Friday, July 12, 2019

हिमालय के कोट में टँका हुआ फूल--भाग 2

भाग 1 से आगेl

17 मई 2019
लगभग 2335 मी. की ऊँचाई पर बसा शहर थिम्पू भूटान की राजधानी है और शायद भूटान का सबसे बड़ा शहर भी .फुनशुलिंग से थिम्पू तक हरे-भरे मनोरम लेकिन पाँच-छह घंटे पहाड़ों में ऊपर नीचे चढ़ते उतरते अब तन मन दोनों ही विश्राम चाह रहे थे . यहाँ रामदा होटल में हम दो रातें गुजारने वाले थे . होटल पहुँचते ही दो युवक गाड़ी से सामान उतारने आगए . फिर जब दो सुन्दर लड़कियों ने मुस्कराते हुए हमारे कन्धे पर सफेद रेशमी दुपट्टा डालकर अभिवादन और स्वागत किया तो एक गरिमामय अनुभव हुआ .उनकी अतिथि सत्कार की यह परम्परा हमें अपूर्व और बहुत शानदार लगी .साथ ही यह भी कि अब हम सचमुच दूसरे देश में हैं .

वास्तव में यहाँ आकर ही हमें असली भूटान देखने मिला . थिम्पू में दो दिन रुके इसलिये बहुत सारी नई व अनौखी जानकारियाँ मिलीं . जैसे कि भूटान का स्थानीय नाम ड्रुक है ,ड्रैगन की भूमि .राज्य के चीफ को ड्रेगन किंग कहा जाता है.....यहाँ लोकतांत्रिक शासन है पर संवैधानिक राजशाही भी है.....यहाँ ट्रैफिक सिग्नल नहीं हैं लेकिन एक से बढ़कर एक शानदार गाड़ियों सड़कों पर दौड़ती देखी जा सकतीं हैं.....दो पहिया वाहन नहीं दिखाई देते . हर जगह (होटल ,शॉपिंग सेन्टर व अन्य स्थानों पर ) लड़कियाँ ही काम करतीं हैं ... यहाँ कोई अपना अलग से जन्मदिन नहीं मनाता बल्कि नववर्ष को ही सबके जन्मदिन के रूप में मनाते है... .प्लास्टिक और धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबन्धित है ....लोग पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक हैं ....यहाँ अधिकतर लोग हिन्दी समझते हैं ... शादी के बाद लड़का लड़की के घर आकर रहता है....बहुविवाह बुरा नही माना जाता . लोग अपनी संस्कृति व परम्पराओं के प्रति बहुत प्रतिबद्ध व आस्थावान हैं . बाहरी प्रभाव से मुक्त रखने के लिये लम्बे समय तक पर्यटकों के लिये भूटान के दरवाजे बन्द रखे गए . 1970 ई में यहाँ पहला विदेशी पर्यटक आया .1999 से पहले यहाँ टीवी इन्टरनेट जैसे संचार साधन नहीं थे . यहाँ का वास्तु शिल्प अनूठा और विशिष्ट है . सभी इमारतें एक ही शैली में बनी हुई हैं . निचले भाग में सफेद और ऊपरी भाग में कत्थई पेंट किया गया है जिस पर हरे सुनहरे रंगों की कलात्मक आकृतियाँ हैं .. खिड़की दरवाजों और झरोखों में लकड़ी की शिल्पकारी देखने लायक है . पारम्परिक शैली से अलग रंग और ढंग के भवन निर्माण की अनुमति नहीं है......होटल अपार्टमेंट्स ,मॉल ..सभी भवन एक ही शैली में बने हुए हैं .हिमालय की गोद में बसे सिक्किम और भूटान में भौगौलिक समानताएं हैं लेकिन अलग राष्ट्र होने के साथ भवन निर्माण शैली भी भूटान को सिक्किम से अलग करती है . बाजार बहुत साफसुथरे शान्त व भीड़ रहित हैं....कोई आपाधापी या तनाव नहीं है.... विदेशियों के लिये भूटान काफी मँहगा है लेकिन भारतीय पर्यटकों के लिये यह छोटा सा देश अपने घर आँगन जैसा है ...यहां का राष्ट्रीय पक्षी रेवेन है जो एक शक्तिशाली देवता माना जाता है . उसे मारने पर उम्रकैद की सजा का प्रावधान है .रेवेन-क्राउन को वांग्चुक वंश का मॉडल माना जाता है ... यहाँ लोग राजा को बहुत मानते हैं . वर्त्तमान राजा जिग्मे खेसर नामग्याल हैं और रानी जेटसुन पेमा .यहाँ आय का बड़ा स्रोत बिजली है... अन्य में वन सम्पदा और अब पर्यटन भी शामिल हो रहा है ..वगैरा वगैरा ..
रात के भोजन के बाद हम अपने अपने कमरों में चले गए . विवेक ने विकास के ठहरने के विषय पूछा तो वह हँसकर बोला ---हो जाएगा सर ,हमारा तो रोज का काम है . हँसते समय उसकी आँखें लगभग बन्द होगई लगतीं हैं .
सर सुबह नौ बजे तक ब्रेकफास्ट लेकर तैयार रहें . मैं आ जाऊँगा .”विकास ने एक बार और दोहराया फिर खाना खाकर अपने किसी परिचित या मित्र के यहाँ चला गया .
मेरे साथ विहान के खूब मजे रहे . उसे मालूम तो हो ही गया है कि दादी पापा मम्मी से भी बड़ी हैं इतनी कि जरूरत होने पर वे उन्हें डाँट भी सकती हैं .उसने सोने से पहले दो कहानियाँ व चुटकुले सुने फिर अपने प्रिय कार्टून डोरेमोन के किस्से सुनाए और उनसे जुड़े सवाल भी किये , (मानो नोबिता ,डोरेमोन सूजैन वगैरा को मैं रोज मिलती हूँ ) जो मेरे पल्ले तो नही पड़े पर मैं अन्दाज से जबाब देती गई और वह खुश होकर कहता रहा –अरे दादी आप तो काफी इन्टेलिजेंट हैं .
कहानी सुनकर विहान सो गया लेकिन मुझे उस रात नींद बहुत ही कम आई . न के बराबर .एक तो कम से कम डेढ़-दो बालिश्त मोटा गद्दा आपत्ति की हद तक मुलायम और गुलफुला था . हम दोनों उसमें लगभग धँस गए थे . मुझे इतनी आरामदायक चीजें रास नहीं आतीं . उस पर रास्ते के दृश्य दिल-दिमाग और आँखों में इस तरह भरे हुए थे कि नींद आ आकर लौट जाती थी .
18 मई
मेमोरियल चोर्टन 
विकास सचमुच सुबह ठीक नौ बजे आगया . हम लोग भी तैयार थे . पहले हम मेमोरियल चोर्टन (msmorial chorten) ( किसी किसी ने कोर्टन भी लिखा है . कोई नियम--धरम नहीं है रोमन लिपि का ) गए . यह थिम्पू के मनोरम ,प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित स्मारकों में से एक है . विश्वशान्ति को समर्पित, तिब्बती शैली में बना यह मठ तृतीय ड्रुक ग्यालपो ( भूटान का राजा) जिग्मी डोरजी वांगचुक की याद में बनाया गया था .हमने देखा ,सैकड़ों लोग उस हरे भरे मैदान के बीच स्थित धवल भव्य स्मारक की परिक्रमा कर रहे थे . आस्था , प्रेम व श्रद्धा का केन्द्र चाहे मानवीय हो या दैवीय वह मन को ऊर्जा, उल्लास और जीवन को सौन्दर्य देता है . आस्था व विश्वास के बिना जीवन जैसे बिना चालक के चलता दिशाहीन वाहन है .
बुद्ध—पॉइंट और थिम्पू शहर--
भूटान बौद्ध संस्कृति का देश है .बौद्ध धर्म यहाँ का राजकीय धर्म है .सड़क ,पुल ,पेड़ , पहाड़ , हर जगह बौद्धधर्म के रंगबिरंगे परचम लहराते दिख जाते हैं .जंगल पहाड़ और नदियों के साथ साथ भूटान को बौद्ध मठों ( मॉनेस्टरीज) का भी देश कहा जा सकता है .थिम्पू में स्थित भगवान बुद्ध डोरडेम्मा की प्रतिमा भूटान ही नहीं पूरे एशिया में सबसे ऊँची प्रतिमा है . हम वहीं जा रहे थे .गाड़ी लहराती हुई पहाड़ चढ़े जा रही थी और मैं नीचे छूटते जा रहे शहर को देख रही थी जहाँ भवनों के बीच की दूरियाँ मिटती जा रही थी और शहर सिमटता जा रहा था . विहंगम दृष्टि भौतिक के साथ आध्यात्मिक व व्यावहारिक संकेत भी देती है . दृष्टिकोण जितना ऊँचा होगा ,विषमता और संकीर्णता उतनी ही कम होगी . मैंने अपनी कविता ऊँचाई पर दो व्यंजना में भी लिखा है कि ऊँचाई का मतलब ही है ,भेदों का मिट जाना .  कुछ ही पलों में हम भगवान बुद्ध के विशाल प्रांगण में थे ,विस्मित अभिभूत .... आसमान में बादलों के बीच शान्त , उन्नत-भाल भगवान बुद्ध की स्वर्णखचित प्रतिमा सचमुच भव्य है , अद्भुत है , दिव्य है . प्रतिमा की ऊँचाई का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि नीचे प्रांगण खड़े होकर बुद्ध का मस्तक देखने के लिये आकाश की ओर देखना पड़ता है . 169 फीट ऊँची इस प्रतिमा की स्थापना भूटान के चतुर्थ नरेश जिग्मे सिंगे वांग्चुक के साठवें जन्मदिन पर की गई थी . कहते हैं कि इसके अन्दर भी काँसे की सवा लाख बौद्ध-प्रतिमाएं हैं . इसके निर्माण और स्थापना में चीन जापान कोरिया आदि देशों का पर्याप्त सहयोग मिला है . उस ऊँची और बंजर सी पहाड़ी पर जहाँ हरियाली वैसी नहीं थी जैसी रास्तें में थी लेकिन हवा में गज़ब का जोर था , जैसे पाँव फर्श पर कसकर पर नहीं रखे तो उखड़ जाएंगे . मानो कि दर्शनार्थियों की यह एक परीक्षा थी कि कितना टिक सकोगे यहाँ , इस मार्ग पर जो धन-वैभव और पति पत्नी व सन्तान जैसे आत्मीय सम्बन्धों के प्रति भी व्यक्ति को निस्संग व निर्मोही बना देता है .
