मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

पुरस्कार--महात्म्य (व्यंग्य)

आप अगर मुझसे पुरस्कार की परिभाषा लिखने को कहें तो वह कुछ इस तरह होगी--–"पुरस्कार लोहे को सोना बना देने वाला पारस है .किसी गुमनाम बस्ती में किसी मंत्री या सांसद का आगमन है .अँधेरी गली में लगा दिया गया बल्व है .अनावृष्टि में जूझती उम्मीदों के लिये एक बाल्टी पानी है. लेखन रूपी फसल के लिये खाद पानी है . पुरस्कार-विहीन लेखन बिना विज्ञापन के बेचा जा रहा प्रॉडक्ट है , बिना लाउडस्पीकर के किसी कोने में गुनगुनाया गया गीत है ,बिना बैंडबाजे की बरात है , अरण्य रोदन है . जंगल में नाचता हुआ मोर है .कारों के बीच रेंगता साइकिल सवार है . भरे वसन्त में फूल पत्र विहीन खड़ा पेड़ है .मंच पर बिना हाव ,भाव और सुर ताल के सुनाई गई कविता है ...वगैरा वगैरा

मंच से याद आया कि मंच पर श्रोताओं का ध्यान ,सम्मान मिलना भी किसी पुरस्कार से कम नहीं है . श्रोताओं को बाँधे रखना और उनसे तालियाँ बजवा लेना कोई हंसी खेल नहीं है .उसके लिये बड़ा अभ्यास और लगन चाहिये . कविता (कहीं से चुराई भी चलेगी) किसी मंत्र की तरह सिद्ध हो ,आवाज में सुर और बुलन्दी हो .श्रोताओं की आँखों में झाँककर अपनी बात इस विश्वास के साथ सकने का कौशल हो कि श्रोता वाह वाह कहने , तालियाँ बजाने विवश होजाय ..भाई साहब वह है मंच पर काव्यपाठ . .डायरी या मोबाइल लेकर पढ़ने वाले तो जैसे आते हैं , चले जाते हैं . इसके लिये माइक से गहरा मोह और अभिनय , सुर लय का ध्यान भी बहुत काम आता है . मंच पर कविता पढ़कर लोकप्रियता की चाह रखने वाले बन्धु ,भगिनी इन सूत्रों को अवश्य अपनाएं . उल्लेखनीय है कि मंच पर जमने वाले कवि साथी कवियों के समय की चिन्ता जूतों /चप्पलों के साथ ही छोड़ आते हैं . फिर चाहे वे कुढ़ते हुए उसकी तुलना अपने चिपकू पड़ोसी से करते रहें .
ध्यान रहे कि जो लोग मंचीय कविता को कमतर नज़रों से देखते हैं वे हीनता के यानी एहसासे कमतरी के शिकार होते हैं . सच्ची .
मंच हो या साहित्यिक पुरस्कार , दोनों का ही पहला लाभ तो यह कि जो लोग सोशल मीडिया पर आपके नाम को देख नाक सिकोड़कर निकल जाते थे वे अचानक आपके घनिष्ठ बन जाते हैं . नाकुछ शब्दों में बहुत कुछ खोजकर निकाल लेते हैं .निरर्थक से वाक्य या ,एक सादा सी सेल्फी पर ही बलिहारी जाते हैं .कमेंट्स की बौछार कर देते हैं .रचनाओं पर भली सी समीक्षाएं लिखकर निकटता जताते हैं मन न हो तब भी आपकी मामूली सी बात को लाइक करते हैं . 
सबसे बड़ी बात यह कि पुरस्कार में दाम के साथ नाम भी मिलता है . नाम की बड़ी महिमा है. कवियों ने ,“राम से बड़ा राम का नाम…” कहा है . दुनिया नाम के लिये ही मरती है . दुनियाभर में सत्ता और धन के अलावा जिस चीज के लिये भागदौड़, आपाधापी ,खींचतान , नोंच-खसोट और मारकाट मची है , वह  नाम ही है . आज नाम में क्या रखा है ..” ,कहने वाला शख्स ज़िन्दा होता तो खुद के लिखे पर ही बहुत पछता रहा होता . सभी प्रबुद्धजन से माफी माँग रहा होता खैर..
अरे नाम से याद आया, नामी लोगों का सम्पादक के साथ भी एक आत्मीय रिश्ता बन जाता है . सम्पादक उनकी मामूली रचनाओं को भी सिर माथे लेकर छापते हैं .जानते हैं .पूरी पत्रिका में एक दो रचनाएं ऐसे ही पड़ी रहें पत्रिका की सेहत पर भला क्या असर होने वाला है .वैसे भी छोटी बड़ी हर पत्रिका में कुछ रचनाएं फालतू होती ही हैं ,ज़ाहिर है कि वे उनके कुछ पालतू रचनाकारों की होती हैं .
असल में सम्पादक वर्ग ऐसी प्रजाति है जो विधाता की तरह रचनाकार के पालक और संहारक दोनों का दायित्त्व निभाता है. राई को पर्वत और पर्वत धूल कर देने वाली क्षमता . न छापनी हो तो ठीक ठाक रचना को भी खेद सहित लौटादे .भले ही रचना बूमरेंग की तरह लौटकर रचनाकार को घायल करदे उन्हें क्या . जानते हैं कि प्रकाशन के बिना लेखन दो कौड़ी का भी नहीं . छपने और लिखने में परस्पर जन्मजन्मान्तर का सम्बन्ध है .सभी छपने के लिये ही लिखते हैं ..
अब भैये , इसमें तो कोई शक सुबहा नहीं हैं कि हमारे यहाँ नाम और पद पूजा जाता है ,काम नहीं . सरकारी कार्यालयों में एक गुणी अनुभवी कर्मचारी ,पिछवाड़े लगी सीढ़ी से ऊपर चढ़ आए अपने नौसिखिया अधिकारी की लानत मलामत सहकर भी हाथ जोड़े रहता है और उसके सामने खुद को अनुभवहीन स्वीकारता रहता है . इससे अच्छा हो कि हाथ जोड़ने की बजाय वह उससे भी ऊपरवाली सीढ़ी तलाश ले .बुद्धिमान लोग लेखन शुरु करने से पहले सीढ़ी तलाश लेते हैं . उन्ही को देखकर द्विवेदी जी के कंठ से फूट पड़ा होगा , “कोशिश करने वालों की हार नहीं होती …”
तो भाई साहब पुरस्कार की महिमा अनन्त है अशेष है .नित्य है ,सत्य है . जैसे आयोजकों ने उनको पुरस्कार दिये , वैसे ही आपको भी मिलते रहों .

