शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

माँ ऐसे स्वर दे


 अँधियारे का त्रास बहुत है ।

उजियारे की आस बहुत है ।

ज्योतिर्मयी शारदे माँ ,

बस रिक्त हृदय भरदे

मन जगमग जग करदे ।

 

दुर्गम पथ सूना सूना है ।

उस पर भय दूना दूना है ।

दृढ़ आशा विश्वास रहे ,

पथ यों गुंजित करदे

अन्तर निर्भय करदे ।                

बस जगमग जग करदे ।

 

जंजालों में मन अटके ना ।

चौराहों पर अब भटके ना ।

गीत नेह के गाती जाऊँ ,

माँ ऐसे स्वर दे ।

मन जगमग जग करदे ।

 

कूल-किनारे हरियाली हो ।

अन्तर कोश नहीं खाली हो ।

नदिया का अविरल प्रवाह ,

निर्मल , कल कल स्वर दे

मन जगमग जग करदे ।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

माँ



 पौष-माघ की ठिठुरन में

है गरम रजाई माँ

तपती जेठ दुपहरी में

ठंडी अमराई माँ ।

 

तिमिर हटाती सरस प्रभाती

पूरब की लाली

बूँद-बूँद अमृत बरसाती

शरद जुन्हाई माँ ।

 

छलका है वात्सल्य

सूर के छन्दों में इसका

गिरधर की कुण्डलियाँ

तुलसी की चौपाई माँ ।

 

'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी

'रवि' का सरस सितार

पावन अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की

शहनाई माँ ।

 

रोते शिशु तो मीठा--मीठा

दूध मिले भरपेट

रूखी रोटी पर है

मक्खन और मलाई माँ

 

स्वार्थ नही सन्देह नही

बस प्यार भरा विश्वास

झूठे चेहरों की दुनिया में

एक सच्चाई माँ ।

( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बिरबा सींचें आशा के


 नया वर्ष ले हर्ष आगया 

बिरबा रोपें आशा के ।

जो व्यतीत अब है अतीत 

छोड़ें भी ठांव  निराशा के 


सुबह सुबह सूरज की पाती 

हरकारा दे जाता है 

कोई पाखी आ मुँडेर पर 

पढ़कर रोज सुनाता है ।

सुनो उसे समझो ,समझाओ 

शब्द अर्थ उस भाषा के । 


बीत गया, घट रीत गया 

मनमीत उसे फिर से भरलो 

जो अबतक सोचा है केवल ,

अब उसको पूरा करलो ।

लिखलो मीत ,गीत जो 

अब तक लिखे नहीं अभिलाषा के 


समय साथ देता उनका ही ,

लक्ष्य बाँध चल देते जो ।

अर्थ आज के दिन को देकर  

दीप्तिमान कल लेते जो । 

पल पल को मुट्ठी में करलो 

काटो बन्ध दुराशा के ।


छोड़ो उनको जो तिनकों से 

धारा में बह जाते हैं ।

जिधर हवा का रुख होता है , 

अपनी राह बनाते हैं ।

अर्थ अनर्थ स्वार्थ में करते

सीधी सच्ची भाषा के 

जो अतीत अब है व्यतीत 

छोड़ें भी ठांव निराशा के

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

मन पाए विश्राम जहाँ

 जीवन में हमारे साथ कुछ लोग ऐसे अवश्य होते हैं जिनसे मिलकर मन विश्राम पाता है । आज अनीता निहलानी जी जिनके ब्लॉग से ही यह शीर्षक लिया है , ग्वालियर भ्रमण पर हैं और मेरा सौभाग्य के उनके साथ तीन चार घंटे बिताने का अवसर मिला है । मैं सौभाग्य जैसा शब्द केवल उनके लिये ही लिखती हूँ जिनके विचार ,व्यवहार और कृतित्त्व से उजाला पाती हूँ क्योंकि यह शब्द मेरे लिये महज औपचारिक नहीं है । ब्लॉग के माध्यम से मेरा अनीता जी से परिचय पुराना है । वे ब्लॉग पर मेरी हर रचना को अनिवार्यतः पढ़ती ही हैं यदि कहूँ कि मेरे ब्लॉग उनके कारण भी ऊर्जा पा रहे हैं तो असत्य कथन न होगा ।