प्रांगण में चारों ओर देवी देवतों की सुनहरी और भव्य प्रतिमाएं खड़ी थीं मानो वे सुविशाल भगवान बुद्ध की स्तुति कर रहे हों . नीचे थिम्पू शहर भगवान बुद्ध को साष्टांग प्रणाम कर रहा था और बुद्ध जैसे अपने संरक्षण में आए शहर को अभयदान दे रहे हों . प्रतिमा के नीचे विशाल भवन है . वहाँ बुद्ध भगवान विष्णु , शिव ,ब्रह्मा , सरस्वती आदि के बीच विराजमान हैं . बाहर मोर व गरुड़ की मूर्त्तियाँ हैं . इस तरह मुझे वहाँ हिन्दू और बौद्ध धर्म का समन्वय देखने मिला . लकड़ी के स्तम्भ और छत की शिल्पकारी अद्भुत है . हमने वहाँ जितना भी समय बिताया , वह अविस्मरणीय है .
इसके बाद एक दूसरे बहुत प्राचीन बौद्धमठ या मन्दिर को भी देखने गए जो बारहवीं शताब्दी में बनाया गया . बौद्ध धर्म यहाँ नौवीं सदी में आया था . इससे पहले का इतिहास केवल जनश्रुतियों में है .
भूटान और भारत के सम्बन्ध अच्छे पड़ोसी जैसे ही हैं . भूटान में सड़क, पुल का निर्माण , म्यूजियम ,कई परियोजनाएं , सीमा सुरक्षा आदि में भारत का सहयोग व हस्तक्षेप है . हुआ यों कि 1865 ई. में ब्रिटेन और भूटान के बीच एक सन्धि हुई जिसके तहत भूटान के कुछ सीमावर्त्ती भूभाग के बदले उसे वार्षिक अनुदान देना तय हुआ . आजादी के बाद वह अधिकार भारत को मिला लेकिन भारत ने सन् 1949 ई. में भूटान को उसकी सारी ब्रिटेन अधिकृत भूमि लौटादी बदले में भारत को भूटान की विदेश व रक्षा नीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका मिली .
पारम्परिक वेशभूषा और भोजन  .
भूटान आज भी एक अनौखा देश है . यहाँ 70 प्रतिशत जंगल हैं .. पर्यावरण के प्रति लोग बहुत जागरूक हैं .प्लास्टिक व धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबन्धित है . दो-तीन साल पहले राजपुत्र के जन्मोत्सव के रूप में लोगों ने एक लाख पेड़ लगाए .यह पूरी दुनिया को एक महत्त्वपूर्ण सन्देश है .
भूटान की पाम्परिक वेशभूषा .धौं व कीरा है . हर भूटानी नागरिक के लिये यही परिधान अनिवार्य है .भूटान के लोग अपनी भाषा , वेशभूषा और परम्पराओं के प्रति बड़े प्रतिबद्ध हैं . आज वैश्वीकरण के युग में अपनी संस्कृति के लिये ऐसी प्रतिबद्धता, ऐसा विश्वास और आस्था सचमुच चकित और प्रेरित करती है .
निहाशा ने पहले ही विकास को बता दिया था कि हम दोपहर का भोजन होटल में नहीं बल्कि किसी अन्य जगह भूटान के पारम्परिक व्यंजनों का स्वाद लेना चाहेंगे . होटल में तो हर जगह लगभग एक सा ही मेनू पनीर दाल सब्जी रायता चपाती सलाद आदि होता है . रवि हमें कावाजंग्सा( kawajangsa) फोक हैरिटेज रेस्टोरेंट ले गया . वहाँ की पारम्परिक कला से सज्जित व्यवस्था देख मन खुश होगया . एक बहुत खूबसूरत लड़की --–"अच्छा चलता हूँ दुआओं में याद रखना .." गीत गुनगुना रही थी यह देख अपनेपन का अनुभव हुआ . 
वहाँ भी हमारी प्राचीन परम्परा की तरह ही भोजन फर्श पर बैठकर करने का नियम हैं .हमारे सामने सुसज्जित चौकियाँ थी जिन पर खाना रखा जाने वाला था . सबसे पहले हमें मिट्टी के कुल्हड़ों में सुजा (बटर टी ) दी गई .यह पेय चाय ,नमक और मक्खन से बनाया जाता है . इसके बाद जो कुछ आया सब नया था .परोसने का तरीका भी शानदार था .. व्यंजनों में एमादात्शी ,केवादात्शी, रेड राइस ,वेज मोमोज , लाल मिर्च की तीखी चटनी ,खुली ,एजी परोसा गया . .खुली (khulee) कूटू के आटे से बना पेन केक होता है , एमादात्शी भूटान का राष्ट्रीय व्यंजन कहा जाता है .इसे लाल मिर्च मक्खन और चीज़ के साथ पकाया जाता है जबकि केवादात्शी , पत्तागोभी , बीन्स आलू चीज़ और मक्खन से बनता है . यहाँ सब्जी में मिर्च की मात्रा ज्यादा होती है . एजी चीज़ के साथ बारीक कटा सलाद था . रेडराइस बेस्वाद (लेकिन सेहत के लिये अच्छे ) लाल चावल ...स्थानीय भोजन में शाकाहारी लोगों के लिये बस इतना ही है . हमने जैसे तैसे उदरपूर्ति की , फिर निकट ही स्थित म्यूजियम देखा .
टाकिन
टाकिन
टाकिन भूटानका राष्ट्रीय पशु है इससे बड़ी विशेषता है कि यह बकरी और गाय का मिलाजुला रूप है , आगे बकरी और पीछे से गाय. तब तो टाकिन को देखना ही चाहिये ,इस विचार के साथ हम मोतीथांग प्रेजरवे (अभयारण्य) पहुँचे . रवि ने टाकिन के बारे में एक जनश्रुति सुनाई कि सदियों पहले एक लामा घूमते घूमते इधर आए . एक दिन उन्होंने एक जगह एक गाय मरी पड़ी देखी और दूसरी जगह एक बकरी . लोगों को मालूम हो चुका था कि इनके पास दैवीय शक्ति है इसलिये उनसे कुछ चमत्कार दिखाने का आग्रह किया तो सन्त ने बकरी और गाय दोनों की हड्डियों को जोड़कर प्राण डाल दिये तो एक विचित्र जानवर उठ खड़ा हुआ . वही जानवर आज टाकिन के नाम से जाना जाता है  .300 रुपए प्रति व्यक्ति टिकिट के हिसाब से 1200 रुपए देकर हम अन्दर गए तो महसूस हुआ कि इतने रुपए व्यर्थ गए क्योंकि वहाँ मात्र चार-पाँच टाकिन दिखे वह भी बहुत दूर . वे दूर उधर ही घूमते रहे .पास से देखने की चाह पूरी नहीं हो पाई . लौटते हुए बेम्बो मार्केट से कुछ की चेन ,पर्स ,स्पेशल होममेड साबुन ,बुद्ध की प्रतिमाएं आदि सामान खरीदा . एक दुकान में निहाशा के हाथ से बुद्ध की प्रतिमा , जिसे वह बड़े शौक से खरीदना चाह रही थी , छूट गई और चटक गई . उसने मूर्त्ति की कीमत अदा करदी पर दूसरी लेने से मना कर दिया हालाँकि उसका बहुत मन था . विवेक ने आग्रह करके वैसी ही दूसरी मूर्त्ति खरीदी तब दुकानदार लड़की ने धन्यवाद कहते हुए कीमत से 100 निकालकर नेहा को दे दिए. भूटान में हमने हर जगह लड़कियों को काम करते पाया .होटलों में भी रिशेप्शन से लेकर ,कुकिंग, फूड सर्विंग ,सफाई सब कुछ लड़कियाँ करतीं हैं और वह भी निर्भय . यह बात हमें बड़ी अच्छी लगी .
रात में रॉयल पैलेस
अब तक शाम हो चली थी . विकास ने कहा ----कुछ देर रुकें , रॉयल पैलेस की लाइट देखकर चलेंगे . उससमय काफी थकान भी हो रही थी . मन्नू ने कहा --छोड़ो भी ,लाइट क्या देखना
अब यहाँ आए ही हैं तो देख लेते हैं ना सर ...विकास साग्रह बोला . वह खुशमिजाज होने के साथ बहुत उत्साही और पर्यटकों का ध्यान रखने वाला युवक है शायद यह उसके पेशे की माँग और अभ्यास हो . पैलेस की लाइट जलने में अभी लगभग एक घंटा की देर थी पर वह हमें यहाँ वहाँ घुमाता रहा और कितनी ही जानी अनजानी जानकारियाँ देता रहा कि यह खेल का मैदान है . तीरन्दाजी और डार्ट्स यहाँ के राष्ट्रीय खेल है , इस बार भूटान ओलम्पिक में भी शामिल हुआ था ... कि भूटान को यहाँ ड्रुकयुल कहते हैं . वैसे भूटान भूतान यानी भूतों का घर ..पहले यहाँ भूतों का डेरा हुआ करता था .....यहाँ लोग राजा की बहुत इज्जत करते हैं लोग .यहां लोग अपना जन्मदिन नववर्ष के दिन मनाते हैं .....
सात बजे रॉयल पैलेस लाल पीली रोशनी से जगमगा उठा तब विकास का आग्रह हमें बहुत आत्मीय और सार्थक लगा .वरना उसे क्या पड़ी थी . उस रात काफी अच्छी नींद आई .

