Tuesday, December 11, 2018

तुम जो बिछड़े ....

यह संस्मरण जिया के जाने के बाद लिखा था . काकाजी की पुण्यतिथि पर . कभी पोस्ट नहीं कर पाई . आज सामने आगया तो ब्लाग पर दे रही हूँ . अब उतना प्रासंगिक नही है लेकिन जीवन का एक बड़ा सच इसमें है कि स्नेहमय सम्बल  जीवन की ऊर्जा है . ठोस जमीन है जिसमें पेड़-पौधे जड़ें फैलाते हैं .फलते फूलते हैं .  धूप और पानी की प्रतीक्षा में पेड़ अन्ततः  असमय ही मुरझाकर झड़ जाता है . जिजीविषा खत्म हो जाती है . क्या इन्सान को इतना कमजोर होना चाहिये ?
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19 मई 
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काकाजी आपकी पुण्यतिथि पर मैं आपसे जिया (माँ) की बातें करना चाहती हूँ .क्योंकि आज जिया भी हमारे पास नहीं हैंकैंसर के आगे जिन्दगी को हारकर चली गईं हमेशा के लिये. 
मन मानना नही चाहता ,ठहरकर इस विषय में सोचना भी नहीं चाहता पर मन के चाहने न चाहने से क्या होता है . यह तो अमावस के अँधेरे जैसा सत्य है कि जिया अब हमारे बीच नहीं हैं..
“तेरी जिया हार मानने वालों में से तो नहीं थीं ? ” 
आप होते तो शायद यही कहते . आपका या किसी का भी ऐसा सोचना अकारण भी नहीं है . कोई भी जिसने जिया को संघर्ष करते देखा है, यही कहेगा . वे सचमुच आशा से परिपूर्ण उद्यमी और साहसी महिला थीं . लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में खास तौर पर आपके जाने के बाद वे बहुत निष्क्रिय सी होगईं .उन्हें बहुत अस्थिरचित्त ,निस्पृह और निराश देखकर खेद ही नहीं अचरज भी होता था .क्योंकि हमारी वह धारणा ध्वस्त होने लगीं थी ,जिसे दिल दिमाग में बिठाए हमने एक लम्बा सफर तय कर लिया था .  हालाँकि यह सच है कि हममें से कोई भी उन्हें उनकी अपेक्षाओं के अनुसार समय ,सुविधा और वातावरण नहीं दे पाए . कहीं सर्विस की व्यस्तता ,कहीं व्यापक व उदार दृष्टिकोण की कमी , कहीं पारिवारिक विवशता तो कहीं माँ के लिये स्नेह , संवेदना और दायित्त्वबोध की कमी रही .जीवन के स्नेहमय सम्बल और सबसे अधिक आत्मीय रिश्ते को खोने के बाद हमारे पास अब केवल खेद और मलाल है .फिर भी स्थितियाँ इतनी खराब नहीं थीं कि जिया जीने का उत्साह ही खो देतीं .नींव में ऐसी क्या कमी रह गई कि दीवारें जरा सी आहट से डगमगा उठीं .छत दो-चार बारिशें भी सहने में असमर्थ रही . ऐसा क्यों हुआ कि आपके बाद उनके पास कुछ सोचने या करने को रहा ही नहीं उनके साथ की कितनी ही महिलाएं हैं जो पति के चले जाने के बाद भी और बच्चों से उपेक्षा मिलने के बावजूद स्थिर और सहज रहती हैं .जब तक आप थे ,हमें ऐसा कभी लगा नहीं कि जिया आपके बाद इतनी उदासीन होजाएंगी .
क्योंकि हमने आप दोनों को कभी स्नेह के साथ बैठे-बतियाते नहीं अक्सर मुद्दों पर असहमत होते ,बहस करते और झगड़ते ही देखा था . आप दोनों के विचारों व सिद्धान्तों में काफी अन्तर था . जिया घोर आस्तिक , सामाजिक ,उदार, नैतिक मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाली निश्छल व सरल महिला थीं . वे अपने भावों को शब्दों द्वारा नहीं बल्कि व्यवहार द्वारा व्यक्त करती थीं . उनका हाथ खुला था और 'मँहगा रोए एक बार , सस्ता रोए बार बार' वाला सिद्धान्त पसन्द था .प्रतिफल के बारे में सोचे बिना ही दूसरों की मदद करने में पीछे नहीं रहतीं थीं . 'नेकी कर दरिया में डाल' उनका आदर्श था .जबकि आप मन्दिरों और दूसरे धार्मिक स्थलों व कथा भोज जैसे आयोजनों में विश्वास नहीं करते थे. एकाकी थे . 'या शेख अपनी अपनी देख' का विचार रखते थे . भावनाओं (प्रेम और प्रशंसा) को अक्सर शब्दों में व्यक्त करके मुक्त होजाते थे . बचत और मितव्ययता पर आपका बहुत ज्यादा ध्यान था वगैरा वगैरा ..विचारों के इस अन्तर के कारण हमारे घर में किसी भी मुद्दे पर प्रायः सहमति नहीं होती थी .
आपके विचार व व्यवहार से मैंने जिया को प्रायः त्रस्त ही देखा था .आपकी कई बातों के प्रति उनके अन्दर विरोध-भाव रहता था पर भावनात्मक रूप से आप पर निर्भर भी थीं इसलिये आपसे लड़ते हुए (चाहे लड़ाई उचित होती ) वे एक लड़ाई खुद से भी लड़ती रहतीं थीं और अन्दर ही अन्दर लहूलुहान होती पराजित होती रहतीं थीं . आप भी जानते हैं कि जब आदमी खुद से लड़ता है तब बाहरी लड़ाई स्वतः ही कमजोर होजाती है . एक अनवरत चल रहे विरोध-भाव के कारण वे कमजोर होतीं ही चली गईं थीं .
19 मई 2010 को जब आप हमें हमेशा के लिये छोड़ गए तब पिता को खोने की घोर पीड़ा और कसक होने के बावजूद मैंने सोचा था (शायद वे भी कुछ ऐसा ही सोचतीं थी) कि अब माँ शेष जीवन अपनी तरह से जी सकेंगी .अब तक अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिये भी उन्हें आपसे सीमित खर्च मिलता था पर अब आपकी पेंशन के सारे रुपए उनके हाथ में होंगे . सात-आठ बीघा खेतों की फसल. गाँव में दो पक्के मकान , सारी सुविधाएं ,अपनी खुद की सोच ,विचार और व्यवहार की स्वतन्त्रता ..स्वामित्त्व  ,चारों बच्चे स्थापित हो चुके हैं . फिर उन्हें सिर माथे रखने वाले गाँवभर के लोग.. क्या कमी है ! जिया के साथ पूरी दुनिया है .सिर्फ आप ही तो नहीं है !
