बुधवार, 29 जून 2022

अगर प्रेम विश्वास रहे

 

अगर प्रेम विश्वास रहे तो

साथ न छूटेगा .

अन्तर को जोड़ा जिसने

वो तार न टूटेगा .

 

संकल्पों के बीज भरी

फसलें लहराती हों

मोड़ मोड़ पर जहाँ हवाएं

फागुन गाती हों .

वहाँ लुटेरा कोई भी

खलिहान न लूटेगा .

अगर प्रेम विश्वास रहे...

 

यहाँ वहाँ से टुकड़े ले

जो भवन खड़ा करते हैं

सहज प्रवाहित धारा में

चट्टान अड़ा करते हैं .

होंगे वे निःशब्द 

समय जब कारण पूछेगा .

 

मनमानी को जो अपना

अधिकार समझते हैं .

पकी फसल पर जो

बनकर अंगार बरसते हैं

पर कब तक ,एक दिन तो

घट कच्चा है ,फूटेगा .

 

सोमवार, 20 जून 2022

कुछ कमी सी है .

 

हवाओं में आज सर्द नमी सी है .

दिशाओं में धुन्ध गहरी जमी सी है.


ओप अपनी खो रहा सूरज अभी से,   

देख उसको धूप भी अनमनी सी है .


राह में लो अड़ गया आकर समन्दर ,

धार नदिया की तभी तो थमी सी है.


पेड़ ,पंछी ,फूल ,मौसम खुशनुमा हैं .

कौन फिर जिसके बिना कुछ कमी सी है ?


'भाव मेरा जो , वही उसका भी होगा  . '

सोच मेरी अब गलतफहमी सी है .


छूटकर पीछे कहीं कुछ रह गया है ,

सोच सारी अब तक उसी में रमी सी है .


उजड़ता ,बसता ,उगा लेता है फसलें ,

फितरतें मन की बहुत कुछ ज़मीं सी हैं .  

 

शनिवार, 7 मई 2022

मैं उन जैसी हूँ , पर नहीं हूँ .

 जब कभी मैं अपने जीवन के स्वरूप की तुलना करती हूँ तो माँ के जीवन से बहुत साम्य पाती हूँ .

वैचारिक स्तर पर जब बात दूसरों की खुशी में खुश होने की हो , दूसरों की संवेदना को महसूस करने की हो ,हमेशा सकारात्मक सोचने की हो , किसी को ना न कह पाने की हो , छल , घात ,झूठ , बेईमानी , दिखावा जैसी बातों से दूर रहने की हो ,इधर उधर कहीं ध्यान बाँटकर अपनी उलझनों को अनदेखा करने की हो , कड़वाहट और चुभन से परे आत्मीयता की जरा सी झलक पाकर अपने विरोधी के साथ भी सहज और स्नेहमय होने की बात हो , तो यकीनन मैं माँ जैसी ही हूँ .

माँ की प्रवृत्ति में कछुआ-धर्म था ,जो उनमें नानी से आया था . कछुआ--धर्म यानी जब आपको कोई चोट पहुँचाना चाहे . अहित की दृष्टि से पास आए तब आप पीछे हट जाएं . इस प्रवृत्ति को लोग भले ही पलायनवादी कहें लेकिन वह खुद को बचाए रखने का एक कारगर तरीका है . इस अर्थ में माँ पलायनवादी थीं . उन्हें झगड़ा करना नहीं आता था . जीवन के प्रति उनमें गहरी आस्था थी .हर कलाप्रिय व्यक्ति की तरह खुश व सन्तुष्ट रहने के तरीके उन्हें बखूबी आते थे . उन्हें गाना बजाना प्रिय था . वे भजन खुद लिखा करती थीं . ढोलक बजाने में उनका कोई मुकाबला आज तक नहीं है . वे कटु यथार्थ पर विचार करने की बजाय उसे समय के हवाले कर भविष्य की कल्पनाओं से खुद को सम्बल दिया करती थीं . खुद से ज्यादा वे दूसरों की परवाह किया करती थीं .यही नहीं खुद का आकलन दूसरों की नजर से करके वे खुद में ही गलतियाँ देखतीं और स्वीकार कर लेती थीं . लेकिन गलत को कभी स्वीकार नहीं कर पाती थीं . अगर करना पड़ ही जाता तो एक लड़ाई उनके अन्दर भी चलती रहती थी . जब व्यक्ति खुद से लड़ता है तब बाहर की लड़ाई में अक्सर हार जाता है . माँ बाहर की लड़ाइयाँ प्रायः हारती रहीं . ये सारी बातें सदा मेरे साथ भी रही हैं .