जारी......

Thursday, June 27, 2019

हिमालय के कोट में टँका फूल


भाग--1 एक परदेश अपना सा
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जब हिमालय की बात होती है तो कल्पना में या तो सघन हरियाली से आवृत्त असंख्य पर्वत शिखर और शरारती चंचल बच्चों से कल कल चलते हुए दूधिया झरने होते हैं या फिर हिम का ताज पहने सगर्व शीश ताने उत्तुंग शिखर .सिक्किम और हिमाचल का सौन्दर्य अभीतक दिल-दिमाग से उतरा नहीं था . जब मन्नू (मँझला बेटा विवेक) ने भूटान-भ्रमण की योजना के बारे में बताया तो कल्पनाएं एक बार हिमालय की रमणीय गोद में जा लेटीं . मैं भूटान के बारे में मैं सुन तो चुकी थी कि वह बहुत खूबसूरत छोटा सा खुशगवार देश है . मन ललचा उठा लेकिन मन में लोकसभा चुनाव का व्यवधान था .
उस समय तक चुनाव की तारीख भी घोषित नहीं हुई थी . पर सन् 2014 के हिसाब से अनुमान लगाया था कि ज्यादा से ज्यादा मई के प्रथम सप्ताह तक चुनाव हो जाएंगे . इसी आधार पर मन्नू ने 9 मई की टिकिटें बुक करवा लीं . लेकिन निराशा तब हुई जब ग्वालियर में चुनाव पाँचवे चरण यानी 12 मई को होना तय हुआ . सारी कल्पनाएं धूल में मिल गईँ .
मन्नू , मेरा जाना संभव नहीं . तुम लोग चले जाओ .—मैंने कहा तो मन्नू और नेहा बोले – 
मम्मी जो भी हो हम आपको लेकर ही चलेंगे .
तीस्ता डैम पश्चिम बंगाल
और उन्होंने 9 मई के टिकिट कैंसल कर 16 मई के टिकिट बुक कराए . 12 को चुनाव सुचारु रूप से सम्पन्न हुआ . मैं पन्द्रह को बैंगलोर पहुँच गई और इस तरह 16 मई की सुबह हम लोगों ने बागडोगरा के लिये प्रस्थान किया .
बागडोगरा से सिलीगुड़ी ,होते हुए जयगाँव ( भारतभूमि का आखिरी भाग) तक का सफर काफी मनोरम था . सिलीगुड़ी से तीस्ता डैम तक तो रास्ता बेहद ही खूबसूरत है . साफ पानी से भरी पूरी चौड़ी तीस्ता नहर के किनारे पेड़ मानो दर्पण में अपना रूप निहारने खड़े हैं ,बढ़िया चौड़ी सड़क पर इनोवा दौड़ नही रही जैसे तैर रही थीं .विशाल तीस्ता डैम जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि तीस्ता नदी पर बना है . वही तीस्ता जो सिक्किम में हर जगह हमारे साथ थी .
जयगाँव चारों ओर चाय के बागानों से घिरा पश्चिम बंगाल का यह अन्तिम शहर मुझे उपेक्षित सा लगा . अव्यवस्थित और भीड़ भरा बाजार मिला . सड़क भी कहीं कहीं खराब थी. ऐसा शायद इसलिये लगा क्योंकि हम भूटान में मुख्य सड़क से प्रवेश नहीं करने वाले थे  .इसलिये जाते समय हमें भूटान का वह सुन्दर प्रवेश-द्वार भी नहीं मिला जो हमें लौटते हुए मिला था .और इसीलिये हमें पता ही नही चला कि कहाँ से विदेश की धरती आरम्भ होगई .
फुंशुएलिंग की फुहारों नहाई सड़क 
जहाँ से भीड़भाड़ रहित साफ सुन्दर सड़क शुरु हो गई .”–अविनाश हँसकर बोला .
जी आपको केवल सड़क देखकर ही पता चल जाएगा कि अब आप इण्डिया में नहीं ,भूटान में हैं .
मुझे थोड़ा अजीब लगा पर सच यही था .भूटान की सड़कें सचमुच बहुत साफ सुथरी व सुन्दर हैं . इसमें जनसंख्या की कमी और प्रशासन की सजगता दोनों ही तथ्य हैं . 
मुझे ध्यान आया कि सड़क पर देहरी जैसा हल्का सा गतिरोधक और छोटी सी चैकपोस्ट पार की थी वही भूटान की सीमा रेखा थी . अजीब बात . हम दूसरे देश में आराम से आगए न किसी ने रोका न टोका .
मैडम भूटान में सात कि.मी. तक बिना पासपोर्ट या परिचयपत्र के आ जा सकते हैं .—अविनाश ने बताया-- भूटान के लोग जयगाँव में आकर सब्जी –सामान खरीदते हैं और जयगाँव के लोग भूटान में सुबह सैर-सपाटा करते हैं .
जयगाँव का विहंगम दृश्य
वाह , पड़ोस ऐसा ही हो तो क्या बात है .  
उजाला रहते हम फुएन्शुलिंग पहुँच गए . भूटान का यह शहर जयगाँव से लगा हुआ है . यहीं भूटान भ्रमण के लिये परमिट लेना होता है .और फोटो ,फिंगरप्रिंट आदि औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं .
सर सुबह जल्दी परमिट का काम निपटा लें .ताकि थिम्पू समय से पहुँच जाएं . और क्योंकि कल शनिवार से दो दिन छुट्टी रहेगी . ऑफिस बन्द रहेंगे . आपको मुश्किल होगी.. .—अविनाश ने पहले ही ही बता दिया था .
हमने पार्क होटल में रात्रि विश्राम किया .
नेहा (निहाशा) के साथ
होटल की खिड़की से सुन्दर सड़क बाजार और सुदूर हरी भरी चोटियों देखते हुए मन पुलक और रोमांच से भर गया .यह अपने देश से बाहर परदेस की धरती पर मेरा पहला कदम था. पर वास्तव में अभी परदेस का एहसास बिल्कुल नही हो रहा था . न लोग  न भाषा . न पासपोर्ट की जरूरत न अँग्रेजी की बध्यता . सब हिन्दी बोल समझ रहे हैं . खाना भी अपने होटलों जैसा ही था.. 
सुबह चाय नाश्ता लेकर हम लोग परमिट के ऑफिस (जो पार्क होटल के पास ही है ) गए . नेहा और विवेक के प्रयासों से ग्यारह बजे तक सारी औपचारिकताएं पूरी होगईं . इस तरह के कार्यों में नेहा बहुत ही कुशल और सक्रिय है . टिकिट बुकिंग से लेकर , भ्रमण की सारी योजना , दर्शनीय स्थान , दिन ,होटल ,ड्राइवर सब कुछ उसी ने तय की थी जो काफी व्यवस्थित और शानदार थी .
लंच के बाद अब हम थिम्पू जाने के लिये ड्राइवर की प्रतीक्षा कर रहे थे . अविनाश का साथ बागडोगरा से फुन्शुएलिंग तक ही था . अब गाड़ी और ड्राइवर दोनों ही नए लेने थे . काफी देर बाद ड्राइवर आया . विकास नाम का वह नेपाली युवक हमें काफी चुस्त-दुरुस्त और भला लगा .लेकिन लम्बी प्रतीक्षा की खीज उस पर उतरे बिना न रही .
फुएनशुलिंग से थिम्पू लगभग 175 कि.मी. है जैसा कि अविनाश ने बताया था . पहुँचने में पाँच से छह घंटे कम से कम लगेंगे ही . उस समय दो बज रहे थे .मन्नू ने कहा--
आने में काफी देर करदी विकास भाई ,हम कबसे इन्तजार कर रहे हैं . थिम्पू पहुँचते रात होजाएगी .जबकि हमें जल्दी पहुँचना था .
सर आप चिन्ता न करें . सब मेरे ऊपर छोड़दें आपको कोई परेशानी नही होगी .”-विकास ने मुस्कराते हुए विनम्रता के साथ कहा .
हमने उसी पर छोड़ना बेहतर समझा . और करते भी क्या ..
फुंशुएलिंग से चढ़ाई और पहाड़ों का सौन्दर्य शुरु होता है .पूरे रास्ते आँखें इनोवा की खिड़की पर लगी विमुग्ध होती रही . सुन्दर सर्पिल सड़क पर जब लहराती हुई गाड़ी सड़क के मोड़ों को गिनती हुई पहाड़ों की ऊँचाइयों को नाप रही थी ,मुझे सिक्किम याद आ रहा था . बिल्कुल वैसे ही पेडों से ढँके-छुपे हरियाले पहाड़ , वैसे ही पहाड़ की परिक्रमा करते ऊपर नीचे झूलते हुए से रास्ते , ऊँचे पेड़ों की ओट से आँख-मिचौनी खेलता आसमान ,रोम रोम में स्फूर्ति भरती ताजी हवा , जहाँ तहाँ पत्थरों की खामोशी को तोड़ते खिलखिलाते छोटे छोटे झरने , अकेले में भी खुशी का इज़हार करते जाने अनजाने फूल ....सिक्किम और भूटान एक सी ही धरते के दो लाल .शासन के अलावा केवल भवन निर्माण कला और सुन्दर चौड़ी सड़क सिक्किम को भूटान से अलग करती है . यह बात अलग है कि थिम्पू तक यह सड़क हमारे देश के सहयोग से ही बनी है .
पेड़ों के कन्धों पर सोए बादल
बीच में चूखा नामक स्थान पर चाय पानी के लिये कुछ देर रुके . मौसम और भी सुहाना होगया था . बादल पेड़ों के कन्धों पर आ टिके थे . सुदूर सामने एक झरना हरे कुरते में टँकी मोती की लड़ी जैसा लग रहा था या कि हरी स्लेट पर किसी बच्चे ने खड़िया से टेढ़ी मेढ़ सी लकीर खींच दी हो . यह बेहद खूबसूरत जगह है .यहाँ बेशुमार खिले गुलाब के बड़े बड़े फूल ललचाते हैं . उनका आकार चकित करता है कि आखिर इस मिट्टी में ऐसा क्या जादू है .
चूखा में भारतीय सड़क संगठन का कैम्प है . वांग चू (नदी) पर भारत के ही सहयोग से बनी विद्युत जल परियोजना है . भारत बड़े पैमाने पर भूटान से बिजली खरीदता है .... यह सब विकास बता रहा था  मेरा ध्यान तो पहाड़ सड़क नदी और हरेभरे पेड़ों के अलावा कहीं जाता ही नहीं .
फुनशुएलिंग से थिम्पू तक कितने पहाड़ पार किये याद नहीं . जब ऊँचाई पर दौड़ती हुए गाड़ी घूमती हुई नीचे उतरती तब समझ में आता कि अब दूसरा पहाड़ चढ़ना है . यों चढ़ते उतरते ही वह सुन्दर रास्ता पूरा किया .सीधा सपाट रास्ता होता तो दूरी बहुत सिमट जाती .   
थिम्पू पहुँचते पहुँचते देखा साँझ पहाड़ों को सुला रही थी .हवा हल्की थपकियाँ दे रही थी . दूर से जगह जगह बेशुमार जुगनू से चमकते दिखने लगे तो पता चला कि हम थिम्पू पहुँच रहे हैं .

जारी ........