लेकिन कहाँ ? कैसी दुनिया ! कैसा स्वामित्त्व ! कैसी स्वातन्त्रता ! आपके बाद इन छह सालों में जो कुछ सामने आया वह निश्चित ही जिया की उस उम्मीद पर ,जिसे दाम्पत्त्य जीवन में त्रस्त लगभग हर स्त्री भविष्य में जीते हुए पालती है , तुषारापात था कि बच्चे बड़े और काबिल होंगे और माँ को एक सुकून भरा जीवन दे सकेंगे . पर अक्सर ऐसा नहीं होता . जिया के साथ भी नहीं हुआ . भावनात्मक स्तर पर भी और बाद में व्यावहारिक स्तर पर भी .
गाँव छूट गया . विचारों की नदी एक जगह ठहरकर रह गई . विरोध-भाव कही पिघलकर बह गया .हाथ-पाँव बेजान से होते चले गए . कभी हमेशा काम में लगी रहने वाली माँ को निष्क्रिय होने की उपाधि मिल गईं . स्मृति उत्तरोत्तर क्षीण होती गई . न उनमें पेंशन के रुपए गिनने सम्हालने की ललक रहीं न फसल का हिसाब सम्हालने की सामर्थ्य . बस एक अतिरिक्त और फालतू पड़े स्टूल सी ,भाव और विचारों से अलग थलग पड़ी सी वे जीवन को तिल तिल खोती हुई ,अपना समय कोई न कोई किताब ,पत्रिका या अखबार पढ़ते गुजारतीं रहीं . विरोध ,शिकायत और इच्छा रहित सपाट सा जीवन ..रोज सुबह शाम..साथ रहने वाले बेटे-बहू और बेटियों को भनक तक न लगी कि जीने के लिये थोड़ा बहुत खाना पेट तक पहुँचाने वाली उनकी नलिका कैंसर की चपेट में आ चुकी है ...
ऐसा क्यों हुोता है
काकाजी ,क्या कभी आपने सोचा कि क्यों बाहर से मजबूत और कठोर दिखता आदमी अन्दर से खोखला होता रहता है ? ऐसी कौनसी संजीवनी है जिसके बल से आदमी को काँटों में भी हँसकर चलता है ? जिसकी ऊर्जा से पहाड़ों को मैदान की तरह पार कर लेता है जिसके कारण लम्बा रास्ता भी छोटा होजाता है और जिसके बल पर कैसे भी मुश्किल वक्त में जिन्दगी को पूर्णता से जीते हुए गुजारता है ,क्या है वह ?
वह जो कुछ भी है ,शायद शुरु से ही जिया के पास नहीं था . पिता का स्नेह बचपन में ही छूट गया .समाज से अकेली जूझती विधवा माँ जीने के साधनों को सहेजती या बच्ची पर ध्यान देती . विवाह के बाद भी पति यानी आपने उनसे अपेक्षाएं तो बहुत रखीं पर स्नेह के सारे स्रोत बन्द ही रखे . हालाँकि आप सरल निष्कपट व्यक्ति थे . सच्चे और ईमानदार शिक्षक थे पर आपके अन्दर का शिक्षक इतना प्रबल था कि जिया के लिये भी आपके पास सिर्फ गिनती पहाड़े और बारहखड़ी का रटना ही था . जिया के सहयोग को आप सिर्फ एक विद्यार्थी के गृहकार्य जितनी ही मान्यता देते थे . जैसा आप चाहते थे वैसा होगया तो शाबासी दे देते थे और नही हुआ तो रुष्ट हो जाते थे . आपने कभी यह नहीं समझना चाहा कि हर स्त्री की तरह ही उनके कुछ कोमल स्वप्न थे .कि उन्हें भी आपके स्नेहमय संरक्षण और विश्वासभरे सम्बल की बहुत आवश्यकता थी . कि वे कार्यक्षेत्र में भले ही सशक्त लगतीं थी पर हृदय से बहुत भावुक और संवेदनशील थीं . और कि आपसी तालमेल व स्नेह के बिना जिन्दगी बिखर जाती है .
आप एक कठोर मास्टर की तरह उनके कार्यों पर आप सवाल उठाते थे .बल्कि सीधा विरोध भी कर देते थे जैसे कि हर महीने ये आटा-दाल मन्दिर पर देने का क्या प्रयोजन ? कोई जरूरत नहीं . इसकी बजाय किसी गरीब को देना ठीक है . कि अमुक बीमार है तो तुम्हें वहाँ देर रात तक रुकने की क्या जरूरत कि तुम्हें अपने से अधिक दूसरों की चिन्ता क्यों रहती है ? क्या दूसरी औरतें भी ऐसा ही करती हैं ?
काकाजी ! क्या जिया दूसरी औरतों जैसी थीं ?
मुझे जब से याद है ,परिवार की गाड़ी खींचने में वे भी बराबर आपके साथ थी . जब आप कुछ साल ‘बड़वारी’ के स्कूल में थे( मैं तो आपके साथ थी ) जिया बानमोर (मुरैना) के पास एक गाँव में दो छोटे बच्चों( सन्तोष ,दिलीप ) के साथ अकेली रहकर बालबाड़ी स्कूल चलातीं रहीं . हर मुश्किल को खुद ही हल करते हुए . वहाँ उनकी कितनी मान्यता थीं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वहाँ के लोगों ने उनसे स्थाई रूप से वहीं बस जाने का पुरजोर आग्रह किया था. यहाँ तक कि वहाँ के सरपंच ने तो अपनी कुछ जमीन भी जिया को देने का वचन दिया था लेकिन तिलोंजरी (मेरा ननिहाल) में नानी अकेली रहतीं थीं .उनकी जमीन को कुछ लोगों की हथियाने की नीयत है ,यह जानकर सन् 1970 में आपने बड़बारी से अपना ट्रांसफर करा लिया और हम सब तिलोंजरी आकर रहने लगे थे . माँ के पास आकर रहने के पक्ष में जिया बिल्कुल नहीं थीं .उन्होंने इसका विरोध भी किया था . वास्तव में तिलोंजरी में आकर रहना और ठीक से स्थापित होना बिल्कुल आसान नहीं था . क्योंकि एक तो गाँवों में तब स्त्री का मायके में रहना सँकरी और ऊबड़-खाबड़ पगडण्डी पर चलने जैसा था (है) दूसरे अधिकार के सवाल पर वहाँ का वातावरण हमारे प्रतिकूल था . उस पर आपकी सबसे अलग चलने की आदत गली में अनावश्यक ही बने गतिरोधकों जैसी थी ,तभी तो जिया को वहाँ व्यवहार में सामान्य से अधिक ध्यान रखना पड़ा था . गाँव के भाई-भतीजों और भावजों से व्यवहार क्या ऐसे ही बना लिया उन्होंने ?
