बुधवार, 14 सितंबर 2022

हर दिन हिन्दी का है .

 एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

प्राणवायु सा साँसों में, जीवन हिन्दी का है .

 

 जैसे भावों को माँ समझे और सबको समझाए  .

माँ के वशभर सन्तानों का सिर न कभी झुक पाए .

अपने अन्तर की बातें माँ से ही कह सकते है .

उसके अंचल की छाया में निर्भय रह सकते हैं .

माँ  के आंचल जैसा ही , सम्बल हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है.

 

हिन्दी भाषा मन की देहरी , सही पता है घर का .

आना जाना सहज सुगम रहता है भाव-प्रवर का .

हिन्दी अपने घर का आँगन , जहाँ बसा है बचपन .

गभुआरे बालों की खुशबू रची बसी है कण कण .

अधरों पर पहला ही उच्चारण हिन्दी का हो .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हो .

 

धरती है यह धरती पर ही पाँव जमा सकते हैं

चलते चलते बिना रुके मंजिल को पा सकते हैं .

इसके उर्वर अंचल में उगती फसलें सपनों की ,

अनजानी सी राहों में यह भाषा है अपनों की .

दिल को दिल से जोड़े वह बन्धन हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

 

 साथ दूध मे हिन्दी भी माँ ने मिसरी सी घोली .

संस्कृति की देहरी पर जैसे सजी हुई रंगोली

सरल समर्थ व्याकरण सम्मत नदिया सी बहती है

अन्तर में रच बस जाएं उस बोली में कहती है .

धरा हमारी हिन्दी और गगन हिन्दी का है .

एक दिवस क्या हम सबका हर दिन हिन्दी का है

 

देश प्रदेश सभी की अपनी भाषाएं उत्तम हैं .

बात एक को चुनने की तो हिन्दी सर्वोत्तम है

हिन्दी ऐसा उपवन जिसमें मुकुलित सभी विधाएं,

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम गूँजें यही सदाएं

हिन्दी बोलें पढ़ें लिखें , चिन्तन हिन्दी का हो .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का हो .  

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मंगलवार, 13 सितंबर 2022

मातृभाषा माँ --हिन्दी दिवस पर एक कविता

 मातृभाषा माँ है

माँ ,

जो समझती है
समझा सकती है औरों को भी
ह्रदय की हर बात
आसानी से .
माँ ,
जो छोटा नही होने देती अपने वश भर
अपनी सन्तान को-कभी ,... कहीं भी .

मातृभाषा, धरती है ।
धरती ,
जिसके उर्वरांचल में ही
उगती हैं, लहलहाती हैं
फसलें सपनों की .
संवेदना अपनों की
भावों की ,उद्गारों की ,
नदी के नम कूल किनारों की  
धरती पर ही टिकाए जा सकते हैं
पाँव मजबूती से ।
तय की जा सकती है लम्बी दूरी
बिना रुके ,बिना थके .
आसमान में पंछी उड़ सकते हैं 
पर उतरना होता है उन्हें 
ज़मीन पर ही .
जीने के लिये .

मातृभाषा, 
अपने घर का आँगन
आँगन ,
जहां कोने--कोने में रची-बसी है
गभुआरे बालों की खुशबू ।
दूधिया हँसी की खनक
आँगन , 
जहाँ सीखते हैं सब , 
सर्वप्रथम, बोलना ,किलकना
चलना , थिरकना ।

हिन्दी हमारी मातृभाषा, 
हमारी ज़मीन और आसमान 
घर का सही पता और पहचान ।
पत्र भी मिला करते हैं हमेशा
सही पते पर ही .
( पुनःप्रकाशित व संशोधित) 
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

गणपति बप्पा अगले बरस आकर , इन्हें समझाना ज़रूर.

मयंक के हाथों साकार हुई आस्था  

 

लगभग दस-ग्यारह दिन की धूमधाम के बाद आज शिव पार्वती के लाड़ले गणपति के उत्सव का समापन हो गया है ..गलियाँ सूनी और शान्त होगई हैं . पर्व और त्यौहार हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं . आस्था व भक्तिभाव के साथ ऐसे आयोजन जीवन की एकरसता को मिटाकर नया उत्साह व ऊर्जा का संचार करते हैं . गणेश तो वैसे भी मोद और मोदक के देव हैं . तो आयोजन भी आनन्द व उल्लासपूर्ण होते हैं ,इसलिये आवश्यक भी हैं . मुझे याद है उन दिनों की है जब मुझे पर्व और त्यौहारों की बड़ी उल्लासमय प्रतीक्षा रहती थी । यह उल्लास बचपन के कारण था या अनूठे उत्सव-आयोजनों के कारण यह पूरी तरह अलग करके तो नही कह सकती लेकिन इसमें कोई सन्देह नही कि उन दिनों हमारे गाँव में हर त्यौहार को मनाने के लिये विशेष तैयारियाँ होतीं थी । चाहे होली हो , दशहरा हो ,कृष्ण-जन्माष्टमी हो या गणेश-उत्सव ।

गणेश-उत्सव के आठ दिनों की झाँकियों की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली जाती थी जिसके निर्माता--निर्देशक ताऊजी ही होते थे । उनके द्वारा तैयार की गई झाँकियाँ अदुभुत हुआ करती थीं । जैसे एक बार उन्होंने कैलाश पर ध्यानमग्न शिव की झाँकी सजाई ।
" शिवजी निराधार बैठे ध्यान मग्न हैं ।( ध्यान रहे कि शिव प्रतिमारूप नही बल्कि सजीव हैं । किशोर भैया से छोटे देवेन्द्र को शिव के रूप में इतनी कलात्मकता से सजाया गया कि देखने वाले मंत्र-मुग्ध हुए देखते ही रह गए थे और लगभग बारह वर्ष के देबू भाई का आँखें बन्द कर घंटों तक शान्त व निश्चल  बैठे रहना भी कम आश्चर्य नही था ) जटाओं से गंग-धार फूट रही है । उनका धरती से स्पर्श केवल फर्श में गड़े त्रिशूल के द्वारा है,जिसे उन्होंने थाम रखा है । चकित दर्शक आजू-बाजू झाँकते हैं कि आखिर शिवजी अधर में बैठे किस तरह है ।"
हर दिन एक नई और अनूठी झाँकी होती थी । कभी भगवान विष्णु के क्षीरसागर-शयन की कभी माखनचोरी की तो कभी खेत में बीज बोते किसान-दम्पत्ति की ।   

आरती व प्रसाद के बाद भजन गाए जाते थे । उन दिनों गाँव में गाँव के ही बहुत अच्छा गाने-बजाने वालों की भजन-मण्डली थी दो-चार लोग बाहर से भी आजाते थे । और श्रोता भी कम रस-मर्मज्ञ नही थे । ताल और मात्राओं की जरा सी गलती पकड़ लेते थे ।  हम लोग आतुरता से इस त्यौहार की प्रतीक्षा करते थे . 

