Sunday, May 27, 2012

जेठ हुआ मेहमान


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सूरज की दादागिरी,सहमे नदिया ताल।
,हफ्ता, दे देकर हुई हरियाली कंगाल।

तीखे तेवर धूप के हवा दिखाए ताव।
मौसम के आतंक से ,कैसे करें बचाव ।

चढी धूप तपने लगा भडभूजे का भाड ।
चित्त चना सा भुन रहा,तन हो रहा तिहाड ।

दिन भर चूल्हे पर तपे धरती तवा समान ।
रोटी सेके दुपहरी,'जेठ' हुआ मेहमान ।

चिडिया बैठी तार पर ,मन में लिये मलाल।
कंकरीट के शहर में दिखे न कोई डाल ।

अनशन कर मानो खडा पत्र-विहीन बबूल ।
बादल बरसेंगे तभी लेगा पत्ते -फूल ।

धूप प्रतीक्षा सी चुभे,झुलसा मन का गाँव ।
पेड कटे उम्मीद के सपना हो गई छाँव ।

उडे बगूले धल बन धरती के अहसास ।
उत्तर जाने मेघमय कब देगा आकाश ।

Monday, May 21, 2012

सोचो तो जरा....


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एक बार  तुम
सोच ही लो
कुछ पल ठहर कर
छोड कर यह 'भागमभाग'
किसी महानगर के 'ट्रैफिक' की तरह कि
अभी कुछ तो शेष है कहीं
जिसे सोच कर---
मन होजाता है ,नीम का झुरमुट
सुबह-सुबह
चिडियों के कलरव से गूँजता हुआ ।
   अपेक्षाएं व शिकायतें खामोश नही हुईं
जैसे खामोश हो जाते हैं गाँव के रास्ते
अँधेरा होते ही ।
    उम्मीदें सिमटी नहीं हैं ,जिस तरह
सिमट जाती है एक पूरी दुनिया
एक बहुत ही छोटे से फ्लैट में ।
     तुम्हारी लगातार गहरी होती
अनकही सी बेरुखी के बावजूद
अभी तक सोचा नही मैंने
तुम्हारे लिये उस तरह
जिस तरह  सोचता है कोई
सुबह-सुबह अखबार में सुर्खियाँ पढते हुए ।
अभी यकीन भी नही हुआ पूरी तरह कि
व्यर्थ है मेरा होना ,
तुम्हारे लिये
जैसे नए साल में व्यर्थ होजाता है
गुजरे साल का कैलेण्डर
और एकदम निरर्थक नही है
मेरा तुम्हें हर पल साथ लेकर जीना
जैसे जीता है कोई प्रेम में ,
निरपेक्षता को सर्वथा नकार कर
गलत 'पासवर्ड' की तरह ।
इससे पहले कि वह सब गुजरने लगे
तुम सोच कर देखो  ,मेरी तरह ही ।
फिर तुम भी महसूस कर सकोगे कि
कितनी खुशकिस्मती है  ,शेष होना
कुछ सोचने /करने को
ज़िन्दा इन्सानों के लिये   ।





Friday, May 18, 2012

तब तुम थे कहाँ ?

