शनिवार, 21 मार्च 2026

एक नाम एक दरिया

 

संस्मरण पुनःप्रसारित
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आज गनगौर(गणगौर) पूजा है।
अब केवल अपने परिवेश की बात करूँ तो दूसरे त्यौहारों की तरह गणगौर--पूजा भी अब काफी संक्षिप्त ,औपचारिक और अकेली होगई है खासतौर पर मेरे लिये जिसने बचपन में इस पर्व को काफी बड़े रूप में देखा हो । यहाँ बचपन के उन्हीं दिनों की यादें हैं । 
तब गनगौर के पर्व की तैयारियाँ आठ दस दिन पहले से शुरु हो जातीं थीं जब ताऊजी गणगौर पूजा के लिये मूर्तियों की माटी तैयार  करते थे ।  इधर माँ और मौसी ( जैसा कि मैंने  होली ....संस्मरण में लिखा है कि मौसी ही मेरी ताई भी हैं ) भर-भर डलिया 'गुना' बनातीं थीं  
क्योंकि पूरे गाँव में बाँटने होते थे । गुना गोल पहिया जैसी आकृति के मीठे नमकीन पकवान होते हैं .मीठे गुना घी ,गुड़ आटा और मैदा घी शक्कर के बनते थे और नमकीन गुना  बेसन और मैदा अजवाइन के बनाए जाते थे ( हैं)। घर घर से घी और तेल की महक गणगौर की तैयारियाँ बताती 
उधर ताऊजी मिट्टी से गणगौर  शिव पार्वती) की सुन्दर मूर्तियाँ बनाने जुट जाते थे । तृतीया की सुबह तक ताऊजी गौरा-ईसुर को पूरे साज-सिंगार के साथ तैयार कर देते थे ।  हमारा आँगन इतना बड़ा है कि उसमें  पचास-साठ महिलाएं आराम से बैठ जातीं थीं । पूजा सम्पन्न कराने का दायित्त्व दादी का होता था । छोटे कद की साँवली और दुबली-पतली मेरी दादी बहुत गुणी थीं । उनके हाथों में गजब की कलाकारी थी । मिट्टी के घर को उन्होंने इतना सुन्दर रूप दे रखा था कि लोग देखते रह जाते थे ।उनके पास कहावतों गीतों और कहानियों का अपार भण्डार था । वे बहुत मधुर गातीं थीं । वे जितनी गुणी थीं उतनी ही तेज और अनुशासन प्रिय थीं । उनकी अवज्ञा करने का साहस किसी में नहीं था  इसलिये भी और अपने पद के हिसाब से भी हर व्रत-पूजा में कथा-वाचक की भूमिका वे ही निभाती थीं । सो गनगौर की  तीन-चार कहानियों ( कभी लिखूँगी) और मधुर गीतों के साथ पूरे विधि-विधान से पूजा सम्पन्न करवातीं थीं ।
मिटटी से इन्हें मैंने ही बनाया और सजाया है 
शाम को गौर का चीर लेने के साथ देर रात तक नाच-गाने की जमकर धूम  होती थी . नाच के कारण आँगन की लीपन तक उखड़ जाती थी . लेकिन इस पर्व का सबसे रोचक प्रसंग था शाम को गौरा का चीर प्राप्त करना ।
 कथानुसार गौरी से प्राप्त वह चीर सुहाग के दीर्घायु होने का प्रतीक होता है. उसे पाए बिना व्रत अधूरा ही होता है । लेकिन चीर के उस टुकड़े को पाना क्या आसान था ?
उस चीर को पाने के लिये सुहागिनों को अपने पति का नाम लेना होता था और यह कार्य मकर-संक्रान्ति के दिन सुबह-सुबह कड़कती सर्दी में नदी में डुबकी लगाने से कम दुष्कर नही होता था । अगर आपने कभी जनवरी की बर्फीली सुबह ऐसा किया हो तो आप जानते होंगे कि नदी में उतरने से पहले कितना हौसला जुटाना होता है । पति का नाम लेने से पहले सुहागनों का हौसला जुटाना देखने लायक तमाशा हुआ करता था .
वन-गमन प्रसंग में वनवासिनें सीताजी से पूछतीं हैं कि "करोडों कामदेवों को लज्जित कर देने वाले ये साँवरे सलौने तुम्हारे कौन हैं ?" तब सीताजी अपने व राम के सम्बन्ध तक को मुँह से नही बतातीं ( नाम लेना तो दूर ) सिर्फ संकेत कर देतीं हैं ---
"बहुरि बदनु बिधु आँचर ढाँकी, पिय तन चितहि भौंह करि बाँकी ।
खंजन मंजु तिरीछे नयननि, निज पति कहेउ तिन्हउ सिय सयननि ।"
उल्लेखनीय है कि तब (गाँवों में तथा शहर की पुरानी पीढ़ी में तो अब भी ) पति का नाम तो क्या पत्नी का भी नाम नही लिया जाता था । पुरुष की तरह महिला को भी या तो किसी रिश्ते के साथ ( मानू की माँ ,विमला की भाभी आदि) पुकारा जाता था या मायके के नाम के साथ ( जौरावाली ,रामपुरवाली ) । मुझे याद है , जब 1976 में मेरा विवाह हुआ था और पति शादी के बाद पहली बार मेरे मायके आए थे ,कार्यवश उन्होंने सबके सामने मुझे नाम लेकर पुकारा तो दादी ने होठों पर उँगलियाँ रख कर आँखें फैलाईं और अपने आपसे ही बोलीं--"अरे राम ! घोर कलजुग आगया । देखो तो कैसे तडाक् से सबके सामने लड़की का नाम ले रहा है !"