लेकिन जबसे धर्म में राजनीति ने प्रवेश लिया है ये या तो आयोजन प्रदर्शन और गुटबाजी का हिस्सा बन गए हैं या अमर्यादित मौजमस्ती का . धर्म के नाम पर नियमों , दायित्त्वबोध और नैतिकता को ताक पर रख दिया जाता है . भजनों के नाम पर माइक पर पैरोडियाँ बजाना शराब पीना ,हुल्लड़बाजी करना इन आयोजनों का एक खराब पक्ष है . वास्तव में लाउडस्पीकर का उपयोग जब तक बहुत ज़रूरी न हो ,नहीं होना चाहिये . आप आराधना इबादत अपने लिये कर रहे हैं दूसरों के लिये नहीं . लेकिन हमारे यहाँ इस बात का ध्यान रखा ही नहीं जाता . जन्मदिन की पार्टी हो , शादी या फिर धार्मिक कार्यक्रम हों लाउडस्पीकर पर रात रात भर गीत चलाए जाते हैं . अगर कोई आपत्ति करे तो ,'खुशी बर्दाश्त नहीं होती' या 'धर्मविरोधी' होने का आरोप लग जाता है . मोहल्ले में एक महिला ने ,जब मैंने कहा कि गीत बजालो पर धीमी आवाज में , बच्चे पढ़ रहे हैं सीधा मेरे मुँह पर आपना ज्ञान दे मारा –“थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम ,तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी ..”

मुझे मालूम था कि इससे बहस का कोई लाभ नहीं ,पर यह अफसोस की बात है कि ऐसे कथित धार्मिकों ने हमारे धर्म को बदनाम तो कर रखा है .लोगों को समझना होगा कि धार्मिक आयोजन केवल दिखावे या मौज मस्ती के लिये नहीं होते , नहीं होना चाहिये . देवी दुर्गा ,भगवान शिव, मर्यादा पुरषोत्तम राम , लीलाधर कृष्ण , विघ्नेश्वर भगवान गणेश ...सभी हमें जीने की राह बताते हैं .आस्था और विश्वास देते हैं . दिखावा या नियम विरुद्ध आचरण नहीं . रात रात भर ( दिन में भी ) तेज आवाज में गाने बजाना , कार्यक्रमों के लिये रास्तों का अतिक्रमण करना , शराब पीकर हुल्लड़ करना नियम विरुद्ध आचरण है कोरा दिखावा है . उन्माद में लोग प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं .अभी हरियाणा और उत्तर प्रदेश में ऐसा हुआ भी है .

गणपति विसर्जन के समय गाते हैं –गणपति बप्पा मोरया , अगले बरस तू जल्दी आ ..मैं कहती हूँ हे देव अगले बरस आकर अपने भक्तों को समझाना भी कि उत्सव के साथ साथ सामाजिक शान्ति और नियमों का ध्यान भी रखना ज़रूरी है और अपने अनमोल प्राणों का भी .  

सोमवार, 5 सितंबर 2022

सिडनी डायरी --6 'सीनिक वर्ल्ड' और जिनोलन गुफाएं

20 अगस्त   ---गतांक से आगे

सुबह जल्दी नींद खुल गई . बाहर घास और कारों पर जमे हिमकणों से पता चला कि रात कितनी ठंडी थी . लेकिन पेड़ों की फुनगियों से उतरती धूप सुबह को सुहानी बना रही थीं . हवा तेज और नुकीली थी पर सुबह की ताजगी का अनुभव उसकी चुभन को कम कर रहा था . घास पर टहलते हुए मैंने छाती में खूब गहरी साँसें भरीं .प्रकृति ने यह अनमोल उपहार सबके लिये मुक्तहस्त लुटाया है .कुछ देर बाद श्वेता भी बाहर निकल आई हम लोग देर तक घास में टहलते रहे .बगलवाले पोर्शन में अभी भी पर्दे पड़े थे .

“कल साढ़े दस बजे तक हमें ‘सीनिक-वर्ल्ड’ पहुँचना होगा .”-–मयंक ने कल सोने से पहले ही बता दिया इसलिये उसी समय के अनुसार हम तैयार होकर जैमिसन वैली की तरफ चल पड़े .

सीनिक रेल वे 


‘ सीनिक वर्ल्ड ‘  एक निजी व्यावसायिक कम्पनी Hammons Holding pty (Ltd) द्वारा संचालित और विश्व-विरासत की सूची शामिल में ऐसी अनूठी दुनिया है जो प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है . जिसमें सघन वन के बीच संचालित रोमांचक ‘सीनिक रेलवे’ है , ‘केबल वे’ और ‘स्काई वे’ जैसी अनूठी व रोमांचक गतिविधियाँ आनन्द , रोमांच और थरथरा देने वाली अनुभूतियों से भर देती है . हृदय को आनन्द से भर देने वाला ‘वॉक वे’ या ‘बुशवॉक’ भी है . हमने इस सबका एक साथ पैकेज लिया था . दिनभर चाहे जहाँ जिसका जितना आनन्द लो

सीनिक रेल वे 310 मीटर लम्बा 52 डिग्री झुका ,और संभवतः विश्व का सबसे तीव्र ढलान वाला रेलमार्ग है . जिस पर ग्लास की पारदर्शी छत और कवर वाली सुन्दर ट्रेन चलती है जिसमें एक साथ 84 यात्री उस रोमांचक यात्रा का आनन्द ले सकते हैं . 310 मीटर लम्बे मार्ग में सीधी ढलान है . उस पर खड़ी चट्टानों और सुरंग से बीच से गुज़रती हुई ट्रेन एक दो जगह तो लगभग गिरती हुई सी प्रतीत होती है . उस क्षण यात्री बरबस ही बच्चे बन जाते हैं . चीत्कार और सीटियाँ से सुरंग गूँज उठती है .भयवश नहीं रोमांचक अनुभव के कारण . पारदर्शी खिड़कियों व छत से पेड़ , चट्टानें , बादल ..पीछे छूटते लगते हैं . कुछ पल के लिये तो लगता है जैसे ट्रेन धरती में समा ही जाएगी .  शिखर से नीचे आखिरी बिन्दु तक पहुँचने में लगभग दो या ढाई मिनट का समय लगता है . लौटने में भी लगभग इतना ही . हमारा पैकेज़ असीमित था ,इसलिये हमने दो बार जाकर इस अनूठी रेल के सफर का आनन्द लिया .

