शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

सपने

सपने नींद में आते हैं .

और जगाकर सोई हुई स्मृतियों को

चले जाते हैं निर्ममता के साथ  

जैसे लौट जाते है बादल उमड़ घुमड़कर

बिना बरसे ही .

सुगबुगा उठती हैं भूली हुई बातें

मुरझाई घास की तरह .

 

सपने आते हैं

जैसे आती हैं,  सागर की छाती को

खरोंचती हुई सी उत्ताल तरंगें .

भिगो जातीं हैं सारा पुलिन.

छोड़ जाती है अपनी निशानियाँ

कुछ चमकते शंख ,सीपियाँ ,

उछलती तड़फती मछलियाँ ,

लहरों की निस्संगता पर

छोड़कर चली गई हैं जो  

अपनी मौज में .

 

सपने आते हैं जैसे

उकेरती हैं उँगलियाँ गीली माटी में

रूहानी सी लकीरें .

गीला मन माटी सा  .

सपने उस पर लिख देते हैं .

एक और गीत

उम्मीद का , इन्तज़ार का .

 

साधारण से लगते सपने

कभी कभी होते हैं असाधारण भी

समेट लाते है विगत को 

दोहराते है किसी मोड़ पर 

छूट गई कहानी फिर से

मिलाते हैं उन्हें भी

नामुमकिन हैं करीब आना जिनका .


कुछ सपने जता जाते है कि कभी 

जीवन्त थीं अनगिन अनुभूतियाँ ,

व्यक्त होने की उम्मीद में .

समाया रहता था आँखों में

एक पूरा आसमान.

उमंगें उड़ती थीं हवा में

आक के रेशों की तरह ..

सपने कहते हैं कि 

पुलिन पर छोड़ गयी हैं लहरें जो मछलियाँ

अभी जिन्दा है , प्रतीक्षा में  

लहरों के लौटने की . 

सपने क्यों आते हैं

यह पूछने की बजाय आश्वस्त हूँ

कि सपने अभी आते हैं .


