Thursday, February 10, 2011

दो कविताएं प्रेम की

यादें
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(1)
कुछ यादें,
सुपरफास्ट ट्रेन की तरह
गुजरती रहतीं हैं अक्सर
ह्रदय के पुल से।
धडधडाती हुई,
चप्पा--चप्पा थर्राती हुई
उडाती हुई--धूल, पत्ते, ...तिनके ।
उतर नही पाती जिन्दगी ,
किसी भी स्टेशन पर
चाह कर भी ।
(2)
नियमित धारावाहिकों सी
कुछ यादें
करतीं हैं षडयन्त्र ।
रूबरू नही होने देतीं मुझे
अपने-आप से ।
सोच भी नही पाती ,
अपनी पीडाओं और अभावों को
अपनों के पराएपन को,
छल और दुरावों को
गहराई से ।
(3)
उतर आती है पूरब के क्षितिज से
यादों की धूप
मुग्ध , चकित झाँकती है
कमरे में ।
मेरे दिखाती है मुझे
मेज पर जमी धूल
गुलदस्ते के सूखे फूल
पलटतीं हैं मेरी डायरी के
एक अरसे से कोरे रह गए पन्ने
और यूँ करतीं हैं मुझे
और भी उदास ..तन्हा...।
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(2)उनका आना

खयालों में उनका आना
फूटना है कोंपलों का
ठूँठ शाखों पर
पतझड के बाद ।

दस्तक देना है
पोस्टमैन का
भरी दुपहरी में
थमा जाना
एक खूबसूरत लिफाफा ।

मिलजाना है
रख कर भूला हुआ कोई नोट
किताबें पलटते हुए
अचानक ही ।

लौट आना है
एक गुमशुदा बच्चे का
अपने घर
बहुत दिनों बाद ।

मिल जाना है
अचानक ही
किसी अनजान शहर में
बचपन के सहपाठी का ।

और दिमाग में भरी हो
खीज और झुँझलाहट
ऐसे में एक मासूम
दुधमुँही मुस्कराहट का
समाजाना आँखों में ।
यूँ उनका आना खयालों में

कोई जरूरी चीज भूल गये
आदमी की तरह
लौट पडना जिन्दगी का
उल्टे पाँव घर
या
मिलना एक सान्त्वना
अपनत्व और दुलार भरी
चोट से आहत
रोते हुए बच्चे को
या फिर
गुलमोहर के झुरमुट से
कूक उठना कोयल का
कॅालोनी की उबाऊ खामोशी के बीच
किसी दोपहर अचानक ही
यूँ उनका आना खयालों में

सन् 1998 में प्रकाशित व पुरस्कृत

10 comments:

  1. कोमल भावों की सुंदर अभिव्यक्ति।

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  2. गिरिजा जी!
    मैं जिन जिनको पसंद करता हूँ, वे सब मेरे ब्लॉग रोल में हैं और अपडेट होती रह्ती हैं उनकी पोस्ट.. तभी तो मैंने देखा कि आपकी पोस्ट ग़ायब हो गई!
    आपकी पहली कविता दुष्यंत जीकी याद दिलाती है
    तू किसी रेल सी गुज़रती है,
    मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ.
    बाकी की सारी रचनाएँ बहुत ही कोमल.. उनका आना में आपने हर आस्पेक्ट को छुआ है!!बहुत सुंदर!!

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  3. आपने जो बिम्ब प्रयुक्त किये हैं...बेजोड़ हैं...

    सभी रचनाएं मन को छूने वाली हैं...

    कोमल भावुक प्रभावशाली बहुत ही सुन्दर रचनाएं...

    आपके कलम ने बड़ा ही प्रभावित किया...

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  4. आप सबकी टिप्पणियाँ मेरे लिये बहुत मायने रखतीं हैं । धन्यवाद ।

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  5. आदरणीया गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी
    सादर अभिवादन !

    वाह वाऽऽह ! क्या लिखती हैं आप भी !
    आपकी कविताओं में खो-सा गया …
    बहुत सुंदर भाव और उससे भी सुंदर शिल्प !

    उनका आना तो कमाल की रचना है !


    इतने सुपरिचित , फिर भी अनछुए बिंब …
    रचना की सरसता और प्रवाह और एक एक बिंब में साकार होता दृश्य …

    कविता के इतना नज़दीक ले आना हर किसी के लिए संभव नहीं होता ।
    साधुवाद !

    बसंत पंचमी सहित बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  6. सहज तरल प्रवाहमयी रचना में छिपा मौन संगीत मन में देर तक गूंजता रहता है. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  7. आपके ब्लॉग पर और इस पुरस्कृत कविता को पढकर बहुत अच्छा लगा.

    सादर

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  8. behad khoobsurti ke saath likha hai...

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  9. मिलजाना है
    रख कर भूला हुआ कोई नोट
    किताबें पलटते हुए
    अचानक ही ।
    आप भी तो इसी तरह अचानक मिल गई मुझे ब्लाग पर ।
    कोमल, सुंदर, मन को छूने वाली कविताओं के लिये आभार

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  10. Respected girija ji
    aap ka srijan to kaabil-e-taarif hai mein mothers day per chand pankti aapko samarpit kerta hoon
    माँ माता जननी मम्मी तेरे संबोधन अपार हैं
    तेरी दुआओं से ही तो मेरा यह सुखद संसार है
    हम तेरे बच्चे तेरी ही तो छाया हैं माँ
    दुःख सहकर भी ख़ुशी देती ऐसा तेरा व्यव्हार है माँ
    मेरी गलतियों को हसकर टाल देती यही तो तेरा प्यार है माँ
    नारी से बढकर बहुत अधिक तू ही तो मेरा संसार है माँ
    अंततः बस इतना ही करना चाहता हूँ काम
    मुझे यह संसार दिखाने वाली ऐ परम शक्ति तुझे मेरा शत शत प्रणाम
    Deepsrijan

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