19 वीं शताब्दी में यह ट्रेन कोयले की खदानों की सेवा में शुरु की गई थी . उस समय यह साधारण डिब्बों वाली ट्रेन थी . सन् 1945 ई. में Hammon family द्वारा अधिग्रहीत कर लेने के बाद यह अत्याधुनिक रूप में पर्यटकों के लिये शुरु की गई .

सीनिक केबल वे –जेमिसन वैली से ढलान के शिखर तक 545 मीटर लम्बा केबल वे एक मनोरंजक , रोमांचक और सुविधाजनक हवाई सफर है . यह हवाई केबल मार्ग सन् 2000 ई में शुरु किया गया . इसे आधुनिक रूप सन् 2018 में दिया गया है .84 यात्रियों की क्षमता वाली सुन्दर सुविधाजनक और पारदर्शी स्विस-मेड केबल कार का निर्माण प्रसिद्ध केबल इंजीनियरिंग कम्पनी Doppelmeyr Garaventa द्वारा किया गया है . दक्षिणी गोलार्द्ध की यह सबसे अधिक लम्बी बड़ी और ढलान वाली हवाई केबल-कार है . संभवत मनोरम और रोमांचक भी . शीशे के पार थ्री सिस्टर्स , ओरफन रॉक ,खड़ी चट्टानें और सुदूर तक बिछा हुआ सा सघन वन देखते हुए ऊपर की ओर जाते हैं तब उड़ने का सा अनुभव होता है . वह सचमुच एक अपूर्व और अविस्मरणीय अनुभव रहा .




स्काइ वे 

स्काइ वे--दो शिखरों के बीच 270 मीटर लम्बा , सीधा हवाई मार्ग है जो सुन्दर पारदर्शी 84 यात्रियों की क्षमता वाली केबल-कार द्वारा तय किया जाता है . हालांकि पूरी लम्बाई 720 मीटर की है लेकिन कोई कारण रहा होगा कि सफर 270 मीटर तक सीमित किया गया है . सन् 1958 में शुरु 'स्काइवे' ऑस्ट्रेलिया की पहली केबल-कार थी . आधुनिक स्विस-मेड कार सन् 2017 में जारी की गई है ..'स्काइ वे' पर सुन्दर आरामदेह पारदर्शी केबल-कार में चलते हुए , जैसा कि नाम (Sky way )से ही स्पष्ट है पौराणिक कथाओं में वर्णित आकाशमार्ग और दिव्य विमान का स्मरण होता है .पारदर्शी कार में ऊपर आसमान का नीला वितान तना है तो नीचे वनाच्छादित जेमिसन वैली में हरा शामियाना बिछा हुआ हो . आजू बाजू में थ्री सिस्टर्स , कटूम्बा फॉल ,सूनी खड़ी चट्टानें ..सबकुछ स्वप्निल सा ..विहंगम दृष्टि में सुदूर अंचल सिमट आया लगता है .

वॉक वे
वॉक वे— ‘सीनिक वाक वे’ सीनिक रेलवे और केबल वे’के बीच सघन और ऊँचे ऊँचे वृक्षों के वितान तले लगभग 500 मीटर लम्बा तख्तों ( लकड़ी के पटरों ) पर बना स्थानीय वन्य जीवों और जड़ी बूटियों से भरा मनोरम मार्ग है जो जुरासिक युग का आभास कराता है . लगभग बीस मिनट के पैदल मार्ग में रंग बिरंगे पक्षियों की चुहल और कलरव ,अनेक प्रकार के वृक्ष मिलते हैं साथ ही उनकी कहानियाँ भी . एक दो और भी लम्बे और ढलान वाल मार्ग हैं लेकिन हमने यही रास्ता चुना . बीच में कोयले की खदान का प्रवेश द्वार भी मिला जहाँ खदान में काम करने वाले की और उसके घोड़े (pony छोटा घोड़ा ) की पीतल की बनी प्रतिमा भी देखने मिली .
कोल माइनर और  पोनी 


उसके इतिहास से जुड़ी जानकारियाँ भी कि कोयले की खदान John Britty North  (जिसे ‘फादर ऑफ कटूम्बा‘ कहा जाता है) द्वारा 1879 में शुरु की गई थी . वैसे खदान की शुरआत तो 1872 में होगई थी लेकिन रजिस्ट्रेशन 1878 के बाद ही हुआ . 1945 में इसे बन्द कर दिया गया .

जिनोलन गुफाएं---जिनोलन गुफाएं ऑस्ट्रेलिया में गुफाओं की सबसे बड़ी श्रंखला है . ये ब्ल्यू माउंटेन के पठारी क्षेत्र में चूना-पत्थर की गुफाएं हैं जिनमें अन्दर चूने के पानी से बनी विचित्र आकृतियों चकित करती हैं .अपनी विचित्रता और रोमांचक सुन्दरता के कारण जिनोलन गुफाओं को सन् 1866 से पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किया गया है जिनोलन Jenolan की उत्पत्ति ऑस्ट्रेलिया के मूलनिवासियों द्वारा प्रयुक्त Gnowlan से हुई है जिसका आशय पैर की आक़ृति वाली उच्चभूमि से है .

जिनोलन गुफाएं वैसे तो लगभग 22 हैं लेकिन उनमें दस ही गुफाएं पर्यटकों के लिये खोली गई हैं . उनमें भी तीन गुफाएं ही अधिकांशतः देखी जाती हैं –ओरिएंट , इम्पीरियल और चिफली .

