Wednesday, May 9, 2018

सड़कें ..


चौड़ी सड़कें,..
.सड़कों का जाल  
अति व्यस्त... ट्रैफिक से त्रस्त .
वाहनों की बाढ़ की, 
शोर और सन्नाटे की अभ्यस्त
जिन्दगी हो रही है ,  
सड़क जैसी ही .
सड़कों को पार करना कठिन  
उससे भी ज्यादा कठिन तय कर पाना दूरी
अब दिल से दिल तक की .
विलुप्त हो रहा मिलने का चाव  

क्योंकि बीच में फैली हैं लम्म्म्बी .. चौड़ी व्यस्त सड़कें ,
सड़क पार तुम..
इन्तजार रहता है मुझे
शनिवार रविवार का ,
पर नही आते शनिवार इतवार हर हफ्ते .
परस्पर मिलने के लिये ..
कितने सारे काम ..और
बहुत ही बारीक सी दूरियाँ
धीरे धीरे फैल रही हैं सड़क की तरह .
सड़क भारी ट्रैफिक से व्यस्त त्रस्त .
बहुत जरूरी लगने पर ही बनाते हो तुम योजना
आकर मिलने की .
अब असंभव है सोचना भी
सहज ही शाम को
एक साथ बैठकर चाय पीने की बात .

तुम एक अलग दूसरा घर बनाओ
पर न हो वहाँ अपनों के बीच कोई व्यस्त सड़क .
ताकि कल्पना बनकर न रह जाए
सबका एक साथ ,हँसते बोलते हुए
शाम गुजारना बाँटते हुए अपनी उलझनें खुशियाँ
उम्मीदें ..अपेक्षाएं 
जैसा कि होता था
अपने गाँव और छोटे से शहर के 
एक मोहल्ले में .
तुम दौड़कर आजाते थे
एक पुकार पर या ऐसे ही चाहे जब
बिना कोई योजना बनाए .
दूरियाँ ज्यादा डरावनी होजातीं हैं
किसी महानगर में .



Tuesday, April 3, 2018

नेह निर्झर बह गया है ...


4 अप्रैल 2018
" नेह निर्झर बह गया है .
रेत ज्यों तन रह गया है ..." 
(निराला)
चार अप्रैल को जिया को गए दो साल होगए . ये दो वर्ष जैसे किसी वीरान खण्डहरों से आँखें मींचे जैसे तैसे बस गुजर गए हैं . उनके बाद मन का आँगन स्नेह और अपनेपन की छाँव से इस तरह खाली हो जाएगा , अनुमान नही था . मन जब खाली होता है तब कुछ किया नही जासकता . वक्त बेवजह सा गुजरता जाता है राह के काँटे कंकड़ों को गिनते हुए .
कहते हैं समय हर घाव को भर देता पर माँ के जाने के बाद जो शून्यता आई है , वह गहराती जा रही है , एक जड़ता सी जमकर बैठ गई है अनुभूतियों पर इसलिये अभिव्यक्ति पर भी , प्रेम का चरम सृजन को जन्म देता है .अपनत्त्व का चरम मन को मजबूत आधार देता है . जब दोनों नही तो कुछ भी लिखने से मन घबराता है . अरसे से अन्दर एक उजाड़ सा महसूस कर रही हूँ . यह माँ के लिये प्रेम है या हाथ से एक डोर छूट जाने की तिलमिलाहट . मुझे नही मालूम कि यह उनके बिछोह की अँधेरी सुरंग में घुसने का डर है , या मेरी निष्क्रियता है कि बचती रही हूँ यादों की पीड़ा से . पीड़ा की अभिव्यक्ति से . अभिव्यक्ति बिना चैन कहाँ ..तभी तो इधर उधर से उनके खालीपन को भरने की कोशिश में मैं ज्यादा खाली होगई हूँ . मैंने एक गीत और सावन के संस्मरण के अलावा उनके लिये कुछ नहीं लिखा .हालाँकि उनकी यादों को पूरी तरह जीकर लिखने के लिये खुद को अवकाश देना जरूरी था . चलते फिरते यादों में रोया जा सकता है पर उसे शब्दों में पिरोना कठिन है .कम से कम मेरे लिये .

लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि माँ को शब्दों में बाँधना ही एक दुष्कर कार्य है . दिल से भी और दिमाग से भी . समझ नहीं आता कि उनके लिये क्या लिखूँ ..कहाँ से और कैसे शुरु करूँ . शुरु से ही उनके चारों ओर घिरे रहे विसंगतियों के काले बादलों को याद करूँ या बादलों के बीच मुस्कराती किरणों जैसे उनके आशापूर्ण विचारों के उजाले को लिखूँ . अनुचित के प्रति उनके विरोधभाव को लिखूँ या लिखूँ उनकी परिस्थिति को सहज ही स्वीकार कर लेने वाली सरल प्रवृत्ति और उससे मिली ठोकरों की पीड़ा को . उनके स्वातन्त्र्य-प्रिय स्वभाव को याद करूँ या स्नेह और सद्भाव जनित बन्धनों में सहर्ष बँध जाने की मनोवृत्ति को याद करूँ .तेज प्रवाह में हाथ से छूट गई डोर जैसी अनुभूतियों का न ओर समझ में आता है न छोर. प्रारम्भ पल पल दिशाएं बदलती हवाओं की तरह इधर उधर उड़ते पत्तों में बिखरा प्रतीत होता है और अधूरी रह गई कहानियों का कोई अन्त नही होता .पर शुरु तो करना ही होगा . आज यही कोशिश है .. (जारी )

Tuesday, December 26, 2017

अपने विरुद्ध

मैं जब जब सोचती हूँ कि,
जबाब दूँ तुम्हारे छल , द्वेष और वितृष्णा का .
प्रतिकार करूँ अपनी अवमाननाओं का .
कड़े शब्दों में .
तय करती हूँ कि
सोचूँगी अब से हर बात
तुम्हें शामिल किये बिना .
पर मैं हैरान हूँ कि
खड़ा होजाता है कोई मेरे ही विरुद्ध .
मेरे अन्दर .
शुरु हो जाता है एक युद्ध .
कितने ही युद्ध लड़ने पड़ जाते हैं
अनचाहे ही .
सुनिश्चित होता है परिणाम .
आश्चर्य यह कि 
हारकर भी मुझे बुरा नही लगता
उसका जीत जाना
जो मौजूद है मेरे अन्दर ,
मेरे ही विरुद्ध .

Tuesday, July 4, 2017

मोहभंग .

एक युग से गूंज कर
लौटती रही मुझ तक ,
मेरी ही आवाज .
और मैं सोचती रही कि
पुकारा है मुझे पहाडों ने.
बड़ा अच्छा लगता था 
यह सोचकर कि 
पत्थर भी  दिल की सुनकर
देते हैं प्रत्युत्तर  .

मेरी ही आहट से
जागती रही हैं 
मेरी खामोशियाँ
और मैं लिखती रही पातियाँ
अनाम अविराम .

दस्तक देते रहे  
मेरी साँसों के स्पन्दन
बंद दरवाजों पर ,
तलाशने कुछ खोया हुआ 
अंधेरों में .
जहाँ एक दुनिया थी .

लेकिन अब,
अहसास होने लगा है कि
चट्टानों के सीने पर
सिर रखकर रोना व्यर्थ है 
वेदना और प्रतीक्षाओं का ?

कि यह विश्वास करना  
कि पत्थर भी सुनते और बोलते हैं ,
धोखा देना है खुद को .

लेकिन इस धोखे का अहसास होना भी
शायद  ,

अंत होना है एक पूरी दुनिया का .



Saturday, July 1, 2017

संवेदना की भाषा और निरक्षरता की पीड़ा

यह पोस्ट ब्लॉग की पहली पोस्ट है . लेपटॉप में खराबी आ गई है .  नई पोस्ट अभी संभव नहीं लेकिन चार माह से निष्क्रिय पड़े ब्लॉग को जारी रखने इसे दिया है . 