बुधवार, 26 अक्टूबर 2022

कथा भाई-दौज की -भाई बहिन के अटूट प्रेम की गाथा

 पुनः प्रकाशित

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बचपन में भाई दौज की सुबह से ही हमें याद करा दिया जाता था कि दौज की कहानी सुने बिना और भाई को टीका किए बिना पानी भी नही पीना है । जब हम नहा-धोकर तैयार होजातीं तब दादी या नानी तुलसी के चौरा के पास आसन डाल कर ,घी का दिया जलाकर हमारे हाथ में घी-गुड़ देकर दौज की कहानी शुरु करतीं थीं । कहानी के दौरान कई बार उनका गला भर आता था और कहानी के अन्त में जब वे कहतीं कि जैसा प्रेम उनमें था वैसा भगवान सबमें हो, वे अक्सर पल्लू से आँखें पौंछती मिलतीं थी । बहुत छोटी उम्र में तो हमें नानी--दादी की वह करुणा पल्ले नही पड़ती थी पर उम्र के साथ कहानी में समाए भाई बहन के स्नेह की तरलता की अनुभूति अन्तर को भिगोती गई । आज भी कथा सुनाते दिल भर आता है |पता नही ये लोक-कथाएं किसने लिखीं । कैसे लिखीं ?  लेकिन हमारे जीवन  में गहराई से जुड़ी हैं । जड़ की ही तरह संवेदनाओं का पोषण करती हुई । तभी तो अलिखित होते हुए भी ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहीं हैं । इस कथा को यहाँ देने का मेरा उद्देश्य भी यही है ।
हर भाई को हृदय से शुभकामनाएं देते हुए उस कहानी को ,जिस रूप में मैंने अपनी दादी नानी और माँ से सुनी है ,यहाँ दे रही हूँ । हालाँकि हर  कथा की तरह स्थानीय प्रभाव से निश्चित ही थोड़ा--बहुत अन्तर तो होगा ही लेकिन कथ्य में कोई अन्तर नहीं है .
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    वह अपनी माँ की आँखों का तारा और बहन का इकलौता दुलारा भाई था 'निकोसी पूत'। ( जिसे किसी ने कभी कोसा न हो अभिशाप न दिया हो कहते हैं ऐसे व्यक्ति को बुरी नजर जल्दी लगती है काल भी जैसे उसके लिये तैयार रहता है )  
'भाई दौज' आई तो वह माँ से बोला --"माँ मैं बहन से टीका कराने जाऊँगा ।" माँ कैसे भेजे !  बहुत ही प्यारा और बूढी माँ का इकलौता सहारा था । ऊपर से रास्ता बड़े खतरों से भरा । जाने कितनी 'अलहें' (अनिष्ट) .
"बेटा ना जा । बहन परदेश में है । तू अकेला है ,रस्ता बियाबान है । तेरे बिना मैं भी कैसे रहूँगी ? "
"जैसे भी हो ,रह लेना मैया! बहन मेरी बाट देखती होगी । "
बेटा आखिर चल ही दिया । पर जैसे ही दरवाजे से निकला दरवाजे की ईँटें सरकीं । यह पहली अलह (अनिष्ट) थी .
"तुम्हें मुझे दबाना है तो ठीक है | पर पहले मैं बहन से टीका तो कराके आजाऊँ, फिर मजे में दबा देना..।" निकोसी ने कहा तो दरवाजा मान गया । एक वन पार किया तो शेर मिला । निकोसी को देखते ही उस पर झपटा ।
"अरे भैया ठहरो ! मेरी बहन टीका की थाली सजाए भूखी बैठी होगी । पहले मैं बहन से टीका करा के लौट आऊँ तब मुझे ज़रूर खा लेना ।" 
शेर मान गया । आगे चला तो दूसरा बियाबान जंगल मिला | जंगल के बीच एक नदी मिली । निकोसी जैसे ही नदी पार करने लगा नदी उमड़ कर उसे डुबाने चली ।
"ओ नदी मैया , मुझे शौक से डुबा लेना पर पहले मैं बहन से टीका तो करवा आऊँ । वह मेरी बाट देखती होगी ।" --यह सुनकर नदी भी शान्त होगई ।
आखिर भाई बहन की देहरी पर पहुँच गया । बहन अपने भाई के आंवड़े-पाँवड़े ( कुशलता की प्रार्थना) बाँचती चरखा कात रही थी कि तभी तागा टूट गया । वह तागा जोड़ने लग गई । अब न तागा जुड़े न बहन भाई को देखे । भाई द्वार पर खड़ा  खिन्न मन सोचने लगा कि मैं तो इतनी मुसीबतें पार कर आया हूँ और बहन को देखने तक की फुरसत नही । वह लौटने को हुआ तभी तागा जुड़ गया | बहन उठ खड़ी हुई , बोली--"अरे भैया  ! मैं तो चरखा चलाती हुई तेरे नाम के ही आँवडे-पाँवडे बाँच रही थी |"
बहन ने भाई को बिठाया । दौड़ी-दौड़ी पड़ोसन के पास गई | पूछने लगी --
" जीजी सबसे प्यारा पाहुना आए तो क्या करना चाहिये ?"
"करना क्या है , गुड़ से लीपदे , घी में चावल डालदे |" 
बहिन ने वैसा ही किया पर न गुड़ में लिपे न घी में चावल सीजे ( पके)|  तब वह सास के पास गई ,पूछा--"अम्मा-अम्मा सबसे प्यारा पाहुना आया है  तो क्या करूँ ?" 
सास ने कहा कि " बहू गोबर माटी से आँगन लीपले और दूध में चावल डालदे ..।" बहन ने झट से आँगन लीपा ,दूध औटा कर खोआ--खीर बनाई । भाई की आरती, उतारी टीका किया । पंखा झलते हुए भाई को भोजन कराया ।
दसरे दिन तड़के ही 'ढिबरी'( चिमनी, लैम्प ,जिसकी रोशनी धुंधली होती है ) जलाकर बहन ने गेहूँ पीसे । रोटियाँ बनाई और अचार के संग कपड़े में बाँधकर भाई को दे दीं । भाई को भूख कहाँ । आते समय सबसे कितने--कितने 'कौल वचन' हार कर आया था । बस मन में एक तसल्ली थी कि बहन से टीका करवा लिया । बहन से विदा लेकर लौट पड़ा .
उधर उजाला हुआ । बच्चे जागे । पूछने लगे---"माँ , मामा के लिये तुमने क्या बनाया ?"  बच्चों को देने के लिये बहन ने बची हुई रोटियाँ उजाले में देखीं तो रोटियों में साँप की केंचुली दिखी । कलेजा पकड़कर बैठ गई -- "हाय राम ! मैंने अपना भाई अपने हाथों ही मार दिया ।"
बस दूध चूल्हे पर और पूत पालने में छोड़ा और जी जान से भाई के पीछे दौड़ पड़ी । कोस दो कोस जाकर देखा ,भाई एक पेड़ के नीचे सो रहा है और 'छाक' ( कपडे में बँधी रोटियाँ) पेड़ से टँगी है । बहन ने चैन की साँस ली . भगवान को हाथ जोड़े . फिर भाई को जगाया । भाई ने अचम्भे से बहन को देखा | 'बहिन यहाँ कैसे ,क्यों !'
 बहन ने भरी आँखों से पूरी बात बताई । भाई बोला---"तू मुझे कहाँ-कहाँ बचाएगी बहन ? " 
बहन बोली--"मुझसे जो होगा ,मैं करूँगी  पर अब तुझे अकेला नही जाने दूँगी ।"
भाई ने लाख रोका, समझाया पर बहन न मानी ,चल पड़ी भाई के साथ । चलते-चलते रास्ते में वही नदी मिली । भाई को देख जैसे ही उमड़ने लगी । बहन ने नदी को 'नई-नकोर' चुनरी चढ़ाई । नदी शान्त होगई । आगे चले तो वन में शेर मिला | बहिन ने उसे बकरा दिया । शेर भी जंगल में चला गया । घने जंगल में चलते-चलते बहन को प्यास लगी ।
भाई ने कहा--"बहन मैंने पहले ही मना किया था । राह में कितने ही संकट हैं अब इस बियाबान जंगल में पानी कहाँ मिलेगा ? बहन बोली-- "मिलेगा कैसे नही ,देखो दूर चीलें मँडरा रहीं हैं वहाँ जरूर पानी होगा ।" 
"ठीक है ,मैं पानी लेकर आता हूँ ।"
बहन बोली--- " पानी पीने तो मैं ही जाऊँगी ? अभी पीकर आती हूँ । तब तक तू पेड़ के नीचे आराम करना ।"  
बहन जहाँ पानी पीने गई ,वहाँ  देखा कि कुछ लोग एक बड़ी भारी शिला गढ़ रहे हैं । 
"भैया ये क्या बना रहे हो ?"
"तुझे मतलब ? पानी पीने आई है तो पानी पी और अपना रस्ता देख ।"
एक आदमी ने झिड़ककर कहा तो बहन के कलेजे में सुगबुगाहट हुई । जरूर कोई अनहोनी है । बोली- "भैया बतादो ये शिला किसके लिये गढ़ रहे हो ? मैं पानी तभी पीऊँगी ।"
"बड़ी हठी औरत है । चल नही मानती तो सुन । एक निकोसी पूत है । उसी की छाती पर सरकाने के लिये ऊपर से हुकम हुआ है ।"
सुनकर बहन को काटो तो खून नही । माँ-जाए के लिये हर जगह काल बैरी बन कर खड़ा है । 
"उसने ऐसी क्या गलती करी है जो....?"
"तुझे आम खाने कि पेड़ गिनने ? तू पानी पी और अपना रास्ता देख ।" दूसरा आदमी चिल्लाकर बोला पर वह नही गई । वही खड़ी गिड़गिड़ाने लगी --"सुनो भैया ! वह भी किसी दुखियारी माँ का लाल होगा । किसी बहन का भाई होगा । तुम्हें दौज मैया की सौगन्ध । बताओ ,क्या उसे बचाने का कोई उपाय नही है ?"
"है क्यों नहीं ? उपाय तो है ।"
आदमी हार मानकर बोला--"उसे किसी ने कभी कोसा नही है । अगर कोई कोसना शुरु करदे तो 'अलह' टल सकती ।" 
बस बहन को कैसी प्यास ! कहाँ का पानी ! उसी समय से उसने भाई को कोसना चालू कर दिया और कोसती-कोसती भाई के पास आई---"अरे , नासमिटे , तू मर जा । 'धुँआ सुलगे' ...'मरघट जले'...।"
" हे भगवान ! मेरी अच्छी--भली बहन बावली भी होगई ! मैंने कितना मना किया था कि मत चल मेरे संग । नही मानी ।"---भाई ने दुखी होकर सोचा । जैसे-तैसे दोनों घर पहुँचे | बेटी को इस हाल में देखा तो माँ हैरान । अच्छी भली बेटी को कौनसा प्रेत लग गया है ? कौनसे भूत-चुडैल सवार होगए हैं, जो भाई को कोसे जा रही है ? लड़की तो बावरी होगई ? 
"माँ कोई बात नही । बावरी है ,भूतरी है, जैसी भी है तो मेरी बहन । तू नाराज मत हो ।"
माँ चुप होगई | बहन रोज उठते ही भाई को कोसती और दिन भर कोसती रहती । ऐसे ही 'कोसते-कासते' कुछ दिन गुजर गए । एक दिन भाई की सगाई आई । बहन आगे आ गई---"इस 'जनमजले' की सगाई कैसे होगी ? पहले तिलक मेरा होगा |"
"हें... ??" सबको  बड़ी हैरानी हुई , बुरा भी लगा पर भाई ने कहा --"मेरी बहन की किसी बात का कोई बुरा मत मानो । वह जैसी भी है, मेरी बहन है वह जो चाहती है वही करो ।" 
पहले बहिन का टीका किया | लगुन भी पहले उसी के हाथ रखी गई | 
फिर तो हर रस्म पर बहन इसी तरह आगे आकर भाई को रोकती रही टोकती रही और कोसती रही । 
भाई का ब्याह होगया ।
अब आई सुहागरात । बहन पहले ही पलंग पर जाकर लेट गई ।
"यह अभागा सुहागरात कैसे मनाएगा ? मैं भी वही सोऊँगी ।"
"हे भगवान ! और सब तो ठीक,  पर सुहागरात में कैसे ,क्या होगा ? ऐसी अनहोनी तो न कभी देखी न सुनी |"  पर भाई ने कहा --"कोई बात नही । मेरी बावरी बहन है । मैं उसका जी नही दुखाऊँगा ।हम जैसे भी रात काट लेंगे ।" फिर कोई क्या कहता ।
बहन रात में भाई और भौजाई के बीच लेट गई । पर पलकों में नींद कहाँ से आती । सोने का बहाना करती रही । आधीरात को भगवान का नागदेवता को हुकम हुआ कि फलां घर में एक नया-नवेला जोड़ा है , उसमें से दूल्हा को डसना है । नागदेवता आए । पलंग के तीन चक्कर लगाए पर जोड़ा  कहीं न दिखे | ऊपर देखे तो तीन सिर दिखें और नीचे की ओर छह पाँव । जोड़ा होता तो डसता । बहन सब देख-समझ रही थी । चुपचाप उठी । तलवार से साँप को मारा और ढाल के नीचे दबा कर रख दिया । और भगवान का नाम लेकर दूसरे कमरे में चली गई । 
सुबह उसने सबको मरा साँप दिखाया और बोली--"मैं बावरी आवरी कुछ नही हूँ । बस अपने भाई की जान , मैया की गोद और भौजाई का एहवात ( सुहाग) बचाने के लिये यह सब किया । जो भूल चूक हुई उसे माफ करना ।"
भाई-भौजाई ने बहन का खूब मान-पान रखा । बहन खुशी-खुशी अपने घर चली गई । 
जैसे इस बहन ने भाई की रक्षा की और भाई ने बहन का मान रखा वैसे ही सब रखें । जै दौज मैया की । 