 

गुरुवार, 21 मार्च 2024

जब कविता बन जाती है

 कुछ ही पल ऐसे होते हैं सखि

जब कविता बन जाती है ।

 

अन्तर-वीणा पर पीडा ,

जब कोई राग बजाती है

विद्रूपों की ज्वाला जब-जब भी ,

मन विदग्ध कर जाती है

जब साँस-साँस से आहों की

बारात निकलती जाती है

अलि तब कविता बन जाती है ।

 

अन्तर आलोडन हो होकर

जब एक उबाल उमडता है

अधरों का पथ अवरुद्ध जान

भीषण भूकम्प मचलता है

घातों-प्रतिघातों से छिल-छिल कर

गलती कोमल छाती है

सखि तब कविता बन जाती है ।

 

जब हृदय प्रतीक्षाकुल व्याकुल

नैराश्य जलधि में बुझता है ।

देहरी पर जलते दीपक का

स्नेह भी चुकता है ।

स्मृतियाँ तीखे दंश चुभा

उर को उन्मत्त बनाती हैं

सखि तब कविता बन जाती है ।

 

खायी हो चोट कभी गहरी

अपने हो ,कहने वालों से .

मिलते पीछे से वार दुसह ,

अन्तर में रहने वालों से .

जब चूर चूर होकर आशाएं

पग पग ठोकर खाती हैं .

सखि तब कविता बन जाती है .

 

जब हृदय प्रतीक्षाकुल पल पल

नैराश्य जलधि में बुझता है .

जब अन्धकार से लड़ते दीपक का

स्नेह भी चुकता है .

जब यादें तीखे शूल चुभा

उर को उन्मत्त बनाती हैं ,

सखि तब कविता बन जाती है .

 

आतप से तप्त तृषित धरती

कण कण विदग्ध होजाता है .

जब श्याम सघन मेघों का मेला

अम्बर में लग जाता है .

