Tuesday, December 11, 2018

तुम जो बिछड़े ....

यह संस्मरण जिया के जाने के बाद लिखा था . काकाजी की पुण्यतिथि पर . कभी पोस्ट नहीं कर पाई . आज सामने आगया तो ब्लाग पर दे रही हूँ . अब उतना प्रासंगिक नही है लेकिन जीवन का एक बड़ा सच इसमें है कि स्नेहमय सम्बल  जीवन की ऊर्जा है . ठोस जमीन है जिसमें पेड़-पौधे जड़ें फैलाते हैं .फलते फूलते हैं .  धूप और पानी की प्रतीक्षा में पेड़ अन्ततः  असमय ही मुरझाकर झड़ जाता है . जिजीविषा खत्म हो जाती है . क्या इन्सान को इतना कमजोर होना चाहिये ?
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19 मई 
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काकाजी आपकी पुण्यतिथि पर मैं आपसे जिया (माँ) की बातें करना चाहती हूँ .क्योंकि आज जिया भी हमारे पास नहीं हैंकैंसर के आगे जिन्दगी को हारकर चली गईं हमेशा के लिये. 
मन मानना नही चाहता ,ठहरकर इस विषय में सोचना भी नहीं चाहता पर मन के चाहने न चाहने से क्या होता है . यह तो अमावस के अँधेरे जैसा सत्य है कि जिया अब हमारे बीच नहीं हैं..
“तेरी जिया हार मानने वालों में से तो नहीं थीं ? ” 
आप होते तो शायद यही कहते . आपका या किसी का भी ऐसा सोचना अकारण भी नहीं है . कोई भी जिसने जिया को संघर्ष करते देखा है, यही कहेगा . वे सचमुच आशा से परिपूर्ण उद्यमी और साहसी महिला थीं . लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में खास तौर पर आपके जाने के बाद वे बहुत निष्क्रिय सी होगईं .उन्हें बहुत अस्थिरचित्त ,निस्पृह और निराश देखकर खेद ही नहीं अचरज भी होता था .क्योंकि हमारी वह धारणा ध्वस्त होने लगीं थी ,जिसे दिल दिमाग में बिठाए हमने एक लम्बा सफर तय कर लिया था .  हालाँकि यह सच है कि हममें से कोई भी उन्हें उनकी अपेक्षाओं के अनुसार समय ,सुविधा और वातावरण नहीं दे पाए . कहीं सर्विस की व्यस्तता ,कहीं व्यापक व उदार दृष्टिकोण की कमी , कहीं पारिवारिक विवशता तो कहीं माँ के लिये स्नेह , संवेदना और दायित्त्वबोध की कमी रही .जीवन के स्नेहमय सम्बल और सबसे अधिक आत्मीय रिश्ते को खोने के बाद हमारे पास अब केवल खेद और मलाल है .फिर भी स्थितियाँ इतनी खराब नहीं थीं कि जिया जीने का उत्साह ही खो देतीं .नींव में ऐसी क्या कमी रह गई कि दीवारें जरा सी आहट से डगमगा उठीं .छत दो-चार बारिशें भी सहने में असमर्थ रही . ऐसा क्यों हुआ कि आपके बाद उनके पास कुछ सोचने या करने को रहा ही नहीं उनके साथ की कितनी ही महिलाएं हैं जो पति के चले जाने के बाद भी और बच्चों से उपेक्षा मिलने के बावजूद स्थिर और सहज रहती हैं .जब तक आप थे ,हमें ऐसा कभी लगा नहीं कि जिया आपके बाद इतनी उदासीन होजाएंगी .