बुधवार, 28 सितंबर 2022

सिडनी डायरी --7 ‘हायम्स बीच’ और हम

नीले आसमान का दर्पण बना , गहन गंभीर निस्सीम नीलाभ सागर , अपने अथाह जलागार को सहेजने में व्यस्त ...उसकी व्यस्तता को तोड़ने उद्दाम उत्तुंग चंचल लहरें शोर करती हुईं तट की ओर बढ़ रही हैं , युवा होरही किशोरी की तरह सीमाएं तोड़ने और मनचाहे तरीके से फैल जाने को आतुर सी हिलोरें ..., लेकिन एक अनुशासन प्रिय पिता की तरह सागर गरज वरजकर मानो उन्हें रोक रहा है तो लहरें भी मानो मन मारकर तट को जितना भिगो सकती हैं , भिगोकर लौट रही है . या मानो कबड्डी के खिलाड़ी की तरह प्रतिपक्ष की सीमा को छूकर लौटना ही उनका लक्ष्य हो ,या फिर गोला या भाला फेंक जैसी कोई प्रतियोगिता चल रही हो कि कौन सी लहर तट को कहाँ तक भिगोकर आ पाएगी . कोई लहर नीरज चौपड़ा की तरह सबसे आगे बढ़कर तट को छू लेती है .

किनारे किनारे सुदूर बिछे हुए सफेद रेशम से मुलायम और महीन रेत का लम्बा तट नीले अम्बर की सफेद किनारी सा मनोरम , दृष्टि को विजड़ित करने पर्याप्त है .. सागर का नीलाभ जल कभी फिरोजी रंग में बदल जाता है तो नीली लहरें ऊपर उमड़ने पर हरिताभ होजाती हैं और आगे आगे बढ़ती हुई दुग्ध फेन सी धवल हो जाती हैं और तट पर फैलती हुई बालू के रंग में घुलमिल जाती हैं  .रंगों का यह अनूठा मेल और परिवर्तन चकित करता है .धुले निखरे काँच सा
दुग्ध धवल महीन रेत वाला तट

पारदर्शी जल मोहक आमंत्रण देता है . हालाँकि छूते ही बर्फीला अहसास कदमों को पीछे कर देता है लेकिन अगली लहर आपके पैरों से बालू के साथ पैरों को भी खींच लेती है और आप लहरों में घुलमिल जाते हैं .ठंडी लहरों से एकाकार होना भी एक अनूठा और तृप्तिदायक अनुभव है जिसे दूर किनारे पर बैठा व्यक्ति अनुभव नहीं कर सकता .   

