मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

रहे किनारे पर

 

इसकी उसकी राह चले ना ,

रहे किनारे पर .

 

 कोई शाख पकड़ लेते तो पार उतर जाते .

लगी कतारों में हम खुद को अलग नहीं पाते .

रेले गुज़रे कई , रहे हम अपने द्वारे पर .

इसकी उसकी राह चले ना ...

 

पत्ते होते तो ले जाती साथ हवा हमको .

या बह जाते धारा में ,मिलता सागर हमको .

अड़े रहे अपनी मर्जी पर , कहलाए पत्थर .

इसकी उसकी राह चले ना..

 

दरवाजे नीचे थे , झुकना हमें नहीं आया .

कोई छाँव देखकर .रुकना हमें नही भाया .

दिल से निकले दो शब्दों के रहे गुजारे पर .

इसकी उसकी राह चले ना ..

 

निकले वे दरवाजे से ही नज़रें बचा बचा .

उनको मेरा तट पर रहना बिल्कुल नहीं रुचा .

रुकते वो ,यदि चलते उनके एक इशारे पर .

इसकी उसकी राह चले ना ..

 

पर हमको अफसोस नहीं पाए ना उच्च शिखर

छाँव न खोजी यहाँ वहाँ रहते अपने ही घर .

अपने पैरों चले, रहे ना किसी सहारे पर .

इसकी उसकी राह चले ना ...

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

आने वाली पुत्रवधू के लिये .

यह कविता मैंने  सन् 2003 में अपने बड़े बेटा प्रशान्त के विवाह से पहले लिखी थी . आज उसके विवाह की वर्षगाँठ पर यह अचानक मिल गई . बिना किसी संशोधन के प्रस्तुत है . 

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ओ अनदेखी , अनजानी 

मेरे घर की भावी महारानी .

तू आना मेरी दुनिया में

जैसे आती है हवा किसी नदी में नहाकर 

फूलों को सहलाकर. 

जैसे आती है लाली पूरब के क्षितिज पर 

सूरज से पहले .

करती है ऐलान रात बीत जाने का .  

जैसे आता है परिणाम 

आशान्वित, वर्षों के परिश्रम के बाद .

प्रतीक्षा में है .

घर का हर कोना ,

मेरा बेटा , मेरा सोना 

सलोना सपना मेरा भी ,

कि देखूँगी अपने आँगन में ,

मन में दमकती जगमग रोशनी .

तू ले आना अपने साथ

माँ की यादों को .

लेकिन उन्हें घोल देना मेरी साँसों में

मान लेना मुझे भी अपनी माँ .

उससे भी ज्यादा अपनी मीत .

बेटी नहीं है मेरी कोई ,

तुझमें ही देखूँ अपनी बेटी भी .

कर सकूँ खूब सारी मन की बातें .

माँ की तरह ,

तू सुनना उन्हें बेटी की ही तरह .

बता देना मेरी अनजाने में हुई कोई भूल भी

अपनत्त्व के साथ .

सुन लेना तू भी उतने ही विश्वास से 

स्वीकार होंगी तेरी माँगें ,जिद ,चाहत .

छोड़ आई हूँ बहुत पीछे 

वह युग ,जो मैंने देखा था 

नववधू के रूप में .

अब स्वामिनी होगी तू .

इस घर की , बेटे की ..

और मेरी भी ...कम न होगा मेरा स्नेह .

मत रखना मन में कभी सन्देह 

कोई दुराग्रह .

मत लाना साथ में कोई तीखी धार

बनादे जो दरार ,आँगन में .

तू खुशी है ,मेरे बेटे की 

और बेटा मेरी ..

इसलिये खुशी है तू मेरी भी .

पलकें बिछाए हूँ तेरी राह में . 

सपने जो बसे हैं तेरी पलकों में .

आशंकित न होना कभी .

सजाएंगे उन्हें और भी खूबसूरत 

मिलजुलकर .

बचाए रखना 

भाव और विचारों को बोझिल होने से 

सपनों को फीका होने से

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

नदी होजाना आसमान का

 
जब जब नदी में उतर आता है आसमान 
नदी होजाता है खुद भी .
गहरी नीली नदी .