ल्यूसिंडा चेम्बर में शाल

हम लोगों ने चिफली chifley गुफा देखी . इसे 1880 में Jeremiah Winson ने खोजा था .इसका मूल नाम Left Imperial था. सन् 1952 में प्रधानमंत्री Mr. Ben Chifley के सम्मान में इस गुफा का नाम चिफली रखा गया . 690 मीटर लम्बी इस गुफा में 421 सीढ़ियाँ हैं . रंगबिरंगी रोशनी के बीच सँकरे रास्तों पर चढ़ते उतरते वाकपटु और स्मार्ट गाइड हर जगह , जीवाश्म और चूने के पानी से स्वतऋ निर्मित अनौखी आकृतियों के बारे में समझाती और कहानियाँ सुनाती जा रही थी कि यह मार्गरीटा Margarita चेम्बर है जिसे सबसे पहले बिजली के बल्वों से प्रकाशित किया गया

मैडोना चेम्बर

मेडोना Medonna चेम्बर का यह नाम चूने के पानी के रिसने से बनी आक़तियों में प्रसिद्ध गायिका और अभिनेत्री मेडोना और उसके बच्चों की कल्पना करके रखा गया . .और .ल्यूसिंडा Lcinda Chamber., जिनोलन गुफा का सबसे खूबसूरत हिस्सा है .कई जगह बार्डर वाले शॉल या साड़ी के खूबसूरत पल्ले जैसी आकृतियाँ चकित करती हैं .स्फटिक और झिलमिलाते सुनहरे रुपहले कण धरती का रत्नगर्भा नाम सार्थक करते लगते हैं . चूना मिश्रित पानी रिसने से बनी और बनती जारहीं विचित्र और मोहक आकृतियाँ किसी को भी विस्मय से भरने के लिये पर्याप्त हैं . इस जगह की खूबसूरती से Jeremiah इतना प्रभावित हुआ कि इसे अपनी पत्नी Lusinda का नाम दे दिया . इसके अलावा Wall Of noses, Lion’s Den . katies Bower गुफा के अन्य आकर्षण थे . Katies Bower 19 वर्षीया बहादुर लड़की Katie Webb की कहानी कहता है .  कैटी की जिद थी कि गुफा में जिस रास्ते से आए हैं उससे लौटेंगे नहीं 

कैटी बाउर
उसकी दृढ़ता ने Jeremiah को काफी प्रभावित किया और एक रस्सी के सहारे कैटी को अँधेरी गुफा में उतार दिया इस तरह गुफा में एक नयी खोज हुई .

गुफा में कुछ पल लाइट बन्द करके यह अनुभव भी कराया कि मानव ने कभी ऐसे अँधेऱों में भी जीवन बिताया होगा और किसी भी तरह रोशनी की व्यवस्था की होगी या फिर अभ्यस्त होगया होगा अँधेरे का ..कैसा होगा वह युग भूगर्भ में कितने रहस्य छुपे हैं . कितनी हलचलें होती रही हैं कि पर्वत से समुद्र् और समुद्र से पर्वत बन जाते हैं .एक बार कहीं पढ़ा था कि हिमालय में व्हेल का जीवाश्म मिला था . मेरा विचार है कि हर बच्चे को भूगोल की जानकारी अवश्य होनी चाहिये . धरती से जुड़कर ही जीवन का यथार्थ समझ आता है . प्रकृति के आगे हम कुछ नहीं हैं .

चूने का पानी रिसने से बनी आकृति

हमारे देश में बस्तर में भी चूने के पत्थर की बिल्कुल ऐसी ही गुफाएं हैं कोई अन्तर नहीं .

एक घंटे के गुफा भ्रमण के बाद हम बाहर आए तो उजाला और भी सुहाना लग रहा था .

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आधारभूत जानकारियां गूगल से साभार 

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रविवार, 4 सितंबर 2022

उन दिनों ऐसे भी शिक्षक थे .

 