यह मनोरम और रोमांचक दृश्य है ‘हायम्स बीच ’ ( Hyams beach ) का . यह ‘जेर्विस खाड़ी’ का एक बहुत ही खूबसूरत तट है जो अपने दूर तक फैले दूध से सफेद बारीक रेत के लिये विश्वभर में जाना जाता है .

सागर से मिलने चली एक नदी

सिडनी के दक्षिण में तस्मान सागर से सम्बद्ध जेर्विस खाड़ी (Jervis Bay) एक समुद्री खाड़ी है . जो  न्यू साउथ वेल्स के शॉल्हेवन (Shoalhaven) शहर का सुदूर विस्तारित तटीय क्षेत्र है जिसमें सघन वन हैं और मारीज़  Murrays beach , ब्लेनम Blenheim  ,नेल्सन Nelson ,  आदि अनेक सुन्दर तट ( beach) हैं . इन्हीं में से एक है Hyams beach जो अपने दुग्ध-धवल-तट के कारण अद्वितीय है .

हम लोगों ने सिडनी से 16 सितम्बर को हायम्स बीच के लिये प्रस्थान किया . ‘हम-लोग’ में पाँच परिवार शामिल थे . सौरभ , अमर , शिवम् , लविराज और हम . कुल 21  (8 बच्चे और13 बड़े) सदस्य थे . पाँच परिवारों का प्यारा ग्रुप है जिनके बीच परस्पर आलू प्याज या चाय शक्कर माँग लेने वाला एकदम अनौपचारिक सम्बन्ध है .

 बोरल टाउन में ट्यूलिप गार्डन  

सिडनी से खूबसूरत जंगल के बीच , कंगारू वैली से गुजरते हुए, 180 कि मी. लम्बे शान्त और मनोरम मार्ग तय करके हम लोग ‘माउंटेन व्यू रिजॉर्ट’ पहुँचे . बीच में ‘बोरल’ Bowral town में रुककर जलपान किया और विविध रंग के ‘ट्यूलिप’ के फूलों की प्रदर्शनी देखी . इन दिनों वसन्त पेड़ पौधों पर जी जान से अपना स्नेह लुटा रहा है . जहाँ देखों टहनियाँ फूलों से भरी हैं . हर तरफ फूलों का जैसे मेला लगा है . यहाँ तक कि धरती पर बिछी घास भी कई तरह के फूलों से सजी है .

माउंटेन व्यू रिजॉर्ट ‘शॉल्हेवन हेड्स’ ( टाउन) में है जो शॉल्हेवन सिटी काउंसिल के अन्तर्गत है . यहाँ सुन्दर व सुविधायुक्त अनेक रिज़ॉर्ट हैं  माउंटेन व्यू उन्हीं में से एक है . 

डाइनिंग हॉल में 

इस हरे भरे पेड़ ,फूलों भरे पोधौं से सज्जित सुन्दर रिजॉर्ट में पर्यटकों के लिये गैसचूल्हा ज़रूरी बर्तन , चाय का सामान,  फ्रिज़ , टीवी , बेड्स सभी सामान और सुविधाओं से युक्त अनेक सुन्दर कॉटेज बने हुए हैं . साथ ही मनोरंजन के लिये  टेनिस ,जम्पिंग बॉल , स्वीमिंग पूल ,जिम आदि कई साधन हैं .क्योंकि खाने की व्यवस्था खुद करनी होती है . इसलिये सबने मिलजुलकर खाना बनाया . डाइनिंग हॉल में खा पीकर सब बतियाने बैठ गए . प्रेम , विवाह , कैरियर , बच्चे ,परिवार , रुचियाँ कितने सारे विषय .. ठहाकों के बीच समय का ध्यान ही न रहा . एक गोरी तन्वंगी ने आकर बड़ी नरमी से जताया कि हम लोग यहाँ जागने की समय सीमा पार कर चुके हैं . तब ध्यान आया कि हम लोग अपने घर में नहीं हैं .

सुबह सब लड़के टेनिस खेलने चले गए . बच्चों और उनकी माँओं ने जम्पिंग बॉल पर आनन्द लिया . मैं और नेहा ( शिवम् की पत्नी) की माँ दोनों वॉक पर निकल गईं .कुनकुनी धूप और ताजी हवा के झकोरों में हरे भरे ,फूलों भरे फुटपाथ पर टहलना भी एक अनौखा अनुभव रहा . दस बजे हम सब ‘बीच’ के लिये निकल पड़े . रिजॉर्ट से 'हायम्स बीच' तक की दूरी लगभग 47-48 किमी है . सघन वन से आच्छादित मार्ग से होते हुए बीच तक हमें 45 मिनट से अधिक नहीं लगे . 

‘बीच’ पर पहुँचकर आँखें जैसे पलकें झँपकाना भूल गईं . तट की दूध सी सफेदी के साथ सागर का नीला फिरोजी रंग ,  दूर क्षितिज तक नीले आसमान के साथ एकाकार होता हुआ सा समुद्र , ऊंची लहरों का तुमुल गर्जन ..इसके बीच विजड़ित सा मन .. लहरें जैसे निमंत्रण दे रही थीं , चुनौती भी कि आओ हिम्मत है तो खेलो हमारे साथ ..उन लहरों में खेलना सचमुच कोई खेल नहीं . उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है ...खैर यहाँ सबने लहरों का आनन्द जी भरकर लिया . पानी धुले निखरे काँच जैसा पारदर्शी ..और उतना ही ठण्डा लेकिन सभी हमउम्र साथी लहरों में खूब देर तक झूलते रहे . मैं पूरी तरह भीगना नहीं चाहती थी . पानी ही इतना बर्फीला था लेकिन तेज लहरें तो पाँव पकड़ कर खींच ही लेती है .ना ना कहते कमर से ऊपर तक भीग ही गई  .कवि ने डूबने का आनन्द अनुभव करने के बाद ही किसी को इंगित करके लिखा होगा “हौं बौरा डूबन डरा रहा किनारे बैठ.” 

