकर जान में जान आई .वास्तव में यह एक माँ के ममत्त्व का बल था वरना बहुत ही अल्पाहारी, सुकोमल नेहा में कहाँ थी ऐसी क्षमता ?
यह वो जगह थी जहाँ आपको खच्चर छोड़ देते हैं . कहते हैं कि यह टाइगर्स नेस्ट तक की दूरी का आधा हिस्सा है . यहाँ पास में ही कैपेट एरिया है जहाँ जलपान व विश्राम की व्यवस्था है . तय हुआ कि सामान के साथ मैं और विहान वहीं रुकें . मन्नू और नेहा अकेले मॉनेस्ट्री तक जाएं . मैं थकी तो थी ही उस पर एक व्यक्ति ने कह दिया कि भाई आंटी को मत ले जाना . इनके लिये रास्ता बहुत कठिन है .
मन्नू नेहा का मुझे विहान के साथ छोड़ने का विचार और भी मजबूत हुआ और सामान के साथ हमें कैपेट एरिया छोड़कर चले गए . कुछ पल मुझे राहत तो मिली पर आराम की साँस लेने के तुरन्त बाद मुझे एहसास हुआ कि रुककर मैंने गलती करदी . मुझे जाना चाहिये था .
उधर एक घंटे बाद ही विहान का राग शुरु होगया –मम्मी पापा कब आएंगे ..दादी आप और मैं चलते हैं उन्हें ढूँढ़ने ..कहीं रास्ता तो नही भूल गए ..कितनी देर और लगेगी ...

सामने होकर भी अभी बहुत दूर है टाइगर्स नेस्ट .फोटो मन्नू 

दरअसल कुछ लोग आपको बरगला देते हैं कि अरे बस यहाँ से आधा पौन घंटे का रास्ता है. पर उन्हें लौटने में पूरे चार घंटे लगे.  इतनी देर विहान को सम्हालते समझाते काफी मुश्किल हुई . साथ ही यह मलाल गहराता गया कि मेरा यह सफर अधूरा रह गया . कितना रोमांचक था वहाँ से सुदूर टाइगर्स नेस्ट को देखना . कैसे पहुँचते होंगे वहाँ . रास्ता कैसा होगा .वहाँ पहुँचकर कैसा लगता होगा ..उफ्...जाती तो वहाँ के दृश्य व अनुभव भी लिख पाती .
"मम्मी आप नहीं गईं , बहुत अच्छा हुआ . आप और विहान जाते तो हमें बीच से ही लौटना पड़ता ."–मन्नू व नेहा ने आते ही जो जो मुश्किलें बताईं उससे मेरा मलाल कुछ कम तो हुआ पर लगा कि शायद ये मुझे तसल्ली देने कह रहे हैं .
"मम्मी आपका स्वास्थ्य पहले है बाकी सब पीछे ..मैंने देखा कि आपकी पल्स कहाँ पहुँच गई थी ." –मन्नू मुझे समझाता रहा . शायद उसे मेरे खेद का अनुमान हो गया था .
कुछ देर आराम करने के बाद हम लोग उतर आए . पर टाइगर्स नेस्ट तक न जा पाने का अफसोस मुझे हमेशा रहेगा . पता नही क्यों ...
लौटते हुए विकास ने टाइगर्स नेस्ट की कथा सुनाई कि ,"हजार साल पहले यहाँ एक राक्षस रहता था . गुरु रिम्पोचे यानी भगवान पद्मसंभव एक बाघ पर बैठकर आए थे .बाघ उड़कर आया क्योंकि तब बाघ के पंख हुआ करते थे .यहाँ पद्मसंभव भगवान ने राक्षस को हराया और इसी जगह तीन साल, तीन महीने ,तीन सप्ताह ,तीन दिन , और तीन घंटे तपस्या की थी . गुरु रिम्पोचे बाघ पर बैठकर आए थे इसलिये इसे टाइगर्स नेस्ट कहा जाता है . जो भी भूटान आता है वह यहाँ जरूर जाता है सर ..."
