नया वर्ष ले हर्ष आगया
बिरबा रोपें आशा के ।
जो व्यतीत अब है अतीत
छोड़ें भी ठांव निराशा के
सुबह सुबह सूरज की पाती
हरकारा दे जाता है
कोई पाखी आ मुँडेर पर
पढ़कर रोज सुनाता है ।
सुनो उसे समझो ,समझाओ
शब्द अर्थ उस भाषा के ।
बीत गया, घट रीत गया
मनमीत उसे फिर से भरलो
जो अबतक सोचा है केवल ,
अब उसको पूरा करलो ।
लिखलो मीत ,गीत जोअब तक लिखे नहीं अभिलाषा के
समय साथ देता उनका ही ,
लक्ष्य बाँध चल देते जो ।
अर्थ आज के दिन को देकर
दीप्तिमान कल लेते जो ।
पल पल को मुट्ठी में करलो
काटो बन्ध दुराशा के ।
छोड़ो उनको जो तिनकों से
धारा में बह जाते हैं ।
जिधर हवा का रुख होता है ,
अपनी राह बनाते हैं ।
अर्थ अनर्थ स्वार्थ में करते
सीधी सच्ची भाषा के
जो अतीत अब है व्यतीत
छोड़ें भी ठांव निराशा के


आहा अति मनमोहक,सुंदर, सकारात्मकता से भरी अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शनिवार ३ दिसम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
नववर्ष मंगलमय हो।
क्षमा चाहेंगे,कृपया ३ दिसम्बर को ३ जनवरी पढ़े।
हटाएंसादर।