उगता है सूरज  नदी में ही
तैरता है ,लहरों में 
बतखों और पनडुब्बियों की तरह 
दौड़कर आने से लाल हुआ अपना चेहरा 
धो डालता है ठंडे पानी में ,
खेलता है आँखमिचौनी .
रुई के फाहों जैसे बादलों के साथ 

 
आसमान जब उतर आता है नदी में ,
चाँद भी नदी में उतरकर 
झूलता है लहरों के पालने में .
भूलता है ,कि चलना आसान नही है 
नदी हुए आसमान में .
डगमगाता है ,फिसलता है ,
गीला होगया चाँद .
थाम लेती हैं उसे
पानी पर झुकी बेंत की टहनियाँ  

तारे डूबते उतराते 
छकाते हैं मछलियों को .
जो घेरकर उन्हें ,
मचलती हैं झपटती हैं .
पॉपकार्न या लाई समझकर .   
मुस्कराते हैं जकरान्दा के पर्पल फूल 



 
लहर लहर बहता भी है आसमान
जब उतर आता है नदी में .
बतखें ,पेड़ ,फूल ,मछलियाँ 
खुश होते हैं आसमान छूकर 
इसे आसमान का नदी होना कहें  
या नदी का आसमान होजाना . 
बताता है यही 
कि कितना उदार और निर्मल है 
नदी का हृदय . 
समा लेता है हर रंग .
सिन्दूरी सफेद ,हरा ,
नीला या फिर सुर्मयी 
खुद बदले बिना ही ..

शनिवार, 29 अक्तूबर 2022

सपने

सपने नींद में आते हैं .

और जगाकर सोई हुई स्मृतियों को

चले जाते हैं निर्ममता के साथ  

जैसे लौट जाते है बादल उमड़ घुमड़कर

बिना बरसे ही .

सुगबुगा उठती हैं भूली हुई बातें

मुरझाई घास की तरह .

 

सपने आते हैं

जैसे आती हैं,  सागर की छाती को

खरोंचती हुई सी उत्ताल तरंगें .

भिगो जातीं हैं सारा पुलिन.

छोड़ जाती है अपनी निशानियाँ

कुछ चमकते शंख ,सीपियाँ ,

उछलती तड़फती मछलियाँ ,

लहरों की निस्संगता पर

छोड़कर चली गई हैं जो  

अपनी मौज में .

 

सपने आते हैं जैसे

उकेरती हैं उँगलियाँ गीली माटी में

रूहानी सी लकीरें .

गीला मन माटी सा  .

सपने उस पर लिख देते हैं .

एक और गीत

उम्मीद का , इन्तज़ार का .

 

साधारण से लगते सपने

कभी कभी होते हैं असाधारण भी

समेट लाते है विगत को 

दोहराते है किसी मोड़ पर 

छूट गई कहानी फिर से

मिलाते हैं उन्हें भी

नामुमकिन हैं करीब आना जिनका .


कुछ सपने जता जाते है कि कभी 

जीवन्त थीं अनगिन अनुभूतियाँ ,

व्यक्त होने की उम्मीद में .

समाया रहता था आँखों में

एक पूरा आसमान.

उमंगें उड़ती थीं हवा में

आक के रेशों की तरह ..

सपने कहते हैं कि 

पुलिन पर छोड़ गयी हैं लहरें जो मछलियाँ

अभी जिन्दा है , प्रतीक्षा में  

लहरों के लौटने की . 

सपने क्यों आते हैं

यह पूछने की बजाय आश्वस्त हूँ

कि सपने अभी आते हैं .