मैं तो नही जा सकी --मैंने सोचा पर इसके बाद कुछ सोचने कहने का कोई अर्थ नहीं था .
सुबह उदुम्बरा से विदा लेने से पहले विकास ने हमारे कुछ फोटो लिये .
एयरपोर्ट पारो 
22 मई को दस बजे हम फुन्शुलिंग की ओर चल पड़े . लौटते हुए प्रकृति के रंग बदले हुए थे . आसमान में तैरते बादल सघन होकर घने काले वितान में बदल गए थे . पहाड़ों का रंग एकदम गहरा गया था . चूखा से निकलने के बाद भारी वर्षा शुरु होगई . बारिश होते ही नटखट बच्चों की तरह झरने भी पहाड़ की गोद से उतरने के लिये उछलकूद मचाने लगे . उनके देखा देखी बादल भी नीचे उतर आए . और फैल गए आजू बाजू पेड़ों पर , रास्ते में ,सड़क पर.... परवाह किसे है कि ड्राइवर बेचारा कार के स्क्रीन से पानी हटाते हटाते हलकान हो रहा है . रास्ता सूझ नही रहा . आगे जा रही बस की धुँधली सी लाइट रास्ते का अनुमान करा रही है .सब कुछ एक धुन्ध में विलीन सा होगया था . कुछ मील इसी तरह चलते रहे और फिर अचानक जैसे दर्पण पर जमी धूल को किसी ने साफ कर दिया हो . पेड़ पहाड़ सड़क सब नहा निखरकर बाहर निकल आए . पन्त जी ने ऐसा ही कुछ देखकर कहा होगा –
"पावस ऋतु थी पर्वत प्रदेश ,पल पल परिवर्तित प्रकृति वेश..."
फुन्शुलिंग में फिर पार्क होटल में ही रुके . संयोग से पहले वाले कमरे ही मिले तब लगा जैसे घर वापस आगए . इस तरह शानदार सात दिन हमने भूटान में बिताए . सुबह विकास ने हमसे विदा ली . हमारी इच्छा थी ,विकास की भी , कि वही हमें सिलीगुड़ी तक छोड़े . इन आठ दिनों में वह बिल्कुल अपना सा लगने लगा था . पर यह तय करने वाला न
वह था न हम . विकास हमें यहीं से मिला था और यहीं से विदा हुआ . सिलीगुड़ी तक के लिये अब हमें दूसरा ड्राइवर और दूसरी गाड़ी लेनी थी .
लौटते हुए हम कोरोनेशन ब्रिज से होते हुए हम सिलीगुड़ी आए . कोरोनेशन ब्रिज की नींव 1937 ई में किंग जार्ज षष्ठम ने रखी थी .इसे सेवोक पुल या बाघ पुल भी कहा जाता है .वास्तुकला और इतिहास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण यह सुन्दर पुल तीस्ता नदी पर बना है .
 23 मई को हमें सिलीगुड़ी में रुकना था . चुनाव परिणाम पर झगड़े फसाद की आशंका विकास ने भी जताई थी और नए ड्राइवर ने भी . सो हम लोग सुबह दस बजे ही सिलीगुड़ी के 'उड़ान क्लोवर होटल' पहुँच गए .वहाँ दिनभर चुनाव परिणाम देखते रहे .
सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल का सुन्दर शान्त शहर है . यहां मेरी भतीजी पल्लवी गायनोकॉलोजी से पोस्ट ग्रेजुएशन कर मेडिकल कॉलेज में ही नियुक्त होगई है . उससे मिलना भी सुखद रहा . 24 मई को सुबह हम लोग बागडोगरा पहुँच गए . 8 45 की फ्लाइट थी . दोपहर एक बजे घर भी पहुँच गए .पूरे सप्ताह भागमभाग भरा लेकिन बहुत ही प्यारा और अविस्मरणीय सफर रहा .  भूटान हमारे दिल दिमाग में आज भी बसा है और बसा ही रहेगा . 