आज उनसे मिलना किसी अपनी आत्मीया से मिलना था । उनके आध्यात्मिक विचार पावन संयमित जीवनशैली का ओज उनके चेहरे पर है । इसका श्रेय उनके पति श्री एम.सी. निहलानी जी को भी है । दोनों ही बड़े प्रसन्नचित्त , मिलनसार व स्नेह से परिपूर्ण हैं । दोनों ही बड़े सहज सरल हैं । भ्रमण-प्रिय हैं । शायद ही कोई प्रान्त देखने से छूटा हो यह तथ्य सचमुच बड़ा प्रेरक और अनुकरणीय है । दोनों से ही मिलना बड़ा आनन्द और उत्साह मय रहा । ऐसी मुलाकातें ऐसे अपनों से होती रहें । 

अनीता जी के चार ब्लॉग हैं। लेखन उन्ही की तरह आध्यात्म से आप्लावित और उत्कृष्ट है ।   

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अन्धा विश्वास

आँखों पर पट्टी बाँध लेना

यानी सच को अनदेखा करना ।

यह नहीं है केवल बाह्य दृश्यों 

नज़र बचाना,

बल्कि अक्षम होजाना है

ज्ञान-चक्षुओं का भी ।

मुँह मोड़ लेना है यथार्थ से ।

यों बचकर निकलजाना  ,

जड़ है बहुत से अनर्थों , विवादों की

कलह -क्लेश और अपवादों की ।

 यथार्थ से बचना ,

पलायन है 'कछुआ-धर्म' 

 समझो इसका मर्म कुरुक्षेत्र से ।

आँखों पर पट्टी बाँधकर

गांधारी ने मुँह मोड़ लिया था

अन्याय और दुराचार से ।

महल में होरहे षड़यंत्रों

और अत्याचार से

झोंक दिया था पूरे कुटुम्ब को

एक भीषण संग्राम में ।

 

आँखों पर पट्टी बाँधना  

मुँह मोड़ना है समय से

समय की गंभीरता

और जीवन में अपनी भूमिका से ।

अपने दायित्त्व से मुँह मोड़ना भयानक है सभी का

किन्तु स्त्री का सबसे अधिक ।

वह धुरी है परिवार की ,समाज की ,

जब जब जहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधी है स्त्री ने

ठोकर खाई है

न केवल स्त्री ने बल्कि

पूरे परिवार समाज परिवेश

और जीवन मूल्यों ने भी ।  

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

ताना-बाना --मेरी दृष्टि में

रचनाकार --ऊषा किरण 

मन की उधेड़बुन का खूबसूरत ‘ताना-बाना’ -जब कोई आँचल मैं चाँद सितारे भरकर अँधेरे को नकारने लगे , तूफानों को ललकारे , मुट्ठी में आसमान को भरने के स्वप्न देखने लगे ,जब कल्पना वक्त की निर्मम लहरों से चुराई रेत ,बन्द सीप ,शंख आदि बटोर कर अनुभूतियों का घर सजाने लगे, वेदना के पाखी शब्दों के नीड़ तलाशने लगें, लहरों और बादलों से बातें करे और कल्पनाओं की हीर अभिव्यक्ति के राँझे की तलाश में यहाँ वहाँ भटकने लगे , हृदय के शून्य को भरने की व्यग्रता वेदना बन जाये तब ताना-बाना जैसी कृति हमारे सामने आती है .

डा. ऊषाकिरण को जितना मैंने जाना है , इस पुस्तक से वह परिचय और प्रगाढ़ हुआ है . उनके सरल तरल स्नेहमय सुकोमल व्यक्त्तित्त्व का दर्पण है तानाबाना . यों तो वे मेरी आत्मीया हैं , मुझे बड़े स्नेह के साथ यह सुन्दर उपहार भेजा . इसलिये इसे पढ़ना और पढ़कर इसके विषय में कुछ कहना मेरा तो एक कर्त्तव्य भी है और एक जरूरी काम भी लेकिन वास्तव में यह किताब ही ऐसी है कि कोई अनजान भी इसे देख-पढ़कर मुग्ध हुए बिना न रहेगा . लगभग सौ कविताओं और इतने ही सुन्दर उनके खुद के रचे गए सुन्दर चित्रों से सजी यह ऐसी कृति नहीं कि जल्दी से पढ़ो और थोड़ा बहुत लिखकर मुक्त हो जाओ . इसमें गहरे पैठकर ही मोतियों का सौन्दर्य दिखाई देता है . कुमार विश्वास जी ने शुरु में ही लिखा है कि ऊषा जी कविता को चित्रात्मक नजरिया से देखतीं हैं और चित्रों कवितामय नजरिया से . यही बात उन्हें अन्य समकालीन लेखकों से अलग करती है .