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वाणी अम्मा अब काम पर नहीं आती . लगभग दो माह से वह बीमार सी दिख रही थी . अक्सर नागा भी करने लगी थी ।अब बिल्कुल नही आरही ।अभी दो दिन पहले ही सरोज अम्मा से पता चला कि डाने वाणी अम्मा को कैंसर बताया है  सरोज अम्मा नीचे सामने वाले घर में काम करती है वह
 हिन्दी समझ लेती है और टूटीफूटी बोल भीलेती हैउसी 
तरह जिस तरह चलना सीखरहा बच्चा लडखडाते हुए ही 
सही कुछ कदम तो चल ही लेता है  
इस दुखद सूचना से हम सब स्तब्ध हैं ।दुखी भी हैं ।वाणी अम्मा पिछले चार साल से हमारे यहां काम कर रही थी ।गहरे रंग.छरहरे बदन और सरल हँसी वाली तमिल-भाषी वाणी अम्मा इतने समय में हमसे इतनी घुल-मिल गई थी कि हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी का एक हिस्सा ही बन गई थी ।भाव संचार के लिये भाषा का माध्यम  होनेपर भी वह अपना सुख-दुख प्रकट करलेती थी ।जैसे कि मैं जब भी बैंगलोर आती ,वह अचानक सुबह-सुबह मुझे घरमें देख खुशी के मारे दोनें बाँहें फैला कर कहती--...अम्मा----।इसी तरह जब मैं उसे उदास देख कर उसके कन्धेपर हाथ रख कर उदासी का कारण पूछती तो वह मेरे कन्धे पर सिर टिका कर फफक कर रो पडती थी ।तब मैं यहसमझकर कि इसके साथ कोई गहरा दुख जुडा है ,उसे सान्त्वना तो दे देती थी पर......।मैं मानती हूँ किप्रेम,पीडा,आनन्द,घ्रणा .आदि भाव व्यक्त होने के लिये शब्दों के मोहताज नही है। संवेदना की भाषामानवीय,सर्वमान्य,और सर्वकालिक होती है ।वैसे भी उसे जो कुछ व्यक्त करना होता था कर लेती थी ।उसे कुछशब्द अंग्रेजी के ---बकेट,सोप,क्लिप आदि---आते ही थे बाकी कामों ---खाना कपडा माँगने--वह संकेतों से काचलाती थी ।उसके लिये शायदयही काफी था ।पर मेरे लिये इतना काफी नहीं है ।मैं जानना चाहती हूँ कि उसनेचप्पलें पहनना क्यों छोड दिया  कि ,वह बडे जतन से खाना बचा कर किसके लिये ले जाती है 

कि ,सरोजअम्मा के कथनानुसार उसका बेटा उसे घर से चाहे जब निकाल देता है तो क्यों उसका विरोध करने कीबजाय उसकी फिक्र करती है ।और कि ........और  जाने कितनी बातें ।मेरे लिये आँसू और मुस्कान की भाषा सेआगे और ज्यादा महत्त्व शब्दों की भाषा का है ।वस्तुतः मानव जीवन दूसरे जीवनों से अभिव्यक्ति की क्षमता केकारण ही तो अलग है ।एक दूसरे की व्यथा-वेदना को,भाव-संसार को जानना ही नही उसे पूरी तरह समझना भीजरूरी है  मेरा मानना है कि अपने आस-पास से ...जमीन से जुडे बिना आत्मीयता नहीँ आसकती ।और जुडावभाषा-संवाद के बिना नहीं होता ।मुझे यह अखरता है कि मैं बडे-बडे सिन्दूरी फूलों वाले और जहाँ-तहाँ विशालछतरी की तरह फैले गुलाबी फूलों वाले इन पेडों के नाम भी नही जानती , या कि किसी प्रतिमा को सजा कर फूलबरसाते हुए बैंड-बाजों के साथ जो जलूस निकला वह क्या ,कौनसा उत्सव था ।क्यों कि मुझे यह सब समझाने वालीभाषा उन्हें नही आती जो इसे जानते होंगे  अगर सरोज नही होती तो वाणी अम्मा के बारे में हमें कहाँ से पताचलता 

भाषायी समझ की आवश्यकता के अनुमान के लिये एक और प्रसंग याद आरहा है ।एक सुबह जब मैं पार्क में टहलही थी एक हमउम्र महिला की अपनत्व भरी सी मुस्कान ने मुझे संवाद के लिये प्रेरित किया ।पर विडम्बना यह किउन्हें अंग्रेज तक नही आती (,हिन्दी की तो बात ही नही है ) और मुझे कन्नड ।विवश होकर हमें मुस्कान औरअभिवादन तक ही सीमित रहना पडा 
बैंगलोर आकर मुझे निरक्षरता की पीडा का अहसास होता है ।जब मैं केवल कन्नड में(अंग्रेजी नही ) लिखी सूचना विज्ञापनों को देखती हूँ,तो  पढ पाने की बेवशी कचोटती है ,एक अँधेरे का अनुभव होता है  ।अक्षर -ज्ञान कीमहत्ता  आवश्यक समझ आती है  अक्षर उजाले का स्रोत हैं , दिमाग के दरवाजों की कुन्जी है ।चेतना के द्वार हैं ।अक्षर जमीन हैं आसमान हैं