कोरोनेशन ब्रिज 

Friday, July 12, 2019

हिमालय के कोट में टँका हुआ फूल--भाग 2

भाग 1 से आगेl

17 मई 2019
लगभग 2335 मी. की ऊँचाई पर बसा शहर थिम्पू भूटान की राजधानी है और शायद भूटान का सबसे बड़ा शहर भी .फुनशुलिंग से थिम्पू तक हरे-भरे मनोरम लेकिन पाँच-छह घंटे पहाड़ों में ऊपर नीचे चढ़ते उतरते अब तन मन दोनों ही विश्राम चाह रहे थे . यहाँ रामदा होटल में हम दो रातें गुजारने वाले थे . होटल पहुँचते ही दो युवक गाड़ी से सामान उतारने आगए . फिर जब दो सुन्दर लड़कियों ने मुस्कराते हुए हमारे कन्धे पर सफेद रेशमी दुपट्टा डालकर अभिवादन और स्वागत किया तो एक गरिमामय अनुभव हुआ .उनकी अतिथि सत्कार की यह परम्परा हमें अपूर्व और बहुत शानदार लगी .साथ ही यह भी कि अब हम सचमुच दूसरे देश में हैं .

वास्तव में यहाँ आकर ही हमें असली भूटान देखने मिला . थिम्पू में दो दिन रुके इसलिये बहुत सारी नई व अनौखी जानकारियाँ मिलीं . जैसे कि भूटान का स्थानीय नाम ड्रुक है ,ड्रैगन की भूमि .राज्य के चीफ को ड्रेगन किंग कहा जाता है.....यहाँ लोकतांत्रिक शासन है पर संवैधानिक राजशाही भी है.....यहाँ ट्रैफिक सिग्नल नहीं हैं लेकिन एक से बढ़कर एक शानदार गाड़ियों सड़कों पर दौड़ती देखी जा सकतीं हैं.....दो पहिया वाहन नहीं दिखाई देते . हर जगह (होटल ,शॉपिंग सेन्टर व अन्य स्थानों पर ) लड़कियाँ ही काम करतीं हैं ... यहाँ कोई अपना अलग से जन्मदिन नहीं मनाता बल्कि नववर्ष को ही सबके जन्मदिन के रूप में मनाते है... .प्लास्टिक और धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबन्धित है ....लोग पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक हैं ....यहाँ अधिकतर लोग हिन्दी समझते हैं ... शादी के बाद लड़का लड़की के घर आकर रहता है....बहुविवाह बुरा नही माना जाता . लोग अपनी संस्कृति व परम्पराओं के प्रति बहुत प्रतिबद्ध व आस्थावान हैं . बाहरी प्रभाव से मुक्त रखने के लिये लम्बे समय तक पर्यटकों के लिये भूटान के दरवाजे बन्द रखे गए . 1970 ई में यहाँ पहला विदेशी पर्यटक आया .1999 से पहले यहाँ टीवी इन्टरनेट जैसे संचार साधन नहीं थे . यहाँ का वास्तु शिल्प अनूठा और विशिष्ट है . सभी इमारतें एक ही शैली में बनी हुई हैं . निचले भाग में सफेद और ऊपरी भाग में कत्थई पेंट किया गया है जिस पर हरे सुनहरे रंगों की कलात्मक आकृतियाँ हैं .. खिड़की दरवाजों और झरोखों में लकड़ी की शिल्पकारी देखने लायक है . पारम्परिक शैली से अलग रंग और ढंग के भवन निर्माण की अनुमति नहीं है......होटल अपार्टमेंट्स ,मॉल ..सभी भवन एक ही शैली में बने हुए हैं .हिमालय की गोद में बसे सिक्किम और भूटान में भौगौलिक समानताएं हैं लेकिन अलग राष्ट्र होने के साथ भवन निर्माण शैली भी भूटान को सिक्किम से अलग करती है . बाजार बहुत साफसुथरे शान्त व भीड़ रहित हैं....कोई आपाधापी या तनाव नहीं है.... विदेशियों के लिये भूटान काफी मँहगा है लेकिन भारतीय पर्यटकों के लिये यह छोटा सा देश अपने घर आँगन जैसा है ...यहां का राष्ट्रीय पक्षी रेवेन है जो एक शक्तिशाली देवता माना जाता है . उसे मारने पर उम्रकैद की सजा का प्रावधान है .रेवेन-क्राउन को वांग्चुक वंश का मॉडल माना जाता है ... यहाँ लोग राजा को बहुत मानते हैं . वर्त्तमान राजा जिग्मे खेसर नामग्याल हैं और रानी जेटसुन पेमा .यहाँ आय का बड़ा स्रोत बिजली है... अन्य में वन सम्पदा और अब पर्यटन भी शामिल हो रहा है ..वगैरा वगैरा ..