19 मई 2012--- काकाजी ( पिताजी) की तृतीय पुण्यतिथि है । मुझे यह बात अक्सर गहराई से महसूस होती है कि आज भी एक सात-आठ साल की लडकी मुझमें जी रही है जो पिता की प्रतीक्षा में आज भी सूनी पगडण्डियों पर अकेली खडी है । अपने पिता से बहुत ही कम मिल पाने का मलाल लिये । एक कदम भी आगे नही चली । पिता का जाना शायद एक आसमान का हट जाना होता है ऊपर से । 
काकाजी को लेकर कितनी ही अविस्मरणीय यादें हैं ,एक विस्तृत फलक पर बिखरी हुईं । यहाँ भी उन्ही यादों की एक धुँधली सी तस्वीर है । हो सके तो पहली पोस्ट 'पिता से आखिरी संवाद'  भी पढें  
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  उस दिन काकाजी सुबह से ही इस उलझन में थे कि वह एक रुपए का नया नोट आखिर आया कहाँ से ,जो शिव जी की तस्वीर के पीछे उन्हें रखा मिला था । कमरे में उनके व मेरे अलावा और कोई नही रहता था ।  पढने वाले बच्चे तो स्कूल में आते थे पर कमरे में आना उनकी सीमा के बाहर था ।
उन दिनों मैं शायद दूसरी या तीसरी कक्षा में थी । सात-आठ साल की उम्र में माँ और छोटे भाई से बहुत दूर एक पहाडी गाँव बडबारी में काकाजी के साथ पढने के लिये भेजी गई थी । काकाजी वहाँ के प्राइमरी स्कूल में दो साल पहले ही पहुँचे थे । डकैत-गूजरों के उस पथरीले गाँव में ,जहाँ बेतरबीबी से यहाँ-वहाँ बैठी भेड-बकरियों की तरह घर बने थे और हरियाली के नाम पर सिरस-बबूल के इक्का-दुक्का पेड थे ,काकाजी ने अपने व्यवहार से लोगों के मन जरूर हरे कर दिये थे । तीन महीने में ही उजाड पडे स्कूल में फुलवारी खिल उठी थी । वहाँ लोगों के लिये यह हैरत की बात हो थी कि गाय-बकरियाँ चराने वाले, आए दिन ,बन्दूक और गोली की ,लूट और हत्या की भाषा सुनने सीखने वाले गाँव के उजड्ड बच्चों में कैसे पढने के लिये तथा काकाजी के आदेश का पालन करने के लिये प्रतिस्पर्धा होने लगी थी । गाँव में पानी नीचे तलहटी में जाकर एक कुँए से आता था फिर भी स्कूल के प्राँगण में हमेशा हरियाली के साथ-साथ मौसम की सब्जियाँ व फूल हँसते रहते थे । खैर यह तो एक लम्बी गाथा है पूरे उपन्यास का विषय । कुल मिला कर यह कि गाँव में उनकी अच्छी धाक थी     
  जहाँ तक मेरी बात है , बहुत संक्षेप में ही कहूँ तो मुझे काकाजी के साथ वहाँ रहना अच्छा नही लगता था । इसके पीछे बहुत से कारण थे जैसे कि मुझे वहाँ माँ की और अपने गाँव की बहुत याद आती थी पर यह बात मैं उनसे की बात नही कह सकती थी । उनके आगे रोना तो दूर की बात थी । वे इस तरह माँ को याद करके रोने वाले बच्चों को उतना ही बुरा मानते थे जितना पढाई से जी चुराने वालों को । इसलिये मैं अकेले में ही चुपचाप रो लेती थी । यों कहूँ कि रोने के लिये मैं अक्सर