और फिर घर भी तो उन्होंने ही सम्हाला ? आपका वेतन दो सौ रुपए से भी कम था . ऐसे में अतिरिक्त आय की भी जरूरत थी इसके लिये जिया ने सिलाई का काम किया ,मेरे विवाह तक (1975) एक छोटी सी दुकान भी चलाई थी . आपका दायित्त्व स्कूल व घर में सिर्फ बच्चों को पढ़ाने तक सीमित था .तब धवा की मोटी-मोटी लकड़ियों को फाँसकर जलाने लायक बनाने से लेकर सब्जी लाने और पकाकर खिलाने का काम जिया ही करती थीं . आपको तो सोचना भी नहीं पड़ता था कि रजाइयाँ कैसे तैयार होंगी , गेहूँ कौन पिसवाने जाएगा ,खरीफ और रबी की फसलों के लिये बीज का इन्तज़ाम कब कैसे होगा ,गेहुओं में दवा कौन लगाएगा ,कीड़ा लगा हो तो गेहूँ किसकी सहायता से छत पर फैलाए जाएंगे , बरसात से पहले छत और दीवार की दरारों में कहाँ कहाँ सीमेंट भरनी होगी.. क्या इतना भार उठाने वाली महिला क्या साधारण होसकती है ?
इस प्रश्न पर संवेदना के स्तर पर न आपने सोचा और ना ही आपके बच्चों ने . व्यवहार तो उसके बाद की बात है . काकाजी यह सब कहकर मैं आपको दोषी नहीं बता रही केवल शिकायत कर रही हूँ वरना मैं और हम सब जानते हैं कि आपने कभी आराम नहीं किया .सिर्फ आटे-दाल के पारिश्रमिक पर बच्चों को पढाया .( सरकारी तो बाद में हुए ) पैसे बचाने के लिये चालीस-पचास किमी तक का सफर साइकिल से किया. लेकिन जहाँ जिया की बात आती है आप कुछ संवेदनाशून्य रहे या फिर ऐसे लगते रहे .आपको पसन्द नहीं थी इसलिये उन्होंने पाजेब पहनना बन्द कर दिया . करवा-चौथ व गणगौर जैसे व्रत छोड़ दिये , क्रीम पाउडर लगाना छोड़ दिया . वे निस्पृह होतीं गईं. आपको इससे कोई अन्तर ही नहीं पड़ा . लेकिन उनकी तो सोच की उस दिशा में चली गई जहाँ उम्मीदों का सूरज धीरे धीरे डूबता जाता है .एक उद्यमी उत्साह से भरीपूरी महिला को निष्क्रिय होने का विशेषण मिल गया . उदारमना और विशाल हृदय वाली महिला दीवारों में घिरकर रह गई . 
काकाजी आपने नहीं सोचा कि एक अकेले पति द्वारा रखा गया ध्यान , मान और संवेदना ही पत्नी का सबसे बड़ा बल होता है . आपकी जमीन से उखड़ी हुईं सी जिया कहीं जम ही नहीं पाईं . जब स्नेहमय विश्वास और आत्मीयता कहीं छूट जाती है तो जीवन बेरंग होजाता है . किसी ने कहा भी है --

“तुम क्या बिछड़े भूल गए रिश्तों की नजाकत हम
जो भी मिलता है कुछ दिन ही अच्छा लगता है .”
तो क्या यही सच था ? शायद हाँ .. इस सच को आप क्यों नही समझ पाए . 
उस सच को शायद जिया भी नही समझ सकीं तभी तो आपसे मिली परेशानियों को व्यक्त करते रहने के बावजूद आपके बाद किसी को आत्मसात नही कर पाईं .न बेटे को न बेटी को .आपके बाद अपनी तरह से जी ही नही पाईं .
उस सच को हम लोग भी नही समझ पाए तभी तो आपके बाद हम भ्रमित रहे और खो बैठे कभी न भरने वाले घाव के साथ अपनी माँ को . बार बार यही लगता है कि काश आपके बाद जिया इतनी उदासीन न होतीं , काश हम उन्हें उदासीन नहीं होने देते , उनकी बातों को भावनाओं से समझते ,उनकी हर बात का ध्यान रखते तो शायद य़ह रोग न लगता .शायद समय से पहले माँ को यों नहीं खो देते .वे क्या गईं हैं जैसे एक रोशनी ही जीवन से चली गई है . जैसे साँस लेने को हवा भी नहीं बची कहीं .जैसे बिना ठीक से पढ़े जिन्दगी की किताब का सबसे महत्त्वपूर्ण पहला अध्याय ही छिन्न-भिन्न होगया . इसका दर्द क्या कभी मिट सकता है ?
काकाजी ,मैं आपसे क्या शिकायत करूँ ,जबकि खुद को ही क्षमा नहीं कर पा रही हूँ . शायद कभी नहीं कर पाऊँगी .

Monday, December 3, 2018

पूत के पाँव ...


शाला-भवन तो होना ही चाहिये .”--- रंमनपुरा के सरपंच ने गणतंत्र-दिवस समारोह में अपने भाषण में कहा . 
हमारे गाँव के लिये यह बड़ी बात है कि दो साल सीसौदिया जी ने बिना भवन और बिना किसी सुविधा के बढिया तरीके से स्कूल चलाया .कभी कोई शिकायत नहीं की बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट भी बढिया रहा ....