असीम सागर की अतलता और विकलता मुझे चकित भी करती है और विकल भी . उमड़ती हुई लहरों के गर्जन और फिर तट से टकराकर उनका लौटना मुझे कहीं व्यग्रता और वेदना का अनुभव कराता है . जैसे सागर धरती का दिल है . लहरें धरती का हदय-उद्वेलन है . धड़कन हैं ..–


सागर हृदय है धरती का 

उमड़ता है ,धड़कता है

किसी की प्रतीक्षाओं में .

मानव के थोथे दम्भ पर

प्रगति के नाम झूठे अवलम्ब पर .  

उफनता गरजता है ,

लिपटती हैं जैसे माँ से 

बेटियाँ फटेहाल ,लहूलुहान

मिलती हैं जब बदहाल नदियाँ

अभी तक सहमी हुई हैं सदियाँ  

तो सागर मन ही मन सिसकता है .

धरती का हदय सागर .

उमड़ता भी है नेहभर जब चन्द्रमा को

देखता है पूर्णकला सम्पन्न .

रहे यह ध्यान सबको 

और अब उसको   .

आघात ना पहुँचे .

धरा का हृदय सागर

रुष्ट हो तो प्रलय भी लाता है .

हरीतिमाच्छादित रिजॉर्ट 'माउंटेन व्यू' में


बुधवार, 14 सितंबर 2022

हर दिन हिन्दी का है .

 एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

प्राणवायु सा साँसों में, जीवन हिन्दी का है .

 

 जैसे भावों को माँ समझे और सबको समझाए  .

माँ के वशभर सन्तानों का सिर न कभी झुक पाए .

अपने अन्तर की बातें माँ से ही कह सकते है .

उसके अंचल की छाया में निर्भय रह सकते हैं .

माँ  के आंचल जैसा ही , सम्बल हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है.

 

हिन्दी भाषा मन की देहरी , सही पता है घर का .

आना जाना सहज सुगम रहता है भाव-प्रवर का .

हिन्दी अपने घर का आँगन , जहाँ बसा है बचपन .

गभुआरे बालों की खुशबू रची बसी है कण कण .

अधरों पर पहला ही उच्चारण हिन्दी का हो .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हो .

 

धरती है यह धरती पर ही पाँव जमा सकते हैं

चलते चलते बिना रुके मंजिल को पा सकते हैं .

इसके उर्वर अंचल में उगती फसलें सपनों की ,

अनजानी सी राहों में यह भाषा है अपनों की .

दिल को दिल से जोड़े वह बन्धन हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

 

 साथ दूध मे हिन्दी भी माँ ने मिसरी सी घोली .

संस्कृति की देहरी पर जैसे सजी हुई रंगोली

सरल समर्थ व्याकरण सम्मत नदिया सी बहती है

अन्तर में रच बस जाएं उस बोली में कहती है .

धरा हमारी हिन्दी और गगन हिन्दी का है .

एक दिवस क्या हम सबका हर दिन हिन्दी का है

 

देश प्रदेश सभी की अपनी भाषाएं उत्तम हैं .

बात एक को चुनने की तो हिन्दी सर्वोत्तम है

हिन्दी ऐसा उपवन जिसमें मुकुलित सभी विधाएं,

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम गूँजें यही सदाएं

हिन्दी बोलें पढ़ें लिखें , चिन्तन हिन्दी का हो .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का हो .  

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मंगलवार, 13 सितंबर 2022

मातृभाषा माँ --हिन्दी दिवस पर एक कविता

 मातृभाषा माँ है

माँ ,

जो समझती है
समझा सकती है औरों को भी
ह्रदय की हर बात
आसानी से .
माँ ,
जो छोटा नही होने देती अपने वश भर
अपनी सन्तान को-कभी ,... कहीं भी .

मातृभाषा, धरती है ।
धरती ,
जिसके उर्वरांचल में ही
उगती हैं, लहलहाती हैं
फसलें सपनों की .
संवेदना अपनों की
भावों की ,उद्गारों की ,
नदी के नम कूल किनारों की  
धरती पर ही टिकाए जा सकते हैं
पाँव मजबूती से ।
तय की जा सकती है लम्बी दूरी
बिना रुके ,बिना थके .
आसमान में पंछी उड़ सकते हैं 
पर उतरना होता है उन्हें 
ज़मीन पर ही .
जीने के लिये .

मातृभाषा, 
अपने घर का आँगन
आँगन ,
जहां कोने--कोने में रची-बसी है
गभुआरे बालों की खुशबू ।
दूधिया हँसी की खनक
आँगन , 
जहाँ सीखते हैं सब , 
सर्वप्रथम, बोलना ,किलकना
चलना , थिरकना ।

हिन्दी हमारी मातृभाषा, 
हमारी ज़मीन और आसमान 
घर का सही पता और पहचान ।
पत्र भी मिला करते हैं हमेशा
सही पते पर ही .
( पुनःप्रकाशित व संशोधित) 
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

गणपति बप्पा अगले बरस आकर , इन्हें समझाना ज़रूर.