अकेली हो जाया करती थी । और उस अकेलेपन में मैं माँ ही नही गाँव की गलियों पेड-पौधों खेत-खलिहानों ,कूल-किनारों , कजरी-गबरू सबको जी भर कर याद करती थी । मुझे यह बात हमेशा अखरती थी कि क्यों काकाजी हमेशा मुझे पढने व आगे बढने के प्रलोभनों में उलझाए रखते हैं कि चलते समय इस बात से बेखबर रहते हैं कि उनके साथ चलने के लिये उनकी बच्ची को किस तरह दौडना पड रहा है ।कि क्यों चाहे जब किसी के सामने मेरे बहुत समझदार व होशियार होने की बात कहते रहते हैं । कि रात को सोते समय कहानी सुनाने की बजाए गिनती-पहाडे रटवाते हैं । यही नही 
काकाजी मेरे साथ दूसरे बच्चों की तरह ही बल्कि उनसे भी अधिक कठोरता से पेश आते थे चाहे वह सबक अधूरा रहने की बात हो ,अपनी क्यारी में खुद पानी न देने का मामला हो या फिर किसी हाट-मेला में कंगन ,रिबन ,नेलपालिश या गुडिया लेने की चाह रखना हो वे एकदम ऐसा चेहरा बना लेते थे कि सारी चाहतें उसी तरह गायब हो जातीं थी जैसे धूप आते ही पत्तों पर जमीं ओस गायब होजाती है । पढाई में किसी भी तरह की शिथिलता को वे क्षमा नही करते थे । मुझे याद है एक बार किसी ने मुझे उनसठ की गिनती पूछली थी । मैंने हडबडाहट में छह पे नौ उनसठ बोल दिया ( वन-पन पाँच की सठ छह की के नियम से । हमें गिनती ऐसे ही याद कराई जातीं थीं । )हालाँकि तुरन्त ही गलती को सुधार भी लिया पर काकाजी ने पूरे दो घंटे मुझसे बात नही की । वह मूक सजा कम भयानक न थी । हाँ बाद में वे मुझे नीचे तलहटी में खिले सफेद कमल और बतखें दिखाने ले गए । लेकिन ऐसे कुछ ही खुशगवार पल होते थे जब मेरी मुलाकात अपने पिता से होती थी । एक शिक्षक के साथ मैं प्रायः अकेली ही रहती थी ।
हमें रहने के लिये स्कूल का ही एक कमरा मिला था । हाँ रात में सोने के लिये रोज गाँव में उदयसिंह सरपंच जी के घर जाना पडता था । वह एक अलग किस्सा है डाकुओं वाला । उसे फिर कभी । 
कमरे में काकाजी की कुछ किताबें थीं । एक घडा था । आटे का कनस्तर ,दाल घी तेल व मसालों के तीनचार डिब्बे व मेरे दो-तीन जोड कपडे व बस्ता । पूजा में शिवजी ,राम और कृष्ण भगवान की तस्वीरें---बस यही कुल गृहस्थी थी । काकाजी इस दोहे को अपना मूलमंत्र जो मानते थे ---"पट पाँखे भख काँकरे ,सपर परेई संग ,सुखिया या संसार में एकै तु ही विहंग ।" 
सुबह सात बजे लम्बी घंटी बजने से पहले काकाजी नहा-धोकर पूजा करके माथे पर रोली की बिन्दी लगा कर पढाने के लिये तैयार रहते थे । 
