Tuesday, September 4, 2012

'वह सबक'----माँ का एक अविस्मरणीय संस्मरण

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"उन दिनों स्कूल लगभग आठ घंटे लगता था । सुबह से दोपहर और फिर तीन से चार घंटे शाम को "---एक दिन मेरे आग्रह पर माँ ने जब अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताया तो बचपन जैसे उनकी आँखों में साकार हो उठा ।
"यह सन् 1946-47 के आसपासकी बात है । तब मध्यप्रदेश को मध्यभारत कहा जाता था । ग्वालियर में सिन्धिया जी का राज था । गाँवों की व्यवस्था जमींदारों के हाथों में थीं ।"
"हमारे गुरुजी पं. छोटेलाल जी थे । पाँच या दस रुपए वेतन मिलता था । कच्ची ,लेकिन लिपी-पुती और एकदम साफ-सुथरी खपरैल( पाटौर) हमारी पाठशाला थी जिसकी दीवारों पर खुद गुरुजी ने ही रंगों से वर्णमाला ,पक्षी फूल फल और पशुओं को अंकित किया था । दिशाओं की सही जानकारी के लिये चारों दीवारों पर दिशाओं के हिसाब से बडे अक्षरों में पूरब,पश्चिम,उत्तर व दक्षिण लिख दिया गया था । वैसे वे दिशाओं ज्ञान एक बडे आसान तरीके से कराते थे कि सुबह के समय जब हमारा मुख सूरज की ओर होता है तब पीठ पश्चिम की तरफ ,बाँया हाथ उत्तर में और दाँया हाथ दक्षिण की ओर होता है । शाम को ठीक इसके विपरीत होता है यानी मुख पश्चिम की ओर तो पीठ पूरब की ओर...।
झकाझक सफेद कमीज और धोती पहने ,माथे पर रोली का तिलक लगा ,पैरों में खडाऊँ डाले जब पंडित जी शाला में आते थे तो हम सब उनके सम्मान में एक साथ खडे होजाते थे मानो इतनी देर से केवल खडे होने के लिये ही बैठे थे । लगभग पन्द्रह मिनट ईश-विनय होती और फिर सबके ,कपडों ,बालों दाँतों व नाखूनों का निरीक्षण करते थे । वैसे तो गुरुजी हमारे साथ जमीन पर ही बैठ कर बडे प्रेम से हर चीज समझाते थे लेकिन निर्देश के अनुसार काम न मिलने पर सजा के लिये उनके पास पतली हरी संटी भी रहती थी जो हथेली पर पडने से पहले ही सांय की आवाज से दहशत भर देती थी और इसमें सन्देह नही कि वह दहशत काम पूरा करने में सहायक ही होती थी ।
इसके बाद सबकी पट्टियों व सुलेख की जाँच होती थी । उस समय स्लेट भी नही थी । काठ की बडी-बडी पट्टियाँ ही स्लेट का काम देतीं तीं जिन्हें कालिख से पोत कर काँच से घिस-घिसकर चमकाना भी एक जरूरी काम था । सरकंडे से खुद अपनी कलम बनानी होती थी । गुरुजी पहले ही सिखा देते थे कि बडे अक्षरों के लिये नोंक कितनी चौडी हो और छोटे अक्षरों के लिये कितनी पतली । खडिया के घोल में कलम डुबाकर पट्टी पर सफाई व सुघडता से लिखना होता था वरना गुरूजी की संटी को सक्रिय होने में देर नही लगती थी । साफ सुन्दर और शुद्ध लेखन तब पढाई की पहली की पहली शर्त हुआ करता था ।
