गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

३१ दिसम्बर का उपहार


31 दिसम्बर 2010
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सन् 1985 जाते--जाते मयंक (सबसे छोटा बेटा) के रूप में एक उपहार हमें देगया था । मुझे याद आता है कि इसी तरह बुआ या जीजी घर से जब विदा होतीं थीं तो जाते-जाते हमारी हथेली पर रुपया-दो रुपया जरूर रखतीं थीं और वह राशि हमारे बड़ी यादगार और अनमोल हुआ करती थी ।
यों तो हर माँ को अपनी हर सन्तान विशिष्ट ही लगती है ।लेकिन मयंक की कई बातें हैं जो सचमुच विशिष्ट हैं ।वह बहुत छुटपन से ही रोना तो जैसे जानता ही नही था मानो ,मम्मी को कोई परेशानी न हो इसे वह जन्म से ही सीख आया था । जब वह दो ही साल का था चाक से आँगन में चित्र बनाता था, इतनी फुर्ती से कि देखने वाले चकित रह जाते थे ।
जब वह ढाई साल का था तभी वह उसने अक्षरों के बारे में अपने मौलिक अनुसन्धान (, कि र से स,य थ, श कैसे बन सकते हैं और ट से ही ठ,ड ढ द ह बनाए जा सकते हैं । च को उल्टा जोडो तो ज बनता है और प ष, म भ,घ ध में तो जरा सा ही अन्तर है ...आदि,) ने मुझे विस्मित कर दिया था । मैं हैरान थी कि इसने वर्णमाला कब , कैसे सीखली । सीख ही नही ली उसे इतनी सूक्ष्मता से समझ भी लिया ।
पहली कक्षा में उसने यह कविता भी लिख डाली थी ----

मेरे पास थी एक पतंग ।
चटक लाल था उसका रंग ।
फर्..फर्..फर्..फर् उडती थी ।
साथ हवा के चलती थी ।
पतंग में एक हाथी था ।
वह तो मेरा साथी था ।
जाने कहाँ वो चली गई ।
संग हवा के चली गई ।
मेरे पास थी एक पतंग।

बहुत अच्छा परिवेश व परवरिश न मिलने के कारण मयंक की प्रतिभा को निश्चित रूप से सही दिशा नही मिल पाई ।वह भी बेंगलुरु में ही इंजीनियर है । सब जानते हैं कि आज इंजीनियर बनना और किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी पाना युवाओं के लिये बड़ी बात नही रह गई है । फिर भी मयंक जहाँ भी है-----जो कुछ है उससे बेहतर चाहिये---का संकल्प उसके साथ है ।
इस समय वह बर्फवारी से घिरे न्यूयार्क शहर में है । पिछले साल जब वह न्यूजर्सी में था ,पहली बार वहाँ के वैभव ,बर्फीले सौन्दर्य और हडसन नदी के वैभव-विस्तार को देख उत्साहित होने के साथ उदास भी था ।बोला -मम्मी सब कुछ अच्छा है पर कमी यह है कि यह सब भारत में नही है । अपने देश , अपनी धरती के लिये उसके भाव-विचार मुझे आश्वस्त करते हैं ।
कल बातों-बातों में ही उसने कहा ---माँ , मुझमें ऐसी कोई बात ही कहाँ है जो मेरे लिये कुछ लिखा जाए । सच तो यह है कि वह सबसे छोटा व प्यारा होने के साथ कई बातों में इतना बड़ा व समझदार भी है कि जो भी लिखती हूँ प्रयोगवादी कविता के युग में भारतेन्दु-युग की रचना सा लगता है । उसके मना करने पर भी मैं केवल एक प्रसंग यहाँ दे रही हूँ जो बहुत छोटेपन में ही आगए उसके बड़ेपन को दर्शाता है ---- मयंक को एक दोस्त राहुल के साथ मेला जाना था । महीने का पहला सप्ताह होने के कारण भी और सबसे छोटे के लिये उदार भाव होने के कारण मैंने उसे पचास रुपए दिये ।कहा कि कुछ अच्छा खा-पीलेना । कुछ खरीदने लायक बजट था भी नही। शाम को जब लौटा तो उसके हाथ में गोर्की का उन्यास (माँ) था । मैने हैरान होकर इस खरीददारी का कारण पूछा तो उसने बताया कि पिछले साल आपने पैसे कम होने के कारण यह किताब लेते--लेते छोड़दी थी । इसलिये ....
पर यह तो 63 रुपए की है --मैंने कहा तो बोला कि तेरह रुपए राहुल से उधार ले लिये थे ।
पर बेटा ,पहले तो यह कि किताब खरीदना जरूरी नही था । किसी और दिन ले आते ।
माँ, रूसी किताबों की दुकान कल जाने वाली है । खाना -पीना तो फिर भी हो जाएगा ।
पर उधार केवल तेरह रुपए ही क्यों , ज्यादा ले लेता । यानी कि तुमने कुछ खाया पिया भी नही .यह बुरी बात है । मैंने पैसे इसलिये तो नही दिये थे ।
मेरी बात के उत्तर में उसने कहा --सॅारी मम्मा लेकिन , जब तक बहुत जरूरी न हो तब तक उधार नही लेना चाहिये न । फिर क्या कहती मैं ।
कुछ पंक्तियाँ मयंक के लिये---