उस दिन पूजा करते समय उन्हें वह एक रुपए का नोट दिखा तो अचरज में पड गए । पैसे-पैसे का हिसाब रखने वाले काकाजी के लिये, जबकि उन्हें पचास रुपए से भी कम वेतन मिलता था ,एक रुपया ऐसे ही रफा-दफा कर चुपचाप जेब में रख लेने की चीज नही था । किसी का एक पैसा भी उनके लिये अस्वीकार्य था । मुझसे पूछा तो मैंने ऐसी अनभिज्ञता दिखाई जैसी विज्ञान का विद्यार्थी भाषा के ध्वनि सिद्धान्त के बारे में दिखाता है । उन्हें सचमुच हैरानी हुई । उस रुपए का सच जानना उनके लिये सबसे ज्यादा जरूरी होगया । जबकि कमरे में मेरे व पिताजी के अलावा कोई नही आता था । शायद किसी बच्चे से भूलवश वह रुपया रह गया हो यह सोच कर उन्होंने स्कूल के सभी बच्चों को भी बुला कर पूछा ---"बताओ क्या तुमने रखा यह रुपया । हो सकता है कि तुमसे गलती से छूट गया हो । देखो अभी बतादो वरना बाद में मुझे पता चला तो ठीक नही होगा ।"   
पर बच्चे बताते तो तब जब वे रुपए के बारे में कुछ जानते । कोई जानता था तो सिर्फ मैं । पर मुझे पूरा विश्वास था कि अगर मैंने तस्वीर के पीछे रुपया रखना स्वीकार कर लिया तो काकाजी सीधा गुलेल के कंकड जैसा सवाल मेरी ओर उछाल देंगे---तेरे पास वह रुपया कहाँ से आया । पाँच-दस पैसे की बात होती तो कही पडे मिलने की बात कही जा सकती थी । तब भी यह सवाल तो उठता ही कि पैसे मिले तो बताया क्यों नही तस्वीर के पीछे रखने का मतलब तो चोरी हुआ न । काकाजी के सवालों से तो मेरे विचार में भगवान भी नही बच पाते मैं किस किनारे की घास थी । फिर यह सवाल था पूरे एक रुपए का जिससे उस समय डेढ--दो सौ ग्राम घी खरीदा जा सकता था । उफ्..मानू जीजी ने मुझे जबरन वह रुपया थमाकर किस मुसीबत में फँसा दिया था । मानू जीजी सरपंच काका की छोटी बेटी थी जो ससुराल में थी । रसाल भैया उन्हें लिवाने सुनारपुर जा रहे थे । भैया ने मुझसे चलने को कहा तो मैं तो जैसे चलने को तैयार ही बैठी थी । किसी नई जगह पर जाने का प्रलोभन बच्चों में कितना प्रबल होता है यह अनुमान इसी से लगाया जासकता है कि काकाजी की अनुमति लेने के लिये मैंने उनकी बडी-बडी कठिन और उबाऊ शर्तें भी मानलीं थीं जैसे रास्ते में मुझे सत्रह व उन्नीस का पहाडा पक्का करना होगा । दस तक मायने याद करके सुनाने होंगे वगैरा वगैरा..। जाते समय बैलगाडी का सफर पहाडे व मायने रटते हुए भी जितना मजेदार था ,लौटते समय उतना ही सूना ,उदास और उदासी से भी ज्यादा उलझन भरा था । एक तो मानू जीजी को उनकी ससुराल वालों ने भेजने से मना कर दिया सो एक तरफ मानू जीजी की उदास सूरत को याद कर रसाल भैया भी उदास थे । वे मुझे अब गीत और कहानियाँ सुनाने की स्थिति में नही थे पर अगर होते भी तो भी में उनका आनन्द नही ले सकती थी । एक गहरी चिन्ता मेरे मन पर उसी तरह लदी थी जिस तरह हमारी जमीन के बँटाईदार की लडकी के सिर पर रोज शाम को घर लौटते समय घास का भारी गट्ठर लदा रहता था । इतना भारी कि कभी-कभी तो खीज कर वह पटक देती थी । मेरा भी मन हुआ कि