बुधवार, 26 अक्तूबर 2022

कथा भाई-दौज की -भाई बहिन के अटूट प्रेम की गाथा

 पुनः प्रकाशित

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बचपन में भाई दौज की सुबह से ही हमें याद करा दिया जाता था कि दौज की कहानी सुने बिना और भाई को टीका किए बिना पानी भी नही पीना है । जब हम नहा-धोकर तैयार होजातीं तब दादी या नानी तुलसी के चौरा के पास आसन डाल कर ,घी का दिया जलाकर हमारे हाथ में घी-गुड़ देकर दौज की कहानी शुरु करतीं थीं । कहानी के दौरान कई बार उनका गला भर आता था और कहानी के अन्त में जब वे कहतीं कि जैसा प्रेम उनमें था वैसा भगवान सबमें हो, वे अक्सर पल्लू से आँखें पौंछती मिलतीं थी । बहुत छोटी उम्र में तो हमें नानी--दादी की वह करुणा पल्ले नही पड़ती थी पर उम्र के साथ कहानी में समाए भाई बहन के स्नेह की तरलता की अनुभूति अन्तर को भिगोती गई । आज भी कथा सुनाते दिल भर आता है |पता नही ये लोक-कथाएं किसने लिखीं । कैसे लिखीं ?  लेकिन हमारे जीवन  में गहराई से जुड़ी हैं । जड़ की ही तरह संवेदनाओं का पोषण करती हुई । तभी तो अलिखित होते हुए भी ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहीं हैं । इस कथा को यहाँ देने का मेरा उद्देश्य भी यही है ।
हर भाई को हृदय से शुभकामनाएं देते हुए उस कहानी को ,जिस रूप में मैंने अपनी दादी नानी और माँ से सुनी है ,यहाँ दे रही हूँ । हालाँकि हर  कथा की तरह स्थानीय प्रभाव से निश्चित ही थोड़ा--बहुत अन्तर तो होगा ही लेकिन कथ्य में कोई अन्तर नहीं है .
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    वह अपनी माँ की आँखों का तारा और बहन का इकलौता दुलारा भाई था 'निकोसी पूत'। ( जिसे किसी ने कभी कोसा न हो अभिशाप न दिया हो कहते हैं ऐसे व्यक्ति को बुरी नजर जल्दी लगती है काल भी जैसे उसके लिये तैयार रहता है )  
'भाई दौज' आई तो वह माँ से बोला --"माँ मैं बहन से टीका कराने जाऊँगा ।" माँ कैसे भेजे !  बहुत ही प्यारा और बूढी माँ का इकलौता सहारा था । ऊपर से रास्ता बड़े खतरों से भरा । जाने कितनी 'अलहें' (अनिष्ट) .
"बेटा ना जा । बहन परदेश में है । तू अकेला है ,रस्ता बियाबान है । तेरे बिना मैं भी कैसे रहूँगी ? "
"जैसे भी हो ,रह लेना मैया! बहन मेरी बाट देखती होगी । "
बेटा आखिर चल ही दिया । पर जैसे ही दरवाजे से निकला दरवाजे की ईँटें सरकीं । यह पहली अलह (अनिष्ट) थी .
"तुम्हें मुझे दबाना है तो ठीक है | पर पहले मैं बहन से टीका तो कराके आजाऊँ, फिर मजे में दबा देना..।" निकोसी ने कहा तो दरवाजा मान गया । एक वन पार किया तो शेर मिला । निकोसी को देखते ही उस पर झपटा ।
"अरे भैया ठहरो ! मेरी बहन टीका की थाली सजाए भूखी बैठी होगी । पहले मैं बहन से टीका करा के लौट आऊँ तब मुझे ज़रूर खा लेना ।" 
शेर मान गया । आगे चला तो दूसरा बियाबान जंगल मिला | जंगल के बीच एक नदी मिली । निकोसी जैसे ही नदी पार करने लगा नदी उमड़ कर उसे डुबाने चली ।
"ओ नदी मैया , मुझे शौक से डुबा लेना पर पहले मैं बहन से टीका तो करवा आऊँ । वह मेरी बाट देखती होगी ।" --यह सुनकर नदी भी शान्त होगई ।