माँ घोर आस्थावादी थीं . गीताप्रेस की किताबों का उन पर गहरा प्रभाव रहा . सामाजिक सम्बन्धों को महत्त्वपूर्ण मानती थीं . समाज के छोटे व निम्न माने जाते रहे लोगों के प्रति भी स्नेह आदर और सम्मान भाव रखती थीं . उन्हें पिता ( मेरे नाना) या पति (मेरे पिता) का कभी कोई सम्बल नहीं मिला . पिता तो जब वे दो तीन साल की थीं तभी चले गए और पति  घर परिवार के सदस्यों के ही नही माँ के साथ भी एक कठोर शिक्षक ही रहे . कठोर गुरु जो शिष्यों की सिर्फ परीक्षाएं लेता है ,पर उत्तीर्ण होने पर कभी पीठ नहीं थपथपाता . उनका धर्म कर्म पूजा आराधना केवल स्कूल था . घर में सब्जी राशन ईँधन से लेकर किवाड़ ,पलंग , छत आँगन आदि की मरम्म्त तक माँ के ही जिम्मे थी . परिवार में स्नेह बनाए रखना भी उनके लिये बहुत ज़रूरी था . अपनी बड़ी बहिन ( बड़ी जिया) और जीजाजी का ,जो काकाजी के बड़े भाई भी थे , बहुत सम्मान करती थीं ,उनके सभी बच्चों को हमसे ज्यादा प्यार करती थीं . हालाँकि काकाजी स्वयं अपने भाई ( ताऊजी) और बच्चों से स्नेह रखते थे पर उन्हें माँ का उनके प्रति गहरा लगाव पसन्द नहीं था . ये सारी बातें माँ के लिये हमेशा अशान्तिकारक रहीं क्योंकि काकाजी का बर्ताव ही हर जगह रिश्तों का निर्धारक रहा इसलिये माँ का स्नेह और त्याग ऐसे ही चलते फिरते मिल जाने वाली मूल्यहीन वस्तु जैसा रहा . ये सभी बातें किसी न किसी रूप में मेरे साथ भी रहीं है . माँ की तरह ही एक विस्थापन सा मेरे विचारों में भी रहा है .

लेकिन जब बात सेवा साहस और परमार्थ की आती है तो माँ की तुलना में मैं खुद को तिनका बराबर भी नहीं मानती हूँ . जिस तरह नानी को उन्होंने छह महीने बिस्तर पर ही सम्हाले रखा था कि मक्खी तक नहीं बैठने दी . शैया-व्रण तो दूर ,शरीर पर एक दाग तक नहीं लगा . बिना किसी खीज या घृणा के बिस्तर पर ही मल मूत्र समेटती रहीं जबकि गाँव में बिजली तक की सुविधा नहीं थी . हर समय हाथ से पंखा झलती रहती थीं .वह एक प्रेरक और अनुकरणीय उदाहरण है . सेवा करना अच्छी ,लेकिन एक सामान्य बात है . समय आने पर अधिकाँश लोग करते ही हैं पर बिना खीज या घृणा के पूरे दायित्त्व व आत्मीय भाव से इस तरह सेवा करना बड़ा दुर्लभ है . माँ जब जीवन के अन्तिम दौर में थीं , ( कारण जो भी रहे हों ) उनकी सेवा मैं उतने स्नेह और दायित्वभाव से कहाँ कर पाई ! 

यह तो हुई अपने घर की बात . वे दूसरों की सेवा सहायता से भी कभी पीछे नहीं हटती थीं . मुझे याद है जब यक्ष्मा से पीड़ित कलुआ खवास का इकलौता बेटा जीवन की आस छोड़ चुका था . घर में वृद्ध माता पिता के अलावा कोई न था . माँ असहाय रोती रहती . एक वैद ने आखिरी कोशिश के लिये कुछ जड़ी बूटियों का चूर्ण और केले के पत्तों का रस बताया . ऐसे में माँ ने खुद जड़ी-बूटियों को कूट छानकर चूर्ण बनाया और एक हफ्ते तक केले के पत्तों का रस मरीज को पिलाया था . उस इलाज का सचमुच असर हुआ भले ही कुछ समय के लिये हुआ ,पर यहाँ महत्त्वपूर्ण थी माँ की पर-सेवा भावना .घर के काम छोड़कर केले के पत्ते लाना ,कूट पीस कर रस निकालना और मरीज तक बिना संक्रमण का डर किये पहुँचाना कितनी बड़ी बात थी . किसी भाई भाभी या बच्चे (मायका होने के कारण गाँवभर के स्त्री पुरुष उनके भाई भाभी थे) की परेशानियों में वे सदा साथ रहती थीं . ऐसे कई उदाहरणों से माँ का जीवन भरा रहा . 