उस रुपए के बोझ को उसी तरह उतार पटकूँ पर मानू जीजी ने जबरन मेरी मेरी हथेली में दबा दिया था । मैं मना करते हुए पीछे हटती जा रही थी जैसे वह रुपया नही ,जलता कोयला हो । पिताजी का कडा आदेश था कि किसी से कोई चीज या रुपया हरगिज नही लेना चाहिये और उधर मानू जीजी ने डबडबाई आँखों से सौगन्ध देकर मुझे कहा---"मैं तेरी बडी बहन नही हूँ क्या ? न लेगी तो मेरा मरा मुँह देखेगी ।" 
'हे भगवान ! इधर गिरूँ तो कुआ और उधर गिरूँ तो खाई । रसाल भैया ने ही एक बार बताया था कि अगर इस कसम को तोडते हैं तो कसम देने वाला सचमुच मर जाता है । मानू जीजी के मरने से तो यही अच्छा था कि मैं वह रुपया ले लेती । लेकिन रुपया लेने के बाद न तो मुझे बिसूरती मानू जीजी की भरी-भरी आँखें याद रहीं न वहाँ मिले प्यारे-प्यारे चूजे व बहुत सारे मेमने । वह रुपया हर पल दाँत में फँसे तिनके की तरह अखरता रहा । उसे फेंकने का साहस जाने क्यों चाह कर भी न जुटा सकी । काकाजी को पता चलेगा तो कितनी शर्मिन्दगी झेलनी होगी । हिकारत से कहेगें कि मैंने मना किया था पर लडकी रुपए का लालच छोड नही पाई न । स्कूल के दूसरे बच्चो को देखा है । मुझे पूछे-बताए बिना वे अपनी क्यारी का टूटा हुआ टमाटर भी नही उठाते । और मैं हूँ कि एक रुपया तक लेने से मना नही कर पाई । यों काकाजी की नजरों में गिरने से तो बेहतर ही था कि झूठ बोल जाती । कम से कम दूसरे बच्चों से पीछे तो नही रहना पडता । फिर काकाजी को पता भी कैसे चलेगा । सो तस्वीर के पीछे रुपया छुपाने वाले उस तथ्य को छुपाना ही मुझे सबसे कारगर तरीका लगा । 
और मैं झूठ बोल गई--- 
"काकाजी ! मुझे नही मालूम । सच्ची कहती हूँ ।"----मैंने सारी ताकत समेट कर दृढता से कहा ।
"फिर यह रुपया कहाँ से आया ?"
"मुझे नही मालूम ।"
"पक्का ?"
"हाँ ।"
मैंने साफ इनकार कर दिया । तब सोचा था कि उलझन से छुटकारा मिल गया । पर भला छुटकारा कहाँ । काकाजी महीनों तक इसी सवाल में उलझे रहे कि आखिर वह रुपया आया कहाँ से । और मैं  उस सवाल से भरसक बचते हुए भी अपराध बोध से दबी रही । 
सालों बाद जब एक दिन पूरी तरह मेरे पिता मेरे सामने थे ,मैंने उस रुपए का सच उन्हें बताया । पहले तो वे हँसते रहे फिर वात्सल्य व करुणा भरे स्वर में बोले--- "बेटी तू बेकार ही इतनी परेशान होती रही । एक बार सच कह कर तो देखती । अपने पिता से भी भला कोई इतना डरता है ?"
काकाजी के इस सवाल का भी जबाब मुझे सालों बाद सूझा कि "तब तुम थे कहाँ काकाजी ? तुम नही थे तभी तो मैं हमेशा अँधेरों में घिरती रही । उजालों से डरती रही । तुम होते तो क्या मैं इस तरह डरती ? यकीनन कभी नही ।" 
और काकाजी मेरे पास अपने होने का यकीन कराए बिना ही चले भी गए !"    