शीतल बौछारों से गद्गद्

जब सृष्टि हरी होजाती है

सखि तब कविता बन जाती है .

 

नूतन किसलय के सम्पुट में

कोमलता कम्पन करती है

शाखाओं की खाली झोली

पल्लव पुष्पों से भरती है .

मधुऋतु रसाल को मंजरियों के

हार स्वयं पहनाती है .

सखि तब कविता बन जाती है .

 

निस्सीम गगन के अगम पन्थ में

अणु सा हृदय भटकता है .

अद्भुत कौशल कण कण का

जब मन में विस्मय भरता है .

जिज्ञासाएं जब उस असीम की

जब जब थाह लगाती है

सखि तब कविता बन जाती है 

बुधवार, 20 मार्च 2024

दो पाटों के बीच


ओ माँ ..आज तो बहुत थक गई .

अंकिता ने आते ही बैग एक तरफ रखा और सोफा पर ही पसर गई .

विमला ने एक ममत्त्व भरी निगाह से बहू को देखा ,पानी का गिलास ले आई और चाय चढ़ाने लगी . यह रोज की बात है अंकिता ऑफिस से आकर यही कहती है . विमला हैरान होती है .वातानुकूलित टैक्सी में आना-जाना . वातानुकूलित कक्ष में ही शानदार कुर्सी पर बैठकर काम करना . ( एक बार अंकिता अपने ऑफिस के वार्षिकोत्सव में विमला को भी लेगई थी ) घर में भी कोई तनाव नही .न व्यवहार का न विचारों का .कामों में पीयूष बराबर हाथ बँटाता है . जब से वह आई है अंकिता को न किचन की चिन्ता करनी पड़ती है न पीहू की .

अभी इस उम्र में इतनी थकान तो नहीं होनी चाहिये. एक बार डाक्टर को दिखालो .”---.विमला ने अपने आशय को कुछ बदलकर प्रकट किया .

थकान काम और भागदौड़ से है माँजी ! आपने अभी यहाँ का ट्रैफिक नहीं देखा ..फिर ऑफिस में क्या कम काम है ..डाक्टर के पास जाओ तो कहता है आराम करो ..अब आराम से तो काम नहीं चलता ना !.

विमला को याद आता है कि किस तरह दिनभर साँस लेने की फुरसत नहीं मिलती थी . घर में सास जी सहित छह लोग थे . सबका नाश्ता खाना बनाकर नौ बजे स्कूल के लिये निकल जाती थी बस से आधा घंटा लगता था और मुख्य सड़क से स्कूल तक पैदल पन्द्रह मिनट ..शाम को पाँच बजे तक लौटती थी तब चाय के बहाने पल दो पल बैठने मिल जाते थे और फिर वहीं रोज के काम . रात नौ-दस बजे जाकर फुरसत मिलती थी . उसका नौकरी करना एक आवश्यकता थी . पीयूष के पिता का कोई निश्चित रोजगार नहीं था .उसकी सर्विस ही परिवार के लिये नियमित आय का एमात्र जरिया थी . आराम करने का न तो समय था, न ही छूट . पर ऐसा व्यक्त करना भी जैसे गुनाह था .

"ज्यादा परेशानी है तो छोड़दो नौकरी ...घर बैठो ."पीयूष के पिता कह देते .

अंकिता के लिये नौकरी आवश्यक नहीं ,आत्मनिर्भर होने के एहसास के लिये है .(चाहें तो पीयूष के शानदार पैकेज में बहुत आराम के साथ जीवन निर्वाह हो सकता है) . वह भी कितने आराम से ...बिस्तर छोड़ने से लेकर ऑफिस जाने तक ,चाय के साथ न्यूज देखने और खुद की तैयारी के अलावा कोई काम नहीं होता अंकिता के लिये . सफाई और खाना बनाने वाली सहायिकाओं को जरूरी निर्देश देना ..चीजों को व्यवस्थित करना ,वाशिंग मशीन से कपड़े निकालकर फैलाना ..नीटू को तैयारकर खिला पिला ..प्लेग्रुप में छोड़कर आना और वहाँ से लेकर आना ..बिग बास्केट से आए सामान को यथास्थान रखना आदि सारे काम खुद विमला ने सम्हाल लिये हैं . फिर भी जाते समय हमेशा बहुत हड़बड़ाहट रहती है . कभी मैच की चुन्नी नहीं मिलती तो कभी सलवार .. कभी कंघा गायब तो कभी एक चप्पल . इन सबकी तलाश में पूरा कमरा अस्तव्यस्त हो जाता है . अलमारी को सारे कपड़े उल्टे पुल्टे . ऐन वक्त पर वह घड़ी देखती है –अरे बाप रे ..और फिर तूफान आ जाता है जैसे उसके लेट होने में उसका नहीं टीवी , अखबार , और घड़ी का दोष है .