संग्रह की पहली कविता ‘परिचय’ पढ़कर ही ऊषा जी के कद का पता चल जाता है जिसमें अनूठी उपमा और बिम्ब के साथ विविधवर्णी भाव हैं .’तुम होते तो’ एक बहुत प्यारी कविता है जिसमें हर भाव और सौन्दर्य-बोध किसी के होने न होने पर आधारित हैं . बहुत कोमल भाव . देखिये— .”..जब छा जाते हैं/ बादल घाटियों में / मन पाखी फड़फड़ता है/ ...पहुँचती नहीं कोई एक भी किरण /वहाँ घना कुहासा छाया है.....सारी किरणें जो ले गए तुम/ अपनी बन्द मुट्ठी में .”

हर रचना कवि के मन का दर्पण होती है . ऊषा जी अपनी हर रचना में पूरी ईमानदारी और सादगी के साथ मौजूद हैं .उनका भाव-संसार कोमल , अछूता , उदार और संवेदना से भरा हुआ है . वे कभी परछाइयों’ को पकड़कर कभी ‘पारिजात’ की गन्ध को बाँधकर और कभी ‘चाँद को थाली ‘ में उतारकर खुद को बहलाने की बात कहती हैं . यह बात कहने में जितनी सुन्दर है समझने में उतनी ही मर्मस्पर्शी है .वे शिकवे शिकायतों का बोझ लादे रहने की पक्षधर नहीं हैं . ‘मुक्ति’ कविता में बड़े प्रभावशाली तरीके से यह बात कही है –“आओ सब /,..करने बैठी हूँ हिसाब/ कब किसने दंश दिया/ किसने किया दगा/.... किसने ताने मारे /सताया किसने /...जब मन छीजा /तब किसका कंधा नहीं था पास/.. फाड़ रही हूँ पन्ना पन्ना /यह इसका /यह उसका./..आओ सब ले जाओ/ अपना अपना /मुक्त हुई मैं /...जाते जाते बन्द कर जाना दरवाजा /.....बहुत सादा सी लगने वाली यह कविता असाधारण है .दरवाजा बन्द करने में एक सुन्दर व्यंजना है . वे नदिया के साथ बहना चाहती हैं ( नदिया कविता ),मुट्ठी में आसमान भर लेना चाहती है ( एक टुकड़ा आसमान) हवाओं में गुम होना चाहतीं हैं खुशबू की तरह ...कहीँ सूफियाना रंग है तो कहीं शाश्वत जीवन-दर्शन .सुख और दुख का स्रोत हम स्वयं हैं ( हम कविता) क्षमताएं हमारे भीतर हैं . कस्तूरी कविता में यही बात है--- “हरसिंगार ,जूही /...महकती है सारी रात/ ....मेरे आँगन में/ ..या तकिये चादर में /...अरे यह खुशबू तो झर रही है /इसी तन-उपवन से/ ..दूर कबीर गा रहे हैं काहे री नलिनी....”

‘ताना-बाना’ में प्रेम और संवेदना के रंग सबसे गहरे हैं . ‘चौबीस-बरस’ और ‘क्यूँ’ कविताओं में प्रेम की वेदना बहुत प्रभावी ढंग से व्यक्त हुई है . रहस्यवाद से रची बसी ‘क्यूँ’ कविता की कुछ पंक्तियाँ देखें—--“.....मैंने कहा था / क्या दोगे मुझे /...तुमने एक लरजता मोरपंख/ रख दिया मेरे होठों पर/ एक धूप बिखेर दी गालों पर /..एक स्पन्दन टाँक दिया वक्ष पर/ एक अर्थ बाँध दिया आँचल में /..तब से तुम्हें पुकार रही हूँ /..तुम कहीं नजर नहीं आते/... या कि हर कहीं नजर आते हो .”.

भाई को याद करते हुए लिखी ‘पतंग’ कविता बरबस ही आँखें सजल कर देती है—

“आज तुम नहीं /पर तुम्हारा स्पर्श हर कहीं है/ तुम्हारी खुशबू हवाओं में /.....तुम्हारी स्मृतियों की डोर आज भी मेरे हाथों में है /पर तुम्हारी पतंग /....कहीं दूर../ बहुत दूर निकल गई है भाई ..”