Tuesday, May 15, 2012

और कुछ भी नही


मातृ-दिवस पर पूर्व-प्रकाशित एक पुरानी लघुकथा
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इन दिनों बैंगलोर में हूँ । मान्या व विहान के साथ । कुछ लिखना व प्रकाशित करना मुश्किल ही है । इसलिये फिलहाल यह पुरानी रचना ही है ।
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"भैया-भैया ,तुम्हें बुआ बुला रही है ।"----मैं बाहर बैठक में सोने की कोशिश कर रहा था कि मेरे छोटे भाई ने आकर मुझे झिंझोडा ।
"क्या हुआ भाई ?" मैंने पूछा तो वह संक्षेप में बता कर चलता बना---
" खबर आई है कि हरी भैया बीमार है ,सो बुआ जाने की कह रही हैं ।"
"जाने की कह रही हैं !!"--मैं चौंक पडा । ऐसा कैसे हो सकता है ? अभी पन्द्रह दिन भी नही हुए जब इसी हरी के दुर्व्यवहार से आहत हुई बुआ को मैं अपने साथ लाया था । अब बीमार भी होगया पन्द्रह दिन में ! मुझे यकीन नही हुआ । जरूर मक्कार ने बीमारी की झूठी खबर भिजवाई होगी ।
हरी उन लडकों में से है जो बेटे के नाम पर कलंक कहे जासकते हैं । माँ की सेवा-टहल तो बहुत दूर की बात है , उसके दो मीठे बोलों का भी सुख नही है बुआ को । ऊपर से मेहनत अलग । चाहे भैंस का चारा लाना हो ,या भरी दोपहरी में चूल्हे पर रोटी सेकना हो ,काम किये बिना बुआ को एक कप चाय भी नसीब नही होती । काम में जरा भी देर या लापरवाही होती तो गाली-गलौज ,अपमान और घर से बाहर निकल जाने की कहना उसके लिये 'तकिया कलाम' जैसा था । बहू मुँह से तो कुछ नही कहती थी पर उसकी मूक उपेक्षा हरी की मुखर कुटिलता से कम न थी । मैंने वहाँ रह कर यह सब देखा । बुआ की दीन दशा देखीं तो हरी को खूब फटकारा और बुआ को अपने साथ ले आया कभी वापस न भेजने का निश्चय करके । बुआ ने भी तब यही कहा कि अब वे इस 'निपूते' का मुँह भी न देखेंगी । फिर इतनी जल्दी कैसे भूल गईं बुआ । अभी इस तरह चली जाएंगी तो उसकी हेकडी और भी बढ जाएगी । नही मैं नही जाने दूँगा एक माँ को यों अपमानित होने के लिये । मैं इस लायक तो हूँ कि बुआ को आजीवन अपने साथ ससम्मान रख सकूँ । आखिर मेरा भी उनके लिये प्रति कोई दायित्त्व है । यही सब सोच कर मैं अन्दर गया ।
मैंने देखा ,बुआ सारे कपडे-लत्ते समेट-बाँध कर बैठी हैं । मुझे बोलने का मौका दिये बिना ही कहने लगीं---"सुनील बेटा , खबर आई है कि वह 'नासमिटा' बीमार है । पडा होगा सारा काम सिर पर । रहने और खाने-पीने का सऊर तो है नही । अब क्या माँ बैठी है जो फिकर करेगी । जरूर पछताता होगा । बहू पूरी अल्हड है । उमर की भी तो छोटी ही है न ! उसे अपना ही होस नही है ।... देख ,तू यह न समझना बेटा कि यहाँ मुझे अच्छा नही लग रहा । अरे यहाँ तो मैंने वो सुख पाया है जो नसीब वालों को मिलता है । मेरा जाने का मन थोडी है ! और तू देखना वहाँ जाकर भी मैं उससे बोलने वाली नही हूँ ...बस सोचती हूँ कि वह 'मरा' बीमार है ....।"
अपनी बात का समर्थन माँगती हुई सी वे मेरी ओर देखने लगीं । मैं हैरान था । कहाँ वह पन्द्रह दिन पहले वाला आक्रोश और दर्द और कहाँ यह व्याकुलता व चिन्ता । मेरे पास कुछ कहने को नही था क्योंकि उनकी नम आँखों में ,बिना माँगे ही क्षमा कर देने वाले हृदय में केवल और केवल स्नेह था और कुछ भी नही ।
फिर लौट आने का आग्रह करके मैंने उनका थैला उठा लिया । और मैं करता भी क्या ।

Thursday, April 26, 2012

बोलो रामसहारे जी


भैया ,रामसहारे जी ।
क्यों हो हारे--हारे जी
क्यों तन्हा बेचारे जी ।
सोचो रामसहारे जी
अलग अलग ही रहते हो
उल्टे ही तुम बहते हो
जो जो सब कहते हैं ,
उससे क्यों हट कर
कुछ कहते हो ।
झुकना तुम्हें नहीं आता ।
रुकना तुम्हें नहीं भाता ।
अफसर की हाँ... हाँ कहने में
भला तुम्हारा क्या जाता !
"क्यों" हर जगह लगाते हो ।
सिर हर जगह उठाते हो
सही गलत का निर्णय तुम क्यों
करने में लग जाते हो ।
सीखा था जो बचपन में
नही चलेगा पचपन में ।
चश्मा अपना जल्दी बदलो
धुन्ध दिखेगी दर्पण में ।
सम्हलो रामसहारे जी
बदलो रामसहारे जी ।
दरवाजे यदि नीचे हैं तो
झुकलो रामसहारे जी ।
काम करो या नाम करो
या बैठ मजे- आराम करो
केवल पाँ--लागी अफसर की
सुबह और फिर शाम करो ।
या ठोकर खाते रहना ।
दुखडे ही गाते रहना ।
पेंशन तक दफ्तर के चक्कर
और लगाते ही रहना ।
आओ रामसहारे जी
गाओ रामसहारे जी
कुर्सी के गुण ,
फिर सुविधाएँ पाओ
राम सहारे जी ।