क्योंकि हमने आप दोनों को कभी स्नेह के साथ बैठे-बतियाते नहीं अक्सर मुद्दों पर असहमत होते ,बहस करते और झगड़ते ही देखा था . आप दोनों के विचारों व सिद्धान्तों में काफी अन्तर था . जिया घोर आस्तिक , सामाजिक ,उदार, नैतिक मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाली निश्छल व सरल महिला थीं . वे अपने भावों को शब्दों द्वारा नहीं बल्कि व्यवहार द्वारा व्यक्त करती थीं . उनका हाथ खुला था और 'मँहगा रोए एक बार , सस्ता रोए बार बार' वाला सिद्धान्त पसन्द था .प्रतिफल के बारे में सोचे बिना ही दूसरों की मदद करने में पीछे नहीं रहतीं थीं . 'नेकी कर दरिया में डाल' उनका आदर्श था .जबकि आप मन्दिरों और दूसरे धार्मिक स्थलों व कथा भोज जैसे आयोजनों में विश्वास नहीं करते थे. एकाकी थे . 'या शेख अपनी अपनी देख' का विचार रखते थे . भावनाओं (प्रेम और प्रशंसा) को अक्सर शब्दों में व्यक्त करके मुक्त होजाते थे . बचत और मितव्ययता पर आपका बहुत ज्यादा ध्यान था वगैरा वगैरा ..विचारों के इस अन्तर के कारण हमारे घर में किसी भी मुद्दे पर प्रायः सहमति नहीं होती थी .
आपके विचार व व्यवहार से मैंने जिया को प्रायः त्रस्त ही देखा था .आपकी कई बातों के प्रति उनके अन्दर विरोध-भाव रहता था पर भावनात्मक रूप से आप पर निर्भर भी थीं इसलिये आपसे लड़ते हुए (चाहे लड़ाई उचित होती ) वे एक लड़ाई खुद से भी लड़ती रहतीं थीं और अन्दर ही अन्दर लहूलुहान होती पराजित होती रहतीं थीं . आप भी जानते हैं कि जब आदमी खुद से लड़ता है तब बाहरी लड़ाई स्वतः ही कमजोर होजाती है . एक अनवरत चल रहे विरोध-भाव के कारण वे कमजोर होतीं ही चली गईं थीं .
19 मई 2010 को जब आप हमें हमेशा के लिये छोड़ गए तब पिता को खोने की घोर पीड़ा और कसक होने के बावजूद मैंने सोचा था (शायद वे भी कुछ ऐसा ही सोचतीं थी) कि अब माँ शेष जीवन अपनी तरह से जी सकेंगी .अब तक अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिये भी उन्हें आपसे सीमित खर्च मिलता था पर अब आपकी पेंशन के सारे रुपए उनके हाथ में होंगे . सात-आठ बीघा खेतों की फसल. गाँव में दो पक्के मकान , सारी सुविधाएं ,अपनी खुद की सोच ,विचार और व्यवहार की स्वतन्त्रता ..स्वामित्त्व  ,चारों बच्चे स्थापित हो चुके हैं . फिर उन्हें सिर माथे रखने वाले गाँवभर के लोग.. क्या कमी है ! जिया के साथ पूरी दुनिया है .सिर्फ आप ही तो नहीं है !
लेकिन कहाँ ? कैसी दुनिया ! कैसा स्वामित्त्व ! कैसी स्वातन्त्रता ! आपके बाद इन छह सालों में जो कुछ सामने आया वह निश्चित ही जिया की उस उम्मीद पर ,जिसे दाम्पत्त्य जीवन में त्रस्त लगभग हर स्त्री भविष्य में जीते हुए पालती है , तुषारापात था कि बच्चे बड़े और काबिल होंगे और माँ को एक सुकून भरा जीवन दे सकेंगे . पर अक्सर ऐसा नहीं होता . जिया के साथ भी नहीं हुआ . भावनात्मक स्तर पर भी और बाद में व्यावहारिक स्तर पर भी .