माँ का सुनाया एक अविस्मरणीय संस्मरण

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"उन दिनों स्कूल लगभग आठ घंटे लगता था । सुबह से दोपहर की पाली में और फिर तीन से चार घंटे शाम को "--एक दिन मेरे आग्रह पर माँ ने जब अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताया तो बचपन जैसे उनकी आँखों में साकार हो उठा । 
"यह सन् 1946-47 के आसपासकी बात है । तब मध्यप्रदेश को मध्यभारत कहा जाता था । ग्वालियर में सिन्धिया जी का राज था । गाँवों की व्यवस्था जमींदारों के हाथों में थीं ."
वे उल्लास सहित बताने लगीं---
"हमारे गुरुजी पं. छोटेलाल जी थे । पाँच या दस रुपए वेतन मिलता था । कच्ची ,लेकिन लिपी-पुती और एकदम साफ-सुथरी खपरैल( पाटौर) हमारी पाठशाला थी जिसकी दीवारों पर खुद गुरुजी ने ही रंगों से वर्णमाला ,पक्षी फूल फल और पशुओं को अंकित किया था । दिशाओं की सही जानकारी के लिये चारों दीवारों पर दिशाओं के हिसाब से बडे अक्षरों में पूरब,पश्चिम,उत्तर व दक्षिण लिख दिया गया था । वैसे दिशाओं ज्ञान वे एक बडे आसान तरीके से कराते थे कि सुबह के समय जब हमारा मुख सूरज की ओर होता है तब हमारी पीठ पश्चिम की तरफ होती है ,बाँया हाथ उत्तर में और दाँया हाथ दक्षिण की ओर होता है । शाम को ठीक इसके विपरीत होता है यानी मुख पश्चिम की ओर तो पीठ पूरब की ओर...।
झकाझक सफेद कमीज और धोती पहने ,माथे पर रोली का तिलक लगा ,पैरों में खडाऊँ डाले जब पंडित जी शाला में आते थे तो हम सब उनके सम्मान में एक साथ खडे होजाते थे , मानो इतनी देर से हम केवल खड़े होने के लिये ही बैठे थे । लगभग पन्द्रह मिनट ईश-विनय होती और फिर गुरुजी  सबके ,कपडों ,बालों दाँतों व नाखूनों का निरीक्षण करते थे । वैसे तो वे हमारे साथ जमीन पर ही बैठ कर बड़े प्रेम से हर चीज समझाते थे लेकिन निर्देश के अनुसार काम न मिलने पर सजा के लिये उनके पास पतली हरी संटी भी रहती थी जो हथेली पर पड़ने से पहले ही सांय की आवाज से मन में दहशत भर देती थी और इसमें सन्देह नही कि वह दहशत समय पर काम पूरा करने में सहायक ही होती थी ।
इसके बाद सबकी पट्टियों व सुलेख की जाँच होती थी । उस समय स्लेट भी नही थी । काठ की बड़ी-बड़ी पट्टियाँ ही स्लेट का काम देतीं तीं जिन्हें कालिख से पोत कर काँच से घिस-घिसकर चमकाना भी एक जरूरी काम था । सरकंडे से खुद अपनी कलम बनानी होती थी । गुरुजी पहले ही सिखा देते थे कि बडे अक्षरों के लिये नोंक कितनी चौड़ी हो और छोटे अक्षरों के लिये कितनी पतली । खड़िया के घोल में कलम डुबाकर पट्टी पर सफाई व सुघड़ता से लिखना होता था वरना गुरूजी की संटी को सक्रिय होने में देर नही लगती थी । साफ सुन्दर और शुद्ध लेखन तब पढाई की पहली की पहली शर्त हुआ करता था ।
सुबह के चार घंटों में केवल हिन्दी, व सामाजिक अध्ययन पढाया जाता था । हिन्दी में व्यंजनों व मात्राओं के उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता था । 'श' की जगह 'स' या व'' की जगह 'ब' जैसी गलतियों को वे बिल्कुल बर्दाश्त नही करते थे । मात्राओं के उच्चारण में वे हमारी ही नही अपनी भी दम निकाल लेते थे । 'क' पर 'आ' की मात्रा लगाने पर वे पूरा मुँह खोलकर बुलवाते--"-काssss" । फिर 'इ' की मात्रा पर झटके से रुकते --'कि' । फिर 'ई' की मात्रा पर वही लम्बा स्वर होता --"कीssss" । और इस तरह मात्राओं के गलत होने का सवाल ही नही था । इतिहास को वे कहानी की सुनाते थे और भूगोल को नक्शों, माडलों से या बाहर नदी और मैदान में जाकर, पहाड़ दिखाकर पढ़ाते थे । ग्राफ द्वारा वे भारत का नक्शा इतनी अच्छी तरह बनवाते थे कि न तो कच्छ की खाड़ी में कोई गलती होती न ही पूर्वांचल की सीमाओं में । अन्त में वे इबारत लिखवाते या कोई व्यावहारिक कार्य करवाते जैसे तकली चलाना ,नारियल के खोखले के टुकडों को घिस कर  बटन बनाना या गीली मिट्टी से फलों व सब्जियों के माडल व कौड़ियाँ बनाना । सुबह की पाली दोपहर खत्म होजाती थी ।
"और फिर दूसरी पाली ?"
ऐसी निराली पाठशाला के बारे में और भी जानने की मेरी उत्कण्ठा बढ़ गई तो माँ भी दुगने उत्साह से बताने लगीं---"दूसरी पाली चार बजे शुरु होजाती थी । बीच में मिले विराम में पंडितजी खाना बनाते--खाते और हम जुट जाते अपनी पट्टियाँ चमकाने में । शाम की पाली होती थी गणित व खेलों की । गिनती ,पहाडे, पाव ,पौना ,ड्यौढा सब कण्ठस्थ करने होते थे और बेसिक सवाल (जोड. बाकी,गुणा,भाग )अधिकतर मौखिक ही होते थे जैसे कि 'सत्रह में क्या जोडें कि पच्चीस होजाएं ?'या कि 'तीन किताबें चौबीस रुपए की तो पाँच किताबों का मूल्य क्या होगा ?' केवल बड़े और कठिन सवाल ही स्लेट या कापी में करने होते थे ।
पी.टी. करवाते समय जब वो कड़क आवाज में सावधान कहते तो लगता कि एक पखेरुओं का झुण्ड साथ पंख फड़फड़ाकर उड़ने तैयार हो । खेलों में खो,खो कबड्डी ,रूमालझपट,कोडामार और कुक्कुट युद्ध जैसे अनेक खेल होते थे । शाम पाँच-छह बजे छुट्टी मिल जाती थी । पंडितजी दिशा-मैदान चले जाते और हम पूरी तरह आजाद ।
रात में भी दो घंटे पंडित जी की पाठशाला चलती थी । तब वे लोग पढ़ते थे जो खेती के कामकाज या गाय-भैंसचराने के कारण दिन में नही पढ़ पाते थे । पंडितजी को वेतन मात्र कामचलाऊ ही मिलता था . प्रसिद्धि की उन्हें कोई लालसा नहीं थी . वे अपने काम को ईश्वर की पूजा का ही एक रूप कहते थे और पूरी लगन व ईमानदारी से करते थे लेकिन उन्होंने जो कमाया उसके आगे रुपया पैसा सब बेकार है .आज भी आदर्श शिक्षक के रूप में उन्हीं का नाम लिया जाता है गाँव में . ...
और कुछ लोग तो.....माँ कुछ रुकीं और मुस्करा कर बहत्तर वर्षीय देवीराम को देखा जो अचानक हमारे वार्तालाप को सुनकर आ खडे हुए थे । वे माँ के सहपाठी रहे थे । उन्हें देखकर माँ पुलक के साथ बोलीं---"-हाँ मैं कह रही थी कि उनके कुछ शिष्य तो आज भी उनके नाम से थरथराते हैं । क्यों देवी भैया !"
देवीराम आदर ,लज्जा व बचपन की यादों की मिठास से भर उठे । माँ कहने लगीं---"देवी भैया कक्षा के सबसे फिसड्डी छात्र थे । इन्हें कई बार समझाने पर भी कुछ याद नही होता था । कभी सबक पूरा करके नही लाते थे । बस कभी 'पंडी इक्की जाऊँ ?'तो कभी 'दुक्की जाऊँ' रटते रहते थे । ( इक्की, दुक्की का प्रयोग क्रमशः पेशाब जाने व शौच जाने के लिये होता था ) इतना कहते कहते माँ की हँसी फूट पडी । मैंने देखा उनके चेहरे की झुर्रियाँ कहीं गायब होगईं हैं ।
"तब सबक याद न करने पर तुम्हारी कितनी पिटाई होती थी भैया । याद है ?"
"सब याद है, बाईसाब ,सब याद है ।"-- देवीराम जैसे किसी स्वप्न संसार की सैर कर रहे थे----"वे क्या दिन थे ! अब कहाँ वैसी पढाई और कहाँ वैसा सनेह ! वह तो मार भी अच्छी थी । उसी मार के कारण मुझ जैसा निखट्टू भी उँगलियों पर हिसाब करना सीख गया था । और सारे सबक तो मुझे ऐसे रट गए कि आज तक नही भूला । आज भी पूरा याद है । "
"कौनसे सबक ?"---मेरी जिज्ञासा जागी ।
"अरे हाँ पुस्तक के पाठ, इबारत और कठिन शब्द लिखते-पढते हम सबको याद भी होजाते थे । केवल देवीराम भैया को ही याद नही होते थे । पर एक दिन इन्होंने सारे सबक एक साथ गुरूजी को सुना दिये तब हँसते-हँसते उन्होंने इनकी पीठ खूब ठोकी थी और एक दुअन्नी इनाम भी दी थी । तो फिर आज वह सारा कंठस्थ सबक सुना ही दो भैया ।"--माँ ने आग्रह किया । मैंने माँ की बात एक बार और दोहराई । तब बहत्तर साल के देवीराम ने बारह साल के छात्र की तरह सावधान मुद्रा में खडे होकर वह सबक सुनाया--- तीन अच्छरों के शब्द जैसे बतख, महल,नगर...चार अक्षर के शब्द जैसे खटमल, अजगर, ...माला-काला, पानी-नानी, सूप-धूप ,मेला-ठेला-केला ...पीतल का रंग पीला होता है ,नीम कडवा होता है, बतासा मीठा होता है ,सडा फल मत खा, रोज दाँतों में मंजन कर , झूठ मत बोल, लज्जा नारी का भूषण होता है , गिद्ध की निगाह तेज होती है ,बर्र का डंक जहरीला होता है , मच्छर के काटने से मलेरिया होता है ,गन्दा पानी इकट्ठा मत होने दो ,पेड मत काटो ,जीवों पर दया कर, ठठ्ठा मत कर , सुबह घूमना अच्छा होता है , चोरी करना बुरी बात है मीठा खाने से दाँतों में कीडा लगता है ,मिले अच्छर याद कर जैसे--डुग्गी ,घुग्घू, झझ्झर, मच्छर, कंकड , जैसे--गिद्ध, डिब्बा, कुप्पा ...ड्यौढा एकम् ड्यौढा, ड्यौढा दूनी तीन, ड्यौढा तीय साढे चार.....एकन पन्द्रह, दूनी तीस, तिय पैंतालीस ,चौके साठ......
सबक चल रहा था लगातार बिना साँस लिये । पूर्ण विराम तो दूर कहीं अल्प-विराम भी नही । हम सबकी हँसी दबे-दबे ठहाकों में बदल गई थी पर देवीराम पूरी गंभीरता व सजगता के साथ अपना सबक सुनाए जारहे थे मानो किसी छात्र को बीच में ध्यान बंग होजाने पर सबक भूल जाने का डर हो ,भूल जाने पर गुरुजी की नाराजी का डर हो या कि वह भी दिखा देना चाहता हो कि सबक याद करने में वह किसी से कम नही है ।
आज समय और परिवेश के साथ शिक्षक व शिक्षा के अर्थ ही बदल गए हैं