सुबह के चार घंटों में केवल हिन्दी, व सामाजिक अध्ययन पढाया जाता था । हिन्दी में व्यंजनों व मात्राओं के उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता था । 'श' की जगह 'स' या व'' की जगह 'ब' जैसी गलतियों को वे बिल्कुल बर्दाश्त नही करते थे । मात्राओं के उच्चारण में वे हमारी ही नही अपनी भी दम निकाल लेते थे । 'क' पर 'आ' की मात्रा लगाने पर वे पूरा मुँह खोलकर बुलवाते--"-काssss" । फिर 'इ' की मात्रा पर झटके से रुकते --'कि' । फिर 'ई' की मात्रा पर वही लम्बा स्वर होता --"कीssss" । और इस तरह मात्राओं के गलत होने का सवाल ही नही था । इतिहास को वे कहानी की सुनाते थे और भूगोल को नक्शों, माडलों से या बाहर नदी और मैदान में जाकर, पहाड दिखाकर पढाते थे । ग्राफ द्वारा वे भारत का नक्शा इतनी अच्छी तरह बनवाते थे कि न तो कच्छ की खाडी में कोई गलती होती न ही पूर्वांचल की सीमाओं में । अन्त में वे इबारत लिखवाते या कोई व्यावहारिक कार्य करवाते जैसे तकली चलाना ,नारियल के खोखले के टुकडों को घिस कर  बटन बनाना या गीली मिट्टी से फलों व सब्जियों के माडल व कौडियाँ बनाना । सुबह की पाली दोपहर खत्म होजाती थी ।
"और फिर दूसरी पाली ?"-- ऐसी निराली पाठशाला के बारे में और भी जानने की मेरी उत्कण्ठा बढ गई तो माँ भी दुगने उत्साह से बताने लगीं---"दूसरी पाली ढाई-तीन बजे शुरु होजाती थी । बीच में मिले विराम में पंडितजी खाना बनाते--खाते और हम जुट जाते अपनी पट्टियाँ चमकाने में । शाम की पाली होती थी गणित व खेलों की । गिनती ,पहाडे, पाव ,पौना ,ड्यौढा सब कण्ठस्थ करने होते थे और बेसिक सवाल (जोड बाकी,गुणा,भाग )मौखिक ही अधिक होते थे जैसे कि 'सत्रह में क्या जोडें कि पच्चीस होजाएं ?'या कि 'तीन किताबें चौबीस रुपए की तो पाँच किताबों का मूल्य क्या होगा ?' केवल बडे और कठिन सवाल ही स्लेट या कापी में करने होते थे ।
पी.टी. करवाते समय जब वो कडक आवाज में सावधान कहते तो लगता कि एक पखेरुओं का झुण्ड साथ पंख फडफडाकर उडने तैयार हो । खेलों में खो,खो कबड्डी ,रूमालझपट,कोडामार और कुक्कुट युद्ध जैसे अनेक खेल होते थे । शाम पाँच बजे छुट्टी मिल जाती थी । पंडितजी दिशा-मैदान चले जाते और हम पूरी तरह आजाद ।
रात में भी दो घंटे पंडित जी की पाठशाला चलती थी । तब वे लोग पढते थे जो खेती के कामकाज या गाय-भैंसचराने के कारण दिन में नही पढ पाते थे । पंडितजी को प्रसिद्धि की आवश्यकता नही थी वे अपने काम को पूजा मानते थे इसलिये पूरी लगन व ईमानदारी से करते थे । तभी तो आज भी उनका नाम है । ...और कुछ लोग तो...माँ कुछ रुकीं और मुस्करा कर बहत्तर वर्षीय देवीराम को देखा जो अचानक हमारे वार्तालाप को सुनकर आ खडे हुए थे । वे माँ के सहपाठी रहे थे । उन्हें देखकर माँ पुलक के साथ बोलीं---"-हाँ मैं कह रही थी कि उनके कुछ शिष्य तो आज भी उनके नाम से थरथराते हैं । क्यों देवी भैया !"