Sunday, June 16, 2019

आखिरी स्तम्भ



वर्त्तमान कितना निस्संग होता है . साथ चलते चलते बिना बताए ही अपने हाथ छुड़ाकर अदृश्य हो जाता है . हम केवल हाथ मलते रह जाते हैं . अभी जैसे कल की ही बात है जब जिन्दगी शुरु हुई थी . आगे सुनहरा भविष्य था . हमें स्नेह और संरक्षण देने वाले लोग थे जिनके कारण घर घर था . आँगन में ममत्त्व की सघन छाँव थी .. हर त्यौहार बहुत प्रतीक्षित व उल्लासमय हुआ करता था . सावन में बादल ज्यादा घनघोर और बौछारें ज्यादा सुहानी हुआ करतीं थीं . दीपावली ज्यादा जगमगाती थी . होली के रंग अधिक गहरे हुआ करते थे . इतने गहरे कि चार पाँच दिन केवल रंग उतारने में लगते थे . सर्दियों की शामें अलाव के आसपास बैठकर खूब गपशप में गुजरतीं थीं और गर्मियों की दुपहरियाँ ताश , पँचगुट्टे , और अष्टा-चंगा जैसे खेलों में हार जीत पर झगड़ते और फिर हँसते हुए..कोई चिन्ता नहीं ,कोई तनाव या खींचतान नहीं....
बड़े हुए तो जिन्दगी ने कड़वे-तीखे अनुभव कराए , हँसाया ,रुलाया और डराया भी पर कुछ स्नेहमय हाथ थे जिन्होंने थाम लिया , गले लगाकर सम्बल दिया . तब से पता ही न चला कि कितना पानी बह गया नदियों में . कितने वसन्त पतझड़ गुजर गए ...आज मैं मुड़कर देख रही हूँ तो लगता है ,मैं एक उजाड़ में खड़ी हूँ जहाँ अब किसी पेड़ की छाँव नहीं बची . समय के ठेकेदार ने घर आँगन में खड़े पाँच के पाँचौ सघन वृक्ष काट डाले हैं . चारों ओर वैशाख जेठ की धूप है . पीहर की देहरी आज कितनी सूनी और उदास है....
बड़े ताऊजी ,काकाजी (पिताजी),  छोटे ताऊजी ,जिया ( माँ ) और अब ....बड़ी जिया भी चली गईं .एक पीढ़ी जो एक सुनहरा वर्त्तमान थी , अब अतीत हो गई है . जीते-जागते लोगों का यों इतिहास में बदल जाना कितनी असहनीय सी घटना है हालाँकि वह अनिवार्य है . हम जीवन के अन्त को रोक नहीं सकते , रोज देख भी रहे हैं जिन्दगियों को जाते हुए पर अपनों का जाना कितना विशिष्ट और पीड़ादायक होता है . ज्ञानी कहते हैं कि मोह दुख का कारण है .पर मुझे आत्मज्ञान नही हुआ .मैं अभी तक अनुराग और मोह से ग्रस्त हूँ . रक्त और स्नेह के सम्बन्ध की जड़ें बहुत गहरी होतीं हैं ,जब पेड़ उखड़ता है तो उतना ही गहरा गड्ढा बनता है जिसे भरने के लिये जाने कितनी बारिशों की दरकार होती है .बचपन
लम्बा कद ,गोरा रंग ,अनुभवों की चमक लिये भोली सी आँखें और विशाल हृदय वाली स्नेहमयी बड़ी जिया , जिया ( मेरी माँ ) से लगभग छह सात वर्ष बड़ी थीं . दोनों बहिनों में अटूट स्नेह था पर सहोदरा होकर भी अनेक बातों में दोनों अलग थीं . माँ जहाँ साहित्य धर्म ,पौराणिक कथाओं , परमार्थ ,समाज सेवा आदि से प्रेरित थीं ,वैसा ही उनका जीवन था .जिन्दगी की शुरुआत ही अनेक दायित्त्वों और चुनौतियों से हुई थी . अस्त्र-शस्त्र विहीन योद्धा की तरह वे मुश्किलों से लड़तीं रहीं . आराम से बैठकर सोचने समझने की अनुमति उन्हें जिन्दगी ने कभी दी ही नही . माँ से हमें आदर्शों से परिपूर्ण जीवन-दिशा व संस्कार मिले वहीं बड़ी जिया से स्नेह और नियंत्रण-मुक्त बचपन की अनुभूति, जिसे हर बच्चा चाहता है . वे बच्चों को ज्यादा रोकतीं टोकतीं नहीं थीं . हम जो भी करना चाहते वे कहतीं ठीक है पर ध्यान रखना कहीं चोट
बड़ी जिया बीस साल पहले 
न लगा लेना .प्यार और संरक्षण बचपन के लिये ठोस जमीन तैयार करता है जो बड़ी जिया ने हम सबको बखूबी दिया. मैंने कभी उन्हें नाराज होते नहीं देखा . ज्यादा से ज्यादा आँखों में ,वह भी पल भर में मुस्कान का रूप ले लेता था . 
बड़ी जिया एक अच्छी गृहणी थीं . उनकी सीमा रेखा बच्चे घर-परिवार की व्यवस्था ही थी . जब लक्ष्य और सीमाएं छोटी होती हैं तो प्राप्ति सरल और व्यवस्था सुचारु होती है .एक ओर बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनी दादी का कठोर अनुशासन और दूसरी ओर धीर गंभीर ताऊजी का स्नेहमय और दायित्त्वपूर्ण संरक्षण . इसलिये उन्हें जीवन को समझने का पर्याप्त समय मिला .स्नेह और अनुशासन में ढली बारह साल की बालिका-वधू से लेकर 86-87 वर्ष की कुल मिलाकर दर्जन भर नन्हे मुन्नों की परदादी और परनानी बड़ी जिया ने जीवन के सभी रंग देखे . जीवन के यथार्थ को अपनेपन के साथ जिया .काफी कुछ सीखा .
उनके हाथों में गजब की कला थी .कला चाहे रसोई की हो या कसीदाकारी और चौक पूरने की हो, उनका कोई जबाब नहीं था . उनके हाथों के बने तमाम तरह के अचार ,पापड़, दही बड़े ,जलेबी आज भी कहावत की तरह इस्तेमाल होते हैं . उनके हाथों की बुने आसन दरी ,चटाइयाँ ,पंखे ,कागज की टोकरियाँ हस्तकला का बेहतरीन नमूना हैं . सफेद खद्दर की सस्ती साड़ी को भी रँगकर लेस या बूटों से सज्जित कर इतनी सुन्दर बनाकर पहनतीं थीं कि कीमती साड़ियाँ शर्मिन्दा हो जाएं . 2006 तक ( ताऊजी के रहते ) कभी न उनकी ऐड़ियों से महावर छूटा न हाथों की मेहदी .उन दिनों की उनकी बड़ी बड़ी झुमकियाँ, पाजेब ,लाख के नग जड़े कंगन सब मुझे आज भी किसी खूबसूरत दृश्य की तरह याद हैं .
