Yeh Mera Jahaan

रविवार, 31 जुलाई 2011

वे दो शब्द

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वे दो शब्द-- मरहम से, दे दो उसे जो गिरा है अभी-अभी लगा लेगा अपने ताजा जख्मों पर । वे दो शब्द-- उत्तीर्ण होने की सूचना जैसे, पेपर बिगडने के ब...
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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

चलते--चलते

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सीट-1 ----------- गाडी जैसे ही स्टेशन पर रुकी । अनारक्षित डिब्बों में लोगों ने अपनी-अपनी सीट सम्हाली ।किसी ने पाँव पसार लिये किसी ने बैग रख ...
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शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

सूरज के साथ-साथ

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सुबह--सुबह सूरज के साथ उतरती है...गूँजती है उनीदी अलसाई सी गली में एक सत्तर साल के आदमी की आवाज-- दूध ले लो...दूध ठकुराइन..मिसराइन.. ...
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रविवार, 10 जुलाई 2011

कंगाल

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खेत में झूलती बाजरे की रुपहली बालों को देख कर जिस तरह किसान की आँखें तृप्त होजाती हैं, उसी तरह अपने जवान और कमाऊ बेटे को देख कर विसनू की आखे...
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रविवार, 26 जून 2011

चलते-चलते

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बात एक रुपया की ---------------------------- ग्वालियर से मुरैना जाने वाली एक प्राइवेट बस । जैसा कि अक्सर ही कण्डक्टर को यात्रियों से किराए क...
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रविवार, 12 जून 2011

आज की कविता

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कौन कहाँ ठहरा है बाबा ! राज़ बडा गहरा है । पूरब-पश्चिम , उत्तर दक्षिण बाहर दिखे न कोई लक्षण । लेकिन अन्दर झाँकोगे तो, नस-नस भेद भरा है...
12 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 1 जून 2011

ऊँचाई पर----दो व्यंजनाएं

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(1)एक विस्तार -------------------------- एयर इण्डिया के विमान में उडते हुए मैंने देखा कि विशाल और शानदार दिल्ली शहर , जो धीरे--धीरे सिमट कर ...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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