खैर...बात सुहागिनों द्वारा पति का नाम लेने और  नाम लेकर चीर पाने की दुर्गम राह पर ठहरी हुई है  तो सीन यह होता था कि एक महिला हाथ में गौरी का चीर लिये किसी निर्णायक की तरह सामने बैठी होती थी और चीर की उम्मीदवारिन सुहागिन को ललचाते शरमाते और पति का नाम लेने की  कोशिश करते देखती थी पर नाम था कि अन्दर से निकल कर जुबान पर आते--आते फिसल जाता था  .जैसे कुए में गिरी बाल्टी निकालते समय ऐन घाट तक आते बाल्टी फिर छूट कर गिर जाती है । यह ऐसी मुश्किल होती थी जैसी अँधेरे में माचिस ढूँढते में होती है । ऐसी झिझक होती थी जैसी नया-नया तैरना सीखे व्यक्ति को नदी पार करने से पहले होती है । ऐसी लज्जा जो पहली बार प्रिय के साक्षात्कार के समय होती है । नव वधुएं ही नही प्रौढाएं भी अपने प्रिय का नाम लेते हुए स्नेह और लाज से लाल होजातीं थीं । उस पर चारों ओर तमाशाबीनों का शोर । कई पल इसी कशमकश में गुजर जाते कि आखिर बीच रास्ते में आए उस गहरे नाले को कैसे लाँघा  जाए । जैसे वह दो-चार अक्षरों का नाम न हुआ दुर्गम पहाड़ की चोटी होगया । साठिया कुआ से खींचा एक बाल्टी पानी होगया ।  बहुत ऊँचे छींके पर रखी दही की हाँडी होगया । या मठा में ही ( दही में गलत तरीके से गरम या ठण्डा पानी मिलाने पर ) बिला गया माखन होगया । 
"अरी लुगाइयो ! क्या यहीं बैठी सबेरा करोगी ? साल में एक बार आज के दिन नाम लेने से तो पति की उमर बढ़ती है । जल्दी करो 'भैनाओ' ।"
दादी चिल्लातीं तब किसी तुकबन्दी से सहारे अटकते झिझकते हुए पति नाम लेते हुए वे चीर प्राप्त करतीं थीं , जी तोड़ मेहनत कर कमाए हुए रुपयों जैसा चीर । उस समय उन्हें ऐसा महसूस होता था जैसा किसी कवि को एक अच्छी कविता पूरी कर लेने पर होता है । लोकगीतों की तरह ही ये तुकबन्दियाँ किसने बनाईँ ,पता नही पर इन्हें नाव बना कर सुहागिनें एक गहरी और चौड़े पाट वाली नदी को पार कर सकतीं थीं( हैं ) । पढ़े-लिखे आधुनिक समाज में भले ही इनका कोई महत्त्व न हो पर अनपढ़ ग्रामीणाओं के लिये आज भी ये तुकबन्दियाँ किसी सरस कविता से कम नहीं हैं । उनमें से कुछ आप भी देखें ( कोष्ठक में पति का नाम )----
"चम्मच भरा घी ,मेरा (....) का एक ही जी ।"
"थाली में रोरी ,मैं (...) की गोरी ।"
"औलाती से टपके पानी ,दूध पिये (...) की रानी ।"
"कच्चा पान लाती नईं हूँ ,पक्का पान खाती नईँ हूँ "
(...) की सेज पर बिना बुलाए जाती नईं हूँ ।"
"तराजू की तीन तनी ,मेरी (...) की जोड़ी खूब बनी ।"
"कहूँ पक्के अनार कहूँ कच्चे अनार
ए सखी (...) गए हैं कन्हार ।"
"रोज करै सलाम ,(..) मेरौ गुलाम ।"
"थाली भरे बतासे ,(...) दिखावै तमासे"
"चन्दा की चाँदनी में तरसे जिया
बाती हूँ मैं (.....) मेरा दिया ।" ...
ऐसी तुकबन्दियाँ और भी हैं पर अभी मुझे इतनी ही याद हैं ।
कपड़ा, जेवर, शान-शौक और सुविधाओं से वंचित, जीवन की गाड़ी को मरुस्थल में भी हँस कर खींचने वाली ये ग्रामीणाएं जिस सहिष्णुता से जीवन की विसंगतियों से जूझती हैं ,सम्बन्धों का उत्सव भी उतने ही उल्लास से मनातीं है । स्नेह का ऐसा उदार और गहरा रूप अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । हालाँकि उनके स्नेह व उदारता की कभी कोई कहानी नही बनती । इतिहास बनता है तो उसके प्रति कठोर उपेक्षा व असंवेदना का । लेकिन वे थामे रहतीं हैं सिर्फ और सिर्फ जीवन की खुशियों को और इसका  प्रतीक है गनगौर का यह उत्सव जब एक नाम लेने में स्नेह और लज्जा की नदी को पार करते-करते वे  उसमें डूब जाती है और निकलतीं हैं सारा विषाद ,निराशा और मालिन्य धोकर । निर्मल ,उज्ज्वल,शीतल ।