रविवार, 28 अगस्त 2022

सिडनी डायरी--5

ब्ल्यू माउंटेन में एक बार फिर 
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पिछली बार जब हम ‘ब्ल्यू माउंटेन गए थे, तब केवल थ्री सिस्टर्स और चलते चलते एक फॉल देखकर लौट आए थे लेकिन मालूम था कि यह भ्रमण पूरे शहर में एक छोटा सा बाजार देखने जैसा है. क्योंकि ब्ल्यू माउंटेन लगभग 11400 वर्ग किमी में फैला है . इसकी लम्बाई लगभग 50-60 किमी है . इसमें ‘सीनिक वर्ल्ड’ , ‘केबल वे’ , ‘स्काई वे’ , ‘वॉक वे’ और केव्स (गुफाओं) के अलावा अनौखी शैलाकृतियों , फॉल, सघन वनों से आवृत्त पर्वतीय प्रकृति का सुरम्य संसार इतना व्यापक है कि उसे एक दिन में नहीं देखा जा सकता था .इसलिये मयंक-श्वेता ने इस बार पूरे तीन दिन के लिये बुकिंग कराली . इस तरह 19 अगस्त को मयंक ने कार की स्टेयरिंग सम्हाली और हमने अपनी सीट .

पैरामेटा से माउंटेन में हमारे गन्तव्य तक का लगभ 80 किमी का मार्ग इस बार और भी मनोरम लगा .ये सर्दियों के जाने और धीरे धीरे वसन्त के आने के दिन हैं . इसका पता पूरे रास्ते छोटे छोटे पीले फूलों के गुच्छों से लदी टहनियों और सफेद गुलाबी फूलों से भरी छोटी झाड़ियों ने दिया .. कहीं कहीं चैरी-ब्लॉसम की कलियाँ पलकें खोल मुस्कराने लगीं हैं . अनेक प्रकार के फूलों के साथ खूबसूरत चैरीब्लॉसम की बेशुमार झाड़ियाँ भी यहां-वहाँ ऋतुरानी की प्रतीक्षा में खड़ी दिखाई दे रही हैं कि वह आए और हमारी टहनियों को ढेर सारे गुलाबी ,सफेद फूलों से भरदे .श्वेता ने बताया कि वसन्त में सड़क के दोनों ओर वीरान से खड़े सारे पेड़ लाल-गुलाबी फूलों से भर जाते हैं .

चैरी ब्लॉसम फूल जो कुछ दिनों बाद
पूरी वादी में छा जाएंगे  

 बीच में कुछ देर ‘dolly's Donuts’ पर रुके . यह ग्लेंब्रुक टाउनशिप के पास एक फेमस कॉफी शॉप और रेस्टोरेंट है . यहाँ के ये डोनट्स् (स्वीट-स्नैक्स) काफी पसन्द किये जाते हैं . हमने कॉफी के साथ कुछ ‘डोनट्स’ खरीदे . बच्चे मिठाई से अधिक डोनट्स पसन्द करते हैं .

“मम्मी देखना नदी आनेवाली है . ”- वहाँ से कुछ दूर बढ़ने पर मयंक ने बताया . उसे मालूम है कि मुझे समुद्र की अपेक्षा .नदियाँ , विशेषकर कल कल बहती नदियाँ देखना बड़ा अच्छा लगता है . नदी किनारों के बन्धनों के बीच भी उन्मुक्त बहती है , लम्बी यात्रा में भी जहाँ चट्टानें मिलीं नहीं कि पिता पर्वत की गोद की अनुभूति पाकर बचपन कल कल ध्वनि में खिलखिला उठता है .उसके हृदय में धरती को सींचते चलने की चाह होती है , उसके सपनों में हरियाली लहलहाती है ..सतत प्रवाहित..उर्वरा , कितने ही प्राणियों ,वनस्पतियों को पालने का हौसला ..नदी की प्रकृति के साथ एक आत्मीयता है .समुद्र जैसी अपार गहन गंभीरता व विशालता मेरी सीमित सोच के लिये एक पहेली ही है .उसकी प्रकृति और गतिविधियाँ कल्पना से परे है . 

खैर..जब नदी की बात चल पड़ी तो मैंने उस नदी के बारे में और जानने साथ कुछ जानकारियाँ भी हासिल करने की कोशिश की  .जैसे नेपियन नदी का मूल नाम Yandhai (Dhruk) है .इसे नेपियन नाम ब्रिटिश राजनेता और उपनिवेश प्रशासक Evav Nepean के सम्मान में सन् 1789 ई. में दिया गया . यह नदी न्यू साउथ वेल्स की दक्षिणी उच्चभूमि की Mittagong range से निकल कर Grose river  के साथ मिलती है तब Hawkesbury river बन जाती है . लगभग 178 किमी का सफर पूरा कर Broken Bay में मिल जाती है अन्ततः ‘तस्मान’ सागर में . यह एक सदानीरा नदी है और पेयजल का सबसे बड़ा साधन .