सागर में लहर तू है
नदिया में भँवर तू है ।
ऊबी थकीं ---तिमिर से
आँखों को सहर तू है ।

खिल-खिल हँसी जो निकली
क्यों आँसुओं में बदली ।
तुझको पता नदी कब
किन घाटियों ने निगली ।
टकराने , जीत जाने की
पहली खबर तू है ।

सपनों के नीड छोड़े
रुख अँधेरे के मोड़े
बिखरे जो चिन्दियों में
संकल्प तूने जोड़े ।
पर्दों के पार देखे
वह तीखी नजर तू है ।

लगने लगा मुझे तो
छोटा दुआ का दामन
आकाश आ समाया
छोटे से अपने आँगन ।
है कही भी मरुस्थल
तो उसमें नहर तू है ।
असीम स्नेह व शुभ-कामनाओं के साथ
माँ

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

छोटे दिन---दो कविताएं

22 दिसम्बर वर्ष का सबसे छोटा दिन माना जाता है । यानी दस घंटे का दिन और चौदह घंटे की रात ।यों खान-पान पहनावा,स्वाद व स्वास्थ्य ,सभी तरह से अच्छी होने के बावजूद मुझे शीतऋतु जरा कम ही अच्छी लगती है । इसके पीछे कई कारणों में से एक यह भी है कि इस ऋतु में दिनों का वही हाल हुआ लगता है जो हाल सस्ते डिटर्जेन्ट की धुलाई से शिफॅान की साडी का हो जाता है । दिन की चादर को खींच कर रात आराम से पाँव पसार कर सोती है । सूरज जैसे अपनी जेब से बडी कंजूसी से एक-एक पल गिन-गिन कर देता है । यहाँ छोटे दिनों पर दो कविताएं हैं । दोनों ही कविताएं दस-बारह वर्ष पहले लिखी गईं । दूसरी कविता बाल--पाठकों के लिये लिखी गई है ।
(1)
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मँहगाई सी रातें
सीमित खातों जैसे दिन ।
हुए कुपोषण से ,
ये जर्जर गातों जैसे दिन ।

पहले चिट्ठी आती थीं
पढते थे हफ्तों तक
हुईं फोन पर अब तो
सीमित बातों जैसे दिन ।

वो भी दिन थे ,
जब हम मिल घंटों बतियाते थे
अब चलते--चलते होतीं
मुलाकातों जैसे दिन ।

अफसर बेटे के सपनों में
भूली भटकी सी ,क्षणिक जगी
बूढी माँ की
कुछ यादों जैसे दिन ।

भाभी के चौके में
जाने गए नही कबसे
ड्राइंगरूम तक सिमटे
रिश्ते--नातों जैसे दिन ।

बातों--बातों में ही
हाय गुजर जाते हैं क्यों
नई-नवेली दुल्हन की
मधु-रातों जैसे दिन ।

(2)
(बाल कविता)
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दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं
चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन

लम्बी और उबाऊ,
जटिल सवालों सी रातें
उछल-कूद और मौज-मजे की
छुट्टी जैसे दिन

जाने कब अखबार धूप का
सरकाते आँगन
जाने कब ओझल होजाते
हॅाकर जैसे दिन

जल्दी-जल्दी आउट होती
सुस्त टीम जैसे
या मुँह में रखते ही घुलती
आइसक्रीम से दिन

ढालानों से नीचे पाँव उतरते हैं जैसे
छोटे स्टेशन पर ट्रेन गुजरते जैसे दिन।

कहीं ठहर कर रहना
इनको रास नहीं आता
हाथ न आयें उड-उड जायें
तितली जैसे दिन ।

पूरब की डाली से
जैसे-तैसे उतरें भी
सन्ध्या की आहट से उडते
चिडिया जैसे दिन ।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