राजमार्ग से दो किमी अन्दर बसा गाँव रमनपुरा . मिडिल व प्राइमरी स्कूल पहले से ही थे . आगे पढने के लिये बच्चों को राजमार्ग , जो भारी ट्रकों , बसों व दूसरे वाहनों से हमेशा व्यस्त रहता है , पार करके दूसरे गाँव जाना पड़ता था . एक दो दुखद घटनाओं के बाद ,गाँव वालों की माँग पर यहाँ दो दो साल पहले ही हाईस्कूल शुरु हुआ है .हाईस्कूल नया नया खुला है . अभी तक इमारत नहीं थी . सामान के नाम प्राचार्य के लिये कुर्सी ,दो ब्लैकबोर्ड , दो टाट-पट्टियाँ ,कुछ रजिस्टर और आवश्यक प्रपत्रों के अलावा कुछ नही था सो तत्काल व्यवस्था के लिये एक उदार किसान ने गाँव के बाहर शुरु में ही अपने खेत के पास चौरस जगह और एक कमरा स्कूल के लिये दे दिया था जिसमें स्कूल के तमाम जरूरी कागजात रखे गए .. बाकी स्टाफ के लिये वहाँ चबूतरा और करीने से बिछाए गए चौरस पत्थर थे . चूँकि ज्यादातर लोग नवनियुक्त थे . सबके अन्दर पढ़ाने का जज़्बा था , प्राचार्य सीसौदिया जी कुछ अच्छा कर दिखाना चाहते थे . वैसे तो वहाँ वातावरण बहुत शान्त था . हरेभरे खेतों के बीच पेड़ों की छाँव तले पढ़ाने में किसी को कोई खास मुश्किल नही थी . लेकिन कई असुविधाएं तो थीं ही . आँधी वर्षा के समय स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी . मार्च के बाद धूप और गर्मी बढ़ जाती थी .वास्तव में वह व्यवस्था अस्थाई थी . जल्दी ही शाला-भवन तैयार होना जरूरी था .इसके लिये प्राचार्य ने सरपंच से बात की और सरपंच ने गाँव के कुछ खास लोगों से .
तय हुआ कि किसी राष्ट्रीय पर्व पर किसी नेता या मंत्री को बुलाया जाए .तभी किसी ने सलाह दी--
"अरे अपने 'परसोत्तम' को बुलवा लो . जानपहचान का है .विधायक जी का खास आदमी है .पक्की खबर है कि अबकी बार टिकट उसी को मिल रहा है . वो जरूर विधायक जी से स्कूल का फण्ड निकलवा लेगा ."
इस तरह पुरुषोत्तमसिंह गणतंत्रदिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कुर्सी पर विराजमान थे . सरपंच का बोलना जारी था--
प्रेंसीपल साब और पूरे स्टाफ ने जिस तरह स्कूल सम्हाला है वह तारीफ के काबिल है पर एक हाईस्कूल के लिये एक अच्छी सी इमारत की सखत जरूरत है जिसके लिये हम सब गाँववाले तो पूरी कोसिस करेंगे ही ,पर हमें होनहार और जुझारू नेता माननीय परसोत्तम जी से काफी उम्मीदें हैं .हमें भरोसा है कि वे जरूर गाँव के लिये कुछ करेंगे . आगे मैं उन्हीं से निवेदन कर रहा हूँ कि वे इस बारे में दो शब्द कहें .
तब लम्बे और इकहरे बदन के पुरुषोत्तमसिंह ने सबकी ओर सगर्व देखते हुए हाथ जोड़े और जोश के साथ भाषण शुरु किया --मैं सबसे पहले गाँव वालों को आजादी के दिन की हार्दिक बधाई देता हूँ . सरपंच जी ने जो कुछ कहा उसे सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई .पर मै देख रहा हूँ कि स्कूल को वहाँ से हटाकर अलग बिल्डिंग में शिफ्ट करना बहुत जरूरी है ,अनिवार्य है .न केवल इसीलिये कि  साधन-सुविधाएं नहीं हैं ,बल्कि इसलिये भी कि वह जगह स्कूल के लिये असंवैधानिक है .संविधान विरुद्ध है .
असंवैधानिक ? !—सरपंच सहित कुछ पढ़े लिखे लोगों ने सवालिया नजरों से एक दूसरे को देखा .
"मैं आपको खुलकर समझाता हूँ ."---.असंवैधानिक यानी संविधान के खिलाफ ..वो ऐसे कि कोई भी सरकारी संस्थान किसी धार्मिक स्थान पर नहीं लगना चाहिये ..
धार्मिक स्थान .! वो कहाँ है ..?”—अब प्राचार्य सहित स्टाफ के सदस्यों व कई ग्रामवासियों की सवालिया निगाहें उस नवयुवक के चेहरे पर जा चिपकीं .
.. जी हाँ में माता के मन्दिर की बात कर रहा हूँ .मैंने देखा है . स्कूल एक मन्दिर के पास लग रहा है . शिक्षा के केन्द्र को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये ..उनका सम्बन्ध किसी मन्दिर ,मस्जिद व गुरुद्वारे से नही होना चाहिये .अतः मेरा निवेदन है कि स्कूल को तुरन्त वहाँ से गाँव के किसी भवन में शिफ्ट करा दिया जाए ..जयहिन्द ..जयभारत .”
गाँव वालों में कुछ उस युवक की नई सोच से प्रभावित थे तो कुछ चकित कि यह सब किसी ने कैसे नही सोचा .
मन्दिर कहाँ हैं हमने तो नही देखा .”–प्राचार्य बोले .
अरे सर कोने में एक छोटी सी मढ़कुली है .---एक युवक हँसकर बोला .वह आपको नहीं दिखेगी .यह पड़ोस के गाँव का भावी नेता है . जो नेता को दिखता है वह किसी और को नही दिखता . दिखेगा ही नहीं अभी अभी यह एक पार्टी से जुड़ा है .
यह सुनकर प्राचार्य ने ठहाका लगाया --
तभी मैं सोचूँ कि यह उस मुद्दे को कहाँ से खींच लाया जो अभी तक किसी के दिमाग में था ही नही ...  

Saturday, July 7, 2018

सामने वाला दरवाजा

सभी सहृदय पाठक एवं ब्लागर साथियों को नमस्कार . मेरा कहानी संग्रह 'क़र्ज़ा-वसूली' प्रकाशित हो चुका है .वैसे कथा-कहानी में पहले ही कई कहानियाँ पढ़ चुके हैं . उसी संग्रह से एक कहानी यह भी ..
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बैंगलोर आए मुझे पन्द्रह-बीस दिन हो चले हैं . इतने दिनों में हम लालबाग ,कब्बन पार्क ,स्कान टेम्पल ,सैंकी टैंक , फोरम ,आदि कई जगह घूम लिये हैं .लेकिन मेरा ध्यान आज भी सामने वाले दरवाजे पर टिका है .