मयंक के हाथों साकार हुई आस्था  

 

लगभग दस-ग्यारह दिन की धूमधाम के बाद आज शिव पार्वती के लाड़ले गणपति के उत्सव का समापन हो गया है ..गलियाँ सूनी और शान्त होगई हैं . पर्व और त्यौहार हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं . आस्था व भक्तिभाव के साथ ऐसे आयोजन जीवन की एकरसता को मिटाकर नया उत्साह व ऊर्जा का संचार करते हैं . गणेश तो वैसे भी मोद और मोदक के देव हैं . तो आयोजन भी आनन्द व उल्लासपूर्ण होते हैं ,इसलिये आवश्यक भी हैं . मुझे याद है उन दिनों की है जब मुझे पर्व और त्यौहारों की बड़ी उल्लासमय प्रतीक्षा रहती थी । यह उल्लास बचपन के कारण था या अनूठे उत्सव-आयोजनों के कारण यह पूरी तरह अलग करके तो नही कह सकती लेकिन इसमें कोई सन्देह नही कि उन दिनों हमारे गाँव में हर त्यौहार को मनाने के लिये विशेष तैयारियाँ होतीं थी । चाहे होली हो , दशहरा हो ,कृष्ण-जन्माष्टमी हो या गणेश-उत्सव ।

गणेश-उत्सव के आठ दिनों की झाँकियों की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली जाती थी जिसके निर्माता--निर्देशक ताऊजी ही होते थे । उनके द्वारा तैयार की गई झाँकियाँ अदुभुत हुआ करती थीं । जैसे एक बार उन्होंने कैलाश पर ध्यानमग्न शिव की झाँकी सजाई ।
" शिवजी निराधार बैठे ध्यान मग्न हैं ।( ध्यान रहे कि शिव प्रतिमारूप नही बल्कि सजीव हैं । किशोर भैया से छोटे देवेन्द्र को शिव के रूप में इतनी कलात्मकता से सजाया गया कि देखने वाले मंत्र-मुग्ध हुए देखते ही रह गए थे और लगभग बारह वर्ष के देबू भाई का आँखें बन्द कर घंटों तक शान्त व निश्चल  बैठे रहना भी कम आश्चर्य नही था ) जटाओं से गंग-धार फूट रही है । उनका धरती से स्पर्श केवल फर्श में गड़े त्रिशूल के द्वारा है,जिसे उन्होंने थाम रखा है । चकित दर्शक आजू-बाजू झाँकते हैं कि आखिर शिवजी अधर में बैठे किस तरह है ।"
हर दिन एक नई और अनूठी झाँकी होती थी । कभी भगवान विष्णु के क्षीरसागर-शयन की कभी माखनचोरी की तो कभी खेत में बीज बोते किसान-दम्पत्ति की ।   

आरती व प्रसाद के बाद भजन गाए जाते थे । उन दिनों गाँव में गाँव के ही बहुत अच्छा गाने-बजाने वालों की भजन-मण्डली थी दो-चार लोग बाहर से भी आजाते थे । और श्रोता भी कम रस-मर्मज्ञ नही थे । ताल और मात्राओं की जरा सी गलती पकड़ लेते थे ।  हम लोग आतुरता से इस त्यौहार की प्रतीक्षा करते थे . 

लेकिन जबसे धर्म में राजनीति ने प्रवेश लिया है ये या तो आयोजन प्रदर्शन और गुटबाजी का हिस्सा बन गए हैं या अमर्यादित मौजमस्ती का . धर्म के नाम पर नियमों , दायित्त्वबोध और नैतिकता को ताक पर रख दिया जाता है . भजनों के नाम पर माइक पर पैरोडियाँ बजाना शराब पीना ,हुल्लड़बाजी करना इन आयोजनों का एक खराब पक्ष है . वास्तव में लाउडस्पीकर का उपयोग जब तक बहुत ज़रूरी न हो ,नहीं होना चाहिये . आप आराधना इबादत अपने लिये कर रहे हैं दूसरों के लिये नहीं . लेकिन हमारे यहाँ इस बात का ध्यान रखा ही नहीं जाता . जन्मदिन की पार्टी हो , शादी या फिर धार्मिक कार्यक्रम हों लाउडस्पीकर पर रात रात भर गीत चलाए जाते हैं . अगर कोई आपत्ति करे तो ,'खुशी बर्दाश्त नहीं होती' या 'धर्मविरोधी' होने का आरोप लग जाता है . मोहल्ले में एक महिला ने ,जब मैंने कहा कि गीत बजालो पर धीमी आवाज में , बच्चे पढ़ रहे हैं सीधा मेरे मुँह पर आपना ज्ञान दे मारा –“थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम ,तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी ..”

मुझे मालूम था कि इससे बहस का कोई लाभ नहीं ,पर यह अफसोस की बात है कि ऐसे कथित धार्मिकों ने हमारे धर्म को बदनाम तो कर रखा है .लोगों को समझना होगा कि धार्मिक आयोजन केवल दिखावे या मौज मस्ती के लिये नहीं होते , नहीं होना चाहिये . देवी दुर्गा ,भगवान शिव, मर्यादा पुरषोत्तम राम , लीलाधर कृष्ण , विघ्नेश्वर भगवान गणेश ...सभी हमें जीने की राह बताते हैं .आस्था और विश्वास देते हैं . दिखावा या नियम विरुद्ध आचरण नहीं . रात रात भर ( दिन में भी ) तेज आवाज में गाने बजाना , कार्यक्रमों के लिये रास्तों का अतिक्रमण करना , शराब पीकर हुल्लड़ करना नियम विरुद्ध आचरण है कोरा दिखावा है . उन्माद में लोग प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं .अभी हरियाणा और उत्तर प्रदेश में ऐसा हुआ भी है .

गणपति विसर्जन के समय गाते हैं –गणपति बप्पा मोरया , अगले बरस तू जल्दी आ ..मैं कहती हूँ हे देव अगले बरस आकर अपने भक्तों को समझाना भी कि उत्सव के साथ साथ सामाजिक शान्ति और नियमों का ध्यान भी रखना ज़रूरी है और अपने अनमोल प्राणों का भी .  

सोमवार, 5 सितंबर 2022

सिडनी डायरी --6 'सीनिक वर्ल्ड' और जिनोलन गुफाएं

20 अगस्त   ---गतांक से आगे

सुबह जल्दी नींद खुल गई . बाहर घास और कारों पर जमे हिमकणों से पता चला कि रात कितनी ठंडी थी . लेकिन पेड़ों की फुनगियों से उतरती धूप सुबह को सुहानी बना रही थीं . हवा तेज और नुकीली थी पर सुबह की ताजगी का अनुभव उसकी चुभन को कम कर रहा था . घास पर टहलते हुए मैंने छाती में खूब गहरी साँसें भरीं .प्रकृति ने यह अनमोल उपहार सबके लिये मुक्तहस्त लुटाया है .कुछ देर बाद श्वेता भी बाहर निकल आई हम लोग देर तक घास में टहलते रहे .बगलवाले पोर्शन में अभी भी पर्दे पड़े थे .