( चित्र की मूर्तियाँ---- मैंने ही कोशिश की है बनाने व सजाने की  । हालांकि वांछित मिट्टी व रंग उपलब्ध न हो सके  )

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

प्रेम एक अलग दृष्टि से

 (1)

प्रेम है  ‘एनस्थीसिया’ 

निष्क्रिय कर देता मस्तिष्क को ।

ज़िन्दगी कितनी ही बेरहमी से

चीरती कुरेदती रहे

देती रहे ज़ख्म ।

महसूस नहीं होता किंचित भी दर्द

पता ही नहीं चलता कि ,

चुपचाप निकाला जा चुका है ,

हृदय ,

लीवर ,किडनी ,फेफड़े ..

(2)

प्रेम, 

स्वानुभूति किसी 

हड्डी खखोरते हुए, श्वान की

अपने ही जबड़े से निकलते रक्त का

स्वाद लेते हुए

टीस सहते हुए भी

तृप्त होता रहता है

(3)

 प्रेम

अन्न मन 

लग जाता है जैसे घुन

नहीं छोड़ता उसे

उसके खोखला होने तक .

कहाँ रहता है अन्न फिर

किसी काम का .

(4)

प्रेम 

महज एक इन्द्रजाल  

एक कुहासा  

जिसमें विमुग्ध पथिक 

विलुप्त हुआ अपने आप से

खिंचा चला जाता है कहीं दू...र 

अनजान ,अपना सब कुछ छिन जाने की ,

एक साजिश से  

एक
स्कैम है प्रेम ।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

माँ ऐसे स्वर दे


 अँधियारे का त्रास बहुत है ।

उजियारे की आस बहुत है ।

ज्योतिर्मयी शारदे माँ ,

बस रिक्त हृदय भरदे

मन जगमग जग करदे ।

 

दुर्गम पथ सूना सूना है ।

उस पर भय दूना दूना है ।

दृढ़ आशा विश्वास रहे ,

पथ यों गुंजित करदे

अन्तर निर्भय करदे ।                

बस जगमग जग करदे ।

 

जंजालों में मन अटके ना ।

चौराहों पर अब भटके ना ।

गीत नेह के गाती जाऊँ ,

माँ ऐसे स्वर दे ।

मन जगमग जग करदे ।

 

कूल-किनारे हरियाली हो ।

अन्तर कोश नहीं खाली हो ।

नदिया का अविरल प्रवाह ,

निर्मल , कल कल स्वर दे

मन जगमग जग करदे ।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

माँ



 पौष-माघ की ठिठुरन में

है गरम रजाई माँ

तपती जेठ दुपहरी में

ठंडी अमराई माँ ।

 

तिमिर हटाती सरस प्रभाती

पूरब की लाली

बूँद-बूँद अमृत बरसाती

शरद जुन्हाई माँ ।

 

छलका है वात्सल्य

सूर के छन्दों में इसका

गिरधर की कुण्डलियाँ

तुलसी की चौपाई माँ ।

 

'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी

'रवि' का सरस सितार

पावन अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की

शहनाई माँ ।

 

रोते शिशु तो मीठा--मीठा

दूध मिले भरपेट

रूखी रोटी पर है

मक्खन और मलाई माँ

 