दो लघुकथाएं
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(1) --सन्दिग्ध
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देखो, ऐसा करना-----चलते--चलते कनक ने पत्नी को समझाया ----अगर मुझे ऑफिस में जरूरी काम न होता तो राजन जी को मैं खुद ही अटेण्ड करता । अब तुम्हें ही करना होगा इसलिये कुछ न हो तो पडौस से टीनू या बबलू को ही बुला लेना कुछ तो मदद मिलेगी ही । और फिर.....कहते-कहते कनक रुक गया ।और सोनिया का चेहरा देखने लगा जिस पर हैरानी के भाव थे ।
राजन सोनिया के भाई का दोस्त है और सोनिया का सहपाठी भी । यहाँ विभाग के किसी काम से आया है। कनक से अनायास ही भेंट होगई तो औपचारिकतावश घर आने को कहना ही पडा ।अब उसकी ट्रेन शाम सात बजे है। और कनक छह बजे से पहले नही लौट पाएगा । तब तक सोनिया को अकेले ही सब देखना होगा और फिर......कनक आगे कहते-कहते रुक गया ।
पर इतने छोटे बच्चे भला क्या मदद करेंगे ---सोनिया ने हैरानी से पति को देखा । वैसे भी कोई खास काम नही है । बाजार से कुछ लाना नही है । खाना बन ही चुका है । बस परोसना ही तो है । टीनू--बबलू को बुलाने की क्या जरूरत ।
जरूरत है-------कनक ने जोर देकर कहा--- हर बात को अपने हिसाब से मत देखा करो । तुम घर में अकेली हो और.......सोनिया , लोगों को बात बनाते देर नही लगती ।बच्चे रहेंगे तो..........।
सोनिया कनक के आशय को समझ कर आहत होगई । बोली-----कनक , राजन मेरे भाई जैसे हैं ।
पर भाई तो नही है न । कनक ने तपाक से कहा और बाहर निकल गया । सोनिया अवाक् सी पति को देखती रह गई

( 2 ) फर्क
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माँ ,विनीता को साकेतनगर जाना है ।
सुनील की बात सुनकर मेरे मन में हल्का सा विरोध जागा और साथ में कई सवाल भी । साकेतनगर यानी अपनी माँ के घर । पर क्यों ....आज ही तो सुबह दोनों पूना से आए हैं वह भी सिर्फ हफ्ताभर के लिये । अभी बैग, सूटकेस खुले तक नही हैं । इसके अलावा विनीता की माँ अभी कुछ दिन पहले ही महीनाभर पूना रह कर लौटी हैँ । मुझे तो फिर भी दोनों छह माह बाद मिल रहे हैं । वैसे भी मेरी अपनी कोई बेटी नही है । विनीता ही मेरी बहू भी है और बेटी भी । कबसे उसके आने का इन्तजार था । उसके आने से घर कैसा भरा-भरा लगरहा है ।पहले कितनी सारी बातें सोच रखी थी मैंने । दोनों को --क्या बना कर खिलाऊँगी । कहाँ-कहाँ चलेंगे । कितनी सारी बातें करेंगे । और भी कितना कुछ । पर यह क्या ..विनीता ने आते ही माँ के पास जाने की योजना बना ली । मुझे बताए बिना ही .....।
ये सारी बातें सोचते हुए मैंने स्नेह व कुछ अधिकार से कहा ---
बेटी अभी तो हम लोग ठीक से मिले बैठे भी नहीं हैं । साकेत नगरभी चली जाना । पहले मेरे साथ तो....
आपके साथ तो रहूँगी ही-----विनीता ने मेरी पूरी बात सुने बिना ही कुछ उदासी के साथ कहा-----पर मम्मी अकेली हैं । भाभी मायके चली गईं हैं ।...मम्मी की तबियत भी ठीक नही है । इसलिये मैं सोच रही थी कि ....।
बातें सहज-स्वाभाविक होते हुए भी मुझे झिंझोड गईँ ।मायके जाने के पीछे विनीता के तर्क नही , वह आत्मीयता व संवेदना प्रमुख थी जो एक बेटी की माँ के लिये होती है । ये सारी समस्याएं मेरी भी हो सकतीं थीं यदि विनीता मेरी बेटी होती । पहली बार मुझे बेटी की कमी खली । बहू और बेटी के इस फर्क को स्वीकार करते हुए मैंने विनीता के जाने को सहज रूप में ले लिया । मेरे पास और कोई चारा भी तो नही था ।