चाय पीकर अंकिता ने कप वहीं छोड़ा और कमरे में जाकर पीहू के साथ लेट गई . विमला फ्रिज़ में से सब्जियाँ निकालने लगी . रजनी आती होगी . आते ही पूछेगी क्या बनाना है अम्मा . विमला खड़ी होकर सब्जी या अन्य चीजें बनवाती है .वह कम से कम जब तक यहाँ है बेटा को उसकी मनपसन्द चीजें बनवाती रहे .

"मम्मी ,अंकू कहाँ है ?"-–पीयूष ने दरवाजे के अन्दर पाँव रखते ही पूछा .

"आगया बेटा ! अंकू अपने कमरे में है . शायद आराम कर रही है ."

पीयूष ने देखा अंकिता सिर पर पट्टी लपेटे है . घबराए स्वर में पूछा –"क्या हुआ ?

"थोड़ा सिर भारी है ..पीहू अलग परेशान कर रही है ."

"पीहू को मम्मी के पास छोड़ दो ना ! मम्मी !"--–कुछ उत्तेजना के लहजे में पीयूष ने माँ को पुकारा—

"मम्मी कौनसे काम लेकर बैठी हो ?"

"थोड़े से लड्डू बना लूँ तुम लोगों के लिये ..उसी की तैयारी कर रही हूँ .दिन में तो पीहू मेरे पास..."

"अरे वह सब छोड़ो ...जरा पीहू को देखलो .."

विमला पोती को खिलाते हुए सोच रही थी कि उसके काम का महत्त्व न तब था न अब ..

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

उसकी बात


 खाली पड़े गमले में

अनायास ही उग आए थे

घासपूस जैसे छोटे छोटे पौधे  

अनजाने , अनचाहे .

उखाड़ फेंकना था

हटानी थी खरपतवार

गेंदा ,डहेलिया जैसे फूलों के लिये..

तैयार करना था गमला

एक पौधे के पत्ते लहलहाए ,

मुझे मत निकालो अभी रहने दो .

जो बात है , उसे कहने दो .

मैंने उसे रहने दिया

मुझे सुननी थी उसकी बात .  

आज आँखें खिल उठीं  

देखकर कि वह पौधा मुस्करा रहा है

एक सुन्दर गुलाबी फूल की सूरत में .

जिजीविषा और आत्मविश्वास से भरपूर

मानो कह रहा है ,

मैं खरपतवार नहीं हूँ .

कोई नहीं होता खरपतवार

नितान्त निजी है वह विचार

मापदण्ड हैं उसकी

उपयोगिता ,अनुपयोगिता .

स्थान ,भाव-बोध और सौन्दर्यप्रियता के .

मुझे देखकर भी तो कोई खुश होसकता है

जैसे तुम खुश होते , होना चाहते थे

डहेलिया या गेंदा के फूल देखकर .

अहा ,मैं तो अब भी खुश ..., बहुत खुश हूँ

तुम्हें देखकर यकीनन .”

अनायास ही कह उठा मेरा मन .

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

पहली रचना (पुरानी डायरी से )