‘ताना-बाना’ का फलक बहुत व्यापक है .उसे कुछ शब्दों में नहीं समेटा जा सकता . उसमें यादें हैं फरियादें हैं , माँ का वात्सल्य है , बेटियों की उड़ानें हैं .शहीदों के लिये भावों के पुष्प हैं ,प्रेम की पीड़ा है , मुक्ति की प्रबल आकांक्षा है . ‘बहुत बिगड़ गई हूँ मैं’ और ‘पाप’ कविता में मुक्ति का सुखद अनुभव पाठकों को भी कुछ पलों के लिये जैसे मुक्त कर देता है . नारी के दमन शोषण की व्यथा-कथा के साथ उसे उठकर संघर्ष करने की प्रेरणा ‘तुम सुन रही हो ? और ‘सभ्य औरतें’ कविताओं में बोल नही रही , चीख रही है . ‘यूँ भी’ कविता अपने अस्तित्त्व को दबाने और उस पर पर प्रश्न लगाने वाली व्यवस्था को सिरे से नकारती है . गान्धारी के माध्यम से ऊषा जी ने व्यभिचारियों ,अत्याचारियों की माताओं को सही ललकारा है .

ऊषा जी की कल्पनाएं और बिम्ब मोहक हैं . कुछ उदाहरण देखें–-(1) “रात में /जुगनुओं को हाथ में लेकर /खुद को साथ लिये /..सात समुद्र तैर कर /धरती को पार कर / दूर चमकते मोती को/ मुट्ठी में बन्द कर लौटना .....”

(2) “सूरज को तकती/ सारे दिन महकती नीलकुँई/ साँझ ढले सूरज के वक्ष पर /...आँख मूँद सोगई ..”

(3) “तारों ने होठों पर /उँगली रख /हवा से कहा /धीरे बहो / उजली चादर ओढ़ अभी अभी/ सोई है सुकुमारी रात ..”

(4) “धूप –सुनहरी लटों को झटक/ पेड़ों से उछली/ खिड़की पर पंजे रख /सोफे पर कूदी /छन्न से पसर गई कार्पेट पर /...ऊधम नहीं ..मैं बरजती हूँ पर वह जीभ चिढ़ा खिलखिलाती है /..शैतान की नानी धूप ..”

(5) “थका-माँदा सूरज/ दिन ढले /टुकड़े टुकड़े /लहरों में डूब गया जब/ सब्र को पीते /सागर के होठ और भी नीले होगए .”

(6) “ हाथ में दिया लिये / जुगनू की सूरत में / गुपचुप / धरती पर आकर.../ किसे ढूँढ़ते हैं ये तारे  / मतवाले /”

ऊषा जी की स्वभावानुरूप ही भाषा कोमल और ताजगी भरी है . कहीं ‘नए नकोर प्रेम की डोर ‘ जैसे खूबसूरत प्रयोग भी हैं .

कुल मिलाकर ऊषा जी की यह पुस्तक अनूठी है . बार बार पढ़ने लायक . आधुनिक चित्रकला में हालांकि मेरी समझ कम है फिर भी इतना तो समझ सकी हूँ कि हर चित्र कविता का ही सुन्दर चित्रांकन हैं . हाँ एक बात विशेष रूप से कही जानी चाहिये कि पुस्तक का कलेवर बेहद खूबसूरत है . आवरण , पृष्ठ ,निर्दोष छपाई ..यह सब उत्कृष्ट है . जिसने कृति को अधिक सुन्दर और आकर्षक बना दिया  है . . शिवना प्रकाशन को इसके लिये बहुत बधाई . और ऊषा जी को तो क्या कहूँ . खुद को भगवान का गढ़ा हुआ डिफेक्टिव पीस कहने वाली डा. ऊषाकिरण को ईश्वर ने खूब तराशा है . बस यही कामना कि वे स्वस्थ रहें और सुन्दर कविताएं कहानियाँ लिखती रहें .

                                                                                     

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

बाली यात्रा---4

बाली यात्रा--3 से आगे

 'गरुड़, विष्णु कुन्चाना पार्क

और सेम्यीनाक बीच'

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चार दिन हरे भरे रिवर सोंग में नदी के मधुर गीत सुनने के बाद 11 अगस्त तक हम लोग समीनियक बीचके पास एक विला में रुके । यह बाली के दक्षिण पश्चिम में एक तटीय क्षेत्र है जो अपने सुदूर फैले मनोरम समुद्रतट , पैलेस ,बाजार तथा अन्य कई विशेषताओं के लिये जाना जाता है । विला रिवर सोंग जैसे मोहक वातावरण में तो नहीं था लेकिन काफी साफ सुन्दर और सुविधायुक्त था । दो भागों में तीन तीन कमरे थे । एक भाग में पत्नी बच्चों सहित मयंक शिवम् और सौरभ थे और दूसरे तीन कमरों में हम माताएं । यहाँ रहते हुए हमने बाली के कुछ और दर्शनीय स्थल देखे ।