माँ की तरह ही प्यारी बड़ी जिया के साथ रहने का मुझे बहुत कम समय मिला पर जितना भी मिला उसकी अनुभूति आज भी सुहानी ताजी हवा की तरह यादों के गलियारे से गुजर जाती है .
समझदार लोग कहते हैं कि वर्त्तमान में जिओ अतीत को मत देखो और भविष्य को मत सोचो लेकिन अतीत के बिना वर्त्तमान अधूरा है और भविष्य अँधेरे में . अतीत और वर्त्तमान ही भविष्य तय करते हैं . अतीत में जीते रहना निस्सन्देह ठीक नहीं लेकिन उसे  भूलकर जीना यथार्थ से पलायन करना है . अपनी जड़ों को नकार कर जीना है . बिना जड़ के कोई वृक्ष भला कितना हराभरा और स्थिर रह सकता है . बचपन की जमीन वृक्ष को पोषण और संरक्षण देती है .
बड़ी जिया महाप्रयाण से एक माह पहले 
बड़ी जिया ताऊजी काकाजी की पीढ़ी के भवन का आखिरी स्तम्भ थीं . जो छत को सम्हाले हुए थीं . 
 अब वे सब कुछ केवल सजल यादों के रूप में हैं लेकिन अनवरत पढ़े जाने वाले एक पाठ की तरह ,जो जीवन की तमाम परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के लिये अनिवार्य है , एक एलबम की तरह , एक सन्दूक जैसी जिसमें बहुत सारी बहुमूल्य वस्तुएं संजो रखी हों . और अब चारा ही क्या है .
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Sunday, April 21, 2019

हिमाचल में सात दिन --अन्तिम भाग -- यादों के उजाले


सोलांग घाटी
आज भी हमारी आँखें कटराई की सुहानी सुबह देखते हुए खुली . आज भ्रमण के अन्तिम दिन सबसे पहले हम मनाली में हिडिम्बा देवी के मन्दिर गए .
हिडिम्बा देवी का मन्दिर (सामने)
हम सभी जानते हैं कि लाख के महल से जीवित बच निकले पाण्डवों ने अनेक वर्ष वन में बिताए . वन में ही उन्हें हिडिम्बा मिली . वह राक्षस कुल की थी . वह भीम से मन ही मन प्रेम करती थी . जबकि उसका भाई हिडिम्ब पाण्डवों से युद्ध करते मारा गया  ,और हिडिम्बा अकेली रह गई , कुन्ती ने भीम से उसका विवाह करवा दिया .वही हिडिम्बा बाद में घटोत्कच जैसे वीरपुत्र की माँ बनी . श्री कृष्ण की प्रेरणा से हिडिम्बा लोक कल्याण के कार्यों में रम गई . कुल्लू के शासक विहंगमणि पाल को राजा होने का वरदान हिडिम्बा ने ही दिया . कुल्लू में हिडिम्बा देवी की बहुत मान्यता है . कुल्लू का दशहरा तब तक शुरु नही ता जबतक देवी न पहुँच जाएं
ऊँचे विशाल देवदार के वृक्षों के बीच स्थित पैगोड़ा शैली में बना यह मन्दिर बहुत भव्य और कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट है .मनाली से केवल एक कि.मी.दूरी पर है . मन्दिर के भीतर एक चट्टान है जिसे स्थानीय भाषा में ढूँग कहा जाता है इसलिये हिडिम्बा देवी को ढूँगरी देवी भी कहा जाता है .. वहाँ सवारी के लिये याक खूब मिलते हैं . मान्या अश्विका ने याक की  सवारी का आनन्द लिया .
वाटर राफ्टिंग से आते हुए प्रशान्त
मन्दिर से लौटकर प्रशान्त, सुलक्षणा, कार्तिक ,चारु ,मान्या,और अश्विका ने  व्यास के उछलती मचलती बर्फीली वेगवती धारा में रोमांचक वाटर-राफ्टिंग का आनन्द लिया . यह थोड़ा साहसिक कार्य है .राफ्टिंग बोट लहरों साथ ही उछलती है, लहराती है . बच्चों के आग्रह के बावजूद मैं उसमें शामिल नही हुई . धारा के साथ ही चलती गाड़ी में से मैंने उसके रोमांच का अनुभव किया .
शाम को वशिष्ठ मन्दिर गए .
मनाली से ढाई कि.मी.दूर वशिष्ठ नामक गाँव में भगवान राम और वशिष्ठ मुनि के दो छोटे मन्दिर हैं .ये काठकुणी शैली के परिचायक हैं जिसमें देवदार की लकड़ी का प्रयोग ज्यादा हुआ है . लोगों के आवास गृहों में भी लकड़ी का उपयोग अधिक हुआ है .भी यहाँ गर्म जल के दो प्राकृतिक स्रोत हैं जहाँ पुण्यलाभ के अलावा चर्मरोगों से छुटकारा पाने के लिये लोग स्नान करते हैं . हमने वहाँ विदेशी पर्यटकों ( महिलाएं भी )की भीड़ देखी जो अपनी शैली में स्नान कर रहे थे .कहने की आवश्यकता नही कि वे भीड़ के आकर्षण का खासा केन्द्र बने हुए थे .
मन्दिर के गर्भगृहों में मनु ऋषि व हिडिम्बा देवी की प्रतिमाएं हैं . यहाँ सुन्दर बाजार भी है .हमने कुछ सूट खरीदे .लौटकर मनाली के बाजार में जलेबी का आनन्द लिया .हालाँकि मुझे तो नाम बड़े दर्शन छोटे लगे . वहाँ से ज्यादा स्वादिष्ट जलेबियाँ हमारे 'लवली स्वीट्स' पर मिलतीं हैं . वहाँ सेव का अचार और आलूबुखारे का जैम भी खूब मिलता है .
शॉल की बुनाई