सुशील और सुहानी कोडीहल्ली के एक अपार्टमेंट में थ्री बी एच के फ्लैट में रहते हैं . वे दोनों ही इंजीनियर हैं .सुशील विप्रो में और सुहानी इन्फोसिस में. वास्तव में बैंगलोर और इंजीनियर दोनों आपस में इतने सम्बद्ध होगए हैं कि ट्रेन में एक सहयात्री ने यह जानकर कि मैं बेटे के पास जा रही हूँ ,तपाक से कह दिया-- बेटा किसी कम्पनी में इंजीनियर ही होगा .
वैसे तो मैं किसी बड़े शहर में ही पहली बार आई हूँ लेकिन यहाँ काफी कुछ नया देखने व सोचने के लिये भी मिला है जैसे कि मई--जून के महीने में ,जबकि उत्तर भारत तप रहा होता है यहाँ मौसम बड़ा सुहावना रहता है .शाम को अक्सर बारिश हो जाती है और कभी-कभी इतनी ठण्डक होजाती है कि स्वेटर पहनना पड़ता है .यहाँ सुबह-सुबह हर घर के दरवाजे पर सुन्दर रंगोली बनी देखी जा सकती है और हर महिला के चाहे वह अमीर गरीब कुलीन निम्न ,किसी भी वर्ग की हो बालों में गजरा लगा देखना बड़ा अच्छा लगता है . सोचिये कि सुबह काम वाली के साथ ही मोगरा की प्यारी खुशबू भी आपके कमरे में प्रवेश करे तो कैसा लगेगा .यहाँ लोग पेड़ों का बहुत ध्यान रखते हैं . हर घर में नारियल का पेड़ तो जरूर देखा ही जा सकता है पर आम कटहल चीकू और अनार के पेड़ भी यहाँ-वहाँ दिख ही जाते हैं वैसे ही जैसे दस साल पहले लगभग हर तीसरी दुकान में एस.टी.डी और पी सी ओ के केबिन हुआ करते थे . अगर जेब में पैसा है तो यहाँ सुविधाओं की कमी नही है .सामान लेने के लिये हमारे कस्बा की तरह दुकानदार से मगजपच्ची नही करनी पड़ती कि भैया जल्दी करो ..यह ठीक नही है दूसरा दिखाओ ..कि अरे तुमने पचास रुपए ज्यादा जोड़ दिये हैं . यहाँ शापिंग माल में जाओ पसन्द का सामान टोकरी में डालते जाओ और कम्प्यूटर पर बिल अदा करदो . यही नही ऑर्डर देकर घर पर ही हर तरह का सामान मँगाया जा सकता है .बाजार जाने की भी जरूरत नही . सुहानी तो दही या प्याज-टमाटर तक ऑर्डर से मँगा लेती है .यह अच्छा है . जीवाजीगंज में हम लोग सब्जी और राशन के थैले लादे लादे हाँफते-डगमगाते कैसे घर पहुँचते हैं हमी जानते हैं . यहाँ सोफा पर बैठे बैठे ही हर चीज आपके सामने हाजिर . एकदम कहानियों के जिन्न की तरह ही. .
लेकिन यहाँ बहुत सी अखरने वाली चीजें भी हैं . जैसे अब चारों ओर पेड़ों से ज्यादा बड़े-बड़े उगते अपार्टमेंट हरियाली को उसी तरह नकारते जा रहे हैं जिस तरह अब बड़े-बुजुर्गों को नकार दिया जाता है . यहाँ आप अकेले हैं . सैकड़ों की भीड़ में न आप किसी को जानते हैं न कोई आपको . बड़े-बड़े अपार्टमेंट में कई मंजिल ऊँचाई पर हजार-पन्द्रह सौ वर्गफीट के फ्लैट दूर से किसी विशाल वृक्ष के तने में पक्षियों के कोटर जैसे ...एक छत के नीचे ही आपकी पूरी दुनिया है .दैनिक क्रियाओं के लिये बाहर निकलने की जरूरत ही नही होती .बाहर भी बिना किसी से बात किये आप अपने सारे काम कर सकते हैं .पूरा जीवन गुजार सकते हैं . एकाकी ,नीरस और बेरंग से जीवन में टेलीविजन ही रंग भरने का एकमात्र साधन है .
सुशील ने बताया कि तेजी से हो रहे विकास और आधुनिकीकरण के कारण आई टी सिटी बन गए इस शहर की अपनी मौलिकता अब बदल रही है .बागों झीलों और सुहावने मौसम ,और स्वच्छ आबोहवा के लिये मशहूर इस शहर में अब हरियाली सिमटती जा रही है . आगे बढ़ता शहर धीरे-धीरे कंकरीट के जंगल में बदलता जा रहा है . सड़कों से ऊपर कारें दिखाई देतीं हैं. दुनिया भर से कम्पनियाँ और ऐम्पलायीज यहाँ इस तरह दौड़े चले आ रहे हैं जैसे ज्वैलरी और साड़ियों की सेल की ओर महिलाएं भागतीं हैं .
! मैं नही भागती हाँ !.और शायद मम्मी भी नही .”-–सुहानी हँसते हुए सुशील को बीच में ही टोक देती है .
तब तुम विशुद्ध महिला नही हो .
सुशील भी हँसता है .दोनों की हँसी मन से हर तरह का बोझ हटा देती है .लेकिन जब वे ऑफिस चले जाते हैं तो समय जैसे ठहर जाता है . शनिवार और रविवार को उन्हें अवकाश मिलता है .ये दो ही दिन हैं जबकि हम लोग साथ बैठकर बोलते-बतियाते हैं .कहीँ घूमने चले जाते हैं या बाहर खाना खाने की योजना बनाते हैं .
इन दो दिनों के अलावा सप्ताह के पाँच दिनों का समय उन दोनों के लिये जहाँ सुपरफास्ट ट्रेन जैसा है तो मेरे लिये सुस्त बैलों वाली गाड़ी जैसा . कोडीहल्ली नाम के इस एरिया के एक अपार्टमेंट में रहते हुए मैंने महसूस किया कि सिवा इस भाव के कि हम अपने ही देश के एक शहर में हैं ,यहाँ रहना विदेश जैसा ही है .रश्मि दीदी ने जो अब आस्ट्रेलिया में स्थाई रूप से बस गई हैं ,बताया था कि वहाँ किसी को किसी से कोई मतलब नही हैं .साथ साथ चल रहे हैं पर सिवा इस ज्ञान के कि वे सब मनुष्य जाति के ही हैं ,एक दूसरे के बारे में कुछ नही जानते . मतलब जानना ही नही चाहते . 