आखिर भाई बहन की देहरी पर पहुँच गया । बहन अपने भाई के आंवड़े-पाँवड़े ( कुशलता की प्रार्थना) बाँचती चरखा कात रही थी कि तभी तागा टूट गया । वह तागा जोड़ने लग गई । अब न तागा जुड़े न बहन भाई को देखे । भाई द्वार पर खड़ा  खिन्न मन सोचने लगा कि मैं तो इतनी मुसीबतें पार कर आया हूँ और बहन को देखने तक की फुरसत नही । वह लौटने को हुआ तभी तागा जुड़ गया | बहन उठ खड़ी हुई , बोली--"अरे भैया  ! मैं तो चरखा चलाती हुई तेरे नाम के ही आँवडे-पाँवडे बाँच रही थी |"
बहन ने भाई को बिठाया । दौड़ी-दौड़ी पड़ोसन के पास गई | पूछने लगी --
" जीजी सबसे प्यारा पाहुना आए तो क्या करना चाहिये ?"
"करना क्या है , गुड़ से लीपदे , घी में चावल डालदे |" 
बहिन ने वैसा ही किया पर न गुड़ में लिपे न घी में चावल सीजे ( पके)|  तब वह सास के पास गई ,पूछा--"अम्मा-अम्मा सबसे प्यारा पाहुना आया है  तो क्या करूँ ?" 
सास ने कहा कि " बहू गोबर माटी से आँगन लीपले और दूध में चावल डालदे ..।" बहन ने झट से आँगन लीपा ,दूध औटा कर खोआ--खीर बनाई । भाई की आरती, उतारी टीका किया । पंखा झलते हुए भाई को भोजन कराया ।
दसरे दिन तड़के ही 'ढिबरी'( चिमनी, लैम्प ,जिसकी रोशनी धुंधली होती है ) जलाकर बहन ने गेहूँ पीसे । रोटियाँ बनाई और अचार के संग कपड़े में बाँधकर भाई को दे दीं । भाई को भूख कहाँ । आते समय सबसे कितने--कितने 'कौल वचन' हार कर आया था । बस मन में एक तसल्ली थी कि बहन से टीका करवा लिया । बहन से विदा लेकर लौट पड़ा .
उधर उजाला हुआ । बच्चे जागे । पूछने लगे---"माँ , मामा के लिये तुमने क्या बनाया ?"  बच्चों को देने के लिये बहन ने बची हुई रोटियाँ उजाले में देखीं तो रोटियों में साँप की केंचुली दिखी । कलेजा पकड़कर बैठ गई -- "हाय राम ! मैंने अपना भाई अपने हाथों ही मार दिया ।"
बस दूध चूल्हे पर और पूत पालने में छोड़ा और जी जान से भाई के पीछे दौड़ पड़ी । कोस दो कोस जाकर देखा ,भाई एक पेड़ के नीचे सो रहा है और 'छाक' ( कपडे में बँधी रोटियाँ) पेड़ से टँगी है । बहन ने चैन की साँस ली . भगवान को हाथ जोड़े . फिर भाई को जगाया । भाई ने अचम्भे से बहन को देखा | 'बहिन यहाँ कैसे ,क्यों !'
 बहन ने भरी आँखों से पूरी बात बताई । भाई बोला---"तू मुझे कहाँ-कहाँ बचाएगी बहन ? " 
बहन बोली--"मुझसे जो होगा ,मैं करूँगी  पर अब तुझे अकेला नही जाने दूँगी ।"
भाई ने लाख रोका, समझाया पर बहन न मानी ,चल पड़ी भाई के साथ । चलते-चलते रास्ते में वही नदी मिली । भाई को देख जैसे ही उमड़ने लगी । बहन ने नदी को 'नई-नकोर' चुनरी चढ़ाई । नदी शान्त होगई । आगे चले तो वन में शेर मिला | बहिन ने उसे बकरा दिया । शेर भी जंगल में चला गया । घने जंगल में चलते-चलते बहन को प्यास लगी ।
भाई ने कहा--"बहन मैंने पहले ही मना किया था । राह में कितने ही संकट हैं अब इस बियाबान जंगल में पानी कहाँ मिलेगा ? बहन बोली-- "मिलेगा कैसे नही ,देखो दूर चीलें मँडरा रहीं हैं वहाँ जरूर पानी होगा ।" 
"ठीक है ,मैं पानी लेकर आता हूँ ।"
बहन बोली--- " पानी पीने तो मैं ही जाऊँगी ? अभी पीकर आती हूँ । तब तक तू पेड़ के नीचे आराम करना ।"  
बहन जहाँ पानी पीने गई ,वहाँ  देखा कि कुछ लोग एक बड़ी भारी शिला गढ़ रहे हैं । 
"भैया ये क्या बना रहे हो ?"
"तुझे मतलब ? पानी पीने आई है तो पानी पी और अपना रस्ता देख ।"
एक आदमी ने झिड़ककर कहा तो बहन के कलेजे में सुगबुगाहट हुई । जरूर कोई अनहोनी है । बोली- "भैया बतादो ये शिला किसके लिये गढ़ रहे हो ? मैं पानी तभी पीऊँगी ।"
"बड़ी हठी औरत है । चल नही मानती तो सुन । एक निकोसी पूत है । उसी की छाती पर सरकाने के लिये ऊपर से हुकम हुआ है ।"