कुल्लू एयरपोर्ट
अँधेरा होते ङोते हम कटराई वापस आ गए . रात में सोने से पहले यह विचार हल्की सी उदासी के साथ आया कि यहाँ बीते ये खूबसूरत तीन दिन कल के बाद सिर्फ याद रह जाने वाले हैं . सुबह 23 अप्रैल को गृहस्वामियों ने दही पराँठे और पपीता का स्वादिष्ट नाश्ता दिया . हमने इतने अच्छे आतिथ्य के लिये उन्हें हार्दिक धन्यवाद कहा और कुल्लू एयर पोर्ट की ओर चल पड़े . दिल्ली से मैं ग्वालियर और प्रशान्त आदि सब लोग बैंगलुरु के लिये रवाना हुए . 

घर लौटकर फिर वही पीड़ा थी, माँ को खोने की लेकिन उस पीड़ा भरी याद के साथ स्मृतियों में , चिन्तन में आकाश की ओर तने देवदार के शानदार वृक्षों का अनन्त वैभव , बर्फ के शॉल ओढ़े ऊँचे शिखर ,मण्डी से मनाली तक प्रतिपल साथ चलती कलकल निनादिनी चंचल व्यास नदी का अपार सौन्दर्य , पहाड़ों के चकित कर देने वाले घुमावदार रास्ते ,सेव अखरोट के बगीचे ,रात में पहाडों पर जुगनू की तरह टिमटिमाते चार-छह घरों वाले गाँव....और बहुत कुछ था जो अँधेरी रात में चन्द्रमा की तरह चमक जाता था जो अँधेरे को पूरी तरह दूर तो नही करता पर उसे बहुत हल्का कर देता है . इतना कि हम खुद को देख सकें ,पहचान सकें. 

खूबसूरत यादें हमारी बहुमूल्य पूँजी होतीं हैं, अँधेरे में मिले उजाले जैसी यकीनन...

Wednesday, April 17, 2019

हिमाचल में सात दिन भाग --5 बर्फ में आग

बर्फ में आग 
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कटराई में होम स्टे 
आज की सुबह बहुत ही खूबसूरत और ताजगी भरी थी . ताजगी नींद अच्छी तरह से पूरी होने की तो थी ही, साथ में वहाँ का वातावरण भी बड़ा मोहक था .हल्की सुहानी सर्दी ,चारों ओर सेव, आलूबुखारा , नाशपाती और आडू के पेड़ ,उनमें कलरव करते पक्षी , लॉन में जगह जगह लाल, सफेद और गुलाबी गुलाबों लदी झाड़ियाँ , दूब का कोमल कालीन और निरभ्र आकाश प्रकृति की शुचिता व सौन्दर्य का जैसे उत्सव मना रहे थे  .
टहनियों में आलूबुखारे ,सेव और नाशपाती अभी शैशवावस्था में थे .हवा जैसे उन्हें झूला झुला रही थी .

"सर यह वह समय है जब फूल झर चुके हैं और फल बहुत छोटे हैं . एक माह पहले सभी पेड़ फूलों से लदे हुए थे .वह देखने लायक होता है . अगर आप अगस्त सितम्बर में आते तो डालियाँ सेव नाशपाती आलूबुखारे के फलों से लदी देखना भी एक अनोखा अनुभव है .अगली बार आए तब ऐसा ही कोई समय चुनें ."—बहुत शिष्ट और विनम्र गृहस्वामी ने बड़ी आत्मीयता से बताया . मै सोच रही थी कि अब भी अनुभव क्या कम प्यारा है ! 