गाँव छूट गया . विचारों की नदी एक जगह ठहरकर रह गई . विरोध-भाव कही पिघलकर बह गया .हाथ-पाँव बेजान से होते चले गए . कभी हमेशा काम में लगी रहने वाली माँ को निष्क्रिय होने की उपाधि मिल गईं . स्मृति उत्तरोत्तर क्षीण होती गई . न उनमें पेंशन के रुपए गिनने सम्हालने की ललक रहीं न फसल का हिसाब सम्हालने की सामर्थ्य . बस एक अतिरिक्त और फालतू पड़े स्टूल सी ,भाव और विचारों से अलग थलग पड़ी सी वे जीवन को तिल तिल खोती हुई ,अपना समय कोई न कोई किताब ,पत्रिका या अखबार पढ़ते गुजारतीं रहीं . विरोध ,शिकायत और इच्छा रहित सपाट सा जीवन ..रोज सुबह शाम..साथ रहने वाले बेटे-बहू और बेटियों को भनक तक न लगी कि जीने के लिये थोड़ा बहुत खाना पेट तक पहुँचाने वाली उनकी नलिका कैंसर की चपेट में आ चुकी है ...
ऐसा क्यों हुोता है
काकाजी ,क्या कभी आपने सोचा कि क्यों बाहर से मजबूत और कठोर दिखता आदमी अन्दर से खोखला होता रहता है ? ऐसी कौनसी संजीवनी है जिसके बल से आदमी को काँटों में भी हँसकर चलता है ? जिसकी ऊर्जा से पहाड़ों को मैदान की तरह पार कर लेता है जिसके कारण लम्बा रास्ता भी छोटा होजाता है और जिसके बल पर कैसे भी मुश्किल वक्त में जिन्दगी को पूर्णता से जीते हुए गुजारता है ,क्या है वह ?
वह जो कुछ भी है ,शायद शुरु से ही जिया के पास नहीं था . पिता का स्नेह बचपन में ही छूट गया .समाज से अकेली जूझती विधवा माँ जीने के साधनों को सहेजती या बच्ची पर ध्यान देती . विवाह के बाद भी पति यानी आपने उनसे अपेक्षाएं तो बहुत रखीं पर स्नेह के सारे स्रोत बन्द ही रखे . हालाँकि आप सरल निष्कपट व्यक्ति थे . सच्चे और ईमानदार शिक्षक थे पर आपके अन्दर का शिक्षक इतना प्रबल था कि जिया के लिये भी आपके पास सिर्फ गिनती पहाड़े और बारहखड़ी का रटना ही था . जिया के सहयोग को आप सिर्फ एक विद्यार्थी के गृहकार्य जितनी ही मान्यता देते थे . जैसा आप चाहते थे वैसा होगया तो शाबासी दे देते थे और नही हुआ तो रुष्ट हो जाते थे . आपने कभी यह नहीं समझना चाहा कि हर स्त्री की तरह ही उनके कुछ कोमल स्वप्न थे .कि उन्हें भी आपके स्नेहमय संरक्षण और विश्वासभरे सम्बल की बहुत आवश्यकता थी . कि वे कार्यक्षेत्र में भले ही सशक्त लगतीं थी पर हृदय से बहुत भावुक और संवेदनशील थीं . और कि आपसी तालमेल व स्नेह के बिना जिन्दगी बिखर जाती है .
आप एक कठोर मास्टर की तरह उनके कार्यों पर आप सवाल उठाते थे .बल्कि सीधा विरोध भी कर देते थे जैसे कि हर महीने ये आटा-दाल मन्दिर पर देने का क्या प्रयोजन ? कोई जरूरत नहीं . इसकी बजाय किसी गरीब को देना ठीक है . कि अमुक बीमार है तो तुम्हें वहाँ देर रात तक रुकने की क्या जरूरत कि तुम्हें अपने से अधिक दूसरों की चिन्ता क्यों रहती है ? क्या दूसरी औरतें भी ऐसा ही करती हैं ?
काकाजी ! क्या जिया दूसरी औरतों जैसी थीं ?
