गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बिरबा सींचें आशा के


 नया वर्ष ले हर्ष आगया 

बिरबा रोपें आशा के ।

जो व्यतीत अब है अतीत 

छोड़ें भी ठांव  निराशा के 


सुबह सुबह सूरज की पाती 

हरकारा दे जाता है 

कोई पाखी आ मुँडेर पर 

पढ़कर रोज सुनाता है ।

सुनो उसे समझो ,समझाओ 

शब्द अर्थ उस भाषा के । 


बीत गया, घट रीत गया 

मनमीत उसे फिर से भरलो 

जो अबतक सोचा है केवल ,

अब उसको पूरा करलो ।

लिखलो मीत ,गीत जो 

अब तक लिखे नहीं अभिलाषा के 


समय साथ देता उनका ही ,

लक्ष्य बाँध चल देते जो ।

अर्थ आज के दिन को देकर  

दीप्तिमान कल लेते जो । 

पल पल को मुट्ठी में करलो 

काटो बन्ध दुराशा के ।


छोड़ो उनको जो तिनकों से 

धारा में बह जाते हैं ।

जिधर हवा का रुख होता है , 

अपनी राह बनाते हैं ।

अर्थ अनर्थ स्वार्थ में करते

सीधी सच्ची भाषा के 

जो अतीत अब है व्यतीत 

छोड़ें भी ठांव निराशा के

2 टिप्‍पणियां:

  1. आहा अति मनमोहक,सुंदर, सकारात्मकता से भरी अभिव्यक्ति।
    सादर।
    --------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शनिवार ३ दिसम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    नववर्ष मंगलमय हो।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्षमा चाहेंगे,कृपया ३ दिसम्बर को ३ जनवरी पढ़े।
      सादर।

      हटाएं