नेपियन -हॉक्सबरी नदी ( चित्र गूगल से साभार)

नेपियन नदी के बाद धरातल की ऊँचाई बढ़ती जाती है .रोचक बात है कि ऊंची नीची सड़क पर झूलते हुए पता नहीं चलता कि हम 1100 मीटर ऊँची पहाड़ कही जाने वाली जगह पर पहुँच गए है

ब्ल्यू माउंटेन नाम की सार्थकता

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आवास जहाँ हम ठहरे

मैंने पढ़ा था कि सन् 1788 ई. में आर्थर फिलिप द्वारा इस क्षेत्र का नाम कार्मार्थन और लैंसडाउन हिल्स रखा गया था। कार्मार्थन पहाड़ियाँ क्षेत्र के उत्तर में थी और लैंसडाउन पहाड़ियाँ दक्षिण में लेकिन पूरी पर्वत श्रंखला में यूकेलिप्टस के पेड़ अधिकता में हैं . इस पेड़ की पत्तियाँ दूसरे पेड़ों जैसी हरी न होकर हल्की नीलिमायुक्त होती हैं जो दूर से नीले रंग का आभास देती हैं .विज्ञान की भाषा में पेड़ों द्वारा बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील ‘टेरपेनोइड्स’ के कारण किरणों का बिखराव होता है इस प्रकार नीली धुंध बनती है जिसके लिए पहाड़ों का नाम ब्ल्यूमाउंटेन रखा गया . हमारे यहाँ भी तमिलनाडु में स्थित पर्वत श्रंखला का नाम 'नीलगिरि की पहाड़ियाँ' है ,जो यूकेलिप्टस ( नीलगिरि )के पेड़ों से ढँकी हुई हैं . 

थ्री सिस्टर्स में  कई जगह  ऐसे बोर्ड लगे हैं  .

जिस समय हम कटुम्बा टाउन में पहुँचे , दोपहर के 12--12.30 का समय था . इस बार हमारा विचार नीच उतरकर 'थ्री सिस्टर्स' वाली पहाड़ियों तक पहुँचने का था .पहले जब आए थे, सारा परिदृश्य ऊपर से ही देखकर चले गए थे . 'थ्री सिस्टर्स' तक पहुँचने के लिये यूकेलिप्टस और दूसरे तमाम तरह के पेड़ों से घिरा सुन्दर ट्रैक है . लेकिन उन तीन पहाड़ियों से कुछ ही दूर पहले रास्ता बन्द कर दिया गया है . इसलिये हमें बीच से ही लौटना पड़ा .लौटते हुए रास्ते में ‘वूलवर्थ’ से दूध और कुछ ज़रूरी सामान लिया और पहले अपने गन्तव्य पर पहुँचे जहाँ हमें दो रातें बितानी थीं . यह कटुम्बा से लगभग 12 मिनट की दूरी पर Blackheth  village में था . यहीं मैंने जाना कि 'विलेज' का मतलब हर जगह 'गाँव' नहीं होता . जैसे कॉटेज या कुटीर का मतलब छप्पर या झोपड़ी नहीं होता . चारों ओर ऊँचे अनाम वृक्षों के बीच सुन्दर सर्वसुविधायुक्त आवास , जिसमें दो कमरे ,हॉल किचन दो टॉयलेट्स यानी 'टू बी एच' के फ्लैट जैसा ही . साथ वाले पोर्शन में शीशे के पार एक बुजुर्ग दिखे जो किसी विचार में डूबे से बैठे थे . सामने कु्र्सी पर एक हमउम्र महिला . ये मकान मालिक होंगे हमने सोचा . उनकी नीली कार बाहर ही रखी थी . 

बाहर पेड़ों पर शाम उतरने लगी थी . चिड़ियों के कलरव से पेड़ ही नहीं पूरा आसमान गूँज रहा था . शायद यह घर बच्चों के पास लौटने की खुशी होती है . उधर पड़ोस के घर से एक डॉगी महाशय यहाँ की परम्परा ( Don't interfere in others) को तोड़ते हुए और अपनी सभ्य स्वामिनी की समझाइश को दरकिनार कर बाउण्ड्री से ऊपर सिर उठाकर जब तब हमसे पता पूछ लेते थे कि कौन हो ? कहाँ से आए हो ?  मकान के चारों ओर आकाश को ताकते ऊँचे पेड़ थे . सूरज जैसे ही यूकेलिप्टस के झुरमुट के पीछे अदृश्य हुआ कि सर्दी ने बड़ी सख्ती से हमें अन्दर जाने को कह दिया . अन्दर आकर मैंने देखा वे सज्जन अभी तक उसी मुद्रा में बैठे थे . वहाँ कुछ मकानों के बाद ही चारों ओर जंगल का एहसास होता है . लाइट केवल घरों और बाजार में होती है .इसलिये दिन की अपेक्षा रात कुछ ज्यादा ही सुनसान और सन्नाटे भरी लगती है . वहाँ स्ट्रीट लाइट नही थी . दिन की पलकें मुँदते ही उजाला सड़कों पर केवल गाड़ियों का और घरों में बिजली का होता है . बहुत दिनों बाद हमने आसमान को तारों से भरा देखा . जैसा हम केवल अपने गाँव में देखा करते थे . 

रात्रि का भोजन हमने घर से बनाकर लाई मिक्स सब्जी और पराँठों और ओवन में पकाए शाकाहारी ‘बार्बीक्यू के साथ किया . बगल वाले पोर्शन में शीशे के पीछे अब पर्दा लग गया था .रात में सर्दी बहुत थी पर विद्युत-प्रवाह से कुनकुने गरम हुए बिस्तर में काफी अच्छी नींद आई . सुबह बाहर घास और कारों पर जमे हिमकणों से पता चला कि रात में तापमान कितना नीचे चला गया था . हवा में बर्फीली छुअन थी . .सुबह हवा तेज व नुकीली थी पर पेड़ों की फुनगियों से उतरती धूप सुबह को सुहानी बना रही थीं .चिड़ियाँ चहचहाकर धूप का उत्सव मना रही थीं ..घास के मैदान में अब धूप की चिड़िया नीचे उतर आई थी और घास पर बिखरे मोती चुगने लगी थी .....अगले वृत्तान्त में भी जारी .......