Tuesday, April 17, 2012

रमपतिया की याद में

रमपतिया तुम हँसती थी
दिल खोल कर
एक बडी बुलन्द हँसी ।
छोटी-छोटी बातों पर ही
जैसे कि ,तुम्हारा मरद
पहन लेता था उल्टी बनियान
या दरी को ओढ लेता था
बिछाने की बजाय
या कि तुम दे आतीं थीं दुकानदार को
गलती से एक की जगह दो का सिक्का
तुम खिलखिलातीं थीं बेबाकी से
दोहरी होजाती थी हँसते-हँसते
आँखें ,गाल, गले की नसें ,छाती...
पूरा शरीर ही हँसता था तुम्हारे साथ,
हँसतीं थी घर की प्लास्टर झडती दीवारें
कमरे का सीला हुआ फर्श
धुँए से काली हुई छत
और हँस उठती थी सन्नाटे में डूबी
गली भी नुक्कड तक...पूरा मोहल्ला...।
ठिठक कर ठहर जाती थी हवा
हो जाते थे शर्मसार
सारे अभाव और दुख ,चिन्ता कि
शाम को कैसे जलेगा चूल्हा
या कैसे चुकेगा रामधन बौहरे का कर्जा
बढते गर्भ की तरह चढते ब्याज के साथ ।

रमपतिया तुम रोती भी थीं
तो दिल खोल कर ही
हर दुख को गले लगा कर
चाहे वह मौत हो
पाले-पनासे गबरू की
या जल कर राख होगई हो पकी फसल
या फिर जी दुखाया हो तुम्हारे मरद ने
तुम रोती थीं गला फाड कर
रुदन को आसमान तक पहुँचाने
तुम्हारे साथ रोतीं थीं दीवारें
आँगन ,छत , गली मोहल्ला और पूरा..गाँव
उफनती थी आँसुओं की बाढ
नाली में फंसी पालीथिन की तरह
रुके हुए दर्द बह जाते थे
तेज धार में ।

रमपतिया , तुम्हें जब भी लगता था
कुछ अखरने चुभने वाला
जैसे कि बतियाते पकडा जाता तुम्हारा मरद
साँझ के झुरमुट में
खेत की मेंड पर किसी नवोढा से
फुसफुसाते हुए ।
या कि वह बरसाने लगता लात-घूँसे
बर्बरता के साथ
जरा सी ना नुकर पर ही
या कि छू लेता कोई
उसकी बगलें
चीज लेते-देते जानबूझ कर
वह परिवार की नाक का ख्याल करके
नही सहती थी चुप-चुप
नही रोती थी टुसमुस
घूँघट में ही
और दुख को छुपाने
नही हँसती थी झूठमूठ हँसी
चीख-चीख कर जगा देती थी
सोया आसमान ।
भर देती थी चूल्हे में पानी
जेंव लो रोटी
मारलो ।
काट कर डाल दो
रमपतिया नही सहेगी
कोई भी मनमानी ।
और तब थर्रा उठतीं थीं दीवारें
आँगन ,छत ,गली मोहल्ला गाँव ..
औरत को जूते पर मारने वाले
बैठे-ठाले मर्द भी...
बचो भाई इस औरत से
बचाओ अपनी इज्जत ।
क्यों छेडते हो छत्ता ततैया का ।
रमपतिया ,
ओ अनपढ देहाती स्त्री
काला अक्षर भैंस बराबर
पर मुझे लगता है कि उस हर स्त्री को
तुम्हारी ही जरूरत है जिसने
तुम्हारी तरह
नही जाना -समझा
अपने आपको आज तक
रमपतिया तुम कहाँ हो ।