रात के भोजन के बाद हम अपने अपने कमरों में चले गए . विवेक ने विकास के ठहरने के विषय पूछा तो वह हँसकर बोला ---हो जाएगा सर ,हमारा तो रोज का काम है . हँसते समय उसकी आँखें लगभग बन्द होगई लगतीं हैं .
सर सुबह नौ बजे तक ब्रेकफास्ट लेकर तैयार रहें . मैं आ जाऊँगा .”विकास ने एक बार और दोहराया फिर खाना खाकर अपने किसी परिचित या मित्र के यहाँ चला गया .
मेरे साथ विहान के खूब मजे रहे . उसे मालूम तो हो ही गया है कि दादी पापा मम्मी से भी बड़ी हैं इतनी कि जरूरत होने पर वे उन्हें डाँट भी सकती हैं .उसने सोने से पहले दो कहानियाँ व चुटकुले सुने फिर अपने प्रिय कार्टून डोरेमोन के किस्से सुनाए और उनसे जुड़े सवाल भी किये , (मानो नोबिता ,डोरेमोन सूजैन वगैरा को मैं रोज मिलती हूँ ) जो मेरे पल्ले तो नही पड़े पर मैं अन्दाज से जबाब देती गई और वह खुश होकर कहता रहा –अरे दादी आप तो काफी इन्टेलिजेंट हैं .
कहानी सुनकर विहान सो गया लेकिन मुझे उस रात नींद बहुत ही कम आई . न के बराबर .एक तो कम से कम डेढ़-दो बालिश्त मोटा गद्दा आपत्ति की हद तक मुलायम और गुलफुला था . हम दोनों उसमें लगभग धँस गए थे . मुझे इतनी आरामदायक चीजें रास नहीं आतीं . उस पर रास्ते के दृश्य दिल-दिमाग और आँखों में इस तरह भरे हुए थे कि नींद आ आकर लौट जाती थी .
18 मई
मेमोरियल चोर्टन 
विकास सचमुच सुबह ठीक नौ बजे आगया . हम लोग भी तैयार थे . पहले हम मेमोरियल चोर्टन (msmorial chorten) ( किसी किसी ने कोर्टन भी लिखा है . कोई नियम--धरम नहीं है रोमन लिपि का ) गए . यह थिम्पू के मनोरम ,प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित स्मारकों में से एक है . विश्वशान्ति को समर्पित, तिब्बती शैली में बना यह मठ तृतीय ड्रुक ग्यालपो ( भूटान का राजा) जिग्मी डोरजी वांगचुक की याद में बनाया गया था .हमने देखा ,सैकड़ों लोग उस हरे भरे मैदान के बीच स्थित धवल भव्य स्मारक की परिक्रमा कर रहे थे . आस्था , प्रेम व श्रद्धा का केन्द्र चाहे मानवीय हो या दैवीय वह मन को ऊर्जा, उल्लास और जीवन को सौन्दर्य देता है . आस्था व विश्वास के बिना जीवन जैसे बिना चालक के चलता दिशाहीन वाहन है .