माँ के अन्य गुणों में धैर्य और साहस सबसे विलक्षण गुण थे . एक बार नदी में नहाते समय माँ के पैरों से साँप लिपट गया . जिया ने कुछ देर हट्.. हुश् श करते हुए साँप को झटक दिया पर इतनी देर में उसने माँ की पिंडलियों में कई जगह काट लिया था .खून निकल रहा था . हम लोग रोए जा रहे थे पर वे बिना किसी डर या तनाव के कह रही थीं –--"अरे कुछ नहीं पनिहा था ." 

अरे पनिहा हो या करैत साँप का स्पर्श क्या कम भयावह होता है फिर उसने तो दाँत गढ़ा दिये थे . साँप के जहर की आशंका भी जहर जैसी ही होती है पर माँ जरा भी आशंकित नहीं थीं . मैं उस दिन सचमुच चकित रह गई माँ का धैर्य व साहस देखकर . ठीक है कि वह जहरीला नहीं था लेकिन साँप का तो नाम ही डरावना होता है फिर वह जिया के तो पैरों से लिपट गया था . उनकी जगह कोई महिला होती तो बेहोश होकर गिर पड़ती . इसी तरह घर में दो बार निकले दो बहुत जहरीले साँपों को जिया ने गंगाघाट उतार ही दिया था .

खाना बनाने और खिलाने का मुझे चाव है लेकिन परोसने में माँ के स्तर पर मैं शायद नहीं पहुँची हूँ अभी तक . फैली जाटव ,जिन्हें माँ फैली भैया कहा करती थीं और हम फैली मामा , ने हमारा मकान बनाया था . उस दौरान माँ उन्हें खाना भी खिलाती थीं और रोटियों में उसी तरह दबा दबा कर घी लगाती थीं जिस तरह वे हमारी व काकाजी की रोटियों में लगातीं थीं . फैली कारीगर सिर झुकाए माँ के स्नेह से कृतकृत्य होते रहते . माँ ने सम्मान देने में कभी किसी के साथ जातिगत भेदभाव नहीं किया .झाड़ू लगाने वाली वसन्ती को वे बड़े अपनेपन से बसन्ती भौजी कहती थीं .

माँ जैसा उदार भाव , और सशरीर सेवा भाव मुझमें नहीं है . मेरी सहायता प्रायः आर्थिक स्तर पर रही है . माँ की बराबरी मैं कभी नहीं कर सकती , काश कर पाती . 

वे अतुलनीया थीं ,हैं और सदा रहेंगी . 

  .

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

सिडनी डायरी -2

 ब्लू माउंटेन और थ्री सिस्टर्स

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ब्लू माउंटेन सिडनी के पश्चिमी भाग में लगभग 100 कि.मी. दूर है . यह आसेट्रेलिया की सबसे लम्बी पर्वत श्रंखला 'ग्रेट डिवाइडिंग रेंज' का ही कम ऊँचाई वाला हिस्सा है .इसकी अधिकतम ऊँचाई 1189 मीटर है . ब्लू माउंटेन में प्रकृति का व्यापक और सुरम्य संसार बसा हुआ है . कटूम्बा टाउन ,खड़ी ऊँची चट्टानें ,झरने ,सघन वन , गार्डन , नेशनल पार्क , अद्भुत रेलमार्ग आदि दर्शनीय स्थल हैं .थ्री सिस्टर्स भी यहाँ का एक बहुत ही प्रसिद्ध और अद्भुत स्थल है . कहा जाय तो ब्लू माउंटेन का सबसे खास लैण्डमार्क .आज हमारी योजना केवल थ्री सिस्टर्स और वाटर फॉल  देखने की थी .जेमसन वैली में सुदूर तक फैला विशाल प्राकृतिक वैभव ही लोगों को आकर्षित नहीं करता बल्कि 'थ्री सिस्टर्स' की रोमांचक कहानियाँ भी उन्हें खींचकर लाती हैं .  

हम लोग और मयंक के तीन मित्र सपरिवार लगभग ग्यारह बजे पैरामेटा से ब्लू माउंटेन की ओर चल पड़े थे. पहुँचने में लगभग डेढ़ घंटा लगा . रास्ते में बहुरंगी वृक्षावलियों का आकर्षण भी कम नहीं था . कटूम्बा ऊंची नीची सड़कों वाला सुन्दर कस्बा है .पर्यटकों की भीड़ के कारण कार पार्किंग में खासी मुश्किल हुई . वह भी मात्र एक घंटा के लिये .

जैमसन वैली में सुदूर तक फैले सघन वनों के बीच स्थित 'थ्री सिस्टर्स' , बलुआ पत्थर से निर्मित बराबर खड़ी तीन चट्टानों की विलक्षण सृष्टि है .  वास्तव में इनका निर्माण हजारों लाखों वर्ष पहले पृथ्वी में होरहे व्यापक परिवर्तनों के प्रभाव से हुआ और धीरे धीरे ठोस चट्टानों में बदल गई . इनका यह भौगौलिक तथ्य है . लेकिन इन तीन चट्टानों को तीन बहिनें मानने के पीछे एक स्वप्निल सी पौराणिक कथा या जनश्रुति भी है जो जनजातीय इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है . Glitter Gold against velvet backdrop .

