Yeh Mera Jahaan

सोमवार, 24 सितंबर 2012

'अपनी खिडकी से'--एक समीक्षक की नजर से

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बड़ों के लिए किस्से बचपन के - लोकेन्द्र सिंह गिरिजा कुलश्रेष्ठ का पहला कहानी संकलन है 'अपनी खिड़की से'। भले ही यह उनका पहल...
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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

पच्चीस साल बाद

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'पच्चीस साल बाद' ---फिल्मी नाम लग रहा है न ? लेकिन यह सच है कि पुस्तक 'ध्रुव-गाथा' जो कल ही प्रकाशित होकर आई है ,पच्चीस सा...
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रविवार, 16 सितंबर 2012

वे 'लक्षणा' को नही जानते ।

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"ए ! ओ !! अरे भाई सुनो !!!"  साक्षरता अभियान के दल-प्रमुख ने एक गाँव वाले को पुकारा जो एक तरफ भागता हुआ सा जारहा था । यह कुछ सा...
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रविवार, 9 सितंबर 2012

दर्द को सोने न देना ।

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---------------------------------------------- यह 19 वर्ष पहले की बात है । सातवीं कक्षा एक का मासूम छात्र एक दिन स्कूल में अपने शिक्षक द्...
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मंगलवार, 4 सितंबर 2012

'वह सबक'----माँ का एक अविस्मरणीय संस्मरण

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-------------------------------------------------------------- "उन दिनों स्कूल लगभग आठ घंटे लगता था । सुबह से दोपहर और फिर तीन से चार...
14 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 27 अगस्त 2012

यह तो सोचा ही नही था ।

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कोलाहल में क्यों ख़ामोश शहर लगता है ख़ामोशी में अब तो साफ ज़हर लगता है । आकर भी देखें  वो सडक बनाने वाले , सारा देश हादसों का ही घर लग...
11 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 21 अगस्त 2012

दुष्यन्त कुमार ने कहा ।

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मामूली बात नही है कि अगन भटुटियों के दहाने पर बैठे हुए हम तुमसे फूलों और बहारों की बातें कर लेते हैं । ....................................
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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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