“कल साढ़े दस बजे तक हमें ‘सीनिक-वर्ल्ड’ पहुँचना होगा .”-–मयंक ने कल सोने से पहले ही बता दिया इसलिये उसी समय के अनुसार हम तैयार होकर जैमिसन वैली की तरफ चल पड़े .

सीनिक रेल वे 


‘ सीनिक वर्ल्ड ‘  एक निजी व्यावसायिक कम्पनी Hammons Holding pty (Ltd) द्वारा संचालित और विश्व-विरासत की सूची शामिल में ऐसी अनूठी दुनिया है जो प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है . जिसमें सघन वन के बीच संचालित रोमांचक ‘सीनिक रेलवे’ है , ‘केबल वे’ और ‘स्काई वे’ जैसी अनूठी व रोमांचक गतिविधियाँ आनन्द , रोमांच और थरथरा देने वाली अनुभूतियों से भर देती है . हृदय को आनन्द से भर देने वाला ‘वॉक वे’ या ‘बुशवॉक’ भी है . हमने इस सबका एक साथ पैकेज लिया था . दिनभर चाहे जहाँ जिसका जितना आनन्द लो

सीनिक रेल वे 310 मीटर लम्बा 52 डिग्री झुका ,और संभवतः विश्व का सबसे तीव्र ढलान वाला रेलमार्ग है . जिस पर ग्लास की पारदर्शी छत और कवर वाली सुन्दर ट्रेन चलती है जिसमें एक साथ 84 यात्री उस रोमांचक यात्रा का आनन्द ले सकते हैं . 310 मीटर लम्बे मार्ग में सीधी ढलान है . उस पर खड़ी चट्टानों और सुरंग से बीच से गुज़रती हुई ट्रेन एक दो जगह तो लगभग गिरती हुई सी प्रतीत होती है . उस क्षण यात्री बरबस ही बच्चे बन जाते हैं . चीत्कार और सीटियाँ से सुरंग गूँज उठती है .भयवश नहीं रोमांचक अनुभव के कारण . पारदर्शी खिड़कियों व छत से पेड़ , चट्टानें , बादल ..पीछे छूटते लगते हैं . कुछ पल के लिये तो लगता है जैसे ट्रेन धरती में समा ही जाएगी .  शिखर से नीचे आखिरी बिन्दु तक पहुँचने में लगभग दो या ढाई मिनट का समय लगता है . लौटने में भी लगभग इतना ही . हमारा पैकेज़ असीमित था ,इसलिये हमने दो बार जाकर इस अनूठी रेल के सफर का आनन्द लिया .

19 वीं शताब्दी में यह ट्रेन कोयले की खदानों की सेवा में शुरु की गई थी . उस समय यह साधारण डिब्बों वाली ट्रेन थी . सन् 1945 ई. में Hammon family द्वारा अधिग्रहीत कर लेने के बाद यह अत्याधुनिक रूप में पर्यटकों के लिये शुरु की गई .

सीनिक केबल वे –जेमिसन वैली से ढलान के शिखर तक 545 मीटर लम्बा केबल वे एक मनोरंजक , रोमांचक और सुविधाजनक हवाई सफर है . यह हवाई केबल मार्ग सन् 2000 ई में शुरु किया गया . इसे आधुनिक रूप सन् 2018 में दिया गया है .84 यात्रियों की क्षमता वाली सुन्दर सुविधाजनक और पारदर्शी स्विस-मेड केबल कार का निर्माण प्रसिद्ध केबल इंजीनियरिंग कम्पनी Doppelmeyr Garaventa द्वारा किया गया है . दक्षिणी गोलार्द्ध की यह सबसे अधिक लम्बी बड़ी और ढलान वाली हवाई केबल-कार है . संभवत मनोरम और रोमांचक भी . शीशे के पार थ्री सिस्टर्स , ओरफन रॉक ,खड़ी चट्टानें और सुदूर तक बिछा हुआ सा सघन वन देखते हुए ऊपर की ओर जाते हैं तब उड़ने का सा अनुभव होता है . वह सचमुच एक अपूर्व और अविस्मरणीय अनुभव रहा .




स्काइ वे 

स्काइ वे--दो शिखरों के बीच 270 मीटर लम्बा , सीधा हवाई मार्ग है जो सुन्दर पारदर्शी 84 यात्रियों की क्षमता वाली केबल-कार द्वारा तय किया जाता है . हालांकि पूरी लम्बाई 720 मीटर की है लेकिन कोई कारण रहा होगा कि सफर 270 मीटर तक सीमित किया गया है . सन् 1958 में शुरु 'स्काइवे' ऑस्ट्रेलिया की पहली केबल-कार थी . आधुनिक स्विस-मेड कार सन् 2017 में जारी की गई है ..'स्काइ वे' पर सुन्दर आरामदेह पारदर्शी केबल-कार में चलते हुए , जैसा कि नाम (Sky way )से ही स्पष्ट है पौराणिक कथाओं में वर्णित आकाशमार्ग और दिव्य विमान का स्मरण होता है .पारदर्शी कार में ऊपर आसमान का नीला वितान तना है तो नीचे वनाच्छादित जेमिसन वैली में हरा शामियाना बिछा हुआ हो . आजू बाजू में थ्री सिस्टर्स , कटूम्बा फॉल ,सूनी खड़ी चट्टानें ..सबकुछ स्वप्निल सा ..विहंगम दृष्टि में सुदूर अंचल सिमट आया लगता है .