मुझे जब से याद है ,परिवार की गाड़ी खींचने में वे भी बराबर आपके साथ थी . जब आप कुछ साल ‘बड़वारी’ के स्कूल में थे( मैं तो आपके साथ थी ) जिया बानमोर (मुरैना) के पास एक गाँव में दो छोटे बच्चों( सन्तोष ,दिलीप ) के साथ अकेली रहकर बालबाड़ी स्कूल चलातीं रहीं . हर मुश्किल को खुद ही हल करते हुए . वहाँ उनकी कितनी मान्यता थीं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वहाँ के लोगों ने उनसे स्थाई रूप से वहीं बस जाने का पुरजोर आग्रह किया था. यहाँ तक कि वहाँ के सरपंच ने तो अपनी कुछ जमीन भी जिया को देने का वचन दिया था लेकिन तिलोंजरी (मेरा ननिहाल) में नानी अकेली रहतीं थीं .उनकी जमीन को कुछ लोगों की हथियाने की नीयत है ,यह जानकर सन् 1970 में आपने बड़बारी से अपना ट्रांसफर करा लिया और हम सब तिलोंजरी आकर रहने लगे थे . माँ के पास आकर रहने के पक्ष में जिया बिल्कुल नहीं थीं .उन्होंने इसका विरोध भी किया था . वास्तव में तिलोंजरी में आकर रहना और ठीक से स्थापित होना बिल्कुल आसान नहीं था . क्योंकि एक तो गाँवों में तब स्त्री का मायके में रहना सँकरी और ऊबड़-खाबड़ पगडण्डी पर चलने जैसा था (है) दूसरे अधिकार के सवाल पर वहाँ का वातावरण हमारे प्रतिकूल था . उस पर आपकी सबसे अलग चलने की आदत गली में अनावश्यक ही बने गतिरोधकों जैसी थी ,तभी तो जिया को वहाँ व्यवहार में सामान्य से अधिक ध्यान रखना पड़ा था . गाँव के भाई-भतीजों और भावजों से व्यवहार क्या ऐसे ही बना लिया उन्होंने ?
और फिर घर भी तो उन्होंने ही सम्हाला ? आपका वेतन दो सौ रुपए से भी कम था . ऐसे में अतिरिक्त आय की भी जरूरत थी इसके लिये जिया ने सिलाई का काम किया ,मेरे विवाह तक (1975) एक छोटी सी दुकान भी चलाई थी . आपका दायित्त्व स्कूल व घर में सिर्फ बच्चों को पढ़ाने तक सीमित था .तब धवा की मोटी-मोटी लकड़ियों को फाँसकर जलाने लायक बनाने से लेकर सब्जी लाने और पकाकर खिलाने का काम जिया ही करती थीं . आपको तो सोचना भी नहीं पड़ता था कि रजाइयाँ कैसे तैयार होंगी , गेहूँ कौन पिसवाने जाएगा ,खरीफ और रबी की फसलों के लिये बीज का इन्तज़ाम कब कैसे होगा ,गेहुओं में दवा कौन लगाएगा ,कीड़ा लगा हो तो गेहूँ किसकी सहायता से छत पर फैलाए जाएंगे , बरसात से पहले छत और दीवार की दरारों में कहाँ कहाँ सीमेंट भरनी होगी.. क्या इतना भार उठाने वाली महिला क्या साधारण होसकती है ?
इस प्रश्न पर संवेदना के स्तर पर न आपने सोचा और ना ही आपके बच्चों ने . व्यवहार तो उसके बाद की बात है . काकाजी यह सब कहकर मैं आपको दोषी नहीं बता रही केवल शिकायत कर रही हूँ वरना मैं और हम सब जानते हैं कि आपने कभी आराम नहीं किया .सिर्फ आटे-दाल के पारिश्रमिक पर बच्चों को पढाया .( सरकारी तो बाद में हुए ) पैसे बचाने के लिये चालीस-पचास किमी तक का सफर साइकिल से किया. लेकिन जहाँ जिया की बात आती है आप कुछ संवेदनाशून्य रहे या फिर ऐसे लगते रहे .आपको पसन्द नहीं थी इसलिये उन्होंने पाजेब पहनना बन्द कर दिया . करवा-चौथ व गणगौर जैसे व्रत छोड़ दिये , क्रीम पाउडर लगाना छोड़ दिया . वे निस्पृह होतीं गईं. आपको इससे कोई अन्तर ही नहीं पड़ा . लेकिन उनकी तो सोच की उस दिशा में चली गई जहाँ उम्मीदों का सूरज धीरे धीरे डूबता जाता है .एक उद्यमी उत्साह से भरीपूरी महिला को निष्क्रिय होने का विशेषण मिल गया . उदारमना और विशाल हृदय वाली महिला दीवारों में घिरकर रह गई . 