कहा जाता है ये तीन बहिनें मीहनी ,विमलाह, और गन्नेडु कटूम्बा ट्राइब की सुन्दर आदिवासी कन्याएं थीं . इनकी ऊँचाई क्रमशः 922 , 918, तथा 906 मीटर है जो चमत्कारिक रूप से इस कथा की सत्यता को पुष्ट करती प्रतीत होती है . वे तीनों बहिनें एक अन्य नेपियन जनजाति के तीन य़ुवकों से प्रेम करती थीं . तीनों युवक भी भाई थे और तीनों बहिनों से विवाह करना चाहते थे लेकिन जनजातीय नियमों के अनुसार उनका विवाह निषिद्ध था .पर वे नियम तोड़कर विवाह करना चाहते थे, इसलिये दोनों जनजातियों के समूहों में युद्ध छिड़ गया . एक ओझा ने अपने कुटुम्बा समूह की इन तीनों बहिनों को बचाने के लिये जादू के बल से  चट्टान बना दिया . उसने सोचा कि जब सब कुछ शान्त होजाएगा तो फिर से उन्हें मानवी के रूप में वापस ले आएगा लेकिन दुर्भाग्यवश वह ओझा युद्ध में मारा गया परिणाम स्वरूप चट्टान बनी वे तीनों बहिनें कभी अपने मौलिक (मानवी) रूप में नहीं आ सकीं .द थ्री सिस्टर्स जैसे उसी करुण कथा को सुनाती प्रतीत होती हैं .


एक अन्य कथा के अनुसा
र मीहनी ,विमलाह और गन्नेडु कटूम्बा ट्राइब के ओझा त्यावान की रूपवती बेटियाँ थीं . उसके पास जादुई शक्तियाँ थीं . जब वह भोजन की तलाश में जाता तो तीनों बेटियों को एक टीले पर चट्टान बना जाता क्योंकि वहाँ गहरे अँधेरे में एक विशाल भयानक मेमल रहता था जो धरती का सबसे डरावना प्राणी था .एक दिन त्यावान जब भोजन की तलाश में निकल गया एक बड़ा सेंटीपीड ( कनखजूरा ,जोंक ,शतपद) रेंगता हुआ मीहनी की तरफ आय़ा . मीहनी ने डरकर उसकी तरफ एक बड़ा पत्थर फेंका जो लुढ़ककर उस विशाल भयानक मेमल को लगा .वह नाराज होकर मीहनी का तरफ दौड़ा यह देख दूर से देख रहे त्यावान ने जादुई छड़ी से तीनों बेटियों को मेमल से बचाने के लिये पत्थर बना दिया . यह देख मेमल त्यावान की ओर झपटा तो त्यावान ने खुद को लायर पक्षी के रूप में बदल लिया . यहाँ तक सब ठीक था लेकिन उसी खींचतान में त्यावान के हाथ से झादुई छड़ी कहीं गिर गई . इस तरह त्यावान पक्षी के रूप में और उसकी बेटियाँ चट्टानों के रूप में बनी ही रह गईं .

आज भी इन्हें देखकर लगता है कि उदासी में डूबी हुई सी तीनों बहिनें मानों अपने सौन्दर्य और आकर्षण को बचाए रखने और फिर से मानवी होने की लालसाओं के साथ खड़ी हैं ,जो कभी नहीं बन सकेंगी . कहा जाता है कि त्यावान आज तक अपनी खोई हुई जादुई छड़ी की तलाश में है इसीलिये लायर पक्षी की पुकार आज भी जब तब जहाँ तहाँ सुनी जा सकती है. यहाँ तक कि जो लोग इस मिथक पर विश्वास नहीं करते वे भी 'द थ्री सिस्टर्स' की त्रासद कथा से हदय में एक टीस अनुभव करते हैं  . 

इस प्रसंग से मुझे बचपन में सुनी राजकुमार और दानव कन्या की एक रोमांचक कहानी याद आ गई है जिसमें एक दानव और उसकी बेटी घने जंगल की एक बड़ी गुफा में रहते हैं . उसे अपनी खूबसूरत बेटी की सुरक्षा की चिन्ता रहती थी खासतौर पर मानुस जाति से . इसलिये जब वह भोजन की तलाश में बाहर जाता है तो बेटी का सिर काटकर छत से टाँग जाया करता था . फिर लौटकर जादू के प्रभाव से सिर को धड़ से जोड़कर जीवित कर लिया करता था .    