देवीराम आदर ,लज्जा व बचपन की यादों की मिठास से भर उठे । माँ कहने लगीं---"देवी भैया कक्षा के सबसे फिसड्डी छात्र थे । इन्हें कई बार समझाने पर भी कुछ याद नही होता था । कभी सबक पूरा करके नही लाते थे । बस कभी 'पंडी इक्की जाऊँ ?'तो कभी 'दुक्की जाऊँ' रटते रहते थे । ( इक्की, दुक्की का प्रयोग क्रमशः पेशाब जाने व शौच जाने के लिये होता था ) इतना कहते कहते माँ की हँसी फूट पडी । मैंने देखा उनके चेहरे की झुर्रियाँ कहीं गायब होगईं हैं ।
"तब सबक याद न करने पर तुम्हारी कितनी पिटाई होती थी भैया । याद है ?"
"सब याद है, बाईसाब ,सब याद है ।"-- देवीराम जैसे किसी स्वप्न संसार की सैर कर रहे थे----"वे क्या दिन थे ! अब कहाँ वैसी पढाई और कहाँ वैसा सनेह ! वह तो मार भी अच्छी थी । उसी मार के कारण मुझ जैसा निखट्टू भी उँगलियों पर हिसाब करना सीख गया था । और सारे सबक तो मुझे ऐसे रट गए कि आज तक नही भूला । आज भी पूरा याद है । "
"कौनसे सबक ?"---मेरी जिज्ञासा जागी ।
"अरे हाँ पुस्तक के पाठ, इबारत और कठिन शब्द लिखते-पढते हम सबको याद भी होजाते थे । केवल देवीराम भैया को ही याद नही होते थे । पर एक दिन इन्होंने सारे सबक एक साथ गुरूजी को सुना दिये तब हँसते-हँसते उन्होंने इनकी पीठ खूब ठोकी थी और एक दुअन्नी इनाम भी दी थी । तो फिर आज वह सारा कंठस्थ सबक सुना ही दो भैया ।"--माँ ने आग्रह किया । मैंने माँ की बात एक बार और दोहराई । तब बहत्तर साल के देवीराम ने बारह साल के छात्र की तरह सावधान मुद्रा में खडे होकर वह सबक सुनाया--- तीन अच्छरों के शब्द जैसे बतख, महल,नगर...चार अक्षर के शब्द जैसे खटमल, अजगर, ...माला-काला, पानी-नानी, सूप-धूप ,मेला-ठेला-केला ...पीतल का रंग पीला होता है ,नीम कडवा होता है, बतासा मीठा होता है ,सडा फल मत खा, रोज दाँतों में मंजन कर , झूठ मत बोल, लज्जा नारी का भूषण होता है , गिद्ध की निगाह तेज होती है ,बर्र का डंक जहरीला होता है , मच्छर के काटने से मलेरिया होता है ,गन्दा पानी इकट्ठा मत होने दो ,पेड मत काटो ,जीवों पर दया कर, ठठ्ठा मत कर , सुबह घूमना अच्छा होता है , चोरी करना बुरी बात है मीठा खाने से दाँतों में कीडा लगता है ,मिले अच्छर याद कर जैसे--डुग्गी ,घुग्घू, झझ्झर, मच्छर, कंकड , जैसे--गिद्ध, डिब्बा, कुप्पा ...ड्यौढा एकम् ड्यौढा, ड्यौढा दूनी तीन, ड्यौढा तीय साढे चार.....एकन पन्द्रह, दूनी तीस, तिय पैंतालीस ,चौके साठ......
सबक चल रहा था लगातार बिना साँस लिये । पूर्ण विराम तो दूर कहीं अल्प-विराम भी नही । हम सबकी हँसी दबे-दबे ठहाकों में बदल गई थी पर देवीराम पूरी गंभीरता व सजगता के साथ अपना सबक सुनाए जारहे थे मानो किसी छात्र को बीच में ध्यान बंग होजाने पर सबक भूल जाने का डर हो ,भूल जाने पर गुरुजी की नाराजी का डर हो या कि वह भी दिखा देना चाहता हो कि सबक याद करने में वह किसी से कम नही है ।

