Monday, December 17, 2012

अनजान शहर से गुजरते हुए-----100 वीं पोस्ट



किसी अजनबी शहर से गुजरते हुए
मुझे अक्सर अहसास होता है
कि बहुत जरूरी  होती है,
सजगता, समझ ,
और जानकारी
उस शहर के--इतिहास--भूगोल की
पर्स में रखनी होती है
मीठी यादों की पर्याप्त पूँजी
डायरी में नोट किये गए
बहुत खास अपने से नाम
किसी अपने का पता फोन नं.
ताकि शहर की गलियों, चौराहों को
पार किया जा सके यकीन के साथ ।
अजनबी चेहरों की भागती सी भीड में
अनजान रास्तों के जटिल जाल में
अन्तहीन सी दूरियों को पार करते हुए भी
याद रखा जा सके अपना गन्तव्य
उसे तलाशने में
खर्च होने से बचाया जा सके
जिन्दगी का एक बडा हिस्सा

जब भी गुजरती हूँ मैं
किसी अनजान शहर से
महसूस होती है तुम्हारी कमी
पहले से कहीं ज्यादा
किसी अनजान भाषा में
बतियाते लोगों को देखना
भर देता है मुझे
निरक्षर होने के अहसास से
तभी तो याद करती हूँ
तलाशती हूँ तुम्हें ही हर चेहरे में ।
क्योंकि तुम्हारा साथ होता है,
सिर पर हाथ होता है
तब नही होता कुछ भी अनजाना
जटिल और थकाने वाला ।

अनजान शहर से गुजरना
सिखाता है बहुत से तमीज-तहजीब
कि हर किसी से नही मिला जाता
उस तरह
जिस तरह मिलते रहते थे हम
अपने गाँव में सबसे
बेझिझक , बेखौफ...।
कि नही खोला जाता सबके सामने अपना बैग
नही गिनी जाती कहीं भी अपनी जमाराशि ..।
और कि नही बताया जाता
अपना घर और गन्तव्य हर किसी को
और यह भी कि सबसे जरूरी होता है
पास रखना अपने आपको
बना लेना किसी को बहुत अपना
गुजरते हुए किसी अनजान शहर से
Click here to Reply or Forward
Why this ad?Ads –
Choose From Different Types of 1BHK Flats on HDFC RED. Quick & Easy!

9 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर एहतियाती ख्यालों का समावेश …………100 वीं पोस्ट की हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete
  2. बहुत ही बढ़िया रचना । 100वीं पोस्ट के लिए बधाई ।

    मेरी नई पोस्ट-गम लिया करते हैं

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर .... 100 वीं पोस्ट की बधाई

    ReplyDelete
  4. अनजान शहर से गुजरते हुए..इस कविता को पढ़कर झट से वह खयाल आता है जो इस कविता में कहीं नहीं लिखा लेकिन है। एक प्रश्न..क्या हम जिस शहर में रहते हैं वह हमारा इतना अपना है कि घूम सकते हैं बेखौफ, बेझिझक अपने गाँव की तरह? क्या नहीं रहना पड़ता हमें सावधान हर समय..अपने ही शहर में? क्या नहीं हो गये हम अपने ही शहर में अजनबी? मुझे लगता है, इस खयाल का आना ही इस कविता की सार्थकता है!

    ReplyDelete
  5. बेहतरीन अभिव्यक्ति,100 वीं पोस्ट की बहुत२ बधाई ,,,,

    recent post: वजूद,

    ReplyDelete
  6. दीदी,
    एक बच्चा जो आपके अंदर छिपा है कहीं, जाने क्यों मुझे बहुत प्यारा लगता है. आपकी कविताओं में खासकर. इस कविता का उत्तरार्ध भी मुझे इसी बात का प्रमाण लग रहा है. एक बच्चा जिसे घर से निकलते समय यह हिदायत दी गयी है कि सबके सामने बटुए से पैसे मत निकालना, अजनबियों से बात मत करना, फोन नंबर साथ में रखना आदि. लेकिन अजनबी शहर में होने की यह बेचैनी मैंने भी महसूस की है. और जिस बेचैनी का वर्णन आपने पूर्वार्ध में किया है उससे गुज़रा हूँ कई बार.
    एक पंजाबी कहानी याद आ गयी जिसमें एक व्यक्ति शहर में अपने दुश्मन की ह्त्या करने जाता है और सुबह से शाम तक किसी हमज़ुबान के लिए भटकता रहता है. अंत में टकराता है अपने दुश्मन से जो उससे अपने गाँव की भाषा में घरेलू बात करता है, और वह अपने शत्रु को गले से लगा लेता है. परदेस में अपने घर की याद (चाहे घर-गाँव कैसा भी हो - सन्दर्भ देवेन्द्र पाण्डेय)की टीस महसूस होती है.
    /
    हाँ, एक दोष है कविता में.. दीदी आपने "फोन नंबर" के स्थान पर "फोन नं." का प्रयोग किया है जो त्रुटिपूर्ण है. एक बार उत्साही जी ने भी अपनी कविता में मध्य प्रदेश के स्थान पर म्.प्र. लिखा था तो मैंने टोक दिया था. कविता में स्वीकार्य संक्षिप्तीकृत शब्द चलते हैं (जैसे यूपी, बीपी, बीजेपी आदि) लेकिन ऐसे शब्द पूरे लिखे जाने चाहिए!
    /
    आपकी कविता का इंतज़ार रहता है!! सौवीं पोस्ट की बधाई!!

    ReplyDelete
  7. सलिल भाई आपका रचना को इस तरह आत्मसात् करते हुए पढना और उसका ऐसा विस्तृत विश्लेषण करना रचना को विशेष अर्थ देता है जिसका भान लिखते समय शायद मुझे नही होता । यह मेरे लिये प्रेरणा ही नही ऊर्जा भी है ।
    अनजान शहर एक प्रतीक के रूप में है जो किसी भी उदास ,अकेली अप्रिय या कठिन स्थिति के अर्थ में प्रयुक्त है । और अनजानी जगह का प्रतीक तो है ही जिसकी टीस शायद हर किसी को होती है । आपने त्रुटि को सही पकडा है । निश्चित ही मेरे ब्लाग को कम ही लोग पढते हैं पर जो भी हैं मेरे लिये उजाला लाते हैं ।

    ReplyDelete
  8. नगर अपरिचित, व्यक्ति अपरिचित,
    जन मन की आसक्ति अपरिचित,
    आसमान में फैली कैसी,
    लाल हुयी नव भक्ति अपरिचित।

    ReplyDelete
  9. १०० वीं पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाई... अब घर आ जाईये...
    वैसे सच है किसी अपरचित शहर में कुछ सहम कर रहना पड़ता है चलना पड़ता है... ये मेरे भी अनुभव हैं.

    ReplyDelete