एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .
प्राणवायु
सा साँसों में, जीवन हिन्दी का है .
जैसे भावों को माँ समझे और सबको समझाए .
माँ
के वशभर सन्तानों का सिर न कभी झुक पाए .
अपने
अन्तर की बातें माँ से ही कह सकते है .
उसके
अंचल की छाया में निर्भय रह सकते हैं .
माँ के आंचल जैसा ही , सम्बल हिन्दी का है .
एक दिवस
ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है.
हिन्दी
भाषा मन की देहरी , सही पता है घर का .
आना जाना सहज सुगम रहता है भाव-प्रवर का .
हिन्दी
अपने घर का आँगन , जहाँ बसा है बचपन .
गभुआरे
बालों की खुशबू रची बसी है कण कण .
अधरों
पर पहला ही उच्चारण हिन्दी का हो .
एक दिवस
ही क्यों अपना हर दिन हो .
धरती
है यह धरती पर ही पाँव जमा सकते हैं
चलते
चलते बिना रुके मंजिल को पा सकते हैं .
इसके
उर्वर अंचल में उगती फसलें सपनों की ,
अनजानी
सी राहों में यह भाषा है अपनों की .
दिल को दिल से जोड़े वह बन्धन हिन्दी का है .
एक दिवस
ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .
साथ दूध मे हिन्दी भी माँ ने मिसरी सी घोली .
संस्कृति
की देहरी पर जैसे सजी हुई रंगोली
सरल
समर्थ व्याकरण सम्मत नदिया सी बहती है
अन्तर
में रच बस जाएं उस बोली में कहती है .
धरा
हमारी हिन्दी और गगन हिन्दी का है .
एक दिवस
क्या हम सबका हर दिन हिन्दी का है
देश
प्रदेश सभी की अपनी भाषाएं उत्तम हैं .
बात
एक को चुनने की तो हिन्दी सर्वोत्तम है
हिन्दी
ऐसा उपवन जिसमें मुकुलित सभी विधाएं,
उत्तर
दक्षिण पूरब पश्चिम गूँजें यही सदाएं
हिन्दी
बोलें पढ़ें लिखें , चिन्तन हिन्दी का हो .
एक दिवस
ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का हो .
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