काकाजी आपने नहीं सोचा कि एक अकेले पति द्वारा रखा गया ध्यान , मान और संवेदना ही पत्नी का सबसे बड़ा बल होता है . आपकी जमीन से उखड़ी हुईं सी जिया कहीं जम ही नहीं पाईं . जब स्नेहमय विश्वास और आत्मीयता कहीं छूट जाती है तो जीवन बेरंग होजाता है . किसी ने कहा भी है --

“तुम क्या बिछड़े भूल गए रिश्तों की नजाकत हम
जो भी मिलता है कुछ दिन ही अच्छा लगता है .”
तो क्या यही सच था ? शायद हाँ .. इस सच को आप क्यों नही समझ पाए . 
उस सच को शायद जिया भी नही समझ सकीं तभी तो आपसे मिली परेशानियों को व्यक्त करते रहने के बावजूद आपके बाद किसी को आत्मसात नही कर पाईं .न बेटे को न बेटी को .आपके बाद अपनी तरह से जी ही नही पाईं .
उस सच को हम लोग भी नही समझ पाए तभी तो आपके बाद हम भ्रमित रहे और खो बैठे कभी न भरने वाले घाव के साथ अपनी माँ को . बार बार यही लगता है कि काश आपके बाद जिया इतनी उदासीन न होतीं , काश हम उन्हें उदासीन नहीं होने देते , उनकी बातों को भावनाओं से समझते ,उनकी हर बात का ध्यान रखते तो शायद य़ह रोग न लगता .शायद समय से पहले माँ को यों नहीं खो देते .वे क्या गईं हैं जैसे एक रोशनी ही जीवन से चली गई है . जैसे साँस लेने को हवा भी नहीं बची कहीं .जैसे बिना ठीक से पढ़े जिन्दगी की किताब का सबसे महत्त्वपूर्ण पहला अध्याय ही छिन्न-भिन्न होगया . इसका दर्द क्या कभी मिट सकता है ?
काकाजी ,मैं आपसे क्या शिकायत करूँ ,जबकि खुद को ही क्षमा नहीं कर पा रही हूँ . शायद कभी नहीं कर पाऊँगी .

4 comments:

  1. मार्मिक संस्मरण !

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  2. मार्मिक ...
    किसी के होने और न होने के बीच की दुनिया जो भुगत रहा होता है वही समझ पाता है ... फिर माँ एक ऐसा किरदार है जो इतना कुछ आत्मसात करता है की सागर भी छोटा पद जाता है ... किसी के जाने के बाद ऐसे भाव मन में स्वाभाविक होते हैं क्योंकि संवेदनशील ह्रदय हर बात के खुद से प्रश्न करता है ... काश ऐसा होता ... काश ये कर पाते ...
    पर क्या सच शायद इससे बहुत आगे है ... कठोर है ... अनजाना है ...

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  3. सच कहा आपने . मुझे याद है, आपने मां की याद में सालभर गीत लिखे .अपने दुख को गीतों में डाल दिया यह अद्भुत है . मैं तो कुछ लिखने का साहस ही नहीं कर पाई हूं . फर्लांग पर आकर मुझे प्रोत्साहित करते हैं यह मेरे लिखे बड़ी बात है .

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