Sunday, April 15, 2012

यह पगडण्डियों का जमाना है


"यार तुम्हारा पाठ्यक्रम अक्टूबर-नवम्बर तक कैसे पूरा हो जाता है "?
"पढाने से और कैसे ! मैं कोई पीरियड मिस नही करता । मेहनत करता हूँ मेहनत । समझे ।"
"तुम्हारा मतलब है कि मैं मेहनत नही करता ।"
"करते हो, लेकिन व्यर्थ एकदम बेकार ..।"
"वो कैसे ?" बताओ न यार । मुझे तो लगता है कि मैं सार्थक ही पढाता हूँ ।"
"क्या सार्थक पढाते हो ? जो पाठ्यक्रम में नही है उस पर अपना व विद्यार्थियों का समय खराब करते हो । नही ?"
"जैसे...?
"जैसे कि पाठ पठाते समय तुम शब्दार्थ, व्याख्या ,सन्धि ,समास,उपसर्ग ,प्रत्यय या कि बिन्दी व मात्राओं का सही प्रयोग बताने में ही कभी-कभी पूरा पीरियड निकाल देते हो ।जबकि ये पाठ्यक्रम में नही हैं । या कि दो-दो दिन एक ही पाठ के पीछे पडे रहते हो । क्या जरूरत है बताने की कि रस निष्पत्ति क्या होती है । कि उपमा व उत्प्रेक्षा में क्या अन्तर होता है । इतना समय नही होता मेरे भाई हमारे पास । गहराई में घुस जाओगे तो पाठ्यक्रम पूरा होगा कैसे ?"
"वह सब प्रसंगवश ही तो बताता हूँ । वैसे भी सन्धि-समास आदि तो हिन्दी के साथ चलते हैं इसलिये पाठ्यक्रम का ही हिस्सा हैं । तुम्ही बताओ अगर तुम्हें पता नही कि ग्यारहवीं का छात्र दिन को दीन लिख रहा है, गलत पढ रहा है याकि दीर्घ सन्धि तक नही जानता तो उसे नही बताओगे । ?"
"बिल्कुल नही । क्योंकि ऐसा करने का कोई लाभ नही है ।
"क्या हर काम केवल अपने लाभ के लिये करते हैं ? क्या जरूरी नही कि छात्र विषय को पूरी तरह आत्मसात् करले और इसमें हम उसकी मदद करें । छात्रों को कुछ सिखा सकें क्या यह भी लाभ नही है ?"
"तुम मदद करके लाभ ले रहे हो ना । ...पर प्राचार्य की निगाह में तुम एक सुस्त व गैरजिम्मेदार शिक्षक हो । जो समय पर पाठ्यक्रम तक पूरा नही कर पाता । मेहनत भी करो और नाम भी न हो ऐसा काम किस मतलब का ।सोचो कि तुम्हें कभी बोर्ड की कक्षा क्यों नही दी जाती ? सो भैये ,जब चार कदम चलने से ही बात बनती है तो बीस कदम चलने की क्या जरूरत है । वैसे भी हमारे लिये पाठ्यक्रम और उसे पढाने का समय ,तय है । पर पाठ्यक्रम पूरा करने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है परीक्षा परिणाम । शिक्षक व छात्र दोनों की योग्यता परीक्षा परिणाम से ही आँकी जाती है । सबका ध्यान केवल परीक्षा-परिणाम पर रहता है । और उसे पाने के लिये इतने विस्तार से जाना आवश्यक भी नही है ।बस कुछ इम्पार्टेंट प्रश्न रटवा दो । तमाम प्रकाशक इतनी सीरीज व गाइडें निकाल कर हमारी मदद कर ही रहे हैं। गाइड पकडाओ और फटाफट कोर्स पूरा करो सब लोग ऐसा ही कर रहे हैं और देखलो उनका रिजल्ट । तुमसे बेहतर ही होता है । तो फिर क्या अटकी पडी है इतनी मगजपच्ची करने की ।"
"वो कैसे बेहतर होता है क्या तुम नही जानते ।"
"अब तुम इन कुतर्कों में ही पडे रहो । कोई तुम्हें ताज नही पहना रहा ! क्या तुमने परसाई जी के एक व्यंग्य में नही पढा कि ----अब..राजमार्गों पर तो झाडियाँ उग आईं हैं । उन पर कोई नही चलता । लोगों ने पगडण्डियों को ही राजमार्ग बना लिया है ..राजमार्ग के दरवाजे पर लोहे के भारी किवाड लगे हैं । जो उन्हें खोलना चाहते हैं....उनके कपालों से खून बह रहा .है....। तुम्हें खून बहाने का शौक है तो खूब बहाओ नही तो पतली गली से निकल जाओ दोस्त । मजे में रहोगे ।"