बुद्ध—पॉइंट और थिम्पू शहर--
भूटान बौद्ध संस्कृति का देश है .बौद्ध धर्म यहाँ का राजकीय धर्म है .सड़क ,पुल ,पेड़ , पहाड़ , हर जगह बौद्धधर्म के रंगबिरंगे परचम लहराते दिख जाते हैं .जंगल पहाड़ और नदियों के साथ साथ भूटान को बौद्ध मठों ( मॉनेस्टरीज) का भी देश कहा जा सकता है .थिम्पू में स्थित भगवान बुद्ध डोरडेम्मा की प्रतिमा भूटान ही नहीं पूरे एशिया में सबसे ऊँची प्रतिमा है . हम वहीं जा रहे थे .गाड़ी लहराती हुई पहाड़ चढ़े जा रही थी और मैं नीचे छूटते जा रहे शहर को देख रही थी जहाँ भवनों के बीच की दूरियाँ मिटती जा रही थी और शहर सिमटता जा रहा था . विहंगम दृष्टि भौतिक के साथ आध्यात्मिक व व्यावहारिक संकेत भी देती है . दृष्टिकोण जितना ऊँचा होगा ,विषमता और संकीर्णता उतनी ही कम होगी . मैंने अपनी कविता ऊँचाई पर दो व्यंजना में भी लिखा है कि ऊँचाई का मतलब ही है ,भेदों का मिट जाना .  कुछ ही पलों में हम भगवान बुद्ध के विशाल प्रांगण में थे ,विस्मित अभिभूत .... आसमान में बादलों के बीच शान्त , उन्नत-भाल भगवान बुद्ध की स्वर्णखचित प्रतिमा सचमुच भव्य है , अद्भुत है , दिव्य है . प्रतिमा की ऊँचाई का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि नीचे प्रांगण खड़े होकर बुद्ध का मस्तक देखने के लिये आकाश की ओर देखना पड़ता है . 169 फीट ऊँची इस प्रतिमा की स्थापना भूटान के चतुर्थ नरेश जिग्मे सिंगे वांग्चुक के साठवें जन्मदिन पर की गई थी . कहते हैं कि इसके अन्दर भी काँसे की सवा लाख बौद्ध-प्रतिमाएं हैं . इसके निर्माण और स्थापना में चीन जापान कोरिया आदि देशों का पर्याप्त सहयोग मिला है . उस ऊँची और बंजर सी पहाड़ी पर जहाँ हरियाली वैसी नहीं थी जैसी रास्तें में थी लेकिन हवा में गज़ब का जोर था , जैसे पाँव फर्श पर कसकर पर नहीं रखे तो उखड़ जाएंगे . मानो कि दर्शनार्थियों की यह एक परीक्षा थी कि कितना टिक सकोगे यहाँ , इस मार्ग पर जो धन-वैभव और पति पत्नी व सन्तान जैसे आत्मीय सम्बन्धों के प्रति भी व्यक्ति को निस्संग व निर्मोही बना देता है .
प्रांगण में चारों ओर देवी देवतों की सुनहरी और भव्य प्रतिमाएं खड़ी थीं मानो वे सुविशाल भगवान बुद्ध की स्तुति कर रहे हों . नीचे थिम्पू शहर भगवान बुद्ध को साष्टांग प्रणाम कर रहा था और बुद्ध जैसे अपने संरक्षण में आए शहर को अभयदान दे रहे हों . प्रतिमा के नीचे विशाल भवन है . वहाँ बुद्ध भगवान विष्णु , शिव ,ब्रह्मा , सरस्वती आदि के बीच विराजमान हैं . बाहर मोर व गरुड़ की मूर्त्तियाँ हैं . इस तरह मुझे वहाँ हिन्दू और बौद्ध धर्म का समन्वय देखने मिला . लकड़ी के स्तम्भ और छत की शिल्पकारी अद्भुत है . हमने वहाँ जितना भी समय बिताया , वह अविस्मरणीय है .
इसके बाद एक दूसरे बहुत प्राचीन बौद्धमठ या मन्दिर को भी देखने गए जो बारहवीं शताब्दी में बनाया गया . बौद्ध धर्म यहाँ नौवीं सदी में आया था . इससे पहले का इतिहास केवल जनश्रुतियों में है .