प्रशान्त वैसे तो स्वभाव से ही बच्चों जैसा सादा सरल है पर ऐसे समय उसका उत्साह छलका जाता है .उसे सुबह किसी का बिस्तर में रहना बिल्कुल नापसन्द है उसपर सुबह इतनी सुहानी हो ,उसने सबको  जगाया . सुलक्षणा एक तो थकी हुई थी फिर हमेशा ड्यूटी की भाग-दौड़ और तनाव से मिले दुर्लभ अवकाश में वह मीठी नींद के आनन्द को खोना नही चाहती थी इसलिये वह मुझे ही बाहर खींच ले गया और सेव के कुंजों में दूर तक टहलता रहा .उधर टहनियों के झुरमुट से किरणें झाँकने लगीं और इधर प्रांगण में ही नाशपाती के पेड़ के नीचे , दूब के फर्श पर एक पेड़ के तने पर बड़ी कलात्मकता से बनाई टेबल पर हमारे लिये चाय बिस्किट तैयार थे . यह सब देख मैं अभिभूत थी .सचमुच धन का ऐसा व्यय मुझे अपव्यय नहीं लगता है .
आलू के पराँठे, दही ,अचार ,पापड़ ,पपीता आदि का स्वादिष्ट नाश्ता लेकर हम लोग निकल पड़े . आज हमें हम्फ्टा वैली और सोलांग घाटी जाना था .
हम्प्टा वैली ---
यों तो हम्प्टा हिमाचल के श्रेष्ठ ट्रेक्किंग स्थलों में से एक है लेकिन हम सबका आकर्षण था बर्फ तक पहुँचना . उसे छूना ,फिसलना .रोहतांग तक जाने का लेह मार्ग किसी कारण से बन्द था इसलिये हम्प्टा जाना ही तय हुआ .यह हमारी सबसे रोमांचक , कुछ कठिन लेकिन लुभावनी यात्रा थी .
गाड़ी ने हमें यहाँ छोड़ा
हम्प्टा वैली लगभग 4200-300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है . वहाँ जाने के लिये अलग जूते व ट्रैक सूट लेना होता है .अलग गाड़ी ड्राइवर भी जिसकी व्यवस्था शायद स्थानीय प्रशासन की ओर से होती है या फिर निजी सेवा द्वारा . हमने अपने नाप और पसन्द के जूते व ट्रैक सूट लिये . और चल पड़े .हमारा ड्राइवर ट्रैवलर के साथ नीचे ही रुक गया .मुझे इतना तो नही मालूम कि हमें कितनी ऊँचाई तक ले जाकर गाड़ी ने छोड़ा लेकिन वह शायद कोई चेकपोस्ट थी जहाँ से ट्रैक शुरु होता है .वहाँ हमने ट्रैक सूट व जूते पहने . एक छड़ी भी मिली सहारे के लिये . कार्तिक की माँ और पिताजी वहीं रुक गए .
शुरु में तो चलने में बड़ा उत्साह रहा .पर जल्दी समझ आगया कि बात उतनी आसान नही है .ऊँचाई पर जाना सचमुच आसान नही होता चाहे ऊँचाई भौगोलिक हो या ऐतिहासिक .सैद्धान्तिक हो या व्यावहारिक . उस पर पहुँचना और फिर वहाँ टिके रहना तो और भी कठिन है . रास्ता कहीं सँकरा  और पथरीला था और कहीं जगह जगह रिसते पानी के कारण फिसलन भरा .भी था . पाँव मन मन भारी हो रहे थे लेकिन लक्ष्य के प्रति मोह रास्ते की परवाह कहाँ करता है . बर्फ तक पहुँचना हमारा लक्ष्य था इसलिये पैरों की न मानकर हम मन के साथ थे .दूर तक चढ़ने के बाद एक चमकती सफेद पट्टी सी दिखी . प्रशान्त व कार्तिक ने एक साथ  उत्ल्लातेजित होकर कहा -- वो देखो बर्फ .     
मेरा मन बुझ सा गया . इस जरा से टुकड़े के लिये हम इतनी दूर कठिनाई को नजरअन्दाज करके साँस रोके चले आए ! कल्पना में तो बर्फ का लम्बा-चौड़ा मैदान था . 
"वहाँ पहुँचकर तो देखिये आंटी जी !" कार्तिक मुस्कराया .मैंने दो-चार गहरी साँसें लेकर खुद को आराम दिया .वैसे भी वही ठहरकर रह जाने का तो सवाल ही नही था . सोच लिया कि वहाँ पहुँचना ही है तो बस पाँव चल पड़े . हमारे और बर्फ के बीच एक लम्बा हरा भरा  सपाट अन्तराल था . बीच बीच में बर्फीले पानी के छोटी छोटी नालियाँ बह रही थीं . बाजू में खड़ी चट्टानों वाला शिखर शीश ताने अटल खड़ा था ,नीचे .बर्फीले पानी की शुभ्र निर्मल धारा कलकल कुलकुल करती बह रही थी .उत्साह भरने के लिये काफी था. अन्ततः हम बर्फ तक पहुँच गए थे .वहाँ बर्फ सचमुच ही एक सँकरी पट्टी में थी विस्तार काफी ऊँचाई पर था पर लोग उतनी ही छोटी हिमपट्टिका पर मुग्ध थे . बर्फ के लिये हमेशा से ही कैसा आकर्षण था . ओले बरसते तब यह जानते हुए भी कि ओले फसल को तबाह कर देते हैं , हम लोग उन सफेद कंचों को हथेली में रख कितने पुलकित होते थे .    
बर्फ में बैठना फिसलना सचमुच एक अनौखा ही अनुभव था .यह जीरो पॉइंट (सिक्किम वहाँ ठण्ड बर्दाश्त से ऊपर थी ) से अलग, भला सा उत्साहजनक अनुभव . धूप और ठिठुरन का अनूठा मेल . वहीं बर्फ के बगल में ही आग जलाकर गरम गरम मैगी खिलाने वाली दो चार उद्यमी महिलाएं भी अपना साज-सामान लिये बैठी थीं और मैगी खाने का आग्रह कर रही थीं . हैरानी की बात यह कि ये नीचे से पैदल ही ,सिर पर सामान लादे चढ़कर यहाँ तक आतीं हैं .कहीं कहीं जीवन कितना कठिन होता है . 
बर्फ में आग 
इनसे मैगी जरूर लेना चाहिये –हमने सोचा . ऊँची सर्द जगहों पर गरम गरम मैगी की प्लेट किसी नियामत से कम नही लगती .मुझे लगा ये महिलाएं जीविका से कहीं बहुत ज्यादा पर्यटकों की सेवा कर रही है .जीविका कितनी कमा पातीं होंगी .स्वच्छता के प्रति जागरूकता ऐसी कि जूठी प्लेटों व चाय के कपों के लिये अलग कट्टा रखतीं हैं . और खुद ही उठा ले जातीं हैं . मैं नत होगई उनकी जीवटता देखकर . हमने लगभग एक घंटा वहाँ बिताया .सभी लोग बर्फ पर खूब फिसलते खेलते रहे . 
लौटना अपेक्षाकृत आसान रहा . मन न जाने कैसी कृतज्ञता और आनन्द से भरा हुआ था----
हिमालय तुम सचमुच महान हो .सजग प्रहरी .अनेक जीवनदायिनी नदियों के जनक.. तुम्हें धरती का ताज यों ही नही कहा जाता .
 शाम को खूबसूरत सोलांग घाटी गए जहाँ रोहतांग के लिये सुरंग का काम चल रहा था . वहाँ सबने रोप वे का आनन्द लिया . रात को देर तक मन आँखें हम्प्टा वैली की सैर करतीं रहीं .    

Monday, April 15, 2019

हिमाचल में सात दिन भाग 4 व्यास और विपाशा


भाग--3 से आगे व्यास और विपाशा
19 अप्रैल 2016

बीर गाँव में सूर्योदय 
भागसूनाग में छोटी छोटी दुकानों के हमें आकर्षित किया . वहाँ से रंगीन मनकों वाली कुछ खूबसूरत मालाएं और मान्या की पसन्त की चीजें खरीदीं . और आगे चल दिये क्योंकि हमारी मंजिल तो मनाली था जो अभी काफी दूर था . रास्ते में पालमपुर के सौन्दर्य ने हमें बरबस ही कुछ देर रोक लिया . यह काँगड़ा घाटी का बहुत खूबसूरत शहर है . सुदूर हरी भरी हिमाच्छादित श्रृंखलाएँ ,कल कल निनादिनी सलिला , चाय के बागान ,बेशुमार गुलाब के फूल, बौद्धमठ ...सब कुछ तो है वहाँ . चिड़ियाघर ने अवश्य निराश किया .
पालमपुर
पालमपुर से 16 कि.मी. दूर बैजनाथ धाम है . कहा जाता है कि पाण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान इस मन्दिर का निर्माण करवाया था .बाद में सन् 1214 में दो स्थानीय आहुक व मनुक नाम के व्यापारियों ने इसका पुनर्निर्माण कराया .यहाँ परिसर में नन्दी की प्रतिमा है . कहा जाता है कि नन्दी के कान में अपनी कोई अभिलाषा कहने पर वह पूरी होती है . लोग ऐसा कर भी रहे थे .मैंने कौतूहलवश एक छोटी सी बात नन्दी के कानों में कही . मजे की बात यह कि वह पूरी हुई . जरूरी नही कि सदा ऐसा हो ही पर मान लेने में भी क्या हर्ज है .
उस रात हम लोग बीर नामक गाँव के सागरमाथा होटल में ठहरे .सागरमाथा नाम बड़ा अच्छा लगा जो कि हिमालय पर्वत का ही एक नाम है . चारों ओर हरियाली से समृद्ध यह स्थान पैराग्लाइडिंग के लिये जाना जात है .यहाँ अनेक सुन्दर बौद्धमठ भी हैं .


मान्या और अश्विका
कल कल निनादिनी व्यास
व्यास  यहाँ गंभीर है . 