सुनकर बहन को काटो तो खून नही । माँ-जाए के लिये हर जगह काल बैरी बन कर खड़ा है । 
"उसने ऐसी क्या गलती करी है जो....?"
"तुझे आम खाने कि पेड़ गिनने ? तू पानी पी और अपना रास्ता देख ।" दूसरा आदमी चिल्लाकर बोला पर वह नही गई । वही खड़ी गिड़गिड़ाने लगी --"सुनो भैया ! वह भी किसी दुखियारी माँ का लाल होगा । किसी बहन का भाई होगा । तुम्हें दौज मैया की सौगन्ध । बताओ ,क्या उसे बचाने का कोई उपाय नही है ?"
"है क्यों नहीं ? उपाय तो है ।"
आदमी हार मानकर बोला--"उसे किसी ने कभी कोसा नही है । अगर कोई कोसना शुरु करदे तो 'अलह' टल सकती ।" 
बस बहन को कैसी प्यास ! कहाँ का पानी ! उसी समय से उसने भाई को कोसना चालू कर दिया और कोसती-कोसती भाई के पास आई---"अरे , नासमिटे , तू मर जा । 'धुँआ सुलगे' ...'मरघट जले'...।"
" हे भगवान ! मेरी अच्छी--भली बहन बावली भी होगई ! मैंने कितना मना किया था कि मत चल मेरे संग । नही मानी ।"---भाई ने दुखी होकर सोचा । जैसे-तैसे दोनों घर पहुँचे | बेटी को इस हाल में देखा तो माँ हैरान । अच्छी भली बेटी को कौनसा प्रेत लग गया है ? कौनसे भूत-चुडैल सवार होगए हैं, जो भाई को कोसे जा रही है ? लड़की तो बावरी होगई ? 
"माँ कोई बात नही । बावरी है ,भूतरी है, जैसी भी है तो मेरी बहन । तू नाराज मत हो ।"
माँ चुप होगई | बहन रोज उठते ही भाई को कोसती और दिन भर कोसती रहती । ऐसे ही 'कोसते-कासते' कुछ दिन गुजर गए । एक दिन भाई की सगाई आई । बहन आगे आ गई---"इस 'जनमजले' की सगाई कैसे होगी ? पहले तिलक मेरा होगा |"
"हें... ??" सबको  बड़ी हैरानी हुई , बुरा भी लगा पर भाई ने कहा --"मेरी बहन की किसी बात का कोई बुरा मत मानो । वह जैसी भी है, मेरी बहन है वह जो चाहती है वही करो ।" 
पहले बहिन का टीका किया | लगुन भी पहले उसी के हाथ रखी गई | 
फिर तो हर रस्म पर बहन इसी तरह आगे आकर भाई को रोकती रही टोकती रही और कोसती रही । 
भाई का ब्याह होगया ।
अब आई सुहागरात । बहन पहले ही पलंग पर जाकर लेट गई ।
"यह अभागा सुहागरात कैसे मनाएगा ? मैं भी वही सोऊँगी ।"
"हे भगवान ! और सब तो ठीक,  पर सुहागरात में कैसे ,क्या होगा ? ऐसी अनहोनी तो न कभी देखी न सुनी |"  पर भाई ने कहा --"कोई बात नही । मेरी बावरी बहन है । मैं उसका जी नही दुखाऊँगा ।हम जैसे भी रात काट लेंगे ।" फिर कोई क्या कहता ।
बहन रात में भाई और भौजाई के बीच लेट गई । पर पलकों में नींद कहाँ से आती । सोने का बहाना करती रही । आधीरात को भगवान का नागदेवता को हुकम हुआ कि फलां घर में एक नया-नवेला जोड़ा है , उसमें से दूल्हा को डसना है । नागदेवता आए । पलंग के तीन चक्कर लगाए पर जोड़ा  कहीं न दिखे | ऊपर देखे तो तीन सिर दिखें और नीचे की ओर छह पाँव । जोड़ा होता तो डसता । बहन सब देख-समझ रही थी । चुपचाप उठी । तलवार से साँप को मारा और ढाल के नीचे दबा कर रख दिया । और भगवान का नाम लेकर दूसरे कमरे में चली गई । 
सुबह उसने सबको मरा साँप दिखाया और बोली--"मैं बावरी आवरी कुछ नही हूँ । बस अपने भाई की जान , मैया की गोद और भौजाई का एहवात ( सुहाग) बचाने के लिये यह सब किया । जो भूल चूक हुई उसे माफ करना ।"
भाई-भौजाई ने बहन का खूब मान-पान रखा । बहन खुशी-खुशी अपने घर चली गई । 
जैसे इस बहन ने भाई की रक्षा की और भाई ने बहन का मान रखा वैसे ही सब रखें । जै दौज मैया की । 