13 comments:

  1. दीदी,
    शिक्षक दिवस पर पंडित जी जैसे समर्पित शिक्षक स्मरण ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि है.. देवी भैया जैसे लोग उनकी दाँत और पिटाई के बावाजोद्द भी उन्हें श्रद्धा के साथ याद करते हैं यही क्या कम है..
    मगर आज अम्मा की बातों से मुझे भी बचपन याद आ गया.. हमलोग टूंडला में थे और वहीं पट्टी पर सरकंडे की कलम से खडिया के घोल में डुबोकर लिखना सीखा था.. आज तक मेरी हैंडराइटिंग उसी कारण खूबसूरत है..
    आज अपने बच्चों को उँगलियों पर हिसाब जोडते देखता हूँ तो हँसी आती है.. हम जुबानी जोड़ लेते थे/हैं. बहुत ही अच्छा संस्मरण!!

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  2. स्पैम में है मेरी टिप्पणी!!

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  3. इस बार स्पैम से निकाल ही लाई टिप्पणी को । वाह....

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  4. बहुत ही रोचक... यह जानकर अच्छा लगा कि उस समय भी पढ़ाई के अलावा प्रैक्टिकल्स और पीटी वगैरह पर ध्यान दिया जाता था।

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    1. दीपिका जी ,उस सबक के अलावा बाकी सब तो मैंने माँ से ही सुना था लेकिन अपने ताऊजी व पिताजी को तो मैंने स्वयं अपने स्कूल व छात्रों के लिये समर्पित देखा है । उन्हें कभी कोई पुरस्कार नही मिला पर वे सबके दिलों पर राज करते थे । किसी भी शिक्षक का यह सबसे बडा पुरस्कार होता है । मेरे दूसरे ब्लाग कथा-कहानी पर एक चुनौती शीर्षक की कहानी है वह पूरे सच के साथ ताऊजी पर ही केन्द्रित है । आप उसे अवश्य पढें । उसके बाद का सच यह है कि कुछ नेताओं ने राजनैतिक व जातिगत् स्वार्थों के चलते ताऊजी को जो राजनीति का आ ई भी नही जानते थे ,घर से बहुत दूर ,कठिनाइयों से भरे अंचल में भेज दिया । इससे वे बहुत दुखी हुए और फिर शेष रहे कुछ साल उन्होंने बडे बेमन गुजारे ।

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    2. दीपिका जी ,उस सबक के अलावा बाकी सब तो मैंने माँ से ही सुना था लेकिन अपने ताऊजी व पिताजी को तो मैंने स्वयं अपने स्कूल व छात्रों के लिये समर्पित देखा है । उन्हें कभी कोई पुरस्कार नही मिला पर वे सबके दिलों पर राज करते थे । किसी भी शिक्षक का यह सबसे बडा पुरस्कार होता है । मेरे दूसरे ब्लाग कथा-कहानी पर एक चुनौती शीर्षक की कहानी है वह पूरे सच के साथ ताऊजी पर ही केन्द्रित है । आप उसे अवश्य पढें । उसके बाद का सच यह है कि कुछ नेताओं ने राजनैतिक व जातिगत् स्वार्थों के चलते ताऊजी को जो राजनीति का आ ई भी नही जानते थे ,घर से बहुत दूर ,कठिनाइयों से भरे अंचल में भेज दिया । इससे वे बहुत दुखी हुए और फिर शेष रहे कुछ साल उन्होंने बडे बेमन गुजारे ।

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  5. बहुत ही रोचक संस्‍मरण ...

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  6. एक मुस्कान देता संस्मरण

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  7. Sundar.... Aaj bhi kuch pandit ji jese hi shikshako ki aawashyakta h

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  8. शिक्षक का नैतिक कर्तव्य समर्पण भाव से पढाना,

    बहुत बढ़िया बेहतरीन प्रस्तुति,,,,
    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  9. बहुत ही रोचक प्रसंग... उसे आपकी लेखनी ने बखूबी निभाया

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  10. बहुत ही रोचक! पिताजी भी ऐसे ही किस्से सुनाते हैं।
    आपका बहुत बहुत आभार! :)

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