Yeh Mera Jahaan

बुधवार, 31 अगस्त 2016

अधपकी दाल

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एक ‘ ऑडिटोरियम ’ का शानदार मंच ,सुन्दर सजावट ,लाइट ,कैमरा ..कथित सभ्य शिक्षित वर्ग के दर्शक ..कुल मिलाकर किसी राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम...
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गुरुवार, 18 अगस्त 2016

कैसे भूलूँ और कैसे याद करूँ ..

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अब से पहले हम बहनें या तो माँ के पास अपने गाँव चली जातीं थीं या मैं गाँव को यादों में ही जी लिया करती थी . गाँव, जहाँ सावन का अर्थ ही रक...
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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

संयोग ऐसे भी होते हैं .

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26 जुलाई को मैं दिल्ली होते हुए बैंगलोर आ रही थी . हवाईयात्रा समय की दृष्टि से एक तरह का चमत्कार ही होती है . चालीस-बयालीस घंटे का सफर म...
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रविवार, 1 मई 2016

कुछ ना कुछ तो....

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चौराहे पर भीड़ लगी है , कुछ ना कुछ तो बात हुई है . कैसे ये खिड़कियाँ खुली हैं , कुछ ना कुछ तो बात हुई है ....
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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

तुम बिन माँ !

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घर आँगन छत देहरी सूनी, सूना है मन तुम बिन माँ ! तुम्ही नहीं तो  क्या घर आँगन ! कैसी वर्षा , कैसा सावन ! बादल भर भर बरस रहे हैं...
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सोमवार, 21 मार्च 2016

कोहरा हुआ सा है

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आसमां पर शाम का  पहरा हुआ सा है । वक्त जाने किसलिये  ठहरा हुआ सा है । रुक गई है जिन्दगी उस मोड पर आकर खुद से ही अनजान ,  य...
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

प्रेम में ...

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मैंने सुना है , जब किसी को प्रेम होता है तब घनघोर अँधेरे में भी एक नाम  उतर जाता है पलकों में ,  रोशनी बनकर पथरीली जमीन से फूट पड...
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मेरे बारे में

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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