वॉक वे
वॉक वे— ‘सीनिक वाक वे’ सीनिक रेलवे और केबल वे’के बीच सघन और ऊँचे ऊँचे वृक्षों के वितान तले लगभग 500 मीटर लम्बा तख्तों ( लकड़ी के पटरों ) पर बना स्थानीय वन्य जीवों और जड़ी बूटियों से भरा मनोरम मार्ग है जो जुरासिक युग का आभास कराता है . लगभग बीस मिनट के पैदल मार्ग में रंग बिरंगे पक्षियों की चुहल और कलरव ,अनेक प्रकार के वृक्ष मिलते हैं साथ ही उनकी कहानियाँ भी . एक दो और भी लम्बे और ढलान वाल मार्ग हैं लेकिन हमने यही रास्ता चुना . बीच में कोयले की खदान का प्रवेश द्वार भी मिला जहाँ खदान में काम करने वाले की और उसके घोड़े (pony छोटा घोड़ा ) की पीतल की बनी प्रतिमा भी देखने मिली .
कोल माइनर और  पोनी 


उसके इतिहास से जुड़ी जानकारियाँ भी कि कोयले की खदान John Britty North  (जिसे ‘फादर ऑफ कटूम्बा‘ कहा जाता है) द्वारा 1879 में शुरु की गई थी . वैसे खदान की शुरआत तो 1872 में होगई थी लेकिन रजिस्ट्रेशन 1878 के बाद ही हुआ . 1945 में इसे बन्द कर दिया गया .

जिनोलन गुफाएं---जिनोलन गुफाएं ऑस्ट्रेलिया में गुफाओं की सबसे बड़ी श्रंखला है . ये ब्ल्यू माउंटेन के पठारी क्षेत्र में चूना-पत्थर की गुफाएं हैं जिनमें अन्दर चूने के पानी से बनी विचित्र आकृतियों चकित करती हैं .अपनी विचित्रता और रोमांचक सुन्दरता के कारण जिनोलन गुफाओं को सन् 1866 से पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किया गया है जिनोलन Jenolan की उत्पत्ति ऑस्ट्रेलिया के मूलनिवासियों द्वारा प्रयुक्त Gnowlan से हुई है जिसका आशय पैर की आक़ृति वाली उच्चभूमि से है .

जिनोलन गुफाएं वैसे तो लगभग 22 हैं लेकिन उनमें दस ही गुफाएं पर्यटकों के लिये खोली गई हैं . उनमें भी तीन गुफाएं ही अधिकांशतः देखी जाती हैं –ओरिएंट , इम्पीरियल और चिफली .

ल्यूसिंडा चेम्बर में शाल

हम लोगों ने चिफली chifley गुफा देखी . इसे 1880 में Jeremiah Winson ने खोजा था .इसका मूल नाम Left Imperial था. सन् 1952 में प्रधानमंत्री Mr. Ben Chifley के सम्मान में इस गुफा का नाम चिफली रखा गया . 690 मीटर लम्बी इस गुफा में 421 सीढ़ियाँ हैं . रंगबिरंगी रोशनी के बीच सँकरे रास्तों पर चढ़ते उतरते वाकपटु और स्मार्ट गाइड हर जगह , जीवाश्म और चूने के पानी से स्वतऋ निर्मित अनौखी आकृतियों के बारे में समझाती और कहानियाँ सुनाती जा रही थी कि यह मार्गरीटा Margarita चेम्बर है जिसे सबसे पहले बिजली के बल्वों से प्रकाशित किया गया

मैडोना चेम्बर

मेडोना Medonna चेम्बर का यह नाम चूने के पानी के रिसने से बनी आक़तियों में प्रसिद्ध गायिका और अभिनेत्री मेडोना और उसके बच्चों की कल्पना करके रखा गया . .और .ल्यूसिंडा Lcinda Chamber., जिनोलन गुफा का सबसे खूबसूरत हिस्सा है .कई जगह बार्डर वाले शॉल या साड़ी के खूबसूरत पल्ले जैसी आकृतियाँ चकित करती हैं .स्फटिक और झिलमिलाते सुनहरे रुपहले कण धरती का रत्नगर्भा नाम सार्थक करते लगते हैं . चूना मिश्रित पानी रिसने से बनी और बनती जारहीं विचित्र और मोहक आकृतियाँ किसी को भी विस्मय से भरने के लिये पर्याप्त हैं . इस जगह की खूबसूरती से Jeremiah इतना प्रभावित हुआ कि इसे अपनी पत्नी Lusinda का नाम दे दिया . इसके अलावा Wall Of noses, Lion’s Den . katies Bower गुफा के अन्य आकर्षण थे . Katies Bower 19 वर्षीया बहादुर लड़की Katie Webb की कहानी कहता है .  कैटी की जिद थी कि गुफा में जिस रास्ते से आए हैं उससे लौटेंगे नहीं 

कैटी बाउर
उसकी दृढ़ता ने Jeremiah को काफी प्रभावित किया और एक रस्सी के सहारे कैटी को अँधेरी गुफा में उतार दिया इस तरह गुफा में एक नयी खोज हुई .

गुफा में कुछ पल लाइट बन्द करके यह अनुभव भी कराया कि मानव ने कभी ऐसे अँधेऱों में भी जीवन बिताया होगा और किसी भी तरह रोशनी की व्यवस्था की होगी या फिर अभ्यस्त होगया होगा अँधेरे का ..कैसा होगा वह युग भूगर्भ में कितने रहस्य छुपे हैं . कितनी हलचलें होती रही हैं कि पर्वत से समुद्र् और समुद्र से पर्वत बन जाते हैं .एक बार कहीं पढ़ा था कि हिमालय में व्हेल का जीवाश्म मिला था . मेरा विचार है कि हर बच्चे को भूगोल की जानकारी अवश्य होनी चाहिये . धरती से जुड़कर ही जीवन का यथार्थ समझ आता है . प्रकृति के आगे हम कुछ नहीं हैं .

चूने का पानी रिसने से बनी आकृति

हमारे देश में बस्तर में भी चूने के पत्थर की बिल्कुल ऐसी ही गुफाएं हैं कोई अन्तर नहीं .

एक घंटे के गुफा भ्रमण के बाद हम बाहर आए तो उजाला और भी सुहाना लग रहा था .

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आधारभूत जानकारियां गूगल से साभार 

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