मुझ जैसी मोहल्लाई संस्कृति की अभ्यस्त महिला के लिये यह हैरानी की बात है कि आप एक ही जगह पर रहने या रोज मिलने वाले लोगों का नाम तक नही जानते . अपने दो-ढाई मीटर की दूरी पर रह रहे पड़ौसी से अनजान हैं .एक हमारा मोहल्ला है जहाँ घर की बातें गली में गूँजा करती हैं .किसके घर कौन मेहमान आया है ,किसकी बेटी ससुराल जा रही है ,किसके घर में कलह के कारण चूल्हे अलग होगए हैं .ये बातें कम से कम पड़ौसी से छुपी नही रहती .हमारे पड़ौसी सक्सेना जी ऑफिस जाते हैं तो पूरे मोहल्ले को खबर होजाती है .पहले तो बाहर गली में आकर स्कूटर स्टार्ट कर बैठते हुए वे अपनी पत्नी को जोर से सुनाते हैं---रमा जा रहा हूँ .” फिर रास्ते में मिलने वाले हर व्यक्ति से उनका संवाद बुलन्द होता है—भैया जी नमस्कार ...चाचाजी कैसे हैं ?..जीजीबाई सब ठीकठाक है ?”...इन संवादों से सड़क तक पूरी गली जाग जाती है .
सुबह पानी आता है तो कोई न कोई चिल्लाकर सबको बता ही देता है कि नल आ गए . चाहे गली में झाड़ू लगाने वाली कोशला या उसकी सास या पति आए, चिट्ठी डालने डाकिया आए या फिर सब्जी वाला गोविन्द ..बिना राम राम, श्याम श्याम के नही निकलते . कहीं कथा होती है तो चरणामृत और पंजीरी पास-पडौस में बाँटी जाती है .किसी के यहाँ गमी होजाती है तो मोहल्ले भर की औरतें वहाँ रात रात भर बैठकर जागतीं हैं . बिना बुलाए ही भजन-कीर्त्तन में शामिल हो जातीं हैं .
मम्मी यह फ्लैट शंकर रेड्डी का है .तेलगू है.— मेरे आते ही सुहानी ने मुझे कई जरूरी ,गैर-जरूरी जानकारियाँ दे डालीं थीं—ग्राउण्ड फ्लोर पर सुगन्धा है . बहुत अच्छी है वह तमिल है लेकिन हाउस-वाइफ होने के बावजूद उसकी अँग्रेजी अच्छी है इसलिये चीजों को समझने में उससे बहुत हैल्प होजाती है .बगल में कोई बंगाली रहते हैं .
मम्मी आप दरवाजा बन्द ही रखना ,वरना रोज दोपहर मछली की बू आपको परेशान करेगी .और हाँ  सामने वाला फ्लैट एक न्यू कपल का है जोसेफ और प्रिया .क्रिश्चियन हैं .जोसेफ टीसीएस में इंजीनियर है और प्रिया हाउस वाइफ . मलयाली हैं पर हिन्दी भी जानते हैं .बोलते भी है . आपको अच्छा लगेगा .प्रिया शायद प्रेगनेंट भी है .
मैंने साश्चर्य सुहानी को देखा .सुबह से शाम तक ऑफिस में रहने वाली लड़की स्वभाव और जिज्ञासावश कितनी जानकारियाँ इकट्ठी कर लेती है .
अरे मम्मी !,मुझे तो सुगन्धा ने बताया  .”—सुहानी मेरा भाव समझकर हँस पड़ी.
यहाँ भी अभिव्यक्ति और उसकी समझ ही संवाद को सुलभ बना रही थी . तभी से मेरा ध्यान जबतब सामने वाले फ्लैट पर अटका रहता है .
वास्तव में यहाँ जो बात मुझे सबसे ज्यादा अखरती है वह भाषा की अनभिज्ञता ही है .
दरअसल यह एरिया पूरी तरह अहिन्दी भाषी है .खास तौर पर यह बिल्डिंग जो दूसरे अपार्टमेंटों की तुलना में छोटी है .इसमें तीस फ्लैट हैं और जहाँ तक सुशील व सुहानी को मालूम है लगभग सभी परिवार या तो कन्नड़ और तेलगू भाषा भाषी हैं या तमिल और मलयालम . ये चारों भाषाएं द्रविड़ परिवार की हैं .चारों की लिपियाँ अलग होने पर भी आपस में काफी कुछ समझ लेते हैं .मैं शाम को छत पर चली जाती हूँ वहाँ कुछ महिलाएं आपस में बातें करतीं हैं पर मेरे पल्ले नही पड़ती है .संभव है कि मेरी खिल्ली उड़ाती हों लेकिन उनकी मुस्कराहट जो कभी कभी मेरी ओर आजाती है .इससे मुझे यह तो पता चल जाता है कि वे मेरे लिये अच्छा भाव ही रखतीं होंगी .मैं उनके साथ खूब सारी बातें करना चाहती हूँ .बातें उनकी परम्पराओं की ,रीतिरिवाजों की ...भावों और विचारों की .. 
हालाँकि ऐली शायद मेरा भाव समझकर ही कहती है –आइ अण्डरस्टेंड हिन्दी लिटिल लिटिल .”..और सुगन्धा जो तमिल भाषी है और सुहानी की सहेली भी ,कभी कभी पूछ लेती है—हाउ आर यू आंटी ?” उसके दाँत बहुत उजले हैं और हँसी बहुत प्यारी कोमल ..लेकिन ओ के ,फाइन थैंक्यू तक सीमित संवाद मुझे भूखे मेहमान को एक गिलास पानी देकर टरकाने जैसा लगता है .सचमुच भाव-संचार के लिये भाषा कितनी आवश्यक है .
शान्ताम्मा हमारे यहाँ काम करती है . वह गहरे काले रंग की सीधी-सादी अधेड़ महिला है .बड़ी बड़ी आँखें विनम्रता से भरी हैं . बाल काले और घुँघराले हैं . यहाँ की दूसरी महिलाओं की तरह वह भी गहरे रंग ( हरा, नीला जामुनी ,कत्थई )की साड़ी पहनती है . नाक में दाँयी तरफ बड़ा सा फूल पहने है . गजरा नही लगाती इसलिये अनुमान लगाया कि शायद उसका पति नही है . सुहानी ने ही बताया कि गजरा यहाँ सुहाग का प्रतीक है .शान्ताम्मा अनपढ़ है .पढ़े-लिखे लोग टूटी-फूटी ही सही अंग्रेजी से काम चला लेते हैं पर शान्ताम्मा को यह बताने के लिये कि मेरे आने से जो अतिरिक्त काम बढ़ा है उसके पैसे अलग देंगे ,सुहानी ने सुगन्धा का सहारा लिया .
