Sunday, September 16, 2012

वे 'लक्षणा' को नही जानते ।


"ए ! ओ !! अरे भाई सुनो !!!" 
साक्षरता अभियान के दल-प्रमुख ने एक गाँव वाले को पुकारा जो एक तरफ भागता हुआ सा जारहा था । यह कुछ साल पहले अक्टूबर-नवम्बर की बात है जब प्रदेश के पूर्ण साक्षर होने के आँकडों को जुटाने के लिये शिक्षक अपने छात्रों की बजाय निरक्षरों को साक्षर बनाने गाँव-गाँव घूम रहे थे पर निरक्षर थे कि खेत-खेत ,रबी की फसल बोने तथा अपने दूसरे कामों में रमे थे । खेत बुवाई के लिये उसी तरह सज-सँवर कर तैयार थे जैसे वधू-आगमन पर घर-आँगन और द्वार चौक-साँतियों से सजा-सँवार दिये जाते है । यही कारण था कि जब मोटरसाइकिलों की फौज मोतीझील ( मोतीझील कोई झील नही ग्वालियर में ही एक जगह का नाम है ) के पास उस छोटे से गाँव में पहुँची ,उस समय गाँव में बाहर दरवाजों पर बँधे छोटे बछडों--मेमनों तथा बूढे जानवरों को छोड कोई नही दिखाई दे रहा । या किसी चबूतरा पर पडी चारपाई से कभी-कभी खाँसने की आवाज बता देती थी कि कोई बीमार लेटा है । धूप चमकीली थी लेकिन हल्की सी नरम होगई थी ।  
"यह हाल है इस देश का । लोगों को भूख नही है पर सरकार है कि मुँह में कौर ठूँसे ही जारही है । ठूँसे ही जा रही है ।"
दल-प्रमुख नरेन्द्र जी ने एक असन्तोषभरी नजर पंचायत-भवन के आसपास बिखरे घासफूस और गोबर पर डाली एक दौडते-फँलागते आदमी पर लपककर आवाज का जाल फेंका--"ओ भाई जरा बात तो सुनो ।"
दो बार तो वह जाल खाली ही आया पर तीसरी बार वह आदमी जाल में मछली की तरह फँसा चला आया ।  
"क्या है साब ?"
"अबे ! कहाँ है सब लोग?"
"हजूर ,गेहूँ चना और मटर की बुवाई हो रही है । इस समय तो कोई नही मिलेगा ।"
"अबे मिलेगा कैसे नही । कल खबर भिजवाई थी ना ? हम क्या ऐसे ही डोल रहे हैं मारे-मारे ? सरकार का हुकम है । सबको कुछ जरूरी बात समझानी है । गाँव के सरपंच को तो कम से कम होना ही था यहाँ । जा बोल सबको । औरत ,बच्चे ,बूढे ,जवान सबको बुला ला ।" 
नरेन्द्र जी ने लताडा । फिर धीरे से बोले---"साले पूरे ढोर हैं । अब क्या इन्सान बनेंगे !"
वह आदमी इतने सारे पढे-लिखे लोगों को गाँव में देखकर अपनी लताड भूल गया और आज्ञाकारी बच्चे की तरह चला गया ।
सरपंच तक सूचना पहुँची । सरपंच कामधाम छोड कर आए । 
"सरपंच जी , आपको तो पता है कि साक्षरता अभियान चल रहा है । कल खबर भी भिजवाई थी कि सब लोगों को बारह बजे पंचायत-भवन पर इकट्ठे होने को कहदें ..।"
"आपकी नाराजी वाजिब है साब लेकिन आजकल साँस लेने को भी "...
"अरे छोडो खां साब ,मुश्किल से आधा-पौन घंटा लेंगे । सबको बिस्कुट वगैरा भी दिये जाएंगे ।"
"साब ! कोई कुछ नही खा पाएगा । यह सब हमारे लिये जहर है अभी ।"--सरपंच ने हाथ जोडकर कहा । नरेन्द्र जी चौंके--"जहर !! अरे भाई हम तुम्हें जहर देंगे ? तुम हमारे भाई जैसे ही हो ।...भैया ,हम तो अमृत बाँटने आए हैं। आप लोगो को अशिक्षित होने का कितना घटा सहना पडता है ,पता है ??...चार अक्षर सीख लोगे तो काम आएंगे ..वही सिखाने आए है । सोचो कि आपके घर तक खुद पूरा स्कूल आया है....।"  
"मैं कोशिश करता हूँ साब ..लेकिन" ...।
नरेन्द्र जी पीछे से कहने लगे --"देखा ! लोग ऐसे दंगे फसाद करवाते हैं । हमारे बिस्कुटों में ही जहर बता दिया । यही बात अखबारों तक पहुँच जाए तो क्या हो...! खैर हमें क्या ! सरकार ने भेजा तो आगए । 
"सरपंच से साइन जरूर ले लेना ।" 
"यह जहर वाली बात प्रिंसिपल साहब को जरूर बताना नरेन्द्र ।"
"और क्या । कौन जानता है कि किसके मन में क्या है ।"
कुछ साथियों ने अपनापन दिखाते हुए कहा ।
"ठीक है लेकिन आप लोगों को तो बिस्कुटों में जहर होने का सन्देह नही है न ?"
नरेन्द्र जी ने मुस्कराकर साथियों को देखा तो सब हँस पडे और पारले जी का एक-एक पैकेट अपने बैग में डाल लिया

8 comments:

  1. वाह....
    क्या करारा झापड मारा है आपने सरकारी तंत्र पर.....
    मगर ये इतने ढीठ है कि सुधरेंगे नहीं...
    बेहतरीन व्यंग.
    सादर
    अनु

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  2. सरकारी तंत्र पहले भी और आज भी बस आंकड़े भरने में लगा रहता है ... खाना पूर्ती ही इसका मकसद है ...
    मस्त व्यंग है ...

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  3. धीरे धीरे सुधरेंगे, प्रथम कार्य को प्राथमिकता मिले।

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  4. अनपढ़ तो अनपढ़, पढ़े-लिखों का तो और भी अजब हाल है.. भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक नए अफसर की पदस्थापना तमिलनाडु में हुई.. अब उन्हें स्थानीय भाषा का एक पर्चा कम से कम ५०% नंबर से पास करना होता है.. नहीं तो उनकी सालाना वेतनवृद्धि रुक जाती है..
    उनसे तमिल भाषा की परीक्षा के दौरान पूछा गया कि हाथी को तमिल में क्या कहते हैं?
    उन्होंने जवाब दिया, "पूनै!" जबकि "पूनै" का अर्थ होता है बिल्ली और "यानै" का अर्थ होता है हाथी..
    फिर भी चूँकि उनके उत्तर में 'नै' सही था इसलिए उन्हें ५०% नम्बा देकर पास कर दिया गया!!
    सरकारी तंत्र की अच्छी खोजखबर ली आपने दीदी!!

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  5. आँखों के आगे चित्र जैसे घूम गया...

    खैर, दयनीय किसे कहें, अनिर्णीत लगता है..शिक्षकों को, ग्रामीणों को या सरकार को..?

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  6. बेहद सशक्‍त लेखन।

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  7. भूखे भजन न होय गोपाला । रोटी रोजी के काम के वक्त पढाई वह भी सज्ञानों की समय सही ना हुआ । आपका लेख सराकरी महकमे के कार्य प्रणाली को उजागर करता है ।

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  8. सभी विधाओं में एक समान पकड़ है आपकी गिरिजाजी... बहुत बढ़िया लगी यह व्यंग्य कथा।

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