बुधवार, 28 सितंबर 2022

‘हायम्स बीच’ और हम

सिडनी डायरी 7 

नीले आसमान का दर्पण बना , गहन गंभीर निस्सीम नीलाभ सागर , अपने अथाह जलागार को सहेजने में व्यस्त ...उसकी व्यस्तता को तोड़ने उद्दाम उत्तुंग चंचल लहरें शोर करती हुईं तट की ओर बढ़ रही हैं , युवा होरही किशोरी की तरह सीमाएं तोड़ने और मनचाहे तरीके से फैल जाने को आतुर सी हिलोरें ..., लेकिन एक अनुशासन प्रिय पिता की तरह सागर गरज वरजकर मानो उन्हें रोक रहा है तो लहरें भी मानो मन मारकर तट को जितना भिगो सकती हैं , भिगोकर लौट रही है . या मानो कबड्डी के खिलाड़ी की तरह प्रतिपक्ष की सीमा को छूकर लौटना ही उनका लक्ष्य हो ,या फिर गोला या भाला फेंक जैसी कोई प्रतियोगिता चल रही हो कि कौन सी लहर तट को कहाँ तक भिगोकर आ पाएगी . कोई लहर नीरज चौपड़ा की तरह सबसे आगे बढ़कर तट को छू लेती है .

किनारे किनारे सुदूर बिछे हुए सफेद रेशम से मुलायम और महीन रेत का लम्बा तट नीले अम्बर की सफेद किनारी सा मनोरम , दृष्टि को विजड़ित करने पर्याप्त है .. सागर का नीलाभ जल कभी फिरोजी रंग में बदल जाता है तो नीली लहरें ऊपर उमड़ने पर हरिताभ होजाती हैं और आगे आगे बढ़ती हुई दुग्ध फेन सी धवल हो जाती हैं और तट पर फैलती हुई बालू के रंग में घुलमिल जाती हैं  .रंगों का यह अनूठा मेल और परिवर्तन चकित करता है .धुले निखरे काँच सा
दुग्ध धवल महीन रेत वाला तट

पारदर्शी जल मोहक आमंत्रण देता है . हालाँकि छूते ही बर्फीला अहसास कदमों को पीछे कर देता है लेकिन अगली लहर आपके पैरों से बालू के साथ पैरों को भी खींच लेती है और आप लहरों में घुलमिल जाते हैं .ठंडी लहरों से एकाकार होना भी एक अनूठा और तृप्तिदायक अनुभव है जिसे दूर किनारे पर बैठा व्यक्ति अनुभव नहीं कर सकता .   

यह मनोरम और रोमांचक दृश्य है हायम्स बीच ’ ( Hyams beach ) का . यह जेर्विस खाड़ी का एक बहुत ही खूबसूरत तट है जो अपने दूर तक फैले दूध से सफेद बारीक रेत के लिये विश्वभर में जाना जाता है .