स्वार्थ नही सन्देह नही

बस प्यार भरा विश्वास

झूठे चेहरों की दुनिया में

एक सच्चाई माँ ।

( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बिरबा सींचें आशा के


 नया वर्ष ले हर्ष आगया 

बिरबा रोपें आशा के ।

जो व्यतीत अब है अतीत 

छोड़ें भी ठांव  निराशा के 


सुबह सुबह सूरज की पाती 

हरकारा दे जाता है 

कोई पाखी आ मुँडेर पर 

पढ़कर रोज सुनाता है ।

सुनो उसे समझो ,समझाओ 

शब्द अर्थ उस भाषा के । 


बीत गया, घट रीत गया 

मनमीत उसे फिर से भरलो 

जो अबतक सोचा है केवल ,

अब उसको पूरा करलो ।

लिखलो मीत ,गीत जो 

अब तक लिखे नहीं अभिलाषा के 


समय साथ देता उनका ही ,

लक्ष्य बाँध चल देते जो ।

अर्थ आज के दिन को देकर  

दीप्तिमान कल लेते जो । 

पल पल को मुट्ठी में करलो 

काटो बन्ध दुराशा के ।


छोड़ो उनको जो तिनकों से 

धारा में बह जाते हैं ।

जिधर हवा का रुख होता है , 

अपनी राह बनाते हैं ।

अर्थ अनर्थ स्वार्थ में करते

सीधी सच्ची भाषा के 

जो अतीत अब है व्यतीत 

छोड़ें भी ठांव निराशा के

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

मन पाए विश्राम जहाँ

 जीवन में हमारे साथ कुछ लोग ऐसे अवश्य होते हैं जिनसे मिलकर मन विश्राम पाता है । आज अनीता निहलानी जी जिनके ब्लॉग से ही यह शीर्षक लिया है , ग्वालियर भ्रमण पर हैं और मेरा सौभाग्य के उनके साथ तीन चार घंटे बिताने का अवसर मिला है । मैं सौभाग्य जैसा शब्द केवल उनके लिये ही लिखती हूँ जिनके विचार ,व्यवहार और कृतित्त्व से उजाला पाती हूँ क्योंकि यह शब्द मेरे लिये महज औपचारिक नहीं है । ब्लॉग के माध्यम से मेरा अनीता जी से परिचय पुराना है । वे ब्लॉग पर मेरी हर रचना को अनिवार्यतः पढ़ती ही हैं यदि कहूँ कि मेरे ब्लॉग उनके कारण भी ऊर्जा पा रहे हैं तो असत्य कथन न होगा ।

आज उनसे मिलना किसी अपनी आत्मीया से मिलना था । उनके आध्यात्मिक विचार पावन संयमित जीवनशैली का ओज उनके चेहरे पर है । इसका श्रेय उनके पति श्री एम.सी. निहलानी जी को भी है । दोनों ही बड़े प्रसन्नचित्त , मिलनसार व स्नेह से परिपूर्ण हैं । दोनों ही बड़े सहज सरल हैं । भ्रमण-प्रिय हैं । शायद ही कोई प्रान्त देखने से छूटा हो यह तथ्य सचमुच बड़ा प्रेरक और अनुकरणीय है । दोनों से ही मिलना बड़ा आनन्द और उत्साह मय रहा । ऐसी मुलाकातें ऐसे अपनों से होती रहें । 

अनीता जी के चार ब्लॉग हैं। लेखन उन्ही की तरह आध्यात्म से आप्लावित और उत्कृष्ट है ।   

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अन्धा विश्वास

आँखों पर पट्टी बाँध लेना

यानी सच को अनदेखा करना ।

यह नहीं है केवल बाह्य दृश्यों 

नज़र बचाना,

बल्कि अक्षम होजाना है

ज्ञान-चक्षुओं का भी ।

मुँह मोड़ लेना है यथार्थ से ।

यों बचकर निकलजाना  ,

जड़ है बहुत से अनर्थों , विवादों की

कलह -क्लेश और अपवादों की ।

 यथार्थ से बचना ,

पलायन है 'कछुआ-धर्म' 

 समझो इसका मर्म कुरुक्षेत्र से ।

आँखों पर पट्टी बाँधकर

गांधारी ने मुँह मोड़ लिया था

अन्याय और दुराचार से ।

महल में होरहे षड़यंत्रों

और अत्याचार से

झोंक दिया था पूरे कुटुम्ब को

एक भीषण संग्राम में ।

 

आँखों पर पट्टी बाँधना  

मुँह मोड़ना है समय से

समय की गंभीरता

और जीवन में अपनी भूमिका से ।

अपने दायित्त्व से मुँह मोड़ना भयानक है सभी का

किन्तु स्त्री का सबसे अधिक ।

वह धुरी है परिवार की ,समाज की ,

जब जब जहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधी है स्त्री ने

ठोकर खाई है

न केवल स्त्री ने बल्कि

पूरे परिवार समाज परिवेश

और जीवन मूल्यों ने भी ।