 अभी तक मुझे याद था कि पहली रचना मेरा पहला गीत –--"काँटों को अपनालूँ मैं या मृदु कलियों से प्यार करूँ ..है जो किसी तरह नष्ट होने से बच गया था लेकिन एक बहुत पुरानी डायरी पलटते हुए एक रचना मिली जिसके साथ लिखा है कि यह ग्यारहवीं कक्षा में (सत्र1974-75) अगस्त सितम्बर माह में लिखी थी .यह मुझे याद थी लेकिन कई कहानियों व एक उपन्यास की तरह नष्ट होगई जानकर शान्त थी लेकिन डायरी पलटते हुए अनगढ़ सपाट और बचकानी सी इस रचना को पाकर हृदय पुलक से भर गया .डायरी में शायद कभी उस कॉपी से उतार ली होगी, जो जर्जर हो चुकी थी .किशोरावस्था में लिखी गई यह पहली रचना संभवतः सेनापति के ऋतुवर्णन से प्रेरित होकर लिखी गई होगी जो उन दिनों पाठ्यक्रम में था .भाषा पर पंचवटी का प्रभाव रहा होगा ( ध्रुवगाथा पर भी ) क्योंकि पढ़ने के नाम पर केवल पाठ्यक्रम की पुस्तकें ही रही हैं मेरे पास .यहाँ तक कि स्नातकोत्तर परीक्षा पास करने तक भी मैंने केवल पाठ्यक्रम की पुस्तकें ही पढ़ी हैं .डायरी में कविता शरद् वर्णन तक ही है . संभव है कि और दो ऋतुओं पर भी हो और मैं उतार नहीं पाई होऊँ क्योंकि अ्न्त में शिशिर लिखकर छोड़ दिया गया है ..कुछ याद नहीं पर पैंतालीस वर्ष पूर्व लिखी यह रचना यह तो बताती है कि सही राह दिशा मिली होती तो मैं शायद कुछ और अच्छा कर पाती .यह भी कि मैंने अपनी क्षमताओं का सही उपयोग नहीं किया .कुछ परिस्थितियाँ , कुछ आलस्य और कुछ सही दिशा ,परिवेश व प्रेरणा का अभाव ..कारण जो भी हो पर मैंने निश्चित ही बहुत सारा महत्त्वपूर्ण समय व्यर्थ चिन्तन व विषमताओं से मानसिक पलायन करते गुजार दिया .खैर...

अपने गाँव से मुझे बहुत लगाव रहा है . नदी खेत आम के कुंज सब मेरी यादों में मिठास की तरह हैं . मेरी कॉपी किसी के हाथ लग गई थी . इसलिये इस कविता के लिये मुझे खूब सुनना पड़ा था कि “ यह बेचारी तो स्वर्ग छोड़कर नरक (ससुराल) में आई है .  

------------------------------------

मेरा गाँव,मेरा स्वर्ग

---------------------------

चिड़ियों के मीठे कलरव में स्वर्ग सदृश यह मेरा गाँव

त्रिविध पवन से रँगी मनोहर अमराई की सीतल छाँव

धरती नाचे झूम झूमकर बनी मनोहर मधुर छटा

जैसे नाचे मोर दिवाना देख निराली श्याम घटा .

सुर भी सुनने उत्सुक रहते उसे सुनाऊँ तुमको आज

हर ऋतु प्रेम-विभोर मगन हो करती कैसे अनुपम राज .

(1)

वसन्त ऋतु

अलकापुरी लजाती मन में जब करता मधुमास विहार

देख निराली अमराई को माने नन्दन वन भी हार .

खुशियाँ मुस्काती प्रमुदित हो रूप वरुणकर सुमनों का

जैसे कोई मोहक और निराला दृश्य कोई हो सपनों का .

प्रेम प्रसून हुआ जाता है नवस्फूर्ति गन्ध भरती

प्रमुदित मन भंवरे की गुनगुन कानों में मधुरस भरती .

ऋतुरानी अँगड़ाई लेती वन—उपवन हँसकर आती

पुष्प लदे तरु और लताओं की छबि सबको अति भाती .

सरुवर सरसिज ने उसके मुख की ही छबि मानो पाई

ऋतुरानी की सुन्दरता को देख बहारें मुस्काईं .

रवि का स्वागत खिलकर करते मधुर मनोहर पु,प जहाँ

भ्रमर दीवाने उसे सुनाते रानी का गुणगान वहाँ .

धरती नया रूप लेती ऋतुराज का चुम्बन पाते ही

हर दिशा नवेली दुल्हन सी लगती वसन्त के आते ही .

(2)

जब जब दिवा रुष्ट होकर पावक सी किरण बिछाता है

हर पंथी पंछी वृक्षों से शीतल छाया पाता है .

घनी मनोहर अमराई को देख अंशु रुक जाती हैं .

मोहित गर्मी कामचोर बन छाया में रम जाती है .