सागर से मिलने चली एक नदी

सिडनी के दक्षिण में तस्मान सागर से सम्बद्ध जेर्विस खाड़ी (Jervis Bay) एक समुद्री खाड़ी है . जो  न्यू साउथ वेल्स के शॉल्हेवन (Shoalhaven) शहर का सुदूर विस्तारित तटीय क्षेत्र है जिसमें सघन वन हैं और मारीज़  Murrays beach , ब्लेनम Blenheim  ,नेल्सन Nelson ,  आदि अनेक सुन्दर तट ( beach) हैं . इन्हीं में से एक है Hyams beach जो अपने दुग्ध-धवल-तट के कारण अद्वितीय है .

हम लोगों ने सिडनी से 16 सितम्बर को हायम्स बीच के लिये प्रस्थान किया . हम-लोग में पाँच परिवार शामिल थे . सौरभ , अमर , शिवम् , लविराज और हम . कुल 21  (8 बच्चे और13 बड़े) सदस्य थे . पाँच परिवारों का प्यारा ग्रुप है जिनके बीच परस्पर आलू प्याज या चाय शक्कर माँग लेने वाला एकदम अनौपचारिक सम्बन्ध है .

 बोरल टाउन में ट्यूलिप गार्डन  

सिडनी से खूबसूरत जंगल के बीच , कंगारू वैली से गुजरते हुए, 180 कि मी. लम्बे शान्त और मनोरम मार्ग तय करके हम लोग माउंटेन व्यू रिजॉर्ट पहुँचे . बीच में बोरल Bowral town में रुककर जलपान किया और विविध रंग के ट्यूलिप के फूलों की प्रदर्शनी देखी . इन दिनों वसन्त पेड़ पौधों पर जी जान से अपना स्नेह लुटा रहा है . जहाँ देखों टहनियाँ फूलों से भरी हैं . हर तरफ फूलों का जैसे मेला लगा है . यहाँ तक कि धरती पर बिछी घास भी कई तरह के फूलों से सजी है .

माउंटेन व्यू रिजॉर्ट शॉल्हेवन हेड्स ( टाउन) में है जो शॉल्हेवन सिटी काउंसिल के अन्तर्गत है . यहाँ सुन्दर व सुविधायुक्त अनेक रिज़ॉर्ट हैं  माउंटेन व्यू उन्हीं में से एक है . 

डाइनिंग हॉल में 

इस हरे भरे पेड़ ,फूलों भरे पोधौं से सज्जित सुन्दर रिजॉर्ट में पर्यटकों के लिये गैसचूल्हा ज़रूरी बर्तन , चाय का सामान,  फ्रिज़ , टीवी , बेड्स सभी सामान और सुविधाओं से युक्त अनेक सुन्दर कॉटेज बने हुए हैं . साथ ही मनोरंजन के लिये  टेनिस ,जम्पिंग बॉल , स्वीमिंग पूल ,जिम आदि कई साधन हैं .क्योंकि खाने की व्यवस्था खुद करनी होती है . इसलिये सबने मिलजुलकर खाना बनाया . डाइनिंग हॉल में खा पीकर सब बतियाने बैठ गए . प्रेम , विवाह , कैरियर , बच्चे ,परिवार , रुचियाँ कितने सारे विषय .. ठहाकों के बीच समय का ध्यान ही न रहा . एक गोरी तन्वंगी ने आकर बड़ी नरमी से जताया कि हम लोग यहाँ जागने की समय सीमा पार कर चुके हैं . तब ध्यान आया कि हम लोग अपने घर में नहीं हैं .

सुबह सब लड़के टेनिस खेलने चले गए . बच्चों और उनकी माँओं ने जम्पिंग बॉल पर आनन्द लिया . मैं और नेहा ( शिवम् की पत्नी) की माँ दोनों वॉक पर निकल गईं .कुनकुनी धूप और ताजी हवा के झकोरों में हरे भरे ,फूलों भरे फुटपाथ पर टहलना भी एक अनौखा अनुभव रहा . दस बजे हम सब बीच के लिये निकल पड़े . रिजॉर्ट से 'हायम्स बीच' तक की दूरी लगभग 47-48 किमी है . सघन वन से आच्छादित मार्ग से होते हुए बीच तक हमें 45 मिनट से अधिक नहीं लगे . 