यह बड़ी ही रोचक बात है और शोध का विषय भी मिथक कि जनश्रुतियाँ और परी-कथाएं हर देश-प्रदेश और हर जाति धर्म में होती हैं जो परस्पर किसी न किसी रूप में मिलती हैं और एक होने का संकेत देती हैं . हजरत नूह और मनु की जलप्लावन की घटना , मानव और आदमी की उत्पत्ति , हजरत इब्राहीम और राजा मोरध्वज की कथा और भी कितनी कथाएं , मिथक और जनश्रुतियाँ हैं जो न केवल किसी समय एक ही एक ही स्रोत से निकली प्रतीत होती हैं बल्कि हमें कभी तो किसी स्वप्नलोक की सैर कराती हैं और कभी हदय को एक वेदना से भर देती हैं . यह भी कि प्रेम , ईर्ष्या , संवेदना , मोह आदि मानव के स्वभाव में है, और प्रेम सदा विरोध का सामना करता रहा है चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में रहता हो . 

शाम सात बजे जब शहर बिजली की रोशनी में जगमगा रहा था हम लौट आए थे . लौटते हुए हमेशा की तरह रास्ता छोटा लग रहा था . 










सोमवार, 25 अप्रैल 2022

सिडनी डायरी--1

19.4.2022

सुबह छह बजकर बीस मिनट पर एयरइण्डिया का विमान सिडनी की धरती पर उतरा तब अनायास ही महसूस हुआ कि मैं अब अपने देश में नहीं हूँ .रही सही कमी एयरपोर्ट पर होगई जहाँ एक लम्बी लाइन में लगकर लगभग दो घंटे तीन जगह जाँच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा . हालाँकि सुरक्षा की दृष्टि से यह सभी जगह होता है . लेकिन गोरे गुलाबी रंग के कर्मचारियों द्वारा अस्पष्ट अंगरेजी में दिये जा रहे निर्देश एक अजनबीपन का अहसास दे रहे थे .

ढाई साल पहले श्वेता को उसकी कम्पनी ने सिडनी भेजा था . बाद में मयंक भी आ गया . वे तभी से मुझे अपने पास बुलाने को उत्सुक थे . कोविड का कहर कम होते ही मयंक ने बीज़ा लेने की तैयारी शुरु करदी थी . बीज़ा मिलते ही तैयारियाँ शुरु हुईँ . सुलक्षणा व निहाशा ने अपने स्तर पर तो मयंक ने अपने स्तर पर . आखिर पहली बार मैं इतनी लम्बी विदेश यात्रा करने वाली थी . बच्चों के पास जाने के लिये माँ के सामने कितनी उलझनें होतीं हैं . क्या ले जाऊँ कितना लेजाऊँ ..श्वेता ने पहले ही कह दिया माँ आम का अचार जरूर लाना ..सुलक्षणा निहाशा ने अपनी तरफ से कुछ सामान अदम्य और श्वेता के लिये रखा . कुछ कपड़े श्वेता ने मँगाये . प्रशान्त मिठाई नमकीन ले आया सो वजन को लेकर बड़ा झमेला हुआ . क्या छोड़ें , क्या रखें ..अन्त में मुझे ही अपनी साड़ियाँ , किताबें और गरम कपड़े हटाने पड़े .


वास्तव में देखूँ तो यह विदेश यात्रा भी पहली ही है . दो साल पहले मन्नू और नेहा के साथ भूटान गई थी पर वहां तो विदेश जैसा कुछ लगा ही नहीं था . न बीज़ा न पासपोर्ट न कोई विशेष जाँच . सिक्किम और भूटान भौगौलिक रूप से एक से ही हैं . भवन निर्माण कला के अलावा दोनों में कोई खास अन्तर नहीं है .जयगाँव ( भारत) से लोग सुबह सैर करने फुंशुलिंग तक जाते हैं और उधर से लोग सब्जी और शॉपिंग के लिये जयगाँव आते हैं . भारत से भूटान में कब प्रवेश कर लिया यह पता ही न चला . तो भला वह कोई विदेश यात्रा थी

तमाम देशी विदेशी लोगों के साथ लम्बी लाइन में लगे मैं मन से बैंगलोर में थी . मुझे नेहा मन्नू और विहान याद आ रहे थे . आँखों में आँसू लिये सुलक्षणा और जल्दी लौट आने की मूक याचना लिये प्रशान्त याद आ रहा था. सबसे अधिक ईशान की याद आ रही थी जिसे मैं सोता छोड़ आई थीं . वह हर कमरे में दादी माँ को ढूँढ रहा होगा . मैं ग्वालियर में अपने मोहल्ले को याद कर रही थी जहाँ मेरे स्वजन हैं . सोच रही थी कि लोग रहने के लिये विदेश क्यों और क्यों चुन लेते है .  