देख थकी सी उन किरणों को हवा और चंचल होती .

विजय भाव से शीतल बनकर हर प्राणी को सुख देती

सर सरिता और निर्झर भी कब ग्रीष्मकाल से डरते हैं

बाग-बगीचे कूल-किनारे तनमन शीतल करते हैं.

अल्प प्रभाव छोड़ पाती ऋतु , प्रकृति बनी ऐसी अनुकूल

लू के झौंके भी कुंजों में प्रकृति छोड़ देते प्रतिकूल .

(3)

वर्षा

केश बिखेरे वर्षा रमणी बड़ी करुण होजाती है

विरहाग्नि में जल जलकर ही नयना नीर बहाती है

विगलित अन्तर लेकर ही सर्वत्र देखती फिरती है .

प्रिय की यादों में रो रोकर गंगा जमुना भरती है .

केशराशि फैलाती है तो जग तममय होजाता है

सुन्दर हार सुनहरा उसका कभी दीप्ति कर जाता है

विरहजनित उसका क्रन्दन हर अन्तर को दहलाता है.

कहाँ गया है इसका प्रियतम क्यों न लौटकर आता है

दुख भी होता है अनुभव कर विरह-प्रकोप गहन इसका

अश्रु वृष्टि भी बन जाता मोहक खेल रात दिन का .

दादुर मोर पपीहा उसकी विरह व्यथा ही गाते है

फिर भी मोहक से लगते यवे वर्षा के दिन आते हैं .

(4)

शरद्

शशि का निर्मल रूप देखकर मधुर बहारें आतीं हैं

निखरे नीलाम्बर में परियाँ मंगल गान सुनाती हैं

नीलगगन में चाँद रुपहला शीतल अमिय पिलाता है .

नीले ही सरुवर झीलों में सरसिज श्वेत रिझाता है

कल कल छल छल बहते नदियाँ—नाले सब निर्मल होजाते है .

तट पर बगुले जमे झील में हंस श्वेत  मुस्काते हैं .

धरती धानी चूनर ओढ़े बड़ी सुहानी लगती है

मत्त गयंद मृगों की टोली सबका स्वागत करती है .

शरद् ऋतु पर आई जवानी जलथल में रँग लाई है

किसकी ढलती उम्र कास के फूलों में लहराई है .

बादल नभ में नैया जल में सुन्दर महल बनाती है

शरद् ऋतु की रानी इनमें सपने नए सजाती है .

(5)

शिशिर .

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

परदा

 आवरण या परदा अच्छा नहीं होता

पड़ा हो अगर आँखों पर .

या किसी भी तथ्य पर .

 

परदा नही होता अच्छा बेशक

जब दीवार बनता है 

दृष्टि और दृश्य के बीच

असत्य और सत्य के बीच

बहुत अखरता है आवरण 

जब मधुर वाणी और सभ्य आचरण में

छुपे रहते हैं

हृदय में जमे कुविचार

देते हैं धोखा .

तुलसी देखि सुवेष

भूलहि मूढ़ न चतुर नर.

कहा है महाकवि ने भी तो .

 

लेकिन परदा होता है अच्छा भी ,

अगर छुपाता है किसी के घर की

झरती दीवारें ,उखड़ा हुआ फर्श

अर्श टूटा या चटका हुआ .

 

परदा अच्छा है

अगर काम आता हो छुपाने के 

किसी अपने की बेवशी और कमजोरी .

गुन प्रकटहि अवगुनहि दुरावा

कहा है महाकवि तुलसी ने भी

सच्चे मित्र के लिये .

 

परदा अच्छा ही है

पड़ा हुआ ऐसे अतीत पर

जिसका सामने आना

नहीं हो कतई जरूरी .

कई बार जरूरी हो जाता है

परदा डालना सच पर .

सबके हित .

देह भी एक सच है

पर कितना जरूरी है

उसका होना आवरण में .

 

परदा होता है जब

प्रतीक मर्यादा व लज्जा का ,

अच्छा होता है .

परदा चाहे साड़ी या चुन्नी का हो

या हो फिर परदा आँखों का .

न कि आंखों पर .

 

परदा आवश्यक भी है

अनावश्यक भी

बाधा भी है और सहायक भी   

यह निर्भर है 

उसके उपयोग और उद्देश्य पर .