गरुड़ विष्णु कुन्चाना पार्क

1-गरुड़ विष्णु कुंचाना पार्क ( kencana का उच्चारण कई जगह केनकाना और केंचना भी है इन्डोनेशियन भाषा में इसका अर्थ है सोना )     बाली की समृद्ध संस्कृति, कला और पौराणिक कथाओं का एक अद्भुत मिश्रण यह पार्क गरुड़ की शानदार प्रतिमा के लिये जाना जाता है जो 122 मीटर ऊँची है ।

यह चित्र गूगल से साभार

आकाश में उड़ान भरते हुए से गरुड़ और उसपर सवार भगवान् विष्णु को दोखकर एक पुलक और रोमांच का अनुभव होता है । यह समान आकार के 754 खण्डों (मॉड्यूल) से बनाई गई है जो अपने आप में विशेष है। दुनिया की ऊँची प्रतिमाओं में मान्य यह प्रतिमा बीस किमी दूर से भी दिखाई देती है । इसे देखे बिना बाली-दर्शन अधूरा है ।  

2-सरस्वती मन्दिर( pura taman kemuda sarswati) उबुद में स्थित सरस्वती मन्दिर जिसे वाटर पैलेस भी कहा जाता है । सुन्दर कमलों से भरे तालाब , फव्वारे और अत्यन्त आकर्षक और कलात्मक शिल्प वाला , कला की देवी सरस्वती को समर्पित यह मन्दिर इन्डोनेशिया का सबसे सुन्दर मन्दिर माना जाता है । 

सरस्वती मन्दिर का ही एक भाग
यहाँ भी अन्दर जाने से पहले टिकिट लेना और  एक सुनिश्चित परिधान पहनना होता है

सरस्वती मन्दिर
वहाँ पाँच पाण्डवों की बहुत ही सुन्दर प्रतिमाएं देखना एक आनन्दमय अनुभव था । उबुद पैलेस सरस्वती मन्दिर आदि स्थानों का कोई न कोई सम्बन्ध मार्कण्डेय ऋषि से रहा है यह कहीं पढ़ा है । इसीलिये बाली में पग पग पर आत्मीयता का अनुभव होता है ।3--उबुद पैलेसबाली की उत्कृष्ट वास्तुकला का शानदार उदाहरण है उबुद पैलेस । यह शाही परिवार का आधिकारिक निवास था । महल के पत्थरों की अद्भुत नक्काशी चकित करने वाली है । अगर पत्थर बोलते तो वैभव और संघर्ष की जाने कितनी रोचक कहानियाँ सुनाते । इतनी सुन्दर अनूठी नक्काशी के कलाकार को ('आई गुस्ती न्यूमन लेम्पाड' --1862 –1978) हदय से नमन है । 


उबुद पैलेस का मुख्य द्वार
यह पैलेस का आकर्षण ही था कि चिलचिलाती धूप में भी देखने की जिज्ञासा बनी हुई थी । वहाँ भी हमने कई फोटो लिये ।  

4-सेमिन्याक बीचबाली जाएं और बीच पर न जाएं ऐसा नहीं हो सकता । खासतौर पर जिन्हें लहरों की बाहों में झूलने का शौक हो । बीच पर जाने से पहले बाँस का बना एक बहुत ही सुन्दर दरवाजा और बाँस से ही बनी लम्बी गैलरी पार करनी होती है । वहाँ सामान देखा जाता है कि कोई प्लास्टिक का या अवांछनीय सामान तो नहीं है । समुद्र-तट को साफ सुथरा रखने के लिये यह बड़ी प्रेरक पहल है। बीच पर उतरने से पहले एक खुला क्लब , स्वीमिंग पूल और रेस्टोरेंट है जहाँ आराम कुर्सियों पर अर्धनग्न लेटे विदेशी पर्यटक , कनफोड़ शोर करते ड्रम के साथ पाश्चात्य संगीत और तली जा रही मछली की गन्ध आपका स्वागत करती है । मेरे जैसे लोगों के लिये एकमात्र यही अप्रिय अनुभव था लेकिन तट पर पहुँचते ही सारी क्लान्ति विलीन होगई । 

सागर की नीलिमा में सुनहरे सितारे टाँकती साँझ धीरे धीरे उतर रही थी । आसमान में चतुर्दशी का बड़ा सा चाँद भी झाँकने लगा तो लहरें जैसे उल्लास से भर गई । और तेजी से उमड़कर मानो वे चाँद को छूना चाहती हों । आसमान में रंगबिरंगी पतंगें लहरों की अधीरता पर मुस्कराती हुई लहरा रहीं थीं