भूटान और भारत के सम्बन्ध अच्छे पड़ोसी जैसे ही हैं . भूटान में सड़क, पुल का निर्माण , म्यूजियम ,कई परियोजनाएं , सीमा सुरक्षा आदि में भारत का सहयोग व हस्तक्षेप है . हुआ यों कि 1865 ई. में ब्रिटेन और भूटान के बीच एक सन्धि हुई जिसके तहत भूटान के कुछ सीमावर्त्ती भूभाग के बदले उसे वार्षिक अनुदान देना तय हुआ . आजादी के बाद वह अधिकार भारत को मिला लेकिन भारत ने सन् 1949 ई. में भूटान को उसकी सारी ब्रिटेन अधिकृत भूमि लौटादी बदले में भारत को भूटान की विदेश व रक्षा नीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका मिली .
पारम्परिक वेशभूषा और भोजन  .
भूटान आज भी एक अनौखा देश है . यहाँ 70 प्रतिशत जंगल हैं .. पर्यावरण के प्रति लोग बहुत जागरूक हैं .प्लास्टिक व धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबन्धित है . दो-तीन साल पहले राजपुत्र के जन्मोत्सव के रूप में लोगों ने एक लाख पेड़ लगाए .यह पूरी दुनिया को एक महत्त्वपूर्ण सन्देश है .
भूटान की पाम्परिक वेशभूषा .धौं व कीरा है . हर भूटानी नागरिक के लिये यही परिधान अनिवार्य है .भूटान के लोग अपनी भाषा , वेशभूषा और परम्पराओं के प्रति बड़े प्रतिबद्ध हैं . आज वैश्वीकरण के युग में अपनी संस्कृति के लिये ऐसी प्रतिबद्धता, ऐसा विश्वास और आस्था सचमुच चकित और प्रेरित करती है .
निहाशा ने पहले ही विकास को बता दिया था कि हम दोपहर का भोजन होटल में नहीं बल्कि किसी अन्य जगह भूटान के पारम्परिक व्यंजनों का स्वाद लेना चाहेंगे . होटल में तो हर जगह लगभग एक सा ही मेनू पनीर दाल सब्जी रायता चपाती सलाद आदि होता है . रवि हमें कावाजंग्सा( kawajangsa) फोक हैरिटेज रेस्टोरेंट ले गया . वहाँ की पारम्परिक कला से सज्जित व्यवस्था देख मन खुश होगया . एक बहुत खूबसूरत लड़की --–"अच्छा चलता हूँ दुआओं में याद रखना .." गीत गुनगुना रही थी यह देख अपनेपन का अनुभव हुआ . 
वहाँ भी हमारी प्राचीन परम्परा की तरह ही भोजन फर्श पर बैठकर करने का नियम हैं .हमारे सामने सुसज्जित चौकियाँ थी जिन पर खाना रखा जाने वाला था . सबसे पहले हमें मिट्टी के कुल्हड़ों में सुजा (बटर टी ) दी गई .यह पेय चाय ,नमक और मक्खन से बनाया जाता है . इसके बाद जो कुछ आया सब नया था .परोसने का तरीका भी शानदार था .. व्यंजनों में एमादात्शी ,केवादात्शी, रेड राइस ,वेज मोमोज , लाल मिर्च की तीखी चटनी ,खुली ,एजी परोसा गया . .खुली (khulee) कूटू के आटे से बना पेन केक होता है , एमादात्शी भूटान का राष्ट्रीय व्यंजन कहा जाता है .इसे लाल मिर्च मक्खन और चीज़ के साथ पकाया जाता है जबकि केवादात्शी , पत्तागोभी , बीन्स आलू चीज़ और मक्खन से बनता है . यहाँ सब्जी में मिर्च की मात्रा ज्यादा होती है . एजी चीज़ के साथ बारीक कटा सलाद था . रेडराइस बेस्वाद (लेकिन सेहत के लिये अच्छे ) लाल चावल ...स्थानीय भोजन में शाकाहारी लोगों के लिये बस इतना ही है . हमने जैसे तैसे उदरपूर्ति की , फिर निकट ही स्थित म्यूजियम देखा .