मुझे घुटन होती है . अगर मैं तमिल समझ सकती या शान्ताम्मा हिन्दी समझ पाती तो मैं जान सकती कि ,’वह कहाँ से आती है ? उसके घर में कौन कौन है ? वह कभी कभी बहुत उदास क्यों होती है ? .कि एक दिन वह काम करते करते रो क्यों रही थी ? अगर मैं कन्नड़ समझती तो पता लग जाता कि अभी-अभी दो आदमी एक लड़के को क्यों पीट रहे थे ? या कि रोज फेरी वाला क्या बेचते हुए निकलता है ?’
यहाँ मुझे निरक्षरता और भाषा की अनभिज्ञता की पीड़ा का अहसास तीव्रता से हुआ है .साथ ही अपनी भाषा के महत्त्व का भी .. क्यों अपनी भाषा मातृभाषा कहलाती है .क्योंकि वह माँ की गोद जैसी निश्चिन्तता और तृप्ति देती है .माँ की तरह हमारी बात समझती है ,औरों को समझाती है . भाषायी संवेदना मुझे सोचने मजबूर करती है कि राष्ट्रीय एकता के लिया भाषा की एकता सबसे ज्यादा जरूरी है.
सुशील व सुहानी सुबह साढ़े आठ तक चले जाते हैं . सुबह तो ऐसी भागमभाग मचती है कि पूछो मत . मैच की चुन्नी या जरूरी कागज न मिलने पर सुहानी हड़कम्प मचा देती है .चाय भी अक्सर भागते भागते पीती है .वह ऑफिस की वैन से जाती है और सुशील अपनी गाड़ी से . सुशील जाते जाते जरूर कहता है – मम्मी दरवाजा बन्द ही रखना . आपको बाहर निकलने की जरूरत नही है कोई खास बात हो तो मुझे फोन करना .
उनके जाते ही खामोशी छा जाती है .मेरे सामने पूरा दिन होता है .काम तो सारा शान्ताम्मा ही निपटा जाती है .मैं किचिन में डिब्बे-डिब्बी साफकर जमा देती हूँ .सुहानी के बेतरतीबी से अलमारी में ठूँसे गए कपड़ों को तहाकर रख देती हूँ .नहाने के बाद थोड़ी देर ईश्वर का ध्यान करती हूँ पर मेरा मन ही जानता है कि वह सिर्फ एक नियम पालन होता है . अभी मुझमें वह क्षमता नही कि चारों ओर से ध्यान खींचकर सम्पूर्ण भाव ईश्वर में लगा दूँ .
बन्द कमरे में मेरा मन नही लगता . टीवी पर ज्यादातर ऐसे कार्यक्रम आते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि इससे तो न देखते वही अच्छा था . पैसे की चमक दमक वाले सीरियल आम जिन्दगी से दूर ले जाने वाले हैं . गाड़ी ,बँगला ,मँहगे कपड़े भारी भरकम गहने आदि से कुछ नीचे ही नही दिखता .बिना षड़यन्त्र के कहानी आगे नही चलती . यही हाल फिल्मी चैनलों का है .एक ही तरह की सस्ती फिल्में रिपीट होती रहती हैं . और समाचार चैनलों की तो बात करना ही बेकार है ..टीवी के सहारे दिन नही काटा जा सकता .
मैं एक नजर सामने के दरवाजे पर डालती हुई अक्सर गैलरी से होती हुई सामने झरोखा तक चली जाती हूँ जहाँ से नीचे गली का दृश्य दिखाई देता है . सामने एक शानदार कोठी है जिसमें केवल कार और कुत्ता दिखाई देता है . बगल में एक प्रोवीजनल स्टोर है जिसका मालिक रजनीकान्त है .असली रजनीकान्त के विपरीत दुबला और सुस्त . दुकान पर जो बोर्ड लगा है उसपर रोमन में लिखे प्रोवीजनल स्टोर के अलावा जो लिखा है वह मेरे लिये काला अक्षर भैंस बराबर हैं .निरक्षरता के अँधेरे की भयावहता को मैंने सबसे पहले यहीं महसूस किया . कन्नड़ सिखाने वाली किताब से मैंने हालु ,मोसरू, सोप्पु जैसे कुछ शब्द याद किये तब मुझे एक कविता याद आई—
शब्द खिड़कियाँ हैं ,रोशनदान हैं आती है जिनसे धूप और हवा मेरे अँधेरे कमरे में ..
आजकल एक नई और साफ-सुथरी फिल्म आई है सिर्फ तुम .उसका का एक गीत --एक मुलाकात जरूरी है सनम जब तब सुनाई देजाता है तो लगता है जैसे कोई अपना ही पुकार रहा हो .
गली में कुछ आगे मटन शाप है जिसमें खट्खट् कच् कच् होती रहती है .न चाहते हुए भी भेड़-बकरों के चमड़ी और सिरविहीन धड़ लटके दिख ही जाते हैं .मांस का यूँ खुलेआम बिकना मुझे ठीक नही लगता पर मेरे लगने से क्या होता है . दूसरी तरफ एक पाँच सितारा होटल दिनोंदिन आसमान को दबाते हुए उठ रहा है . मुझे आसमान का यूँ दबते जाना बहुत अखरता है.
सामने से लौटकर कमरे में आने से पहले मैं एक नजर फिर सामने वाले दरवाजे पर डालती हूँ .यह प्रिया कभी बाहर नही निकलती .क्या इसे धूप और हवा की जरूरत नही है . क्या इसे खुला आसमान देखने की इच्छा नही होती .एक ही कमरे में दिनभर बन्द रहकर क्या ऊब नही होती होगी . क्या बाहर निकलने से डरती है .पागल है .यहाँ डर की क्या बात है . मैं तो हूँ .मेरे लिये वह यह भी सुहानी जैसी ही है .मैं इन्तजार करती हूँ कि दरवाजा खुले तो मैं कुछ बात करूँ .जरूरत हो तो कुछ सहायता भी करूँ .गर्भवती की कितनी ही समस्याएं व जरूरतें होतीं हैं .मैं खुद ही यह सब सोचती रहती हूँ .एक दूसरे की भाषा समझने वालों में वह भी इतने निकट रह रहे लोगों में कम से कम संवाद तो होना चाहिये न . 