बीच पर पहुँचकर आँखें जैसे पलकें झँपकाना भूल गईं . तट की दूध सी सफेदी के साथ सागर का नीला फिरोजी रंग ,  दूर क्षितिज तक नीले आसमान के साथ एकाकार होता हुआ सा समुद्र , ऊंची लहरों का तुमुल गर्जन ..इसके बीच विजड़ित सा मन .. लहरें जैसे निमंत्रण दे रही थीं , चुनौती भी कि आओ हिम्मत है तो खेलो हमारे साथ ..उन लहरों में खेलना सचमुच कोई खेल नहीं . उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है ...खैर यहाँ सबने लहरों का आनन्द जी भरकर लिया . पानी धुले निखरे काँच जैसा पारदर्शी ..और उतना ही ठण्डा लेकिन सभी हमउम्र साथी लहरों में खूब देर तक झूलते रहे . मैं पूरी तरह भीगना नहीं चाहती थी . पानी ही इतना बर्फीला था लेकिन तेज लहरें तो पाँव पकड़ कर खींच ही लेती है .ना ना कहते कमर से ऊपर तक भीग ही गई  .कवि ने डूबने का आनन्द अनुभव करने के बाद ही किसी को इंगित करके लिखा होगा हौं बौरा डूबन डरा रहा किनारे बैठ.” 

असीम सागर की अतलता और विकलता मुझे चकित भी करती है और विकल भी . उमड़ती हुई लहरों के गर्जन और फिर तट से टकराकर उनका लौटना मुझे कहीं व्यग्रता और वेदना का अनुभव कराता है . जैसे सागर धरती का दिल है . लहरें धरती का हदय-उद्वेलन है . धड़कन हैं ..–


सागर हृदय है धरती का 

उमड़ता है ,धड़कता है

किसी की प्रतीक्षाओं में .

मानव के थोथे दम्भ पर

प्रगति के नाम झूठे अवलम्ब पर .  

उफनता गरजता है ,

लिपटती हैं जैसे माँ से 

बेटियाँ फटेहाल ,लहूलुहान

मिलती हैं जब बदहाल नदियाँ

अभी तक सहमी हुई हैं सदियाँ  

तो सागर मन ही मन सिसकता है .

धरती का हदय सागर .

उमड़ता भी है नेहभर जब चन्द्रमा को

देखता है पूर्णकला सम्पन्न .

रहे यह ध्यान सबको 

और अब उसको   .

आघात ना पहुँचे .

धरा का हृदय सागर

रुष्ट हो तो प्रलय भी लाता है .

हरीतिमाच्छादित रिजॉर्ट 'माउंटेन व्यू' में


बुधवार, 14 सितंबर 2022

हर दिन हिन्दी का है .

 एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

प्राणवायु सी साँसों में, जीवन हिन्दी का है .


 जैसे भावों को माँ समझे और सबको समझाए  .

माँ के वशभर सन्तानों का सिर न कभी झुक पाए .

सम्बल दे माँ जैसा ही अंचल हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है.

 

हिन्दी अपने घर का आँगन , जहाँ बसा है बचपन .

गभुआरे बालों की खुशबू रची बसी है कण कण .

अधरों पर पहला उच्चारण हिन्दी का हो .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन

 

धरती है यह धरती पर ही पाँव जमा सकते हैं

चलते चलते बिना रुके मंजिल को पा सकते हैं .

इसके उर्वर अंचल में उगती फसलें सपनों की ,

अनजानी सी राहों में यह भाषा है अपनों की .

दिल से दिल को जोड़े वह बन्धन हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

 

 साथ दूध मे हिन्दी भी माँ ने मिसरी सी घोली .

संस्कृति की देहरी पर जैसे सजी हुई रंगोली

सरल समर्थ व्यकरण सम्मत नदिया सी बहती है

अन्तर में रच बस जाएं उस बोली में कहती है .

धरा हमारी हिन्दी और गगन हिन्दी का है .

एक दिवस क्या हम सबका हर दिन हिन्दी का है

  

देश प्रदेश सभी की अपनी भाषाएं उत्तम हैं .

बात एक को चुनने की तो हिन्दी सर्वोत्तम है

हिन्दी ऐसा उपवन जिसमें मुकुलित सभी विधाएं,

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम गूँजें यही सदाएं

हिन्दी बोलें पढ़ें लिखें , वन्दन हिन्दी का हो .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का हो .   

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