20 अप्रैल को सुबह आठ बजे हम लोग मनाली की ओर निकल पड़े जो हमारा गन्तव्य था .यह एक बहुत ही मनोहर और सुहाना सफर था .मण्डी से मनाली तक पूरे रास्ते सड़क के समान्तर (लेकिन विपरीत दिशा में) बहती व्यास नदी की निर्मल चंचल धारा रोम रोम में स्फूर्ति भरती रही .व्यास का सौन्दर्य हिमाचल के प्राकृतिक वैभव को चार चाँद लगाता है . यह पथरीली और चट्टानी राह में बहने वाली प्रखर वेग वाली नदी है पर कहीं कहीं मन्थर गति में काफी गहरी भी है . पीरपंजाल पर्वत श्रृंखला में रोहतांग दर्रा व्यास का उद्गम-स्थल है . ,जहाँ महर्षि वेदव्यास का मन्दिर है . 470 कि.मी. का सुहावना सफर पूरा करके सतलुज से मिल जाती है . 
नदियाँ जीवन रेखा होतीं हैं पर अपनी अवमानना भी इन्हें बर्दाश्त नहीं . ड्राइवर ने हमें वह स्थान भी दिखाया जहाँ खेल खेल में 24 छात्र व्यास की धारा में समा गए थे .उसे याद कर ह़दय एक बार फिर दहल गया . तब इसका विपाशा ( बन्धन-मुक्त ) नाम सार्थक लगा और गुप्त जी की प्रकृति विषयक वह पंक्ति याद आई –अनजानी भूलों पर भी वह अदय दण्ड तो देती है ..फिर यह तो उनकी जानी मानी लापरवाही थी .खैर हमें आगे बढ़ना था .
आगे भुन्तर नामक स्थान पर व्यास और पार्वती नदी का संगम है .वह दृश्य बहुत ही लुभावना है . हम लोग वहाँ कुछ देर ठहरे . संगम के सौन्दर्य को आँखों में भरा , कैमरे में भी .प्रशान्त को फोटो लेना ज्यादा पसन्द नहीं . कहता है कि फोटो लेने के चक्कर में हम दृश्यों का पूरा आनन्द नही ले पाते .ठीक है लेकिन यह भी सही है कि फोटो खूबसूरत और जीवन्त यादें होते हैं , घर बैठे उन जगहों का बार बार भ्रमण कराते हैं .
पार्वती और व्यास का मिलन 
नग्गर आर्ट गैलरी –
कुल्लू घाटी में 1800 की ऊँचाई पर नग्गर शहर भी एक ऐतिहासिक पर्यटन-स्थल है . यहाँ हमने निकोलाई रोरिक की आर्ट गैलरी देखी . ये महान रूसी चित्रकार थे . अपने जीवनकाल में लगभग 7000 पेन्टिंस बनाईं .जो विश्व की प्रत्येक वीथिका में ससम्मान स्थापित हैं . इनमें से अनेक सुन्दर दुर्लभ चित्र इस म्यूजियम में हैं . हिमालय से उन्हें इतना लगाव था कि एक लम्बा समय उन्होंने हिमाचल में बिताया . उनकी सुन्दरतम कृतियों में हिमालय ही है .हम उनकी पेन्टिंग्स के फोटो नही ले पाए लेकिन गूगल पर उनकी बहुत सारी सुन्दर पेंन्टिंग्स हैं . देखी जा सकतीं हैं . आपने देखी भी होंगी .
शाम को मनाली का मुख्य बाजार देखा .
कुल्लू घाटी के उत्तरी छोर पर व्यास नदी की घाटी में 1950 मीटर ऊँचाई पर स्थित मनाली एकदम शान्त .वाहनों के शोर से मुक्त हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा छोटा सा सुन्दर शहर है .आज सभी काफी थके हुए थे . विश्राम के लिये कुल्लू मनाली के बीच कटराई नामक गाँव के एक खूबसूरत होम-स्टे बुक किया हुआ था . चार पाँच दिन के सफर में पहली बार इतना स्वादिष्ट खाना और आरामदायक शयन कटराई में मिला .सुबह चिड़ियों के कलरव ने जगाया तब रोम रोम स्फूर्ति से भरा था . 

जारी ....... 

Sunday, April 14, 2019

हिमाचल में सात दिन भाग --3 धर्मशाला की ओर

भाग--2 से आगे -----
धर्मशाला की ओर
18 अप्रैल  
जिस समय डलहौजी से नीचे उतर रहे थे हमारे साथ सुनहरी रेशमी किरणें भी चीड़ व देवदार की फुनगियों से नीचे उतर रही थीं . उसके बाद हमारे सामने सड़क थी और आजू-बाजू रह रहकर अचानक से गुजर रहे पीले-सफेद फूलों वाले अनाम अजनबी पेड़ थे . धूप का मिज़ाज भी क्रमशः तेज हो रहा था . दोपहर होते होते हम धर्मशाला पहुँच गए .
पढ़ा था कि धर्मशाला हिमाचल प्रदेश की शीतकालीन राजधानी है . यह काँगड़ा जिले का मुख्यालय है. हमारा विश्राम-स्थल मैकलॉडगंज में था . यह काँगड़ा जिले में धर्मशाला का सुन्दर उपनगर है ,जो धौलाधार पहाड़ियों के बीच 2082 मी. ऊँचाई पर स्थित है इसलिये जहाँ धर्मशाला से गुजरते हुए धूप और गर्मी से सामना हुआ ,वहीँ मैकल़ॉडगंज में ठंडक ने हमारा स्वागत किया . वहाँ एक तिब्बती होटल नोरबू-हाउस में हमारा रात्रि विश्राम था .शाम को विशाल बौद्ध-विहार गए वहाँ भगवान बुद्ध की अत्यन्त दर्शनीय विशाल भव्य प्रतिमा है .मठ गजब की शान्ति थी .जगह जगह आध्यात्म-चिन्तन में लीन हर उम्र के सन्यासी दिखाई देते थे .वहाँ जो कुछ लिखा था या चल रहा था मैं समझ नहीं सकी पर जिज्ञासा थी कि पूरे प्रांगण में जिन गोल आकृतियों (प्रेयर-व्हील्स यह नाम मेरी एक मित्र ने बताया) को हम भी, घुमाते हुए चल रहे थे वह क्या है ,उसका क्या महत्त्व है .शायद वह माला फेरने जैसा कुछ हो . जो भी हो धार्मिक अनुशासन हमें इनसे सीखना चाहिये . किसी ने कहा था कि आस्था विश्वास पर टिकी होती है उसमें तर्क व सन्देह का कोई स्थान नहीं होता . वास्तव में यही सच है .सच्ची आस्था ही पत्थर को भगवान बनाती है ,पूजा भजन का आडम्बर नही . आस्था और विश्वास का मार्ग न केवल हमें ईश्वर की ओर उन्मुख करता है , बल्कि हमारे जीवन को भी स्थिर व्यवस्थित व सार्थक बनाता है .
बौद्धमठ में प्रेयर-व्हील्स
नोरबू-हाउस का खाना मेरे गले से नहीं उतरा . न कोई मसाला न स्वाद .पानी में उबली कुछ अनचीन्ही सब्जियाँ ,साथ में कच्चे आटे के गोले जैसा कुछ .कोई सॉस भी था . मोमोज मुझे पसन्द नहीं . मजे की बात यह कि अण्डा वहाँ शाकाहारी भोजन के साथ था .प्रशान्त ने कहा --"मम्मी यह सेहत के लिये निरापद है ." वह ठीक है पर थोड़ा स्वाद तो आना चाहिये न .सो मैंने दूध कॉफी से काम चलाया .पर यह मेरे लिये अच्छा ही रहा . कम खाकर मैं ज्यादा सक्रिय रह सकती हूँ .
अगली सुबह यानी 19 अप्रैल को हमारी गाड़ी पहाड़ की ऊँची गोलाइयों पर घूमती–चढ़ती नड्डी गाँव पहुँची . यहाँ से लगभग पाँच किलोमीटर की ट्रैकिंग भी हमारी यात्रा में शामिल थी .कहते हैं यहाँ सन-पॉइन्ट भी काफी खूबसूरत जगह है लेकिन इतना समय नहीं था हमारे पास .वास्तव में ऐसी हर जगह के लिये अलग समय होना चाहिये .
भाग सू नाग मन्दिर  का अमृतकुण्ड
ट्रैकिंग का अनुभव बड़ा खूबसूरत , रोचक और अविस्मरणीय रहा .हरे भरे ऊँचे वृक्षों वाले सघन वन के बीच चलते बुराँश और दूसरे तरह के सुन्दर फूलों पर मुग्ध होते , जाने अनजाने पेड़-पौधों और पक्षियों को देखते बिना थके ऊबे पहले चढ़ते और फिर काफी नीचे नीचे उतरते हुए हम लोग कब जंगल को पार कर आए बहुत पता नहीं चला . बीच बीड में किसी जानवर से सामना होने की आशंका ने कुछ डराया भी लेकिन साथ में अनुभवी गाइड था इसलिये आशंका ही रही भय तक बात नही पहुँच सकी .कुछ देर बाद हम भागसूनाग मन्दिर पहुँच गए . चारु के माता--पिता ट्रैकिंग नही कर सकते थे इसलिये वे मैकलॉडगंज से सीधे ही वहाँ पहुँच गए .सच कहूँ तो इतना चलने के बाद मिला यह स्थान मुझे केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण लगा . हिमाचल में जहाँ पग पग पर सृष्टि-सौन्दर्य बिखरा पड़ा है उस दृष्टि से यहाँ जाकर कुछ निराश हुआ जा सकता है .
समुद्रतल से1765 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मन्दिर मुख्य रूप से नागदेवता का है .साथ ही शिव हनुमान गणेश व दुर्गा जी की भी प्रतिमाएं हैं . यहाँ सुन्दर जलाशय और उससे पाँच धाराओं में बहते झरने हैं . इस मन्दिर का निर्माण द्वापर काल में हुआ बताते हैं . इसके निर्माण की वहाँ कथा भी लिखी है जिसके अनुसार भागसू नामक राजा अपनी प्रजा को प्यास और अकाल से बचाने नागों की झील का सारा पानी एक कमण्डल में भर लाया . इससे नाग नाराज होगये . उन्होंने राजा पर हमला कर दिया और परास्त कर दिया . युद्ध के दौरान जल भरा कमण्डल लुढ़क गया उसी जल से यह जलाशय बना जिसे अमृतकुण्ड कहा जाता है .  

जारी.........