एक दिन जोसेफ के दरवाजे पर कई जोड़ी जूते-चप्पल रखे दिखे .बाजू वाली खिड़की भी खुली है .हँसने की मिलीजुली आवाजें आ रही थीं .कुछ अजीब तरह की गन्ध भी .
इनका कोई त्यौहार होगा शायद .”---सुहानी ने शाम को बताया .मुझे अजीब लगा .
ये लोग त्यौहार भी बन्द कमरे में ही मना लेते हैं !”
मम्मी आप बेकार ही इतना सोचतीं हैं . इन लोगों का कल्चर अलग है . वैसे भी यहाँ अपने कस्बा जैसी बात नही है कि लोग चाय-चीनी तक माँगने के बहाने रसोई तक चले आते हैं .यहाँ बस दूर से हाई-हैलो काफी होती है .
मैं देखती हूँ कि सुहानी यहाँ की अभ्यस्त होगई है .उसका काम भी ऐसा ही है .सुबह से शाम तक ऑफिस में बिजी रहने वाले को वैसे भी किसी से मेलजोल की न फुरसत होती है न जरूरत . पर जाने क्यों उसकी बात मेरे सिर से किसी चलताऊ गाने की तरह गुजर गई .
मुझे सुबह छह बजे जागने की आदत है लेकिन कामकाजी लोगों की सुबह अक्सर आठ से नौ बजे तक ही होती है . दूधवाला सात बजे दूध की थैलियाँ दरवाजे के बाहर टँगी पालीथिन में रख जाता है . मैं तो अपनी थैलियाँ उठा लेती हूँ पर कई बार बन्दरों को पैकेट उठाकर भागते देखा गया है एक बार तो पैकेट को वहीं फाड़कर दूध पी भी गए हैं . उस दिन भी अपने पैकेट उठाते हुए मैंने टैरेस पर एक बन्दर को बैठे देखा .
जोसेफ को जगाकर दूध के पैकेट अन्दर ले लेने को कहना चाहिये-–मैंने सोचा .इसी बहाने मुझे उन लोगों से बात करने का अवसर भी मिल जाएगा . पहल कोई भी करे पहल तो होनी ही चाहिये .
मैंने किवाड़ों पर हल्की सी दस्तक दी .कुछ देर बाद ही दरवाजा खुला . एक युवक ने सिर निकालकर मेरी ओर विस्मय से देखा . सुशील की ही उम्र का साँवला सलोना बड़ी और मोहक आँखों वाला यह युवक जरूर जोसेफ ही होगा .
दूध का पैकेट अन्दर ले लो , बाहर बन्दर घूम रहा है .कल बाजू वालों के पैकेट उठाकर भाग गया था .
ओह..सौरी आंटी !...नींद नही खुली .. थैंक्यू .”---उसने बड़े अपनेपन के साथ मुस्कराकर कहा .
मैं कहना चाहती थी कि कभी बाहर भी निकला करो बेटा .हाँ यह ठीक रहेगा .उसने मुझे कितने अपनेपन के साथ आंटी कहा .पड़ौसी से व्यवहार अच्छा हो तो जीवन ज्यादा सहज और सरल हो जाता है .लेकिन तबतक दरवाजा बन्द होगया .शायद वे लोग अभी नीद में ही होंगे .कोई बात नही जोसेफ की मुस्कराहट ने यह तो बता ही दिया कि न तो मैं उनके लिये अपरिचित हूँ न ही वे मेरे लिये .
और..आज मैं सुखद अहसास से भर उठी .जोसेफ का दरवाजा खुला है .सामने जो गुलाबी गाउन पहने लम्बी छरहरी युवती गुलदस्ता ठीक कर रही है वह प्रिया ही होगी .उसके बाल काले घने और घुँघराले हैं .जब वह बाहर आई तो चिरपरिचित मुस्कान के साथ बोली—हैलो आंटी कैसे हो ?”
अरे वाह ! यह तो मुझे जानती है .’—मन पुलकित होगया . अपनी भाषा में किसी का संवाद सुनकर .
अच्छी हूँ .आज अच्छा लग रहा है तुम्हें देखकर .
सुहानी ने आपके बारे में बताया था .
मैं भी कबसे सोच रही थी कि तुम्हें देखूँ ..बात करूँ .—मेरा उत्साह मेरी आवाज से छलका जा रहा था .वह पहली बार मिल रही थी फिर आजकल तो बच्चों से भी आप कहा जाता है पर सुहानी की उम्र की उस लड़की से आप कहा ही नही गया .मेरी बात सुनकर वह मुस्कराई .मैं बोलती रही –
सुहानी ने जब बताया कि हमारे सामने वाले पड़ौसी हिन्दी जानते हैं तो मुझे बड़ी खुशी हुई .नही तो लग रहा था कि जाने कौनसे देश में ..”
सुहानी चला गया ?”–प्रिया ने बीच में ही पूछा . शायद उसे सुहानी के बारे में कुछ और पूछना या कहना हो ,मैंने सोचा लेकिन उसने कुछ कहा नही . मैंने ही पूछा –आप लोग कहाँ से हैं ?”
केरला से.”
अच्छा केरल से !”–मैंने उल्लास के साथ दोहराया ,मानो केरल मेरा गाँव हो .
यहाँ कौन कौन हैं ?”
मैं और मेरा हसबैंड .
तुम बाहर नही आती हो ..मैं तो कई दिनों से...
मेरा तबियत ठीक नही रहता .उसने संक्षिप्त उत्तर दिया . वह मेरी बातों को ऐसे सुन रही थी जैसे कोई बड़ा कवि किसी नौसिखिया की छोटी मोटी तुकबन्दियों को सुनता है .उसने मेरे या हमारे बारे में कुछ नही पूछा .जैसे कि वह सब जानती हो . लेकिन वह यह तो नही जानती थी कि अगर वह ऐसे ही चौबीसों घंटे अन्दर रहेगी , बाहर निकलकर खुली हवा और धूप नही लेगी तो तबियत तो खराब रहेगी ही ..पर मैं यह सब उसे बताती तब तक तो वह अच्छा आंटी कहकर अन्दर चली गई और मेरे देखते देखते दरवाजा भी बन्द कर लिया . मेरा यह वाक्य कि ,“कोई परेशानी या जरूरत हो तो बिना संकोच बताना मैँ भी तुम्हारी माँ जैसी हूँ . बाहर ही पड़ा ही गया .