    

रविवार, 7 अगस्त 2022

और कितनी आजादी ?

 

अभी एक बाल पत्रिका के सम्पादकीय में एक प्रसंग है कि किसी स्कूल में आजादी के अमृतमहोत्सव में अध्यक्ष बच्चों को बताते हैं कि हमारे देश को आज़ाद हुए 75 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आजादी अधूरी है . असली आजादी मिलनी अभी बाकी है . इस तरह के रटे रटाए भाषण मंचों पर अक्सर सुनने मिल जाते हैं .वे तो केवल रटा हुआ भाषण पढ़ते हैं ,लेकिन हमारे देश में कुछ बहुत ज्यादा पढ़े लिखे लोगों का भी यही मानना है कि हम पूरी तरह आजाद नहीं हैं . मैं चकित हूँ . और कितनी आजादी चाहिये ? 

देश में आप जहाँ चाहे आ जा सकते हैं , रह सकते हैं .जाति धर्म के आधार पर कोई भेद या दबाब नहीं . आप किसी भी अव्यवस्था या परेशानी के लिये शिकायत कर सकते हैं . आपको अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मिली हुई है . सच कहूँ तो कुछ अधिक मिली है . कई बार तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नौसिखिया के हाथ में पिस्तौल थमा देने जैसी सिद्ध होती है . 

लेकिन हमारे देश में तो आजादी इससे कहीँ बहुत आगे ले रखी है लोगों ने .संसद से लेकर सड़क तक और नेताओं से लेकर गली मोहल्लों के लोग तक किसी भी ज़रूरी/गैरज़रूरी मुद्दे ले सड़क घेर कर बैठ जाते हैं ,चाहे यातायात बाधित होता रहे . अपनी सुविधा के लिये सरेआम नियम तोड़ते हैं .ज़रा सी व्यक्तिगत असुविधा पर पूरे देश को ही कोसना शुरु कर देते हैं . कानून का गलत लाभ उठाते हैं . धर्म और जाति के नाम पर अफवाहें व विध्वंस फैलाते हैं . विरोधप्रदर्शन के लिये गाड़ियाँ व ट्रेन रोक ही नहीं लेते उन्हें जला भी देते हैं , देश विरोधी बातें ही नहीं करते ,खुले आम देश के टुकड़े होने का ऐलान भी करते हैं , दूसरे देश का झण्डा लेकर जिन्दाबाद के नारे लगा लेते हैं , धर्म विषयक आपत्तिजनक बातें करके , निराधार अफवाहें फैलाकर  समाज में अशान्ति फैलाते हैं . डाक्टर ,पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों तक को पीट लेते हैं , फेसबुक ट्विटर पर अपनी चाहे जैसी भड़ास निकालते रहते हैं . अपना काम छोड़कर महीनों तक आन्दोलन करने का समय और अधिकार है आपके पास , चर्चित होने के लिये मर्यादा विरुद्ध लिखने बोलने, यहाँ तक कि निर्लज्जता के साथ निर्वस्त्र प्रदर्शन की आजादी तक आपके पास है भला और कितनी आजादी चाहिये ? 

आजादी को अधूरी कहने वाले लोगों ने कभी बैठकर सोचा है कि जिसे वे अधूरी आजादी कहते हैं वह आजादी मंच पर रटे रटाए भाषण देकर कोरे कागज काले करके नहीं मिली थी . आजादी कोई पेड़ में पका फल नहीं थी कि टहनी हिलाई और टप्प से झोली में आ गिरी . उसे पाने के लिये लगभग दो सौ साल देश के लाखों लोगों का खून बहा था . हजारों ने हँसते हँसते प्राणों की बलि दी थी . असंख्य वीरों ने जीवन के सारे सुख त्याग दिये थे और काँटों की राह पर चल पड़े थे . और महीनों ,सालों तक आजादी की आग सीने में धधकाए झुलसते रहे थे . पर उन्हें परवाह थी केवल आजादी की क्योंकि वे अपने लिये नहीं , देश के लिये लड़े थे क्योंकि वे देशभक्त थे . खुद से ज्यादा देश के लिये सोचते थे .प्राणपण से लड़े थे ताकि देश को विदेशी शिकंजे से मुक्ति मिले . ऐसी आजादी को अधूरी आजादी कहना , क्रान्तिकारी वीरों का इससे अधिक अपमान और क्या होगा . वास्तव में अधूरे तो वे सपने हैं जो क्रान्तिकारियों ने आजाद देश के लिये देखे थे .   

वास्तव में आजादी की कीमत वह कभी नहीं समझ सकता जो आजादी के इतिहास को , देशभक्त वीरों की विकलता ,अंगरेजों के अत्याचारों के विरोध और देश के लिये उनकी चिन्ता को अनुभव करते हुए नहीं पढ़ता . आजादी का पर्व अव्यवस्थाओं को गाने का नहीं ,देश के वीरों ,जाँबाज़ों को याद करने का है, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का और उनके देखे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेने का है . स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास पढ़ना सुनना, वीरों के शौर्य व शहादत को याद करना ,समाज और देश के प्रति अपने दायित्त्व समझना ..ये ही बातें हैं जो हमारे राष्ट्रीय पर्व हमें याद दिलाते हैं . और इसे याद रखने पर ही हम आजादी का महत्त्व न केवल समझ सकते हैं बल्कि उसे बनाए व बचाए भी रख सकते हैं . इसके लिये आज देश में और खासतौर पर राजनीति में देशभक्त नौजवानों की ज़रूरत है . कुछ लोग देशभक्ति शब्द का मज़ाक उड़ाते हैं उसे आडम्बर कहते हैं .पर देशभक्ति की वह उत्कट भावना ही थी जिसके कारण वीरों ने त्याग और बलिदान किया , हमें आजादी मिली . अपने देश के प्रति प्रेम और कर्त्तव्य-निष्ठा के कारण ही हमारे सेना के जवान दुर्गम पहाड़ों में साहस के साथ डँटे रहते हैं . सच्ची देशभक्ति ही हमें ईमानदारी से देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने प्रेरित करती है .

इसलिये आजादी के पर्व पर हम शहीदों को याद करते हुए , उनके द्वारा सौंपी आजादी को एक अनमोल उपहार समझें  कीमत समझते हुए उसे बचाए रखने का प्रण करते हुए पर्व मनाएं . वरना आजादी को अधूरी कहते कहते यह होगा कि “आधी छोड़ पूरी को धावे , वह भी आधी हाथ से जावे .” जय हिन्द ,जय हिन्द की सेना .