लेकिन पोर्ट से बाहर आने पर विचारों का कोहरा हटा और जैसे धूप खिल आई . मयंक अपने मित्र अमर के साथ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था . फिर सुन्दर कुटीरनुमा भवनों और हरी भरी वृक्षावलियों से होते हुए घर आए तो अदम्य और श्वेता से मिलकर मलाल मिट गया . 

मयंक ‘पैरामेट्टामें रहता है जो मुख्य सिडनी शहर से लगभग 35 कि मी दूर है . हमारे आसपास पंजाब, महाराष्ट्र ,गुजरात और राजस्थान की दुकानें हैं .इसलिये इसे लिटिल इण्डिया कहा जाता है .लोग हिन्दी बोलते हैं . मन को जैसे एक अपनी सी ज़मीन मिल गयी . मुझे हर जगह अपने देश का रंग और खुशबू चाहिये ही .

पैरामेटा में हस्सल स्ट्रीट की एक इमारत में मयंक 18 वीं मंजिल पर रहता है .बड़ी सी बालकनी में हैरिस पार्क से लेकर सिडनी शहर की ऊँची इमारतों तक सब विहंगम दिखाई देता है . मुझे यों तो ज़मीन पर ही रहना पसन्द है . गाँव और गली मोहल्लों की आदत है . लेकिन यहाँ जबकि अनजान सड़कों और इमारतों के बीच हम केवल अपने ही परिचित हैं , नीचे ठहरी हुई सघन वृक्षावलियाँ ,हरे-भरे मैदान और दौड़ता हुए शहर का विहंगम दृश्य टी वी स्क्रीन पर चल रहे डिस्कवरी के किसी प्रोग्राम जैसा लगता है . टी वी मोबाइल के साथ आप वैसे भी अकेले नहीं हैं फिर यहाँ तो मयंक और श्वेता के साथ लाड़ला अदम्य भी है .

अगर मैं देश विदेश से निरपेक्ष होकर देखूँ तो समझ आता है कि वास्तव में लोग रहने के लिये विदेश क्यों चुन लेते हैं . रोजगार और धनार्जन तो एक बड़ा कारण है ही , लेकिन व्यवस्था और सुविधाएं भी अच्छी होती हैं . मैं देखती हूँ कि यहाँ सब कुछ व्यवस्थित है .साफ सुथरा और शान्त है , सुन्दर है . साफ सुन्दर सुरक्षित फुटपाथ हैं . पैदल चलने वालों का बहुत ध्यान रखा जाता है उनके लिये भी सड़क पार करने के लिये लाल हरी बत्ती लगी हुई हैं . यहाँ जीवन और दिनचर्या में किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं . अगर आप नियमों का ठीक से पालन करते हैं तो आपको कहीं कोई व्यवधान नहीं . पर्यावरण के प्रति यहाँ बड़ी जागरूकता है . घर में किसी तरह का धुँआ होने पर एक अलार्म बज उठता है . देर तक बजने पर न केवल फायरब्रिगेड आजाती है बल्कि अच्छा खासा जुर्माना भी लगता है इसलिये हवन पूजन घर में नहीं हो सकता .

जहाँ तक अपनी बात कहूँ तो इस सुन्दर देश के सुन्दर शहर में बच्चों के साथ कुछ माह यह सोचकर ही बहुत आनन्द के साथ व्यतीत करने वाली हूँ कि लौटकर जाना तो है ही अपने ही घर .    

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

मखमली आवाज के साए में

 

उतरती साँझ का उदास सा एकान्त ..पथरीले इलाके का अज़नबीपन ..सन्नाटा ..और तब उस सन्नाटे की सुर्मई परत को तोड़ती थी कहीं दूर से आती मधुर सुरमयी आवाज ," ये जिन्दगी उसी की है... ,छुप गया कोई रे ...बचपन की मुहब्बत को दिल से न भुला देना ..,मोहे भूल गए साँवरिया .." और हम मंत्रमुग्ध सुनते रहते .

यह सन् 1965-66 की बात है .एक साल पहले काकाजी का ट्रांसफर बड़बारी होगया था . बाद में पढ़ाने के लिये मुझे भी साथ लेगये थे .मेरी उम्र छह-सात वर्ष की ही थी . काकाजी  को जब तक कोई अपने जैसा नहीं मिलता था ,वे अकेले रहना ही पसन्द करते थे . बाद में उनके काम से प्रभावित होकर लोग खुद ही उनसे आकर मिलने लगे . सरपंच जी खुद उनके बड़े प्रशंसक होगए थे . खैर ..