टाकिन
टाकिन
टाकिन भूटानका राष्ट्रीय पशु है इससे बड़ी विशेषता है कि यह बकरी और गाय का मिलाजुला रूप है , आगे बकरी और पीछे से गाय. तब तो टाकिन को देखना ही चाहिये ,इस विचार के साथ हम मोतीथांग प्रेजरवे (अभयारण्य) पहुँचे . रवि ने टाकिन के बारे में एक जनश्रुति सुनाई कि सदियों पहले एक लामा घूमते घूमते इधर आए . एक दिन उन्होंने एक जगह एक गाय मरी पड़ी देखी और दूसरी जगह एक बकरी . लोगों को मालूम हो चुका था कि इनके पास दैवीय शक्ति है इसलिये उनसे कुछ चमत्कार दिखाने का आग्रह किया तो सन्त ने बकरी और गाय दोनों की हड्डियों को जोड़कर प्राण डाल दिये तो एक विचित्र जानवर उठ खड़ा हुआ . वही जानवर आज टाकिन के नाम से जाना जाता है  .300 रुपए प्रति व्यक्ति टिकिट के हिसाब से 1200 रुपए देकर हम अन्दर गए तो महसूस हुआ कि इतने रुपए व्यर्थ गए क्योंकि वहाँ मात्र चार-पाँच टाकिन दिखे वह भी बहुत दूर . वे दूर उधर ही घूमते रहे .पास से देखने की चाह पूरी नहीं हो पाई . लौटते हुए बेम्बो मार्केट से कुछ की चेन ,पर्स ,स्पेशल होममेड साबुन ,बुद्ध की प्रतिमाएं आदि सामान खरीदा . एक दुकान में निहाशा के हाथ से बुद्ध की प्रतिमा , जिसे वह बड़े शौक से खरीदना चाह रही थी , छूट गई और चटक गई . उसने मूर्त्ति की कीमत अदा करदी पर दूसरी लेने से मना कर दिया हालाँकि उसका बहुत मन था . विवेक ने आग्रह करके वैसी ही दूसरी मूर्त्ति खरीदी तब दुकानदार लड़की ने धन्यवाद कहते हुए कीमत से 100 निकालकर नेहा को दे दिए. भूटान में हमने हर जगह लड़कियों को काम करते पाया .होटलों में भी रिशेप्शन से लेकर ,कुकिंग, फूड सर्विंग ,सफाई सब कुछ लड़कियाँ करतीं हैं और वह भी निर्भय . यह बात हमें बड़ी अच्छी लगी .
रात में रॉयल पैलेस
अब तक शाम हो चली थी . विकास ने कहा ----कुछ देर रुकें , रॉयल पैलेस की लाइट देखकर चलेंगे . उससमय काफी थकान भी हो रही थी . मन्नू ने कहा --छोड़ो भी ,लाइट क्या देखना
अब यहाँ आए ही हैं तो देख लेते हैं ना सर ...विकास साग्रह बोला . वह खुशमिजाज होने के साथ बहुत उत्साही और पर्यटकों का ध्यान रखने वाला युवक है शायद यह उसके पेशे की माँग और अभ्यास हो . पैलेस की लाइट जलने में अभी लगभग एक घंटा की देर थी पर वह हमें यहाँ वहाँ घुमाता रहा और कितनी ही जानी अनजानी जानकारियाँ देता रहा कि यह खेल का मैदान है . तीरन्दाजी और डार्ट्स यहाँ के राष्ट्रीय खेल है , इस बार भूटान ओलम्पिक में भी शामिल हुआ था ... कि भूटान को यहाँ ड्रुकयुल कहते हैं . वैसे भूटान भूतान यानी भूतों का घर ..पहले यहाँ भूतों का डेरा हुआ करता था .....यहाँ लोग राजा की बहुत इज्जत करते हैं लोग .यहां लोग अपना जन्मदिन नववर्ष के दिन मनाते हैं .....
सात बजे रॉयल पैलेस लाल पीली रोशनी से जगमगा उठा तब विकास का आग्रह हमें बहुत आत्मीय और सार्थक लगा .वरना उसे क्या पड़ी थी . उस रात काफी अच्छी नींद आई .

जारी......