शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

एक गज़ल

 

जालों से उलझनों के ,जैसे हो उबर जाएं

चौराहे से निकलकर , कोई तो डगर पाएं ।

 

थामे रहें न छोड़ें कभी हौसलों का दामन ।

चाहे भले ही कितनी चलती रहें हवाएं ।

 

गुज़री हो उम्र यूँ ही जिनको तलाशते ही ।

कुछ कीजिये वो लमहे ,कुछ देर ठहर जाएं ।

 

इल्ज़ाम ही लगालो, लेकिन यूँ चुप न बैठो

बेकार ग़लतफहमी ,मासूम न मर जाएं ।

 

 तूफान ले गया है सामान जिनका सारा

कैसे करें गुजारा कहदो कि किधर जाएं ।

 

आँखों में नींद थी जब  ,वह बात रात की थी ,

अब भोर को जगाने , चिडियों सा चहचहाएं ।

 

अरसे से रुकी देखो राहों में तमन्नाएं

कहना है जो भी कहदो ,जिससे कि वे घर जाएं ।

रविवार, 13 सितंबर 2026

अपनी खड़ी बोली

 मिसरी की गोली

अपनी  खडी बोली ।

माँ ने दूध में है घोली

अपनी खडी बोली ।

 

सरस है ,सक्षम है

सरल और शुद्ध है

अनुभूतियों का सागर

अभिव्यक्ति में प्रबुद्ध है

संस्कृति के द्वार पर

जैसे रंगोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

झरना ज्यों झरता है

पवन जैसे बहता है

धरती में नमी पाकर

बीज जैसे उगता है

आता वसन्त भरे

फूलों की झोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

शिशु की है किलकारी .

अलकें ज्यों गभुआरी .

अन्तर की बातों सी

हिन्दी मनोहारी .

इससे ही सजती है

सपनों की डोली .

मिसरी की गोली

अपनी खड़ी बोली .