काकाजी जब फुरसत में होते तो खूब तल्लीनता के साथ गाते थे .एक शाम काकाजी ने मुझे गाने को कहा .पता नहीं उन्होंने कब मुझे कहीं गुनगुनाते सुन लिया था या ऐसे ही  मेरी रुचि जानने के लिये कहा . पर मैंने बेझिझक गा दिया----" बतादूँ क्या लाना ,तुम लौटके आजाना ये छोटा सा नज़राना पिया याद रखोगे कि भूल जाओगे ..."

शब्दों पर मेरा ध्यान न तब था और न ही अब जबकि उनके अर्थ भी समझती हूँ . मेरे लिये एक ही और सिर्फ एक ही बात मायने रखती है- आवाज और सुरों का माधुर्य.

तब बड़ा बैट्री वाला रेडियो हमारे आँगन में चलता ही रहता था .हमने देखी हैं उन आँखों की .’.,’.पवन दीवानी . तू कितनी अच्छी है . तुम्ही हो माता पिता....चला भी आ आजा’’ ..दिल अपना और प्रीत पराई . मिलती है ज़िन्दगी में मुहब्बत...ये दिल तुम बिन कहीं ..:छुप छुप मीरा रोए.. ओ वसन्ती ..,गोविन्दा गोपाला .. .,.बाबुल प्यारे ..पत्ता पत्ता बूटा बूटा ..बेबी तू छोटी है ..आ जा आ बहार..’ छोड़दे सारी दुनिया ..उड़ती पवन के संग चलूँगी....दिल का खिलौना हाय....ऐसे अनगिन गीत हैं जिन्हें सुनते दोहराते हमारा बचपन गुज़रा . लता मंगेशकर नाम मेरे अन्तर्मन में कब रच बसकर जीवन का हिस्सा बन गया पता नहीं चला . बाद में तो उनके ऐसे गीत आए कि वे अद्वितीय होगयीं है .

लता जी अब नहीं है तो विचार आया है कि उनकी मखमली आवाज़ के बिना मधुर गीत-संगीत की कल्पना नहीं की जासकती . कोई दिन नहीं गुज़रा जिस दिन उनका गीत नहीं सुना हो . गायन कि क्षेत्र में अनगिन मधुर आवाजें हैं लेकिन लता जी की आवाज की कहीं कोई बराबरी नहीं है . किसी ने पूछा कि लता जी के सबसे पसन्दीदा पाँच गीत बताओ . मैंने कहा पाँच क्या पच्चीस-पचास कहेंगे तब भी बिखरे स्वर माधुर्य को समेटना मुश्किल है. फिल्मी गीत , मीरा तुलसी सूर के भजन ..कितने अद्भुत ..मैं पसन्द के गीत गिनती हूँ और गिनती भूल जाती हूँ .

उन्ही दिनों मैंने कहा था –काकाजी मुझे अगर भगवान मिलें तो मैं उनसे अमरफल माँगूँगी .

अमरफल का क्या करेगी बेटी ?”—काकाजी ने कुछ चकित होकर पूछा .

मैं उसे लता मंगेशकर को दूँगी .

काकाजी हँस पड़े पर वह एक बच्ची की सच्ची भावना थी . देखा जाए तो उनका भौतिक शरीर भले ही मिट गया है पर वास्तव में वे अमर हैं . उनके गीत अनन्तकाल तक हवा में संगीत भरते रहेंगे . मन को महकाते रहेंगे .  

एक गीत उनके नाम

मधुर माधुरी ,दिव्य वाणी हो तुम

शुभे शारदे हो कल्याणी हो तुम ।


शिवालय में गुंजरित वन्दन के स्वर

प्रभाती पवन की सुशीतल लहर ।

विहंगों को कलरव तुम्ही से मिला ,

है निर्झर तुम्हारे सुरों में मुखर ।

सान्ध्य--मंगल की ज्योतित कहानी हो तुम

शुभे शारदे हो कल्याणी हो तुम ।

 

कोकिला विश्व-वन की ,तुम्हारी कुहू सुन ,

विहँस खिलखिलाता है सुरभित वसन्त ।

मधुप गुनगुनाते ,विकसते हैं पल्लव

तुम्हारे सुरों से ही जागे दिगन्त

ऋचा सामवेदी सुहानी हो तुम

शुभे शारदे कल्याणी हो तुम ।

 

हिमालय में गूँजे कोई बाँसुरी

कमल--कण्ठ से जो झरे माधुरी

क्षितिज पर ज्यों प्राची की पायल बजी

अलौकिक , दिशाओं में सरगम बजी ।

युगों को धरा की निशानी हो तुम ।

शुभे शारदे हो ,कल्याणी हो तुम ।

 

तुम्हारे सुरों से है करुणा सजल ।

तुम्हारे सुरों से ही लहरें चपल ।

प्रणय-ज्योत्स्ना की सरस स्मिता ,

समर्पणमयी भक्ति पावन अमल ।

हो आराधना शुचि , शिवानी हो तुम ।

शुभे शारदे कल्याणी हो तुम । 

 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

चाँदनी वाला मोहल्ला

एक पुरानी पोस्ट फिर से 

Sunday, July 4, 2010

चाँदनी वाला मोहल्ला-----24 जून ग्वालियर
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हम जिस मोहल्ले में रहते हैं ,वह ग्वालियर की पुरानी और पिछड़ी बस्तियों में से एक है ।नाम है  ,'कोटावाला मोहल्ला'। कहते हैं कि सामने खण्डहर सी दिखने वाली हवेली कोटावाले राजा की थी ।मोहल्ले का यह नाम इसीलिये पड़ा ।इससे ज्यादा जानकारी रखने वाले लोग अब नहीं हैं ।न ही जानने की किसी को जरूरत व फुरसत है ।
मेरा भतीजा इसे--'कुत्ता वाला मोहल्ला' कहता है । जो कभी कभी सटीक लगता है ।जब यहाँ आदमियों से ज्यादा कुत्ते नजर आते हैं । काले ,भूरे,बादामी ,चितकबरे छोटे- बड़े, सीधे-लड़ाकू --सभी तरह के बहुत सारे देशी कुत्ते (विदेशियों को ऐसी आजादी कहाँ )। दिन में खूब खिलवाड़ करते है।और रात में खूब मन भर रोते हैं ।भगाओ तो भाग जाते हैं पर कुछ देर के लिये, आपको यह तसल्ली देने ही कि आपकी आज्ञा का पालन होता तो है कम-से-कम ।
पर मेरे दिमाग में इस मोहल्ले का एक नया और प्यारा सा नाम उगा है ----चाँदनी वाला मोहल्ला ।
जी नही , यह चाँदनी चाँद से उतरी किरण नही है ।और ना ही कोई रूपसी युवती ।यह तो सामने रहने वाली पारबती की डेढ-दो साल की बेटी है ,जो घर से ज्यादा गली में रहती है ।गाती, खेलती,गिरती,,रोती....।
सुबह होते ही चाँदनी अपनी कोठरी से बाहर आजाती है। दिखाने भर के लिये दूध डाली गई पतली काली कटोरी भर चाय के साथ बासी रोटी खाकर घंटों तक गली में रमक-झमक सी घूमती रहती है ।कभी वह कुत्ते के गले में बाँहें डालना चाहती है तो कभी बैठी हुई गाय की पीठ पर सवारी करने के मनसूबे बनाती है ।यही नही ,जब उसका रास्ता रोकने की हिमाकत करता कोई सांड़ खड़ा होता है, वह उसके नीचे से निकल कर ऐसे खिलखिलाती है जैसे कोई बाजी जीत गई हो ।माता-पिता काम पर जाते हैं तो क्या हुआ ,जानवर चाँदनी का पूरा खयाल रखते है ।इस मासूम परी को शब्दों में बाँधना आसान नही है ।मैंने तो बस कोशिश की है --

(1)
कुँए की मुडेर पर,
धूप के आते-आते
उतर आती है चाँदनी भी
कोठरी के क्षितिज से।
बिखर जाती है पूरी गली में ।
धूप ,जो---
उसके दूधिया दाँतों से झरती है ।
(2)
चाँदनी सुबह-सुबह,
भर जाती है मन में
नल से फूटती
जलधार की तरह
मन--- जो रातभर लगा रहता है ,
कतार में ।
खाली खडखडाते बर्तनों सा,
भरने कुछ उल्लास,ऊर्जा ।
दिन की अच्छी शुरुआत के लिये ।
(3)
भरी दोपहरी में,
चाँदनी नंगे पाँव ही
टुम्मक-टुम्मक..
चलती है बेपरवाह सी
तपती धरती पर
आखिर ,कौन है वह,
जो बिछा देता है ,
हरी घास या अपनी नरम हथेली,
उसके पाँव तले ।
(4)
दूसरे बच्चों की तरह,
उसके कपडे साफ नही हैं
बाल सुलझे सँवरे नही हैं ।
पीने-खाने को दूध-बिस्किट नही है ।
और दूसरे बच्चों की तरह ,
मचलने पर उसे
टॅाफी या खिलौने नही मिलते है।
पर दूसरे तमाम बच्चों से ज्यादा,
हँसती-खिलखिलाती और खेलती है।
वह नन्ही बच्ची---चाँदनी ।
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और अन्त में ------------
चिडियों की चहकार है चाँदनी।
ताजा अखबार है चाँदनी ।
गजक मूँगफली बेचने वाले के गले की खनक,
दूधवाले की पुकार है चाँदनी ।

पहली फुहार जैसी।
फूलों के हार जैसी ।
भर कर दुलार छूटी ,
दुद्धू की धार जैसी ।